दीदी के साथ अनकही चाहत

शाम का समय था, घर में हल्की-हल्की ठंडक फैल रही थी। मैं कॉलेज से लौटकर अपना बैग कमरे में रखा और सीधा किचन की तरफ चला गया। दीदी वहां चाय बना रही थी, रोज की तरह। बाहर बारिश की बूंदें खिड़की पर टपक रही थीं, और घर में सिर्फ हम दोनों थे क्योंकि मम्मी-पापा काम से देर रात लौटते थे।

मैंने कुर्सी खींचकर बैठते हुए कहा, "दीदी, आज क्लास में बहुत बोरिंग लेक्चर था। तुम्हारा दिन कैसा रहा?" प्रिया दीदी ने मुस्कुराकर चाय का कप मेरी तरफ बढ़ाया। वह हमेशा की तरह साड़ी में थी, बाल खुले हुए, और चेहरे पर थकान की हल्की छाया। "अच्छा रहा रोहन, ऑफिस में मीटिंग्स थीं, लेकिन अब घर आकर सुकून मिलता है। तू पढ़ाई पर ध्यान दे, एग्जाम्स आने वाले हैं।"

हम दोनों चाय पीते हुए बातें करने लगे। दीदी मेरी बड़ी बहन थी, मुझसे चार साल बड़ी, और घर की जिम्मेदारियां संभालती थी। मैं रोहन, बीस साल का, इंजीनियरिंग का स्टूडेंट, और दीदी प्रिया, चौबीस की, एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करती थी। हमारा परिवार छोटा था, बस हम चार लोग, और शहर के इस अपार्टमेंट में रहते थे। दीदी हमेशा मेरी दोस्त की तरह रही, स्कूल के दिनों से लेकर अब तक।

बातों-बातों में शाम ढल गई। मैंने अपना होमवर्क निकाला और लिविंग रूम में बैठ गया। दीदी ने डिनर बनाने की तैयारी शुरू की। बाहर बारिश तेज हो गई थी, और घर की लाइट्स हल्की-हल्की जल रही थीं। मैं किताब पढ़ते हुए कभी-कभी दीदी की तरफ देखता, लेकिन सिर्फ इसलिए क्योंकि वह अकेले काम कर रही थी। "दीदी, मदद करूं?" मैंने पूछा। वह हंसकर बोली, "नहीं रोहन, तू पढ़। मैं मैनेज कर लूंगी।"

रात के नौ बजे मम्मी-पापा का फोन आया कि वे देर से आएंगे, बारिश की वजह से ट्रैफिक जाम था। हम दोनों ने साथ डिनर किया। टेबल पर बैठकर, दीदी ने अपनी ऑफिस की कहानियां सुनाईं, कैसे बॉस हमेशा एक्स्ट्रा वर्क देता है। मैंने अपनी कॉलेज की फनी स्टोरीज शेयर कीं। हंसी-मजाक में समय बीतता गया, और लगा जैसे हम दोनों ही घर में हैं, बाकी दुनिया बाहर छूट गई है।

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डिनर के बाद, मैं सोफे पर बैठकर टीवी ऑन किया। दीदी भी आकर पास बैठ गई। "कुछ अच्छी फिल्म लगाओ," उसने कहा। मैंने एक पुरानी हिंदी मूवी चला दी, जो हम दोनों को पसंद थी। बारिश की आवाज बैकग्राउंड में चल रही थी, और कमरे में हल्का अंधेरा था। दीदी ने अपना सिर सोफे पर टिका लिया, और मैंने रिमोट रख दिया।

फिल्म देखते-देखते, दीदी ने कहा, "रोहन, याद है बचपन में हम साथ ऐसे ही फिल्में देखते थे?" मैंने हां में सिर हिलाया। हमारा बॉन्ड हमेशा से गहरा रहा था। पापा की जॉब की वजह से हम अक्सर अकेले रहते, और दीदी मेरी केयर करती। अब बड़े होकर भी, वह मेरी कन्फिडेंट थी। लेकिन आज, फिल्म के एक सीन में जब हीरो-हीरोइन करीब आते दिखे, तो मेरे मन में एक अजीब सी हलचल हुई। मैंने नजरें फेर लीं।

