और मेरी ले ली गयी

सुबह की पहली किरण कमरे में छनकर आ रही थी, और मैं अपनी आदत के मुताबिक सबसे पहले उठ गई। रसोई में जाकर चाय का पानी चढ़ाया, बाहर बालकनी से शहर की हल्की-हल्की हलचल दिख रही थी। आज का दिन भी वैसा ही लग रहा था, जैसे हर रोज़—अमित ऑफिस के लिए तैयार होता, मैं नाश्ता बनाती, और फिर घर की छोटी-मोटी जिम्मेदारियाँ निभाती।

मैं रिया हूँ, अट्ठाईस साल की, और अमित से शादी को तीन साल हो चुके हैं। हम दिल्ली के एक अपार्टमेंट में रहते हैं, जहाँ अमित का छोटा भाई रोहन भी हमारे साथ है। रोहन अभी कॉलेज खत्म करके जॉब की तलाश में है, और घर में उसकी मौजूदगी से थोड़ी रौनक रहती है। अमित एक आईटी कंपनी में काम करता है, सुबह जल्दी निकल जाता है और शाम को देर से लौटता है। मैं घर संभालती हूँ, कभी-कभी फ्रीलांस ग्राफिक डिजाइन का काम भी कर लेती हूँ।

उस दिन अमित ने जल्दी में नाश्ता किया और निकल गया। मैंने रोहन को आवाज़ दी, "रोहन, उठो, चाय तैयार है।" वह कमरे से निकला, बाल बिखरे हुए, लेकिन उसकी मुस्कान हमेशा की तरह ताजगी भरी थी। हम दोनों ने साथ बैठकर चाय पी, और बातें कीं—उसके जॉब इंटरव्यू की, मौसम की, और घर की छोटी-मोटी बातों की। रोहन हमेशा ध्यान से सुनता है, अमित की तरह जल्दबाज़ी नहीं करता।

दोपहर में मैंने घर का काम निपटाया, और रोहन लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था। मैंने सोचा आज कुछ स्पेशल बनाऊँ, तो सब्जियाँ काटने लगी। तभी रोहन रसोई में आया, "भाभी, कुछ मदद करूँ?" मैंने मुस्कुराकर कहा, "नहीं, तुम अपना काम करो।" लेकिन वह रुका रहा, और हम बात करने लगे। उसने बताया कि कल का इंटरव्यू अच्छा नहीं गया, थोड़ा उदास लग रहा था। मैंने उसे दिलासा दिया, "चिंता मत करो, और बेहतर मौका मिलेगा।"

शाम को अमित लौटा, लेकिन वह थका हुआ था। डिनर के बाद हम तीनों ने टीवी देखा, कोई पुरानी फिल्म चल रही थी। रोहन बीच-बीच में मेरी तरफ देखता, और मैं महसूस कर रही थी कि उसकी नज़रों में कुछ अलग है। लेकिन मैंने अनदेखा किया, सोचा शायद मेरी गलतफहमी है। रात को बिस्तर पर लेटकर मैं सोचने लगी कि घर में सब कुछ सामान्य है, फिर भी कहीं एक खालीपन सा है।

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अगले कुछ दिन ऐसे ही गुजरे। रोहन घर में ज्यादा समय बिताने लगा, और हमारी बातें बढ़ने लगीं। एक दोपहर वह मेरे पास आया, "भाभी, आपका डिजाइन का काम देख सकता हूँ?" मैंने अपना पोर्टफोलियो दिखाया, और वह ध्यान से देखता रहा। उसकी तारीफों से मुझे अच्छा लगा, अमित तो कभी इतना ध्यान नहीं देता। धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि उसकी मौजूदगी मुझे सुकून देती है।

एक शाम अमित को ऑफिस से देर हो गई। मैं और रोहन अकेले थे। हमने साथ डिनर किया, और बातें करते-करते पुरानी यादों पर आ गए। रोहन ने बताया कि कॉलेज में उसकी एक गर्लफ्रेंड थी, लेकिन ब्रेकअप हो गया। मैंने अपनी शादी से पहले की जिंदगी के बारे में शेयर किया। उसकी आँखों में एक गहराई थी, जो मुझे छू गई। रात गहराने लगी, लेकिन हम बातें रोक नहीं पा रहे थे।

उस रात मैं सो नहीं पाई। मन में उथल-पुथल थी। रोहन मेरा देवर है, लेकिन उसकी बातों में एक ऐसी गर्माहट है जो अमित में नहीं। अगले दिन सुबह मैंने खुद को सामान्य रखने की कोशिश की, लेकिन जब रोहन ने मुझे देखा, तो उसकी मुस्कान में कुछ छिपा सा था। दोपहर में वह फिर रसोई में आया, इस बार करीब खड़ा हो गया। "भाभी, आप बहुत अच्छी हैं," उसने धीरे से कहा। मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई।

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शाम को अमित घर आया, लेकिन वह जल्दी सो गया। मैं बालकनी में खड़ी थी, चाँदनी रात थी। रोहन चुपके से आया, "नींद नहीं आ रही?" मैंने हामी भरी। हम चुपचाप खड़े रहे, हवा में एक अजीब सी तनाव था। उसने मेरी तरफ देखा, और मैंने महसूस किया कि हमारी नजरें मिलीं। कुछ नहीं कहा, लेकिन वह पल लंबा खिंच गया।

अगली सुबह सब कुछ वैसा ही लग रहा था, लेकिन मेरे मन में बदलाव आ चुका था। रोहन के साथ समय बिताना अब एक जरूरत सी लगने लगी। एक दिन अमित को बाहर जाना पड़ा, दो दिन के लिए। घर में सिर्फ मैं और रोहन। पहली शाम हमने फिल्म देखी, और बीच में उसका हाथ मेरे कंधे पर छू गया। मैंने दूर नहीं किया, बल्कि एक झुरझुरी सी महसूस हुई।

