माँ की अनकही चाहत

सुबह की धूप खिड़की से झांक रही थी, जब मैं बिस्तर से उठा। घर में हमेशा की तरह शांति थी, सिर्फ रसोई से आने वाली चाय की खुशबू हवा में घुली हुई थी। मैं, अजय, 22 साल का कॉलेज स्टूडेंट, अपने छोटे से घर में माँ के साथ रहता हूँ। पापा की मौत को दो साल हो चुके थे, और तब से हम दोनों ही एक-दूसरे का सहारा थे।

मैंने घड़ी देखी, नौ बज रहे थे। आज छुट्टी का दिन था, इसलिए जल्दी उठने की कोई जरूरत नहीं थी। मैं बाथरूम गया, मुंह धोया और बाहर आकर रसोई की तरफ बढ़ा। माँ वहाँ खड़ी थीं, अपनी पुरानी साड़ी में, चाय छान रही थीं। उनका नाम सुनीता है, 45 साल की हैं, लेकिन उनकी आँखों में अब भी वही चमक है जो पापा के साथ की यादों से आती है।

"अजय बेटा, उठ गया? चाय बना ली है, आ जा।" उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। मैं कुर्सी पर बैठ गया, और उन्होंने मेरे सामने कप रख दिया। हम दोनों ने चुपचाप चाय पी, बाहर की खिड़की से पार्क में खेलते बच्चों को देखते हुए। ऐसे पल हमारी जिंदगी का हिस्सा थे, जहां बातें कम होतीं, लेकिन समझ ज्यादा।

माँ ने चाय खत्म करके बर्तन धोने शुरू किए। मैंने अखबार उठाया और पढ़ने लगा। घर छोटा था, दो कमरे का, शहर के बाहरी इलाके में। माँ स्कूल में टीचर थीं, लेकिन पिछले कुछ दिनों से छुट्टी पर थीं। उन्होंने बताया नहीं था क्यों, बस इतना कहा था कि थोड़ा आराम चाहिए। मैंने ज्यादा नहीं पूछा, सोचा शायद थकान होगी।

दोपहर हुई, मैं अपने कमरे में किताब पढ़ रहा था। माँ बाहर बालकनी में कपड़े सुखा रही थीं। उनकी चाल में कुछ अलग लग रहा था, जैसे थोड़ा असहज हों। मैंने आवाज दी, "माँ, सब ठीक है न? आजकल आप जल्दी थक जाती हो।" उन्होंने पीछे मुड़कर देखा और हल्के से मुस्कुराईं, "हाँ बेटा, बस उम्र का असर है। तू फिक्र मत कर।"

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शाम को हम दोनों ने साथ खाना बनाया। माँ ने सब्जी काटी, मैंने रोटी सेंकी। ऐसे में हमारी बातें होतीं, पुरानी यादों की। पापा के बारे में, मेरे बचपन के बारे में। लेकिन आज माँ कुछ चुप थीं। खाने के बाद वे सोफे पर बैठीं, टीवी देख रही थीं। मैं उनके पास जाकर बैठ गया, "माँ, सच बताओ, क्या हुआ है? डॉक्टर के पास गई थीं?"

उन्होंने सांस ली और कहा, "अजय, थोड़ी परेशानी है। प्राइवेट पार्ट में इंफेक्शन हो गया है, डॉक्टर ने दवा दी है, लेकिन सफाई ठीक से नहीं हो पा रही। अकेले मुश्किल लगता है।" उनकी आवाज में शर्म थी, आँखें नीची। मैं स्तब्ध रह गया, लेकिन सहारा बनना था। "माँ, मैं मदद कर दूं? डॉक्टर ने क्या कहा?"

उन्होंने बताया कि डॉक्टर ने साफ-सफाई पर जोर दिया था, कोई क्रीम लगानी थी। मैंने कहा, "चलो, मैं मदद करता हूँ। आप मेरी माँ हो, इसमें क्या शर्म?" हम दोनों बाथरूम की तरफ चले। दिल में एक अजीब सी घबराहट थी, लेकिन मैंने खुद को संभाला। माँ मेरी जिंदगी थीं, उनकी तकलीफ मुझसे देखी नहीं जाती।

बाथरूम में पहुँचकर माँ ने अपनी साड़ी ऊपर की, और बैठ गईं। मैंने दवा ली, पानी तैयार किया। "माँ, आराम से रहो, मैं सावधानी से करूंगा।" मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं, लेकिन मैंने ध्यान केंद्रित किया। उनकी त्वचा नरम थी, और जैसे ही मैंने सफाई शुरू की, एक अजीब सा एहसास हुआ। माँ की सांसें तेज हो गईं, लेकिन वे चुप रहीं।

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सफाई करते हुए मैंने महसूस किया कि उनका शरीर प्रतिक्रिया दे रहा था। मेरी उँगलियाँ उनके गुप्तांग पर फिसलीं, और एक पल के लिए सब कुछ रुक सा गया। माँ ने आँखें बंद कर लीं, "अजय, बस हो गया?" उनकी आवाज में कंपन था। मैंने कहा, "हाँ माँ, अब क्रीम लगा दूं।" लेकिन दिल में कुछ और उथल-पुथल मच रही थी।

उस रात मैं सो नहीं पाया। माँ की वो छुअन, उनकी सांसें, सब कुछ दिमाग में घूम रहा था। क्या ये गलत था? वे मेरी माँ थीं, लेकिन शरीर की अपनी भाषा थी। अगले दिन सुबह, माँ फिर असहज लगीं। "अजय, आज फिर मदद कर देना।" मैंने हामी भरी, लेकिन इस बार दिल तेज धड़क रहा था।

बाथरूम में इस बार माहौल अलग था। मैंने सफाई की, लेकिन मेरी उँगलियाँ ज्यादा देर रुकीं। माँ ने कुछ नहीं कहा, बस सिसकी ली। "माँ, दर्द हो रहा है?" मैंने पूछा। "नहीं बेटा, बस... अच्छा लग रहा है।" उनकी बात ने मुझे चौंका दिया। क्या ये सिर्फ दवा का असर था, या कुछ और?