दीदी ने मेरी तरफ देखा, शायद मेरी असहजता महसूस की। "क्या हुआ रोहन? ठीक है न?" उसने पूछा, उसकी आवाज में चिंता थी। मैंने मुस्कुराकर कहा, "हां दीदी, बस फिल्म का सीन थोड़ा इमोशनल था।" वह हंस पड़ी, और अपना हाथ मेरे कंधे पर रख दिया। उस स्पर्श में कुछ था, जो पहले कभी नहीं लगा था। हम दोनों चुप हो गए, फिल्म चलती रही।

रात गहराती गई। फिल्म खत्म होने के बाद, दीदी उठी और बोली, "चल, सोने चलें। कल जल्दी उठना है।" मैंने भी हामी भरी। लेकिन जैसे ही वह जाने लगी, उसका पैर फिसला, शायद फर्श गीला था बारिश से। मैंने जल्दी से उसे पकड़ा, और हम दोनों गिरते-गिरते बचे। दीदी मेरे सीने से लग गई, उसकी सांसें तेज थीं। "थैंक्स रोहन," उसने धीरे से कहा, लेकिन अलग नहीं हुई।

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उस पल में, हमारे बीच की दूरी जैसे मिट गई। मैंने महसूस किया कि दीदी का शरीर मेरे करीब था, और मेरे दिल की धड़कन बढ़ गई। वह भी शायद वही महसूस कर रही थी, क्योंकि उसने अपनी आंखें बंद कर लीं। "रोहन, क्या हम गलत कर रहे हैं?" उसने फुसफुसाकर पूछा। मैंने कुछ नहीं कहा, बस उसे और करीब खींच लिया। हमारा रिश्ता हमेशा से प्यार भरा था, लेकिन आज वह प्यार कुछ और रूप ले रहा था।

कमरे में सन्नाटा था, सिर्फ बारिश की आवाज। दीदी ने अपना चेहरा उठाया, और हमारी नजरें मिलीं। उसकी आंखों में एक सवाल था, और शायद एक चाहत भी। मैंने धीरे से उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। वह पहले थोड़ा हिचकिचाई, लेकिन फिर साथ दे दिया। हमारा पहला चुंबन, इतना नरम और गहरा, जैसे सालों की दबी भावनाएं बाहर आ रही हों।

हम सोफे पर ही बैठ गए। दीदी के हाथ मेरे बालों में थे, और मैं उसकी कमर को सहला रहा था। "रोहन, यह सब अचानक कैसे?" उसने सांस लेते हुए पूछा। मैंने कहा, "दीदी, पता नहीं, लेकिन यह सही लग रहा है। तुम्हें प्यार करता हूं, हमेशा से।" वह मुस्कुराई, और बोली, "मैं भी, लेकिन डर लगता है।" हमारी बातें भावनाओं से भरी थीं, कन्फ्लिक्ट था कि यह रिश्ता क्या मोड़ ले रहा है।

धीरे-धीरे, हमारा स्पर्श गहरा होता गया। मैंने दीदी की साड़ी का पल्लू सरकाया, और उसकी गर्दन पर吻 किया। उसकी सांसें तेज हो गईं, और उसने मुझे कसकर पकड़ लिया। "रोहन, धीरे," उसने कहा, लेकिन उसकी आंखें कुछ और कह रही थीं। हम दोनों के मन में संघर्ष था – परिवार, समाज, लेकिन उस पल प्यार हावी था।

हम कमरे की तरफ बढ़े। दीदी ने दरवाजा बंद किया, और हम बिस्तर पर लेट गए। मैंने उसके ब्लाउज के बटन खोले, और उसकी त्वचा को छुआ। वह इतनी नरम थी, जैसे रेशम। दीदी ने मेरी शर्ट उतारी, और मेरे सीने पर हाथ फेरा। हर स्पर्श में एक नई संवेदना थी, जैसे पहली बार दुनिया देख रहे हों।

