माँ की छाया में

सुबह के नौ बजे का समय था, जब मैं अपनी किताबें समेटकर कॉलेज जाने की तैयारी कर रहा था। घर की बालकनी से हल्की धूप अंदर आ रही थी, और बाहर की सड़क पर स्कूल जाते बच्चों की आवाजें गूंज रही थीं। माँ किचन में चाय बना रही थीं, उनकी दिनचर्या हमेशा की तरह व्यवस्थित थी – पहले उठना, पूजा करना, फिर घर के काम। मैंने अपनी बैग में नोटबुक डाली और सोचा कि आज का लेक्चर कितना बोरिंग होगा।

मैं राहुल हूं, 22 साल का, दिल्ली के एक कॉलेज में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा हूं। हमारा परिवार छोटा सा है – मैं, माँ सरिता और पापा। पापा एक कंपनी में काम करते हैं, जो अक्सर बाहर के टूर पर रहते हैं। माँ 42 साल की हैं, लेकिन उनकी ऊर्जा देखकर लगता है जैसे वो अभी भी युवा हैं। वो घर संभालती हैं, पड़ोसियों से बातें करती हैं और शाम को टीवी देखती हैं। आजकल पापा मुंबई गए हुए हैं, तो घर में सिर्फ हम दोनों हैं।

किचन से माँ की आवाज आई, "राहुल, चाय पी ले बेटा, कॉलेज जाते-जाते।" मैं मुस्कुराया और वहां चला गया। माँ ने चाय का कप मेरी तरफ बढ़ाया, उनकी साड़ी सलीके से पहनी हुई थी, और बाल खुले थे। "माँ, आज लेट हो जाऊंगा, प्रोजेक्ट पर काम है," मैंने कहा। वो बोलीं, "ठीक है, लेकिन खाना मत भूलना। मैं तेरे लिए टिफिन रख दूंगी।" हमारी बातें हमेशा ऐसी ही साधारण होती हैं, घर की चिंताओं से भरी।

कॉलेज से लौटकर मैं थका हुआ घर पहुंचा। शाम के पांच बजे थे, और घर में हल्की ठंडक छाई हुई थी। माँ सोफे पर बैठी किताब पढ़ रही थीं, शायद कोई धार्मिक पुस्तक। मैंने अपना बैग रखा और पानी पीने किचन गया। वापस आकर मैं उनके पास बैठ गया। "कैसा रहा दिन, माँ?" मैंने पूछा। वो मुस्कुराईं, "बस ऐसे ही, पड़ोस वाली आंटी आई थीं, बातें कीं। तू बता, पढ़ाई कैसी चल रही है?" उनकी आवाज में हमेशा की तरह चिंता थी, जैसे वो मेरी हर छोटी बात पर ध्यान देती हों।

रात का खाना हमने साथ खाया। माँ ने दाल और रोटी बनाई थी, जो मेरी पसंदीदा है। टेबल पर बैठे हमने पापा के बारे में बात की, कि वो कब लौटेंगे। "पापा को फोन कर लेना, माँ," मैंने कहा। वो बोलीं, "हां, कल करूंगी। तू भी अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे।" खाने के बाद मैं अपने कमरे में चला गया, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। मैंने सोचा कि माँ अकेले कितना काम करती हैं, पापा के बिना।

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अगले दिन सुबह उठकर मैंने देखा माँ योगा कर रही थीं। वो लिविंग रूम में मैट बिछाकर व्यायाम करती हैं, ताकि स्वस्थ रहें। मैं चुपचाप उन्हें देखता रहा, उनकी सांसों की लय में एक शांति थी। "गुड मॉर्निंग, माँ," मैंने कहा। वो उठीं और बोलीं, "गुड मॉर्निंग बेटा, नाश्ता तैयार है।" हमारी दिनचर्या में ऐसे पल सामान्य थे, लेकिन आजकल मैं महसूस कर रहा था कि घर में एक अलग सा माहौल है, पापा के न होने से।

शाम को बारिश हो गई। मैं कॉलेज से भीगकर लौटा, और माँ ने मुझे तौलिया दिया। "जल्दी बदल ले कपड़े, सर्दी लग जाएगी," वो चिंतित होकर बोलीं। मैंने कमरे में जाकर कपड़े बदले, लेकिन मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। रात को डिनर के समय माँ ने कहा, "राहुल, कल मैं मार्केट जाऊंगी, कुछ सामान लाना है। तू साथ चलेगा?" मैंने हामी भरी, "हां माँ, चलूंगा।" वो खुश हुईं, और हमारी बातें लंबी खिंच गईं।

