मां के साथ अनकही चाहत

सुबह की धूप धीरे-धीरे कमरे में घुस रही थी, जब मैं बिस्तर से उठा। बाहर आंगन में मां रोज की तरह फूलों को पानी दे रही थीं। मैंने घड़ी देखी, अभी सात बजे थे, और आज रविवार था, इसलिए कोई जल्दी नहीं थी।

मैं रसोई में गया और चाय का पानी चढ़ाया। हमारा घर छोटा सा था, दिल्ली के एक पुराने मोहल्ले में, जहां पापा के जाने के बाद सिर्फ मैं और मां रहते थे। पापा की मौत को दो साल हो चुके थे, हार्ट अटैक से, और तब से मां ने खुद को घर की जिम्मेदारियों में झोंक दिया था।

मैं रोहन हूं, तेईस साल का, एक छोटी सी आईटी कंपनी में जॉब करता हूं। मां का नाम शीला है, वो चालीस की हैं, लेकिन उनकी आंखों में वो थकान साफ दिखती है जो पापा के जाने के बाद आई। वो स्कूल में टीचर हैं, बच्चों को पढ़ाती हैं, और शाम को घर लौटकर सब कुछ संभालती हैं।

चाय बनाकर मैंने दो कप भरे और आंगन में ले गया। "मां, चाय पी लो," मैंने कहा। वो मुस्कुराईं और गमले से हाथ झाड़कर मेरे पास आईं। "तू हमेशा इतनी अच्छी चाय बनाता है, रोहन," उन्होंने कहा, और हम दोनों कुर्सी पर बैठ गए।

बातें करते-करते दिन निकल जाता था। आज मां ने बताया कि स्कूल में एक नया प्रोजेक्ट शुरू होने वाला है, और वो थोड़ी चिंतित हैं। मैंने उनकी बात सुनी, और सोचा कि कितनी मजबूत हैं वो, अकेले सब कुछ संभालते हुए।

दोपहर में मैंने लंच बनाया, क्योंकि मां थक गई थीं। हमने साथ खाना खाया, और फिर वो आराम करने चली गईं। मैं अपने कमरे में लैपटॉप पर काम करने लगा, लेकिन दिमाग कहीं और था। पापा के जाने के बाद घर में एक खालीपन सा आ गया था।

शाम को मां ने मुझे बाजार जाने को कहा। "कुछ सब्जियां लानी हैं, रोहन। मैं साथ चलती हूं," उन्होंने कहा। हम साथ निकले, सड़क पर चलते हुए। मोहल्ले के लोग हमें देखकर मुस्कुराते, क्योंकि सब जानते थे हमारी कहानी।

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बाजार में मां ने सब्जियां चुनीं, और मैं बैग उठाए उनके पीछे चलता रहा। वापसी में बारिश शुरू हो गई, हल्की-हल्की। हम जल्दी-जल्दी घर की ओर भागे, लेकिन भीग ही गए।

घर पहुंचकर मां ने कहा, "जल्दी से कपड़े बदल ले, रोहन। सर्दी लग जाएगी।" मैंने हंसकर कहा, "तुम भी, मां।" कमरे में जाकर मैंने शर्ट उतारी, और सोचा कि कितना अच्छा लगता है उनका ख्याल रखना।

रात का खाना हमने साथ बनाया। मां ने रोटियां सेंकीं, और मैंने सब्जी बनाई। खाते हुए उन्होंने पुरानी यादें साझा कीं, पापा के बारे में। उनकी आंखें नम हो गईं, और मैंने उनका हाथ थाम लिया।

"मां, अब मैं हूं ना। सब ठीक हो जाएगा," मैंने कहा। वो मुस्कुराईं, लेकिन वो चुप्पी में कुछ अनकहा सा था। रात को सोने से पहले मैंने देखा कि मां बालकनी में खड़ी बाहर देख रही थीं।

अगले दिन ऑफिस से लौटा तो मां घर पर नहीं थीं। वो स्कूल से देर से आईं, थकी हुई। "आज बहुत काम था," उन्होंने कहा। मैंने उन्हें पानी दिया, और हम सोफे पर बैठ गए।

बातों में पता चला कि मां को अकेलापन बहुत सताता है। "पापा के बिना सब सूना लगता है," उन्होंने धीरे से कहा। मैंने उनकी तरफ देखा, और पहली बार महसूस किया कि वो कितनी कमजोर लग रही हैं।

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रात को डिनर के बाद मां ने कहा, "रोहन, तू मेरे लिए सब कुछ है।" उनकी आवाज में एक गहराई थी। मैंने उन्हें गले लगाया, और वो मेरे कंधे पर सिर रखकर चुपचाप बैठी रहीं।

उस रात मुझे नींद नहीं आई। मां के बारे में सोचता रहा, उनकी विधवा जिंदगी के बारे में। वो कितनी सुंदर हैं, लेकिन दुख ने उन्हें छू लिया है। अगले दिन सुबह मैंने उन्हें ब्रेकफास्ट सरप्राइज दिया।

मां खुश हुईं, और हमने साथ समय बिताया। धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि घर में एक नई ऊर्जा आ रही है। शाम को जब मां नहाकर आईं, उनके गीले बालों से पानी टपक रहा था।