धीरे-धीरे दिन बीतते गए, और ये मदद एक रूटीन बन गई। हर बार टच ज्यादा अंतरंग होता गया। माँ की आँखों में अब शर्म कम, और एक चाहत ज्यादा नजर आती थी। एक शाम, सफाई के बाद वे उठीं नहीं, बस मुझे देखती रहीं। "अजय, तू बड़ा हो गया है। पापा के जाने के बाद तू ही मेरा सब कुछ है।"

मैंने उन्हें गले लगाया, और वो पल बदल गया। मेरे होंठ उनके हो गए, और हम दोनों खो से गए। क्या ये प्यार था, या जरूरत? दिल में संघर्ष था, लेकिन शरीर ने जवाब दे दिया। माँ ने मुझे खींचा, और हम बेडरूम की तरफ चले।

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बिस्तर पर पहुँचकर मैंने उनकी साड़ी उतारी। उनका शरीर, सालों की मेहनत से थका लेकिन खूबसूरत। मैंने उनके स्तनों को छुआ, नरमी महसूस की। माँ ने आह भरी, "अजय, धीरे..." मेरी उँगलियाँ नीचे सरकीं, जहां सफाई की जगह अब चाहत थी।

मैंने अपना कपड़ा उतारा, और उनके ऊपर आ गया। हमारी सांसें मिलीं, शरीर एक हुए। पहली बार का वो एहसास, दर्द और सुख का मिश्रण। माँ की आँखों में आंसू थे, लेकिन मुस्कान भी। "बेटा, तू मुझे पूरा कर रहा है।" मैंने गति बढ़ाई, हर धक्के में भावनाएं उमड़तीं।

उस रात के बाद, हमारी जिंदगी बदल गई। हर सफाई एक बहाना बन गई। कभी सुबह, कभी रात। माँ की चूत अब मेरी थी, सफाई से चुदाई तक का सफर। एक दिन, वे मेरे ऊपर आईं, अपनी कमर हिलाती हुईं। "अजय, आज मैं तुझे सुख दूंगी।" उनकी हरकतें नई थीं, भावनाएं गहरी।

लेकिन दिल में डर था, समाज क्या कहेगा? माँ ने कहा, "ये हमारा राज है, बेटा। प्यार में क्या गलत?" हमारी अंतरंगता बढ़ती गई, हर बार नया अनुभव। कभी दीवार के सहारे, कभी फर्श पर। सेंसेशन अलग, लेकिन प्यार एक।

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एक शाम, बारिश हो रही थी। हम दोनों भीगकर घर आए। माँ ने मुझे बाहों में लिया, और हम फिर एक हुए। उनकी गर्माहट, मेरी ठंडक। चूत की सफाई अब रोज की थी, लेकिन चुदाई में वैरायटी। कभी धीमी, कभी तेज। भावनाएं उफान पर।

मैंने महसूस किया, ये सिर्फ शरीर नहीं, आत्मा का मिलन था। माँ की आहें, मेरी सिसकियां। हर पल में कन्फ्लिक्ट, लेकिन सुख ज्यादा। हम खोए हुए थे, अपनी दुनिया में।

रात गहरी हो गई, माँ मेरे सीने पर सिर रखकर लेटी थीं। उनकी सांसें शांत, लेकिन दिल की धड़कन तेज। मैंने उन्हें चूमा, और हम फिर शुरू हो गए।

सुबह की रोशनी में, माँ उठीं, मुस्कुराईं। "अजय, आज फिर सफाई?" मैंने हाँ कहा, और हम बाथरूम चले। इस बार, सफाई से ज्यादा, प्यार था। मेरी उँगलियाँ उनकी गहराई में, और फिर चुदाई का दौर।

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दिन बीतते गए, हमारी बॉन्डिंग मजबूत होती गई। कभी रसोई में, कभी सोफे पर। हर जगह हमारा प्यार फैला। माँ की चाहत, मेरी जरूरत।

एक रात, वे रो पड़ीं। "अजय, क्या ये सही है?" मैंने उन्हें चुप कराया, "माँ, हमारे लिए सही है।" और हम फिर मिले, भावनाओं के सागर में।

बारिश की वो रात याद आई, जब हम बालकनी में थे। ठंडी हवा, गर्म शरीर। चुदाई का वो रूप, जहां सफाई भूल गई। सिर्फ सुख, सिर्फ प्यार।

मैंने उनकी चूत को चूमा, पहली बार। माँ कांपी, "अजय..." और फिर उन्माद। नई भावना, नया अनुभव।

हमारी कहानी जारी थी, हर दिन नया अध्याय। माँ की सफाई, मेरी चुदाई। लेकिन गहराई में, ये प्यार की कहानी थी।

शाम का समय, हम सोफे पर बैठे। माँ का हाथ मेरे हाथ में। आँखें मिलीं, और पल बदल गया।

बिस्तर पर, फिर वही जुनून। उनकी कमर की हरकत, मेरी गति। सेंसरी फील, गंध, स्पर्श।

माँ ने कहा, "अजय, तू मेरा सब कुछ है।" और हम चरम पर पहुँचे।

रात की चुप्पी में, हम लेटे रहे, एक-दूसरे में खोए।