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"रोहन, क्या तुम्हें यह अच्छा लग रहा है?" उसने पूछा, उसकी आवाज में शर्म और उत्सुकता थी। मैंने हां कहा, और उसे और करीब खींचा। हमारा शरीर एक-दूसरे से जुड़ रहा था, लेकिन जल्दबाजी नहीं थी। मैंने उसके स्तनों को सहलाया, और वह सिहर उठी। उसकी आहें कमरे में गूंज रही थीं, और मेरे मन में सिर्फ उसका प्यार था।

धीरे-धीरे, हम पूरी तरह एक हो गए। पहली बार का वह अनुभव, दर्द और सुख का मिश्रण। दीदी ने मुझे कसकर पकड़ा, और बोली, "रोहन, यह मजा कभी नहीं भूलूंगी।" मैंने उसके कान में फुसफुसाया, "मैं भी नहीं, दीदी।" हमारा मिलन गहरा था, हर पल में नई भावना – कभी कोमल, कभी तीव्र।

समय जैसे रुक गया। हम एक-दूसरे की बाहों में लेटे रहे, सांसें सामान्य होती गईं। दीदी ने मेरे चेहरे को छुआ, और बोली, "यह हमारा राज रहेगा, रोहन। लेकिन मुझे खुशी है कि यह हुआ।" मैंने उसकी आंखों में देखा, और महसूस किया कि हमारा रिश्ता अब और मजबूत हो गया था।

रात बीतती गई, लेकिन हम बातें करते रहे। दीदी ने अपनी भावनाएं शेयर कीं, कैसे वह अकेलापन महसूस करती थी, और मैंने बताया कि वह मेरी दुनिया है। हमारा कन्फ्लिक्ट अभी भी था, लेकिन प्यार ने उसे दबा दिया। फिर से हम करीब आए, इस बार और ज्यादा आत्मविश्वास से।

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दूसरी बार का मिलन अलग था – ज्यादा सेंसरी, जैसे हर स्पर्श में बिजली दौड़ रही हो। दीदी ने मेरे शरीर को एक्सप्लोर किया, और मैंने उसके। हमारी आहें मिलकर एक संगीत बना रही थीं। "रोहन, तुम्हें कितना प्यार करती हूं," उसने कहा, और मैंने जवाब में उसे और गहराई से महसूस किया।

सुबह होने से पहले, हम थककर सो गए। लेकिन जागते ही, दीदी ने मुस्कुराकर कहा, "कल की रात याद रहेगी।" मैंने उसे गले लगाया, और हम जानते थे कि यह शुरुआत है। घर में अब एक नई ऊर्जा थी, लेकिन हम सावधान थे।

दिन बीतते गए, और हमारा रिश्ता गहराता गया। कभी रात में चुपके से मिलना, कभी दिन में नजरों का खेल। हर बार नया अनुभव, कभी कोमल प्यार, कभी जुनून। दीदी के साथ वह पहली रात ने सब बदल दिया, और अब हम एक-दूसरे के बिना अधूरे थे।

एक शाम फिर बारिश हुई, और हम अकेले थे। दीदी ने मुझे अपने कमरे में बुलाया। "रोहन, आज फिर वही मजा," उसने शरमाते हुए कहा। मैंने हामी भरी, और हम फिर से उस दुनिया में खो गए। उसकी त्वचा की गर्मी, उसकी सांसों की लय, सब कुछ परफेक्ट था।

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हमारे मिलन में अब वैरायटी थी – कभी धीमा, कभी तेज। दीदी ने नए तरीके आजमाए, और मैंने उसके हर हिस्से को प्यार किया। "यह सुख अवर्णनीय है," मैंने कहा, और वह सहमत हुई। हमारा कन्फ्लिक्ट कम होता गया, क्योंकि प्यार सब कुछ जीत रहा था।

रात गहराती रही, और हम एक-दूसरे की बाहों में लेटे बातें करते रहे। दीदी की आंखों में चमक थी, और मेरे दिल में शांति। यह रिश्ता अब हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गया था, और हम जानते थे कि यह जारी रहेगा।

फिर एक रात, जब हम करीब थे, दीदी ने फुसफुसाया, "रोहन, तुम्हारे बिना जी नहीं सकती।" मैंने उसे चूमा, और हम फिर से उस मजा में डूब गए। हर स्पर्श नया था, हर भावना गहरी।