माँ की साये में
सुबह की पहली किरण कमरे में घुस रही थी, जब मैंने आंखें खोलीं। बाहर बालकनी से चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई दे रही थी, और रसोई से माँ की आवाज़ आ रही थी – चाय की केतली का सिटी बजना और बर्तनों की हल्की-हल्की खनक। मैं रोहन, अपनी छोटी सी नौकरी के साथ दिल्ली के इस फ्लैट में रहता हूं, जहां हर दिन की शुरुआत ऐसी ही होती है। पापा का ट्रांसफर हुए दो साल हो गए, वो अब मुंबई में हैं, और मैं माँ के साथ यहां अकेला हूं। आज भी वही रूटीन था – बिस्तर से उठना, ब्रश करना, और नाश्ते की मेज पर बैठना।
माँ राधा, हमेशा की तरह साड़ी में लिपटी हुई, चाय का कप मेरे सामने रख रही थीं। उनकी उम्र पैंतालीस की है, लेकिन वो अब भी वैसी ही लगती हैं जैसी बचपन में लगती थीं – शांत, देखभाल करने वाली। "बेटा, आज ऑफिस जल्दी जाना है क्या?" उन्होंने पूछा, जबकि मैं अखबार पढ़ने की कोशिश कर रहा था। मैंने हामी भरी, "हां माँ, मीटिंग है।" हमारा घर छोटा सा है, दो कमरे का, लेकिन इसमें एक आराम है। पापा के जाने के बाद माँ ने घर को संभाला है, छोटी-मोटी सिलाई का काम करके। मैं कॉलेज से निकलकर नौकरी में लगा हूं, इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर सॉफ्टवेयर कंपनी में।
दिन बीतते हैं ऐसे ही, शाम को लौटना, माँ के साथ डिनर करना, टीवी देखना। कभी-कभी पुरानी यादें ताजा होती हैं – कैसे पापा के साथ पूरा परिवार घूमने जाता था। अब बस हम दोनों। माँ अकेलेपन की शिकायत नहीं करतीं, लेकिन उनकी आंखों में वो खालीपन दिखता है। मैं कोशिश करता हूं उन्हें खुश रखने की, कभी बाहर ले जाता हूं, कभी फिल्म दिखाता हूं। आज शाम भी वैसी ही थी, मैं ऑफिस से थका हुआ लौटा, माँ ने दाल-चावल बनाया था। हमने साथ खाना खाया, और फिर वो अपनी सिलाई मशीन पर बैठ गईं।
रात के नौ बजे मैं अपने कमरे में था, लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था। माँ का कमरा बगल में है, दीवार पतली है, उनकी सांसें तक सुनाई देती हैं कभी-कभी। मैंने सोचा उन्हें पानी का गिलास दे दूं, क्योंकि वो रात को अक्सर प्यास से उठती हैं। दरवाजा खटखटाया, "माँ, सो गईं क्या?" अंदर से आवाज़ आई, "नहीं बेटा, आ जा।" मैं अंदर गया, वो बिस्तर पर बैठी किताब पढ़ रही थीं – कोई पुरानी हिंदी उपन्यास।
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उस रात कुछ अलग था, शायद मौसम की वजह से। बाहर बारिश हो रही थी, और कमरे में हल्की ठंडक थी। माँ ने मुझे देखा, "क्या हुआ रोहन? काम खत्म नहीं हुआ?" मैंने गिलास रखा और बैठ गया, "नहीं माँ, बस थक गया हूं।" हम बातें करने लगे – ऑफिस की, पापा की, पुराने दिनों की। उनकी आवाज़ में एक नरमी थी, जो हमेशा मुझे सुकून देती है। लेकिन उस पल में, उनकी आंखों में कुछ था, एक उदासी जो मैंने पहले नहीं देखी थी।
बातों-बातों में माँ ने कहा, "तुम बड़े हो गए हो रोहन, लेकिन कभी-कभी लगता है जैसे अभी भी बच्चे हो।" मैं हंसा, लेकिन अंदर से कुछ हिला। वो मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोलीं, "पापा के बिना घर सूना लगता है न?" मैंने सहमति में सिर हिलाया। वो पास आईं, गले लगाने की कोशिश में, और अचानक हमारी नज़रें मिलीं। वो पल लंबा खिंच गया, जैसे समय रुक सा गया हो।
मैंने खुद को संभाला, लेकिन दिल की धड़कन तेज़ थी। माँ से दूर हटकर मैंने कहा, "माँ, सो जाओ अब।" लेकिन वो मुस्कुराईं, "ठीक है बेटा।" रात भर नींद नहीं आई, विचारों का तूफान था। अगले दिन सब सामान्य लग रहा था, लेकिन मेरे मन में कुछ बदल गया था। ऑफिस में बैठे-बैठे माँ की याद आती, उनकी मुस्कान, उनकी वो नरमी। शाम को घर लौटा तो माँ रसोई में थीं, साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ, बाल खुले। मैंने उन्हें देखा, और पहली बार कुछ अलग महसूस हुआ – एक आकर्षण जो पहले नहीं था।
