माँ की छुअन

सुबह के नौ बज रहे थे, और मैं अपने छोटे से घर की बालकनी में बैठा चाय की चुस्की ले रहा था। बाहर सड़क पर लोग अपनी दिनचर्या में व्यस्त थे, बच्चे स्कूल जा रहे थे, और हल्की ठंडी हवा चेहरे को छू रही थी। माँ रसोई में नाश्ता बना रही थीं, उनकी आवाज़ कभी-कभी आती थी, जैसे वो खुद से बड़बड़ा रही हों। मैं कॉलेज से छुट्टी लेकर घर आया था, और ये दिन सामान्य लग रहे थे, बस थोड़ी शांति की तलाश में।

मैं अजय हूँ, पच्चीस साल का, और शहर में पढ़ाई कर रहा हूँ। घर वापस आने पर हमेशा लगता है कि समय रुक सा जाता है। माँ, रीता, पैंतालीस की हैं, और पापा के जाने के बाद से उन्होंने घर को संभाला है। वो स्कूल में टीचर हैं, लेकिन इन दिनों थोड़ी बीमार चल रही हैं, इसलिए छुट्टी पर हैं। मैं उठकर रसोई में गया, देखा वो सब्ज़ी काट रही थीं, उनके चेहरे पर हल्की थकान थी।

"माँ, आप आराम क्यों नहीं करतीं? मैं बना दूँगा नाश्ता," मैंने कहा, उनके कंधे पर हाथ रखते हुए। वो मुस्कुराईं, "नहीं बेटा, तू बैठ, मैं ठीक हूँ। बस थोड़ी कमर दर्द कर रही है।" हम दोनों बैठकर नाश्ता करने लगे, बातें कीं पुरानी यादों की, कैसे मैं छोटा था तो वो मुझे स्कूल छोड़ने जाती थीं। दिन ऐसे ही बीतता था, शाम को बाज़ार जाना, रात को साथ टीवी देखना।

एक शाम, माँ बाथरूम से निकलीं तो उनके चेहरे पर दर्द की रेखाएँ थीं। "अजय, ज़रा डॉक्टर को फोन कर न, ये इन्फेक्शन ठीक नहीं हो रहा," उन्होंने धीमे से कहा। मैंने पूछा क्या हुआ, तो पता चला कि उन्हें कोई प्राइवेट पार्ट में जलन हो रही थी, डॉक्टर ने कोई क्रीम दी थी लेकिन असर नहीं। मैं चिंतित हो गया, "माँ, चलो अस्पताल चलते हैं।" लेकिन वो मानी नहीं, बोलीं घर पर ही देख लेंगी।

रात को मैं सो नहीं पाया, सोचता रहा उनकी तकलीफ़ के बारे में। सुबह उठकर मैंने कहा, "माँ, अगर आप कहें तो मैं मदद कर दूँ? वो क्रीम लगा दूँ?" वो हिचकिचाईं, लेकिन दर्द से परेशान थीं। "ठीक है बेटा, लेकिन शर्म आ रही है," उन्होंने कहा। हम उनके कमरे में गए, वो बिस्तर पर लेटीं, और मैंने धीरे से उनकी साड़ी ऊपर की। पहली बार ऐसा कुछ हो रहा था, लेकिन मेरे मन में सिर्फ़ चिंता थी, कोई और विचार नहीं।

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उनकी त्वचा नरम थी, और मैंने क्रीम लगाई, सावधानी से। "आराम से बेटा," वो बोलीं, उनकी आँखें बंद थीं। वो पल अजीब था, लेकिन करीब लाया हमें। अगले दिन फिर वही, लेकिन अब वो थोड़ा खुल गईं, बातें करने लगीं बचपन की। मैं महसूस कर रहा था कि हमारा रिश्ता बदल रहा है, लेकिन धीरे-धीरे, जैसे कोई नदी बह रही हो।

