माँ की अनकही इच्छाएँ
सुबह की धूप मेरे छोटे से किचन में धीरे-धीरे फैल रही थी। मैं हमेशा की तरह उठकर सबसे पहले चाय की केतली चढ़ाती हूँ, और आज भी वही रूटीन था। बाहर गली में बच्चों की आवाज़ें आ रही थीं, और घर में अभी सन्नाटा था। मेरे दोनों बेटे, राहुल और रोहन, अभी सो रहे थे, शायद देर रात तक पढ़ाई करते रहते हैं। मैंने खिड़की से बाहर झाँका, पड़ोस की आंटी अपनी बालकनी में कपड़े सुखा रही थीं।
मेरा नाम सरिता है, और मैं पिछले पाँच साल से अकेली ही इस घर को संभाल रही हूँ। मेरे पति की मौत एक दुर्घटना में हो गई थी, तब राहुल बीस साल का था और रोहन अठारह का। वे दोनों अब कॉलेज जा रहे हैं, राहुल इंजीनियरिंग कर रहा है और रोहन कॉमर्स। मैं खुद एक छोटी सी नौकरी करती हूँ, स्कूल में टीचर हूँ, जो घर चलाने के लिए काफी है। रोज़ सुबह उठकर नाश्ता बनाना, उन्हें जगाना, और शाम को उनके लौटने का इंतज़ार करना – यही मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बन गया है।
आज राहुल सबसे पहले उठा। वह किचन में आया, उसके बाल बिखरे हुए थे और आँखें अभी नींद से भरी हुईं। "माँ, चाय तैयार है?" उसने मुस्कुराते हुए पूछा। मैंने हाँ में सिर हिलाया और उसे कप थमा दिया। रोहन थोड़ी देर बाद आया, वह हमेशा थोड़ा आलसी है, लेकिन दोनों भाई बहुत प्यारे हैं। हम तीनों ने साथ बैठकर नाश्ता किया, बातें कीं कॉलेज की, मेरी स्कूल की। कोई खास बात नहीं, बस सामान्य दिनचर्या।
शाम को जब मैं घर लौटी, तो थकान महसूस हो रही थी। स्कूल में आज बहुत काम था, बच्चे शरारत कर रहे थे। राहुल और रोहन पहले से घर पर थे, वे लिविंग रूम में टीवी देख रहे थे। मैंने उन्हें देखा, दोनों हँसते हुए कुछ डिस्कस कर रहे थे। "क्या देख रहे हो?" मैंने पूछा, जबकि सोफे पर बैठ गई। रोहन ने कहा, "बस एक मूवी, माँ। तुम थक गई लग रही हो, आराम करो।" उनकी चिंता मुझे अच्छी लगती है, वे मेरे लिए सब कुछ हैं।
रात का खाना बनाते समय मैं सोच रही थी कि कैसे समय बीतता जा रहा है। राहुल अब बड़ा हो गया है, उसकी नौकरी की बातें चल रही हैं। रोहन भी जल्दी ही ग्रेजुएट हो जाएगा। कभी-कभी अकेलापन महसूस होता है, लेकिन उनके साथ रहकर सब ठीक लगता है। खाने की मेज पर हमने बातें कीं, पुरानी यादें ताज़ा कीं। पापा की याद आई, लेकिन हमने उसे हल्के में लिया।
कुछ दिनों बाद, एक शाम बारिश हो रही थी। मैं बालकनी में खड़ी होकर बारिश देख रही थी, मन में एक उदासी थी। राहुल अंदर से आया और मेरे पास खड़ा हो गया। "माँ, क्या हुआ? तुम उदास लग रही हो।" उसकी आवाज़ में चिंता थी। मैंने मुस्कुराकर कहा, "कुछ नहीं बेटा, बस ऐसे ही।" लेकिन अंदर से मैं जानती थी कि यह अकेलापन बढ़ता जा रहा है। रोहन भी आ गया, और हम तीनों वहीं खड़े बातें करने लगे।
इसे भी पढ़ें: माँ की अनकही चाहत
उस रात सोते समय मेरे मन में अजीब विचार आने लगे। मैंने खुद को टोका, लेकिन वे विचार थे परिवार की करीबियों के बारे में। सुबह उठकर मैंने सब सामान्य रखा, लेकिन राहुल की नज़रें कभी-कभी मुझे अलग लगने लगीं। शायद मेरी कल्पना हो, लेकिन वह मुझे ज्यादा ध्यान से देखता था। रोहन भी, वह घर के कामों में ज्यादा मदद करने लगा।
