माँ की छुअन
सुबह के नौ बज रहे थे जब मैं अपनी किताबें समेटकर कॉलेज जाने की तैयारी कर रहा था। घर में हमेशा की तरह शांति छाई हुई थी, और माँ रसोई में चाय बना रही थीं। बाहर की बालकनी से हल्की ठंडी हवा आ रही थी, जो दिल्ली की सर्दियों की शुरुआत का संकेत दे रही थी। मैंने अपना बैग उठाया और डाइनिंग टेबल पर रख दिया, जहां माँ ने पहले से ही परांठे और दही रखे हुए थे।
मैं राहुल हूं, बाईस साल का, दिल्ली यूनिवर्सिटी में बीए कर रहा हूं। माँ का नाम सीमा है, वे पैंतालीस की हैं और घर पर ही सिलाई का काम करती हैं। पापा की मौत हुए तीन साल हो चुके हैं, हार्ट अटैक से। तब से हम दोनों ही घर चला रहे हैं, मैं पार्ट-टाइम ट्यूशन देता हूं और माँ अपने काम से। रोज की दिनचर्या ऐसी ही है – सुबह उठना, नाश्ता करना, कॉलेज जाना, शाम को लौटना।
माँ ने चाय का कप मेरे सामने रखा और मुस्कुराकर कहा, "बेटा, आज ठंड ज्यादा है, स्वेटर पहनकर जाना।" उनकी आवाज में वही ममता थी जो हमेशा से रही है। मैंने हां में सिर हिलाया और परांठा तोड़कर खाने लगा। घर छोटा सा है, दो कमरे का फ्लैट, लेकिन साफ-सुथरा। माँ हमेशा व्यस्त रहती हैं, कभी सिलाई मशीन पर, कभी घर के काम में।
कॉलेज से लौटते वक्त शाम हो चुकी थी। ट्रैफिक की वजह से थोड़ी देर हुई, और घर पहुंचते-पहुंचते अंधेरा घिर आया। दरवाजा खोलते ही माँ की आवाज आई, "राहुल, आ गया? हाथ-मुंह धो ले, खाना लगा दूं।" मैंने बैग रखा और बाथरूम चला गया। रात का खाना हम साथ में खाते हैं, टीवी पर कोई सीरियल चलता रहता है। आज भी वैसा ही था, माँ ने दाल-चावल बनाया था।
खाने के बाद मैं अपने कमरे में पढ़ाई करने लगा। माँ बाहर हॉल में सिलाई कर रही थीं। रात के ग्यारह बज चुके थे जब मैंने किताब बंद की। बाहर निकला तो माँ अभी भी मशीन पर झुकी हुई थीं। "माँ, सो जाओ ना, कल कर लेना," मैंने कहा। उन्होंने सिर उठाया और थकी हुई मुस्कान दी, "बस थोड़ा सा बाकी है, बेटा। तू सो जा।"
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अगले दिन छुट्टी थी, रविवार। सुबह देर तक सोया रहा। उठा तो माँ बालकनी में कपड़े सुखा रही थीं। मैंने चाय बनाई और उनके लिए ले गया। "माँ, ये लो," मैंने कहा। वे मुड़ीं और कप ले लिया, उनकी उंगलियां मेरी उंगलियों से छू गईं। वो पल सामान्य था, लेकिन मुझे लगा जैसे कुछ अलग सा है। शायद थकान की वजह से।
दोपहर में हम साथ में फिल्म देखने लगे। माँ सोफे पर बैठी थीं, मैं उनके बगल में। फिल्म में कुछ इमोशनल सीन आया तो माँ की आंखें नम हो गईं। "कितनी अच्छी फिल्म है," उन्होंने कहा। मैंने उनका हाथ थाम लिया, बस सहारा देने के लिए। वो स्पर्श गर्म था, और मैंने महसूस किया कि कितने समय से हम ऐसे करीब नहीं बैठे।
शाम को बारिश शुरू हो गई। घर में ठंड बढ़ गई थी। माँ ने कहा, "राहुल, आज ठंड बहुत है, अपना ख्याल रखना।" मैंने हंसकर कहा, "माँ, आप भी। चलो, साथ में चाय पीते हैं।" हम रसोई में खड़े होकर चाय पी रहे थे। माँ की साड़ी हल्की गीली हो गई थी बालकनी से, और वे ठंड से कांप रही थीं। मैंने अपना शॉल उन्हें दे दिया।
रात को सोने से पहले मैं माँ के कमरे में गया, देखने कि वे सो गईं या नहीं। वे बिस्तर पर लेटी हुई थीं, लेकिन आंखें खुली थीं। "क्या हुआ, माँ? नींद नहीं आ रही?" मैंने पूछा। वे बैठ गईं और बोलीं, "बस, पुरानी यादें आ रही हैं। पापा की।" मैं उनके पास बैठ गया, और उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। वो पल शांत था, लेकिन मेरे मन में कुछ उथल-पुथल सी हो रही थी।
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उस रात मैं सो नहीं पाया। माँ की वो छुअन, उनकी आंखों में वो उदासी, सब कुछ घूम रहा था। अगले दिन कॉलेज गया, लेकिन ध्यान नहीं लगा। शाम को घर लौटा तो माँ घर पर नहीं थीं, बाजार गई थीं। मैं इंतजार करने लगा। जब वे लौटीं, तो थकी हुई लग रही थीं। "माँ, मैं मसाज कर दूं?" मैंने पूछा। वे हंस पड़ीं, "नहीं बेटा, ठीक हूं।"
लेकिन मैंने जिद की, और वे मान गईं। वे बिस्तर पर लेट गईं, और मैंने उनके कंधों पर हाथ रखा। उनकी त्वचा नरम थी, और जैसे-जैसे मैं दबाता गया, उनकी सांसें गहरी होती गईं। "आराम मिल रहा है," उन्होंने कहा। मेरे हाथ उनके गले तक गए, और अचानक मुझे लगा जैसे कुछ बदल रहा है। लेकिन मैंने खुद को रोका।