कुछ दिनों बाद, इन्फेक्शन कम हुआ, लेकिन माँ ने कहा कि सफ़ाई ठीक से नहीं हो पा रही। "अजय, क्या तू मदद करेगा? डॉक्टर ने कहा है साफ़ रखना ज़रूरी है," उन्होंने शर्माते हुए कहा। मैं सहमत हो गया, मन में एक अजीब सी भावना थी, लेकिन मैंने उसे दबाया। बाथरूम में हम गए, वो बैठीं, और मैंने पानी से धोया, साबुन लगाया। उनकी साँसें तेज़ थीं, और मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं।

"बेटा, थोड़ा अंदर तक," वो बोलीं, उनकी आवाज़ में दर्द और कुछ और मिश्रित था। मैंने किया, और अचानक लगा जैसे कोई बिजली दौड़ी। वो कराह उठीं, लेकिन दर्द से नहीं, शायद कुछ और। मैं रुक गया, "माँ, क्या हुआ?" वो चुप रहीं, बस आँखें मिलाईं। उस पल में कुछ टूटा, हमारी नज़रों में एक नई गहराई आई।

रात को डिनर के बाद, माँ मेरे कमरे में आईं। "अजय, आज जो हुआ, वो... मैं नहीं जानती," उन्होंने कहा, बैठते हुए। मैंने उनका हाथ पकड़ा, "माँ, आपकी तकलीफ़ देखकर मुझे बुरा लगता है। मैं कुछ भी करूँगा आपके लिए।" वो रो पड़ीं, और मैंने उन्हें गले लगा लिया। वो गले लगना लंबा खिंचा, उनकी साँसें मेरे कानों में गूँज रही थीं।

धीरे-धीरे, हमारा स्पर्श बदल गया। मैंने उनके गाल पर吻 किया, और वो नहीं हटीं। "बेटा, ये ग़लत है," वो बोलीं, लेकिन उनकी आँखों में इच्छा थी। मैंने कहा, "माँ, अगर ये हमें खुशी देता है, तो क्या फ़र्क पड़ता है?" हम बिस्तर पर लेटे, और मैंने फिर से सफ़ाई की आड़ में छुआ। इस बार, ये सिर्फ़ सफ़ाई नहीं थी, बल्कि एक खोज थी।

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उनकी चूत नरम और गर्म थी, मैंने उँगलियों से सहलाया, साफ़ किया। वो सिसक रही थीं, "अजय, ऐसे मत कर।" लेकिन उनके शरीर ने जवाब दिया, वो गीली हो गईं। मैंने अपनी जीभ से छुआ, स्वाद लिया, जैसे कोई प्यास बुझा रहा हो। वो चिल्लाईं, "बेटा, रुकना नहीं," और मैंने जारी रखा, हर कोने को साफ़ करते हुए, चाटते हुए।

उस रात, हमने सीमाएँ तोड़ीं। मैंने अपना लंड उनकी चूत पर रगड़ा, धीरे से अंदर डाला। "माँ, आप कितनी सुंदर हैं," मैंने कहा, धक्के लगाते हुए। वो कराह रही थीं, उनके नाखून मेरी पीठ में गड़े थे। वो पल भावनाओं से भरा था, प्यार, अपराधबोध, और एक गहरा कनेक्शन। हम दोनों एक हो गए, जैसे कभी अलग थे ही नहीं।

अगले दिन, सुबह फिर वही। माँ ने कहा, "अजय, कल रात... वो सफ़ाई नहीं थी।" मैं मुस्कुराया, "माँ, ये हमारी देखभाल है।" हम फिर बाथरूम गए, इस बार बिना बहाने के। मैंने पानी डाला, साबुन लगाया, और फिर चूमा। उनकी चूत को मैंने जीभ से साफ़ किया, हर बूँद को चाटा। वो काँप रही थीं, "बेटा, और करो।"

हम बिस्तर पर लौटे, मैंने उन्हें उल्टा किया, पीछे से入 किया। "माँ, आपकी ये जगह कितनी टाइट है," मैंने कहा, तेज़ धक्के लगाते हुए। वो चीखीं, खुशी से, दर्द से। हमारा पसीना मिल रहा था, शरीर एक लय में। हर बार नया लगता था, जैसे पहली बार।