एक वीकेंड पर हमने घर पर ही मूवी नाइट रखी। मैंने पॉपकॉर्न बनाए, और हम सोफे पर बैठ गए। फिल्म रोमांटिक थी, और बीच में कुछ सीन ऐसे थे जो थोड़े इंटिमेट थे। मैंने देखा कि राहुल असहज हो रहा था, और रोहन ने मेरी तरफ देखा। "माँ, यह फिल्म ठीक है न?" रोहन ने पूछा। मैंने हाँ कहा, लेकिन मेरे मन में एक हलचल थी। फिल्म खत्म होने के बाद हम बातें करने लगे, और बातें गहरी हो गईं।
राहुल ने कहा, "माँ, पापा के जाने के बाद तुमने कभी खुद के बारे में नहीं सोचा। हम तुम्हारे लिए हैं, लेकिन क्या तुम खुश हो?" उसकी बात ने मुझे छू लिया। मैंने आँखें नीची कर लीं, "हाँ बेटा, तुम दोनों हो तो सब ठीक है।" लेकिन अंदर से एक भावना उभर रही थी, जो मैं समझ नहीं पा रही थी। रोहन ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, "हम तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे।"
उस रात मैं बिस्तर पर लेटी सोच रही थी। मेरे शरीर में एक अजीब सा कंपन था, जैसे सालों से दबी हुई कोई इच्छा जाग रही हो। मैंने खुद को समझाया कि यह गलत है, लेकिन विचार रुक नहीं रहे थे। अगले दिन राहुल घर पर अकेला था, रोहन बाहर गया था। मैं किचन में थी, और वह आया मदद करने। उसकी मौजूदगी मुझे अलग महसूस हो रही थी।
इसे भी पढ़ें: मां के साथ अनकही चाहत
"माँ, तुम बहुत सुंदर हो," राहुल ने अचानक कहा। मैं चौंक गई, "क्या कह रहे हो बेटा?" लेकिन उसकी आँखों में कुछ था। वह करीब आया, और मैं पीछे नहीं हटी। उसने मेरे हाथ पकड़ लिए, "मैं तुम्हें देखता हूँ, माँ। तुम्हारी उदासी मुझे दर्द देती है।" मेरे मन में संघर्ष था, लेकिन उसकी गर्माहट अच्छी लग रही थी।
उस पल हम चुप थे, बस एक-दूसरे को देखते रहे। फिर राहुल ने मुझे गले लगा लिया, और मैंने विरोध नहीं किया। उसका स्पर्श सालों के अकेलेपन को पिघला रहा था। रोहन जब लौटा, तो हम सामान्य हो गए, लेकिन शाम को बात फिर गहरी हुई। मैंने उन्हें बताया अपनी भावनाओं के बारे में, बिना कुछ छिपाए।
रोहन ने कहा, "माँ, हम तुम्हारे लिए कुछ भी करेंगे।" और राहुल ने सहमति दी। उस रात हम तीनों करीब आए, बातों से शुरू होकर। मैंने महसूस किया कि यह रिश्ता बदल रहा है, लेकिन डर भी था। फिर भी, भावनाएँ हावी हो गईं।
पहली बार जब हम अंतरंग हुए, तो वह धीरे-धीरे हुआ। राहुल ने मेरे होंठों को छुआ, और मैंने आँखें बंद कर लीं। उसकी साँसें मेरे चेहरे पर थीं, गर्म और कोमल। रोहन पास बैठा देख रहा था, फिर वह भी शामिल हुआ। मेरे शरीर में एक आग लग गई थी, सालों की कुंठा बाहर आ रही थी।
राहुल ने मेरे ब्लाउज के बटन खोले, धीरे-धीरे, जैसे कोई कीमती चीज़ संभाल रहा हो। मेरी साँसें तेज़ हो गईं, और मैंने उसके सीने पर हाथ रखा। रोहन ने मेरी कमर को सहलाया, उसकी उँगलियाँ मेरी त्वचा पर फिसल रही थीं। मैंने खुद को उनके हवाले कर दिया, भावनाओं की लहर में बहते हुए।
इसे भी पढ़ें: माँ की छाया में
हम बेडरूम में गए, जहाँ रोशनी मद्धम थी। राहुल ने मुझे बिस्तर पर लिटाया, और उसके होंठ मेरे गले पर उतर आए। मैं कराह उठी, वह सनसनी नई थी, लेकिन परिचित भी। रोहन ने मेरे पैरों को सहलाया, ऊपर की ओर बढ़ते हुए। मेरी चूत में एक मीठा दर्द उभर रहा था, गीली और तैयार।