रात को मैं अपने कमरे में थी, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। दरवाजा खुला था, और रोहन अंदर आया। "भाभी, बात कर सकते हैं?" वह बिस्तर के पास बैठ गया। हमने बातें शुरू कीं, लेकिन धीरे-धीरे उसकी आँखों में इच्छा झलकने लगी। मैंने विरोध नहीं किया, क्योंकि मेरे अंदर भी वही आग सुलग रही थी। उसने मेरे हाथ को छुआ, और मैंने आँखें बंद कर लीं।

उसकी उँगलियाँ मेरे हाथ पर फिसलीं, धीरे-धीरे ऊपर की तरफ। मेरी साँसें तेज हो गईं। रोहन ने मेरे करीब आकर मेरे कान में फुसफुसाया, "भाभी, मैं आपको पसंद करता हूँ।" मैंने कुछ नहीं कहा, बस उसकी तरफ मुड़ी। उसने मुझे अपनी बाहों में लिया, और हमारा पहला चुंबन हुआ—धीमा, गहरा, भावनाओं से भरा। मेरे शरीर में एक नई ऊर्जा दौड़ गई।

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उस रात हमने सीमाएँ लाँघीं। रोहन के स्पर्श ने मुझे ऐसे छुआ जैसे कभी किसी ने नहीं। उसकी उँगलियाँ मेरी कमर पर घूमीं, और मैंने खुद को उसके हवाले कर दिया। हमारा मिलन तीव्र था, लेकिन इसमें एक भावनात्मक जुड़ाव था। मैं महसूस कर रही थी कि यह सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मेरे अकेलेपन का जवाब था।

सुबह उठकर मैंने खुद को आईने में देखा। चेहरे पर एक नई चमक थी, लेकिन मन में अपराधबोध भी। रोहन ने मुझे देखा और मुस्कुराया, "कल रात अद्भुत थी।" मैंने शरमाकर नजरें झुका लीं। दिन भर हमने एक-दूसरे को छुआ, बातें कीं, और शाम को फिर वही पल दोहराया। इस बार ज्यादा गहराई से, ज्यादा जुनून से। उसने मेरे शरीर के हर हिस्से को प्यार किया, और मैंने खुद को पूरी तरह खो दिया।

अमित के लौटने से पहले हमने कई पल चुराए। हर बार कुछ नया—कभी धीमा, कभी तेज, लेकिन हमेशा भावनाओं से जुड़ा। रोहन की आँखों में मेरे लिए प्यार था, और मैं जानती थी कि यह रिश्ता अब बदल चुका है। लेकिन मेरे मन में एक डर था, कि यह सब कब तक चलेगा।

एक शाम हम बालकनी में थे, सूरज डूब रहा था। रोहन ने मुझे गले लगाया, "भाभी, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता।" मैंने उसकी छाती पर सिर टिका दिया, और हम चुप रहे। उस रात फिर हम एक हुए, इस बार ज्यादा कोमलता से। उसकी हर हरकत मुझे नई अनुभूति दे रही थी, जैसे मेरी आत्मा तक पहुँच रही हो।

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लेकिन अगले दिन अमित लौट आया। सब कुछ सामान्य लगने लगा, लेकिन रोहन और मेरी नजरें अब भी मिलतीं। एक दोपहर जब अमित सो रहा था, रोहन मेरे कमरे में आया। हमने चुपचाप एक-दूसरे को छुआ, और एक छोटा सा पल चुराया। वह पल तीव्र था, जल्दी में, लेकिन उतना ही संतोषजनक।

समय बीतता गया, और हमारा रिश्ता गहराता गया। हर मिलन में नई भावनाएँ जुड़तीं—कभी ईर्ष्या, कभी डर, कभी गहरा प्यार। मैं जानती थी कि यह गलत है, लेकिन रोक नहीं पा रही थी। रोहन ने एक दिन कहा, "मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ।" मेरे दिल में उथल-पुथल थी।

एक रात अमित बाहर था। हमने पूरे घर को अपना बनाया। रोहन ने मुझे उठाकर बिस्तर पर लिटाया, और धीरे-धीरे मेरे कपड़े उतारे। उसकी जीभ मेरे शरीर पर घूमी, और मैं सिहर उठी। हमारा मिलन लंबा चला, हर पल में नई ऊँचाइयाँ छुईं। मैंने महसूस किया कि मेरी जिंदगी अब बदल चुकी है।

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लेकिन फिर एक दिन सब कुछ उजागर होने का डर आया। रोहन ने कहा कि वह घर छोड़कर जाएगा, लेकिन मैंने मना किया। हमारी बातों में अब भविष्य की चिंता थी। उस रात हम फिर करीब आए, लेकिन इस बार उदासी के साथ। उसने मुझे कसकर पकड़ा, और मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं, सोचते हुए कि यह सब कहाँ ले जाएगा।

धीरे-धीरे हमारा रिश्ता एक आदत बन गया। हर छिपे पल में हम एक-दूसरे को पाते। रोहन की बाहों में मैं खुद को सुरक्षित महसूस करती, और उसके स्पर्श से मेरी आत्मा जागती। लेकिन अंदर ही अंदर मैं जानती थी कि यह "ले ली गयी" मेरी खुशी है, जो अब कभी वापस नहीं आएगी।

एक शाम हम अकेले थे। रोहन ने मुझे दीवार से सटाया, और उसके होंठ मेरे गले पर फिसले। मेरी साँसें रुक सी गईं। हमारा मिलन इस बार जंगली था, जुनून से भरा। मैंने खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया, और वह पल अनंत लगा।