मां की छिपी चाहत
सुबह की धूप कमरे में हल्की-हल्की झांक रही थी, और मैं बिस्तर पर लेटा हुआ अपने कॉलेज के असाइनमेंट के बारे में सोच रहा था। बाहर से बाजार की आवाजें आ रही थीं, और मां रसोई में चाय बना रही थीं। रोज की तरह, मैं उठकर तैयार होने लगा, क्योंकि आज क्लास के लिए निकलना था।
मेरा नाम राहुल है, और मैं 22 साल का हूं। हमारा छोटा सा घर दिल्ली के एक व्यस्त इलाके में है, जहां पापा ज्यादातर बाहर काम पर रहते हैं। मां, जिनका नाम रानी है, घर संभालती हैं और कभी-कभी पड़ोस की सिलाई का काम भी करती हैं। आज भी वही रूटीन था—नाश्ता करके निकलना।
मैं डाइनिंग टेबल पर बैठा, और मां ने गरम पराठे परोसे। वे हमेशा मुस्कुराती हुई बात करती हैं, जैसे आज उन्होंने पूछा, "बेटा, आज क्लास में क्या पढ़ाई है?" मैंने बताया कि इंजीनियरिंग का प्रोजेक्ट है, और हम दोनों ने थोड़ी देर घर की बातें कीं।
शाम को कॉलेज से लौटकर मैं थक गया था। मां ने दरवाजा खोला और कहा, "आओ, हाथ-मुंह धो लो। मैंने खाना बना लिया है।" मैंने नोटिस किया कि वे आज थोड़ी उदास लग रही थीं, शायद पापा की याद आ रही होगी, जो हफ्तों से बाहर हैं।
रात के खाने के बाद हम टीवी देख रहे थे। मां सोफे पर बैठी थीं, और मैं उनके बगल में। कोई पुरानी फिल्म चल रही थी, लेकिन मेरा ध्यान उस पर कम था। मां ने अचानक कहा, "राहुल, तेरे पापा कब आएंगे? घर सूना लगता है।"
मैंने उनकी तरफ देखा और कहा, "जल्दी आएंगे मां, चिंता मत करो।" उनकी आंखों में एक अजीब सी उदासी थी, जो मुझे पहले कभी नहीं दिखी। मैंने उनका हाथ थामा, और वे चुपचाप बैठी रहीं।
कुछ दिन ऐसे ही बीते। मैं कॉलेज जाता, लौटता, और मां से बातें करता। एक शाम, बारिश हो रही थी, और हम दोनों घर में अकेले थे। मां ने कहा, "आज कुछ स्पेशल बनाती हूं, तेरी पसंद का।" मैं मुस्कुराया और किचन में उनकी मदद करने लगा।
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जैसे-जैसे दिन गुजरते गए, मैं महसूस करने लगा कि मां की नजरें मुझ पर थोड़ी अलग तरीके से टिकती हैं। एक सुबह, जब मैं शर्ट पहन रहा था, वे कमरे में आईं और बोलीं, "राहुल, तेरी शर्ट प्रेस कर दूं?" उनकी आवाज में कुछ नरमी थी।
शाम को, जब मैं पढ़ाई कर रहा था, मां मेरे पास आईं और कंधे पर हाथ रखा। "थक गया होगा बेटा," उन्होंने कहा। मैंने उनकी तरफ देखा, और पहली बार महसूस किया कि हमारी निकटता में कुछ बदलाव आ रहा है।
रात को सोते समय, मैं सोच रहा था कि मां क्यों इतनी चुप रहने लगी हैं। अगले दिन, मैंने उनसे पूछा, "मां, क्या बात है? तुम ठीक तो हो?" उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "हां बेटा, बस तेरे पापा की याद आती है।"
एक शाम, हम दोनों बालकनी में खड़े थे। हवा ठंडी थी, और मां ने अपनी साड़ी संभाली। मैंने कहा, "मां, अगर कुछ परेशानी है तो बताओ।" वे चुप रहीं, फिर बोलीं, "राहुल, कभी-कभी अकेलापन बहुत सताता है।"
उस रात, मैं बिस्तर पर लेटा सोच रहा था। मां का कमरा बगल में था, और मैंने सुना वे करवटें बदल रही हैं। मैं उठकर उनके कमरे में गया और पूछा, "नींद नहीं आ रही मां?"