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"माँ, मदद करूं?" मैंने पूछा, पास जाकर। वो बोलीं, "नहीं बेटा, बस हो गया।" लेकिन मैं रुका, उनकी कमर पर नज़र गई, वो पसीने की बूंदें। मन में संघर्ष था – ये क्या हो रहा है? वो मेरी माँ हैं, लेकिन ये भावनाएं...। रात को डिनर के बाद हम सोफे पर बैठे, टीवी चल रहा था। माँ का सिर मेरे कंधे पर था, थकान से। मैंने अपना हाथ उनके कंधे पर रखा, और वो शांत रहीं।
धीरे-धीरे दिन बदलने लगे। एक शाम बारिश में हम भीगकर घर आए, माँ के कपड़े गीले थे। मैंने तौलिया दिया, "जल्दी बदल लो माँ।" लेकिन वो हंसकर बोलीं, "तुम भी बदलो रोहन।" कमरे में जाकर मैंने सोचा, लेकिन दरवाजा खुला था। मैंने उन्हें देखा, साड़ी बदलते हुए, और मन में आग लग गई। वो पल में मैंने खुद को रोका, लेकिन रात को सपने आए – उनके बारे में।
अब टेंशन बढ़ रही थी। माँ भी महसूस कर रही थीं शायद, क्योंकि उनकी नज़रें बदल गईं। एक रात वो मेरे कमरे में आईं, "रोहन, नींद नहीं आ रही।" मैंने जगह दी, "आओ माँ।" वो बिस्तर पर लेटीं, हम बातें करने लगे। उनका हाथ मेरे सीने पर था, अनजाने में। मैंने छुआ, और वो शांत रहीं। दिल की धड़कनें मिल रही थीं।
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उस रात पहली बार हम करीब आए। मैंने उनके गाल पर हाथ रखा, "माँ..." वो बोलीं, "शश... रोहन।" हमारी होंठ मिले, धीरे से, भावनाओं से भरे। मन में अपराध था, लेकिन इच्छा ज्यादा। उनके शरीर की गर्मी महसूस हुई, साड़ी के नीचे। हमने एक-दूसरे को छुआ, धीरे-धीरे, जैसे पहली बार।
उसके बाद रातें बदल गईं। हर शाम हम बातों से शुरू करते, फिर करीब आते। माँ की आंखों में अब डर नहीं, बल्कि एक नई चमक थी। एक रात उन्होंने कहा, "रोहन, ये गलत है, लेकिन मैं रोक नहीं पा रही।" मैंने उन्हें गले लगाया, "माँ, मैं भी।" हमने प्यार किया, उनके शरीर को महसूस करते हुए – उनकी छाती की नरमी, कमर की वक्रता। सांसें तेज़, पसीना, और वो भावनात्मक जुड़ाव।
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हर बार कुछ नया होता। कभी रसोई में, अनजाने में छूना, फिर वही आग। माँ की कराहें, मेरी उत्तेजना। लेकिन अंदर संघर्ष था – समाज, पापा, सब। फिर भी हम रुक नहीं पाते। एक शाम माँ ने मुझसे कहा, "तुम मेरे लिए सब हो रोहन।" मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया, उनके कपड़े उतारे, धीरे-धीरे। उनकी त्वचा पर चुंबन, नीचे उतरते हुए। वो सिसक रही थीं, "रोहन... आह।"
हमारा मिलन अब गहरा था। मैं उनके अंदर जाता, उनकी आंखों में देखते हुए। वो भावना – प्यार, वासना, अपराध – सब मिश्रित। हर स्ट्रोक में नई सनसनी, उनकी नमी, मेरी ताकत। हम चरम पर पहुंचते, साथ में। लेकिन उसके बाद चुप्पी, गले लगकर सोना।
समय बीतता गया, लेकिन ये रहस्य हमारा था। माँ अब ज्यादा खुश लगतीं, लेकिन मैं जानता हूं ये कितना नाजुक है। एक रात फिर हम साथ थे, उनके शरीर को एक्सप्लोर करते हुए। मैंने उनकी पीठ पर चुंबन किए, नीचे उतरते हुए। वो मुड़ीं, "रोहन, और..." हमने नई पोजीशन ट्राई की, पक्षों से, उनकी सांसें मेरे कान में।
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भावनाएं उफान पर थीं। मैं सोचता, ये कब तक चलेगा? लेकिन उस पल में, उनके साथ, सब भूल जाता। हमारा प्यार अब सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि आत्मिक था। वो मेरी माँ थीं, लेकिन अब कुछ और भी।
फिर एक शाम, बारिश में, हम बालकनी में खड़े थे। माँ ने मेरी कमर पकड़ी, "रोहन, आज..." मैंने उन्हें अंदर ले जाकर, फर्श पर ही। उनकी साड़ी ऊपर की, उनके अंदर प्रवेश। वो चिल्लाईं नहीं, बस सिसकीं। हमारा क्लाइमेक्स साथ आया, गीले शरीर मिले हुए।
रात गहरा रही थी, हम बिस्तर पर लेटे थे। माँ की सांसें शांत हो रही थीं, मेरी बाहों में।