मार्केट में हम साथ घूमे। माँ सब्जियां चुन रही थीं, और मैं बैग उठाए उनके पीछे चल रहा था। भीड़ में एक बार उनका हाथ मेरे कंधे पर टिका, ताकि वो संतुलन बना सकें। उस स्पर्श में कुछ नहीं था, बस एक माँ का सहारा। लेकिन घर लौटकर जब मैं अकेला था, तो वो पल याद आया। माँ कितनी मजबूत हैं, अकेले सब संभालती हैं।

रात को मैं बिस्तर पर लेटा सोच रहा था। पापा के न होने से घर खाली-खाली लगता है। माँ का कमरा मेरे बगल में है, और कभी-कभी रात को उनकी आवाजें सुनाई देती हैं, जैसे वो करवट बदल रही हों। मैंने खुद को समझाया कि ये सब सामान्य है, लेकिन मन में एक उलझन थी। सुबह उठकर मैंने माँ को चाय बनाते देखा, उनकी आंखों में थकान थी। "माँ, तुम आराम क्यों नहीं करतीं?" मैंने पूछा। वो बोलीं, "बेटा, आदत हो गई है।"

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धीरे-धीरे दिन बीतने लगे। एक शाम माँ ने कहा, "राहुल, मेरी पीठ में दर्द है, जरा दबा दे।" मैं सहम गया, लेकिन सहज भाव से उनके पास गया। वो बिस्तर पर लेटीं, और मैंने उनकी पीठ पर हाथ रखा। दबाते हुए मैंने महसूस किया उनकी त्वचा कितनी मुलायम है। "आराम मिल रहा है माँ?" मैंने पूछा। वो बोलीं, "हां बेटा, बहुत अच्छा लग रहा है।" वो पल लंबा खिंचा, और मेरे मन में भावनाएं उमड़ने लगीं।

उस रात नींद नहीं आई। मैं सोचता रहा कि माँ के प्रति मेरी भावनाएं बदल रही हैं। वो हमेशा मेरी देखभाल करती हैं, लेकिन अब मैं उन्हें अलग नजर से देखने लगा हूं। अगले दिन सुबह माँ नहाकर निकलीं, उनके बाल गीले थे, और साड़ी में वो खूबसूरत लग रही थीं। मैंने नजरें फेर लीं, लेकिन मन में एक संघर्ष था। "माँ, आज मैं जल्दी लौटूंगा," मैंने कहा। वो मुस्कुराईं, "ठीक है, साथ में फिल्म देखेंगे।"

शाम को हम सोफे पर बैठे फिल्म देख रहे थे। माँ मेरे बगल में थीं, और फिल्म में एक भावुक सीन आया। उनकी आंखें नम हो गईं। मैंने उनका हाथ थामा, "माँ, रो मत।" वो बोलीं, "बेटा, कभी-कभी अकेलापन लगता है।" उस पल में मैंने उन्हें गले लगा लिया, और हमारी सांसें मिलीं। मेरे मन में इच्छाएं जाग रही थीं, लेकिन मैंने खुद को रोका।

रात गहराती गई। माँ अपने कमरे में चली गईं, लेकिन मैं बेचैन था। मैं उनके दरवाजे के पास गया, और हल्के से दस्तक दी। "माँ, नींद नहीं आ रही," मैंने कहा। वो बोलीं, "अंदर आ जा बेटा।" मैं अंदर गया, और वो बिस्तर पर बैठी थीं। हम बातें करने लगे, पुरानी यादों के बारे में। धीरे-धीरे मैं उनके करीब आया, और मेरे हाथ ने उनका चेहरा छुआ।

उस स्पर्श में कुछ जादू था। माँ की आंखों में हैरानी थी, लेकिन वो पीछे नहीं हटीं। मैंने उन्हें चूमा, और वो भी प्रतिक्रिया देने लगीं। मेरे मन में अपराधबोध था, लेकिन इच्छा मजबूत थी। हम एक-दूसरे के आलिंगन में खो गए। उनकी साड़ी सरक गई, और मैंने उनके शरीर को महसूस किया। "राहुल, ये गलत है," वो फुसफुसाईं, लेकिन उनके हाथ मुझे खींच रहे थे।