वे उठकर बैठीं और कहा, "नहीं बेटा, बस विचार आ रहे हैं।" मैं उनके बगल में बैठ गया, और हम बातें करने लगे। उनकी आंखों में एक गहराई थी, जो मुझे खींच रही थी।
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धीरे-धीरे, हमारी बातें व्यक्तिगत होने लगीं। मां ने बताया कि पापा के साथ उनकी जिंदगी कितनी एकरस हो गई है। मैंने सुना, और महसूस किया कि मेरे मन में उनके लिए कुछ अलग भाव उभर रहे हैं।
एक दिन, जब मैं नहाकर बाहर आया, मां ने तौलिया पकड़ाया। उनकी उंगलियां मेरी छाती पर छू गईं, और एक पल के लिए हम दोनों रुक गए। मैंने कुछ नहीं कहा, लेकिन दिल तेज धड़क रहा था।
शाम को, हम सोफे पर बैठे थे। मां का सिर मेरे कंधे पर था, और वे बोलीं, "राहुल, तू मेरा सहारा है।" मैंने उनका हाथ थामा, और उस स्पर्श में कुछ गर्माहट थी।
रात गहराने लगी, और हम दोनों चुप थे। मैंने महसूस किया कि मां की सांसें तेज हैं। मैंने पूछा, "मां, क्या हुआ?" उन्होंने कहा, "कुछ नहीं बेटा, बस तेरे पास होना अच्छा लगता है।"
उस रात, मैं उनके कमरे में रुक गया। हम लेटे हुए बातें कर रहे थे, और धीरे-धीरे हमारी निकटता बढ़ी। मां की आंखों में एक चाहत थी, जो अब छिप नहीं रही थी।
मैंने उनका चेहरा अपने हाथों में लिया, और वे मेरी तरफ देखती रहीं। "राहुल," उन्होंने धीरे से कहा, "ये सही है?" मैंने जवाब दिया, "मां, जो दिल कहता है, वही सही है।"
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हमारे होंठ मिले, और वो पल अनंत लगा। मां की सांसें मेरी सांसों में घुल गईं, और मैंने उन्हें अपनी बाहों में कस लिया। उनकी देह की गर्मी मुझे महसूस हो रही थी।
धीरे-धीरे, मैंने उनकी साड़ी सरकाई। मां की आंखें बंद थीं, और वे मेरे स्पर्श का इंतजार कर रही थीं। मैंने उनके गले पर吻 किया, और वे सिहर उठीं।
हमारी देहें एक हो गईं। मां की चूत गर्म और नम थी, और मैंने धीरे से प्रवेश किया। वे कराह उठीं, "राहुल, आह..." वो मजा अवर्णनीय था, जैसे कोई पुरानी प्यास बुझ रही हो।
हमारी गति बढ़ी, और मां ने मुझे कसकर पकड़ लिया। उनकी चूत की दीवारें मेरे लंड को जकड़ रही थीं, और हर धक्के में एक नई उत्तेजना थी। मैंने उनके स्तनों को चूसा, और वे और जोर से कराहीं।
उस रात, हम कई बार एक हुए। हर बार, मां की आंखों में नई भावना थी—कभी प्यार, कभी जुनून। मैंने उनकी चूत को जीभ से चाटा, और वे पागल हो गईं, "राहुल, और करो..."
सुबह होने तक, हम थक चुके थे। मां मेरी छाती पर सर रखकर लेटी थीं, और बोलीं, "ये हमारा राज रहेगा बेटा।" मैंने हां कहा, और हम फिर से एक होने लगे।
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अगले दिनों में, हमारी ये निकटता बढ़ती गई। एक दोपहर, जब घर खाली था, मां ने मुझे रसोई में बुलाया। वे बोलीं, "राहुल, आज कुछ नया ट्राई करें?" मैं मुस्कुराया और उन्हें काउंटर पर बिठा लिया।
मैंने उनकी साड़ी ऊपर की, और उनकी चूत पर हाथ फेरा। वे गीली हो चुकी थीं। मैंने अपना लंड अंदर डाला, और हम खड़े-खड़े चुदाई करने लगे। मां की कराहें रसोई में गूंज रही थीं।
हर बार, हम नई पोजीशन ट्राई करते। कभी मां ऊपर होतीं, अपनी चूत से मेरे लंड को मसलतीं, कभी मैं पीछे से। उनकी मस्त चूत का मजा मुझे दीवाना बना रहा था।
एक शाम, बारिश में हम बालकनी में थे। मां ने कहा, "राहुल, बाहर ही..." मैंने उन्हें दीवार से सटा लिया और उनकी चूत में घुस गया। बारिश की बूंदें हमारी देह पर गिर रही थीं, और वो उत्तेजना अलग थी।
मां अब खुल चुकी थीं। वे बोलीं, "बेटा, तेरी मां चुदक्कड़ है, तुझे पता है?" मैंने हंसकर कहा, "हां मां, और मुझे ये पसंद है।" हमारी चुदाई अब रोज का हिस्सा बन गई थी।
एक रात, हम बिस्तर पर थे। मां ने मेरे लंड को मुंह में लिया, और चूसने लगीं। मैं सिहर उठा, और उनकी चूत को उंगली से सहलाया। फिर हम 69 पोजीशन में आ गए, एक-दूसरे को चाटते हुए।
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जब मैंने उनकी चूत में जोर से धक्का मारा, वे चीख पड़ीं, "राहुल, फाड़ दे इसे!" वो मजा इतना गहरा था कि हम दोनों एक साथ झड़ गए। मां की चूत से रस बह रहा था।
समय बीतता गया, और हमारा रिश्ता गहरा होता गया। मां की आंखों में अब संतुष्टि थी, लेकिन कभी-कभी डर भी। वे बोलीं, "अगर किसी को पता चला तो?" मैंने कहा, "नहीं चलेगा मां।"
एक दोपहर, पापा का फोन आया कि वे आ रहे हैं। हम दोनों उदास हुए, लेकिन उस रात हमने फिर चुदाई की। मां की चूत उस दिन और भी मस्त लग रही थी, जैसे विदाई का मजा।
मैंने उन्हें कसकर चोदा, उनकी कराहें सुनकर। हमारी देहें पसीने से भीगी थीं, और हर धक्के में प्यार था। मां ने कहा, "राहुल, तू हमेशा मेरी जान है।"
पापा आने के बाद भी, हम चुपके-चुपके मिलते। एक रात, जब पापा सो गए, मां मेरे कमरे में आईं। हम धीरे से एक हुए, उनकी चूत का मजा लेते हुए।
ये सिलसिला चलता रहा, हर बार नई भावना के साथ। मां की चाहत अब मेरी जिंदगी का हिस्सा थी, और मैं उसमें खोया हुआ था।