राहुल का लंड सख्त था, जब उसने मेरे अंदर प्रवेश किया, तो मैं चीख पड़ी। वह धीरे-धीरे हिल रहा था, हर धक्के में प्यार महसूस हो रहा था। रोहन ने मेरे स्तनों को चूमा, निप्पल्स को मुँह में लेकर चूसा। मैं बीच में थी, दोनों की गर्मी से घिरी हुई। भावनाएँ उफान पर थीं, अपराधबोध मिश्रित खुशी।
फिर रोहन की बारी आई। उसने मुझे घुमाया, पीछे से प्रवेश किया। उसकी गति तेज़ थी, जुनूनी। मैंने राहुल को चूमा, जबकि रोहन मुझे चोद रहा था। मेरी चूत लंड से भरी हुई थी, रस बह रहा था। हर स्ट्रोक में एक नई अनुभूति, जैसे शरीर जाग रहा हो।
हम रुके नहीं, रात भर। कभी राहुल, कभी रोहन, और कभी दोनों साथ। मैंने महसूस किया उनकी ताकत, उनकी इच्छा मेरे लिए। मेरी कराहें कमरे में गूँज रही थीं, "हाँ बेटा, और ज़ोर से।" भावनाएँ गहरी थीं, प्यार और वासना का मिश्रण।
इसे भी पढ़ें: माँ की साये में
सुबह हुई, लेकिन हम अभी भी एक-दूसरे में खोए थे। राहुल ने फिर से मुझे चूमा, उसका हाथ मेरी चूत पर था, उँगलियाँ अंदर-बाहर। रोहन मेरे पीछे था, उसके लंड की गर्मी महसूस हो रही थी। मैंने खुद को पूरी तरह खोल दिया, हर पल को जीते हुए।
यह अब हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन गया। हर शाम, हम करीब आते, बातों से शुरू होकर शरीर की भाषा में। एक दिन रोहन ने मुझे किचन में पकड़ा, काउंटर पर उठाकर चोदा। उसकी उँगलियाँ मेरी क्लिट पर रगड़ रही थीं, और मैं झड़ गई, जोर से। राहुल देख रहा था, फिर शामिल हुआ।
दूसरी बार हम बाहर गए, लेकिन घर लौटकर फिर वही। मैंने उन्हें अपनी इच्छाएँ बताईं, और वे पूरी करते। मेरी चूत अब उनकी थी, हर रात भरी जाती। भावनाएँ बदल रही थीं, अपराधबोध कम हो रहा था, प्यार बढ़ रहा था।
एक रात हम तीनों नंगे लेटे थे, मैं बीच में। राहुल ने कहा, "माँ, हम तुम्हारे बिना नहीं रह सकते।" रोहन ने सहमति दी, उसके हाथ मेरे शरीर पर घूम रहे थे। मैंने उन्हें चूमा, और फिर से शुरू हो गया। रोहन का लंड मेरी चूत में, राहुल का मुँह में। मैं चूस रही थी, चाट रही थी, जबकि रोहन धक्के मार रहा था।
झड़ने का अहसास अद्भुत था, हम सब साथ में। मेरे शरीर में कंपन, उनकी गर्मी। यह अब नॉर्मल था, लेकिन हर बार नया। मैंने महसूस किया कि यह रिश्ता हमें बाँध रहा है, गहराई से।
इसे भी पढ़ें: मां की छिपी चाहत
समय बीतता गया, लेकिन हमारी करीबी बढ़ती गई। अब डर नहीं था, बस खुशी। एक शाम हम पार्क में घूमे, लेकिन घर आकर फिर वही। राहुल ने मुझे दीवार से सटाकर चोदा, जोर-जोर से। मेरी कराहें, "हाँ, ऐसे ही।" रोहन ने पीछे से पकड़ा, उसका लंड मेरी गांड पर रगड़ता।
हमने नई चीजें ट्राई कीं, लेकिन हमेशा इमोशनल कनेक्शन के साथ। मेरी चूत अब हमेशा तैयार रहती, उनके लिए। भावनाएँ उफान पर, प्यार की नई परिभाषा।
अब हर पल उनके साथ गुजरता है, अंतरंगता में। राहुल की आँखें, रोहन का स्पर्श, सब कुछ मेरा है। हम लेटे हैं, उनके हाथ मेरे शरीर पर, और मैं महसूस कर रही हूँ उनकी साँसें मेरी त्वचा पर।