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हमारे बीच का बंधन बदल गया। मैंने उनकी गर्दन पर吻 किया, और वो सिहर उठीं। मेरे हाथ उनकी कमर पर फिसले, और धीरे-धीरे हम निर्वस्त्र हो गए। उनकी चूत पर मेरी नजर पड़ी, और मैंने उसे स्पर्श किया। वो गीली थी, इच्छा से भरी। मैंने अपनी उंगली अंदर डाली, और वो कराह उठीं। "बेटा, धीरे," वो बोलीं। मैंने अपना लिंग उसके पास लाया, और धीरे से प्रवेश किया।

हमारी गति बढ़ी, भावनाएं उफान पर थीं। माँ की सांसें तेज थीं, और मैं उनके स्तनों को चूम रहा था। हर धक्के में एक नई अनुभूति थी, प्यार और वासना का मिश्रण। वो मेरे कंधों पर नाखून गड़ा रही थीं, और मैं गहराई तक जा रहा था। क्लाइमेक्स के करीब हम दोनों एक साथ पहुंचे, और वो चरम पर पहुंच गईं।

उसके बाद हम शांत लेटे रहे। लेकिन ये शुरुआत थी। अगली रात फिर वही हुआ, लेकिन इस बार ज्यादा भावुक। मैंने उन्हें पीछे से पकड़ा, और उनकी चूत में प्रवेश किया। उनकी कराहें कमरे में गूंजीं, और मैंने उनकी गांड पर हाथ फेरा। नई पोजीशन में हमने प्रयोग किया, हर बार कुछ नया।

दिनों में हमारा रिश्ता गहरा होता गया। एक दोपहर माँ किचन में थीं, मैंने उन्हें पीछे से गले लगाया। मेरे हाथ उनकी साड़ी के नीचे गए, और मैंने उनकी चूत को सहलाया। वो मुड़ीं और मुझे चूमा। हम फर्श पर ही एक हो गए, तेज और जुनूनी। उनकी आंखों में अब शर्म नहीं, बल्कि स्वीकृति थी।

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हर सीन में नई भावना जुड़ती। कभी धीमी और कोमल, कभी तेज और उग्र। मैंने उनकी चूत को जीभ से चाटा, और वो पागल हो गईं। "राहुल, और करो," वो बोलीं। मैंने अपना लिंग उनके मुंह में डाला, और वो चूसने लगीं। हमारा प्यार अब बंधनों से मुक्त था।

एक शाम हम बाथरूम में थे। पानी की धार के नीचे मैंने उन्हें दीवार से सटाया, और पीछे से प्रवेश किया। उनकी चूत गीली थी, और हमारी कराहें पानी की आवाज में घुल गईं। क्लाइमेक्स में हम दोनों थरथराए, और मैंने उनके अंदर ही वीर्य छोड़ा।

रात को बिस्तर पर लेटे हम बातें करते। "माँ, मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूंगा," मैंने कहा। वो बोलीं, "बेटा, ये हमारा राज है।" हम फिर एक हुए, इस बार मिशनरी पोजीशन में। मैंने उनकी आंखों में देखा, और धीरे-धीरे धक्के दिए। उनकी चूत ने मुझे कस लिया, और हम चरम पर पहुंचे।

समय बीतता गया, लेकिन हमारी इच्छाएं नहीं थमीं। हर पल में एक नई अनुभूति, नया स्पर्श। मैं उनकी गांड में उंगली डालता, और वो सिहरतीं। हम 69 पोजीशन में एक-दूसरे को संतुष्ट करते। भावनाएं गहरी होती गईं, अपराधबोध कम।

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एक रात माँ ने मुझे अपने ऊपर खींचा। "आज मैं कंट्रोल करूंगी," वो बोलीं। वो मेरे ऊपर बैठीं, और अपनी चूत में मेरा लिंग लिया। ऊपर-नीचे होती हुईं, वो तेज हुईं। मैंने उनके स्तनों को दबाया, और हम दोनों का क्लाइमेक्स एक साथ आया।

हमारे बीच अब सब कुछ नैचुरल लगता था। सुबह उठकर मैं उन्हें चूमता, और वो मुस्कुरातीं। लेकिन अंदर एक डर था, कि ये कब तक चलेगा। फिर भी, हम जी रहे थे वो पल।

फिर एक शाम, बारिश में हम बालकनी में खड़े थे। मैंने उन्हें पीछे से पकड़ा, और साड़ी ऊपर की। बाहर की ठंड में उनकी चूत गर्म थी। मैंने प्रवेश किया, और हम धीरे-धीरे हिले। बारिश की बूंदें हम पर गिर रही थीं, और हमारा प्यार बह रहा था।