कुछ दिनों बाद, एक शाम हम साथ में वॉक पर गए। पार्क में घूमते हुए माँ ने कहा, "राहुल, तू बड़ा हो गया है। अब तेरी शादी के बारे में सोचना चाहिए।" मैंने कहा, "माँ, अभी नहीं। मैं आपके बिना कैसे रहूंगा?" वे रुक गईं और मेरी तरफ देखा, उनकी आंखों में कुछ था जो मैं समझ नहीं पाया।
उस रात बारिश फिर शुरू हो गई। बिजली चली गई, और घर में अंधेरा छा गया। माँ डर गईं, "राहुल, कैंडल जला।" मैंने कैंडल जलाई और उनके कमरे में रखी। वे बिस्तर पर बैठी थीं, और मैं उनके पास खड़ा रहा। अचानक उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और कहा, "बैठ जा ना, डर लग रहा है।"
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मैं बैठ गया, और हम बातें करने लगे। पुरानी यादें, पापा की बातें। माँ की आंखें भर आईं, और मैंने उन्हें गले लगा लिया। वो स्पर्श अलग था, गर्म और करीब। उनकी सांसें मेरे कंधे पर महसूस हो रही थीं। धीरे-धीरे, मैंने उनके गाल पर हाथ रखा, और वे शांत हो गईं।
उस पल में कुछ टूट सा गया। मैंने उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए, हल्के से। माँ ने विरोध नहीं किया, बस आंखें बंद कर लीं। वो चुंबन लंबा खिंचा, और मेरे हाथ उनकी कमर पर चले गए। "राहुल," उन्होंने धीमे से कहा, लेकिन रुकी नहीं।
हम बिस्तर पर लेट गए। मेरे हाथ उनकी साड़ी के पल्लू को हटा रहे थे, और उनकी त्वचा की गर्मी मुझे महसूस हो रही थी। माँ की सांसें तेज थीं, और उन्होंने मेरी शर्ट उतार दी। वो पल भावनाओं से भरा था, जैसे सालों की उदासी बाहर आ रही हो। मैंने उनके स्तनों को छुआ, नरम और गर्म।
हमारी बॉडीज एक-दूसरे से जुड़ गईं। मैं उनके अंदर प्रवेश कर रहा था, धीरे-धीरे, और माँ की आहें कमरे में गूंज रही थीं। वो अनुभव नया था, लेकिन इतना गहरा कि मैं भूल नहीं सकता। हर गति में प्यार था, और कन्फ्लिक्ट भी। "माँ, मैं तुम्हें प्यार करता हूं," मैंने कहा।
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उस रात के बाद, हमारा रिश्ता बदल गया। अगले दिन सुबह, माँ शर्माती हुई उठीं। "राहुल, ये गलत है," उन्होंने कहा। लेकिन मैंने उन्हें चुप कराया, "नहीं माँ, ये हमारी जरूरत है।" हम फिर करीब आए, इस बार दिन की रोशनी में। उनकी बॉडी को देखना, छूना, सब कुछ अलग था।
कुछ हफ्ते ऐसे ही बीते। हर शाम हम साथ होते, कभी बातों में, कभी स्पर्श में। एक रात, माँ ने कहा, "राहुल, मुझे डर लगता है। समाज क्या कहेगा?" मैंने कहा, "किसी को पता नहीं चलेगा।" हम फिर एक हुए, इस बार ज्यादा पैशन से। मेरे हाथ उनकी जांघों पर, और उनकी उंगलियां मेरे बालों में।
समय बीतता गया। माँ की उदासी कम हो गई थी, और मैं भी खुश था। लेकिन अंदर एक guilt था। एक शाम, हम पार्क में थे, और माँ ने कहा, "राहुल, शायद हमें रुकना चाहिए।" लेकिन उनकी आंखें कुछ और कह रही थीं। घर लौटकर, हम फिर वही खेल खेलने लगे।
उस रात, मैंने उन्हें नए तरीके से छुआ। उनके पैरों से शुरू करके ऊपर तक। माँ की बॉडी कांप रही थी, और उन्होंने मुझे कसकर पकड़ लिया। वो क्लाइमैक्स इतना इंटेंस था कि हम दोनों थककर सो गए।
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अगले दिन, माँ ने ब्रेकफास्ट बनाया और मुस्कुराई। "राहुल, आज क्या प्लान है?" मैंने कहा, "बस, तुम्हारे साथ।" हम हंस पड़े, लेकिन अंदर कुछ टूट रहा था। शाम को, बारिश फिर आई, और हम फिर करीब आए। इस बार, माँ ने लीड लिया, मुझे किस करते हुए, मेरी बॉडी को एक्सप्लोर करते हुए।
वो अनुभव वैरायटी से भरा था – कभी धीमा, कभी तेज। हर बार नई भावना, जैसे पहली बार हो। लेकिन guilt बढ़ता जा रहा था। एक रात, सेक्स के बाद, माँ रो पड़ीं। "राहुल, ये सही नहीं है।" मैंने उन्हें गले लगाया, लेकिन जवाब नहीं दे पाया।
फिर भी, हम रुक नहीं पाए। हर स्पर्श में प्यार था, हर सीन में नई गहराई। माँ की बॉडी अब मेरी हो चुकी थी, और मैं उनकी। लेकिन समाज की दीवारें करीब आ रही थीं।
एक शाम, हम साथ लेटे थे, सांसें मिली हुईं। माँ ने मेरे सीने पर सिर रखा और चुपचाप लेटी रहीं।