मैंने अनायास उनकी तरफ देखा, और कुछ पल के लिए समय रुक सा गया। मां ने नजरें झुका लीं, लेकिन मुस्कुराईं। "क्या देख रहा है?" उन्होंने पूछा। मैंने हंसकर कहा, "बस ऐसे ही, मां।"

उस शाम हमने फिल्म देखी। सोफे पर बैठे, मां मेरे बगल में। उनकी साड़ी की सिलवटें, उनकी सांसें, सब कुछ करीब लग रहा था। फिल्म में एक भावुक सीन आया, और मां की आंखें भर आईं।

मैंने उनका हाथ पकड़ा, और वो मेरी तरफ मुड़ीं। हमारी नजरें मिलीं, और एक चुप्पी छा गई। "रोहन," उन्होंने धीरे से कहा, लेकिन आगे कुछ नहीं बोलीं। मैंने महसूस किया कि दिल की धड़कन तेज हो गई है।

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रात को बिस्तर पर लेटे मैं सोचता रहा। मां के प्रति मेरी भावनाएं बदल रही थीं। वो सिर्फ मां नहीं, एक औरत भी हैं, जो अकेली है। अगले दिन मैंने ऑफिस से छुट्टी ली, और घर पर रहा।

मां स्कूल से लौटीं तो हैरान हुईं। "आज ऑफिस नहीं गया?" मैंने कहा, "तुम्हारे साथ समय बिताना चाहता था।" हमने साथ लंच किया, और बातें कीं। धीरे-धीरे बातें व्यक्तिगत होने लगीं।

मां ने बताया कि पापा के जाने के बाद उन्होंने कभी किसी और के बारे में नहीं सोचा। "लेकिन अकेलापन बहुत है," उन्होंने कहा। मैंने उनकी आंखों में देखा, और एक अनजानी引きを感じा।

शाम को बारिश फिर शुरू हुई। हम बालकनी में खड़े थे, भीगते हुए। मां की साड़ी गीली हो गई, और वो मेरे करीब आईं। "ठंड लग रही है," उन्होंने कहा। मैंने उन्हें गले लगाया, गर्माहट देने के लिए।

उस पल में कुछ बदल गया। मेरे हाथ उनकी कमर पर थे, और वो चुपचाप खड़ी रहीं। हमारी सांसें मिल रही थीं। "मां," मैंने धीरे से कहा, और वो मेरी तरफ मुड़ीं।

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हमारे होंठ मिले, पहले हिचकिचाहट से, फिर एक गहरी चाहत से। मां की आंखें बंद थीं, और मैंने महसूस किया कि ये सही लग रहा है। हम कमरे में आए, और बिस्तर पर बैठ गए।

मैंने मां की साड़ी धीरे-धीरे उतारी। उनकी त्वचा नरम थी, गर्म। "रोहन, ये गलत है," उन्होंने कहा, लेकिन उनकी आंखों में इच्छा थी। मैंने कहा, "नहीं मां, ये हमारी जरूरत है।"

हमारे शरीर मिले, पहले धीरे, फिर तेजी से। मां की सिसकियां कमरे में गूंजीं, और मैंने उनकी हर भावना को महसूस किया। वो मेरे ऊपर आईं, और हम एक हो गए।

उस रात हमने कई बार प्यार किया, हर बार नई गहराई के साथ। मां की आंखों में अब दुख नहीं, एक नई चमक थी। सुबह जब मैं जागा, वो मेरे बगल में सो रही थीं, शांत।

दिन निकलते ही हमारी जिंदगी बदल गई। अब हर पल में एक छिपी चाहत थी। शाम को मां ने मुझे बुलाया, और हम फिर एक हुए। इस बार और ज्यादा भावुकता से, जैसे सालों का अकेलापन मिट रहा हो।

मां की चूत गर्म और नरम थी, और जब मैं अंदर गया, तो उनकी सिसकियां मेरे कानों में संगीत की तरह बजीं। "रोहन, और जोर से," उन्होंने कहा, और मैंने उनकी इच्छा पूरी की।

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हमारे बीच अब कोई दीवार नहीं थी। हर रात हम नई ऊंचाइयों को छूते, कभी धीरे, कभी तेज। मां की बॉडी मेरे लिए एक रहस्य थी, जिसे मैं हर बार खोलता।

एक शाम मां ने नई ड्रेस पहनी, और मुझे आकर्षित किया। हम बिस्तर पर लेटे, और मैंने उनकी हर इच्छा को पूरा किया। उनकी चूत की गर्मी मुझे पागल कर देती थी।

समय बीतता गया, लेकिन हमारी चाहत कम नहीं हुई। हर सीन में नई भावना जुड़ती, कभी प्यार, कभी जुनून। मां अब खुश लगती थीं, और मैं उनकी हर जरूरत बन गया था।

रात को जब हम मिलते, तो दुनिया भूल जाते। मां की सांसें तेज होतीं, और मैं उनकी चूत में खो जाता। "रोहन, मैं तेरी हूं," उन्होंने कहा, और हम फिर एक हो गए।

उस पल में सब कुछ सही लगता था, जैसे ये हमारा भाग्य हो। मां की आंखें बंद थीं, और मैं उनकी गहराई में उतर रहा था, धीरे-धीरे