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कुछ दिनों में, ये हमारी दिनचर्या बन गई। शाम को, माँ कहतीं, "अजय, सफ़ाई का समय," और हम शुरू हो जाते। एक बार, मैंने तेल लगाया, मालिश की, फिर चोदा। उनकी आहें घर भरतीं, लेकिन हम चुपके से। मन में संघर्ष था, लेकिन प्यार जीतता।

एक रात, माँ ने कहा, "बेटा, क्या ये सही है?" मैंने जवाब दिया, "माँ, आप मेरी दुनिया हैं।" हम फिर एक हुए, मैंने उनकी चूत को उँगलियों से खोला, फिर लंड से भरा। वो रोईं, खुशी के आँसुओं से, और मैंने उन्हें चूमा।

समय बीतता गया, लेकिन हमारा बंधन मजबूत होता गया। हर सफ़ाई एक नई कहानी बनती, हर चुदाई एक नई भावना। माँ की आँखों में अब शांति थी, और मेरे दिल में संतुष्टि। हम साथ लेटे रहते, बातें करते, हँसते।

फिर एक शाम, माँ बाथरूम में थीं, मैं अंदर गया। "अजय, आज कुछ अलग करो," वो बोलीं। मैंने उन्हें दीवार से सटाया, पानी चलता रहा, और मैंने पीछे से चोदा। उनकी सिसकियाँ पानी की आवाज़ में घुल गईं। वो पल अनंत लगता था, हमारी साँसें मिली हुईं।

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रात गहराती गई, हम बिस्तर पर थे। मैंने उनकी चूत को फिर साफ़ किया, जीभ से, उँगलियों से। फिर अंदर गया, धीरे-धीरे, प्यार से। "माँ, आप हमेशा मेरी रहोगी," मैंने कहा। वो मुस्कुराईं, और हम एक होकर सो गए।

सुबह उठकर, माँ चाय बना रही थीं। मैंने पीछे से गले लगाया, "अच्छा लग रहा है?" वो हँसीं, "हाँ बेटा।" दिन फिर सामान्य लगता था, लेकिन हमारे बीच वो राज़ था। शाम को फिर वही, सफ़ाई और प्यार का मिश्रण।

एक बार, हम बाहर घूमने गए, लेकिन घर लौटकर उतावले हो गए। मैंने उन्हें सोफे पर झुकाया, चूत साफ़ की, फिर चोदा। उनकी कराहें कमरे में गूँजीं। हर बार, भावनाएँ नई होतीं, कभी कोमल, कभी तेज़।

माँ ने एक दिन कहा, "अजय, तू मेरी ज़िंदगी है।" मैंने जवाब में उन्हें चूमा, और हम फिर शुरू हो गए। सफ़ाई से शुरुआत, चुदाई में समाप्त। हमारा रिश्ता अब परे था दुनिया के नियमों के।

रात को, मैं उनकी गोद में सिर रखकर लेटा। वो मेरे बाल सहला रही थीं। "बेटा, कल फिर?" मैंने हाँ कहा, और हम मुस्कुराए। वो पल शांत था, लेकिन अंदर उथल-पुथल।

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अगले दिन, बाथरूम में, पानी की धार के नीचे, मैंने उन्हें साफ़ किया। उनकी चूत गर्म थी, मैंने जीभ डाली, चाटा। फिर खड़े-खड़े चोदा। वो चिपक गईं मुझसे, "और तेज़ बेटा।"

हम थककर लेटे, बातें कीं। "माँ, ये कभी खत्म न हो," मैंने कहा। वो चुप रहीं, बस गले लगीं। हमारी दुनिया अब यही थी, प्यार और इच्छा की।

समय के साथ, हम और करीब आए। हर सफ़ाई एक बहाना, हर स्पर्श एक वादा। माँ की मुस्कान अब पहले से ज्यादा चमकदार थी।

एक शाम, बारिश हो रही थी। हम बालकनी में खड़े थे, फिर अंदर आए। मैंने उन्हें बाहों में उठाया, बिस्तर पर लिटाया। सफ़ाई की, चूमा, फिर गहराई से चोदा। उनकी आहें बारिश की आवाज़ में मिल गईं।

हम लेटे रहे, साँसें स्थिर होतीं। माँ ने मेरी छाती पर हाथ रखा, "अजय..."