चाची की अनकही चाहत
सुबह की धूप कमरे की खिड़की से छनकर अंदर आ रही थी, और मैं अपने बिस्तर पर लेटा हुआ चाय की चुस्की लेते हुए अखबार पढ़ रहा था। घर में सब कुछ सामान्य था – माँ रसोई में नाश्ता बना रही थीं, पापा ऑफिस जाने की तैयारी कर रहे थे, और बाहर से पक्षियों की चहचहाहट सुनाई दे रही थी। ये हमारा रोज का रूटीन था, जहां हर दिन एक जैसा लगता था, लेकिन आज कुछ अलग सा महसूस हो रहा था, शायद मौसम की वजह से।
मैं राहुल हूँ, 22 साल का, कॉलेज खत्म करके घर पर ही कुछ ऑनलाइन कोर्स कर रहा हूँ। हमारा परिवार छोटा सा है – माँ, पापा और मैं। लेकिन पिछले दो साल से चाची भी हमारे साथ रहती हैं। चाची का नाम प्रिया है, वो माँ की छोटी बहन हैं, 35 साल की। चाचा की मौत के बाद वो अकेली हो गई थीं, इसलिए माँ ने उन्हें अपने पास बुला लिया। चाची घर के कामों में हाथ बटाती हैं, और कभी-कभी मेरी पढ़ाई में भी मदद करती हैं।
उस दिन नाश्ते की मेज पर हम सब बैठे थे। चाची ने परांठे बनाए थे, जो हमेशा की तरह स्वादिष्ट थे। "राहुल, आज कॉलेज का क्या प्लान है?" माँ ने पूछा, जबकि पापा अखबार में डूबे हुए थे। मैंने मुस्कुराकर कहा, "आज घर से ही कुछ काम है, माँ।" चाची चुपचाप सबको परोस रही थीं, उनकी आँखों में वो हमेशा की थकान दिख रही थी, लेकिन वो कभी शिकायत नहीं करतीं।
नाश्ते के बाद पापा ऑफिस चले गए, और माँ बाजार जाने लगीं। "प्रिया, घर संभाल लेना," माँ ने चाची से कहा। चाची ने हाँ में सिर हिलाया और रसोई साफ करने लगीं। मैं अपने कमरे में लैपटॉप खोलकर बैठ गया, लेकिन ध्यान भटक रहा था। चाची घर में इधर-उधर काम करती रहतीं, और कभी-कभी उनके कदमों की आवाज सुनकर मैं बाहर झांकता। वो हमेशा साड़ी पहनतीं, साधारण सी, लेकिन उनकी चाल में एक ग्रेस था।
दोपहर हुई, तो मैं बाहर लिविंग रूम में आ गया। चाची सोफे पर बैठीं कुछ किताब पढ़ रही थीं। "चाची, क्या पढ़ रही हो?" मैंने पूछा, उनके पास बैठते हुए। वो मुस्कुराईं और किताब बंद कर दी। "बस, एक पुरानी कहानी वाली किताब। तू बता, पढ़ाई कैसी चल रही है?" उनकी आवाज में वो गर्माहट थी, जो हमेशा मुझे अच्छी लगती। हम बातें करने लगे – कॉलेज की, घर की, और थोड़ी बहुत चाचा की यादों की।
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बातों के दौरान चाची की आँखें थोड़ी उदास हो गईं। "राहुल, जीवन कितना अकेला हो जाता है न," उन्होंने धीरे से कहा। मैंने उनका हाथ पकड़ लिया, सांत्वना देते हुए। "चाची, आप अकेली नहीं हो। हम सब हैं न आपके साथ।" वो मेरी तरफ देखकर मुस्कुराईं, लेकिन उनकी आँखों में कुछ और था – शायद वो सालों की दबी हुई भावनाएँ। मैंने महसूस किया कि हमारी बातचीत अब गहरी हो रही थी, जैसे कोई अनकही कहानी सामने आ रही हो।
शाम को माँ-पापा घर लौटे, और डिनर के समय सब सामान्य था। लेकिन रात को जब सब सो गए, मैं अपने कमरे में लेटा सोच रहा था चाची की उन बातों के बारे में। अगले दिन सुबह फिर वही रूटीन, लेकिन अब मैं चाची को ज्यादा नोटिस करने लगा। वो रसोई में काम कर रही थीं, और मैं पानी लेने गया। "चाची, मदद करूँ?" मैंने पूछा। वो हँसकर बोलीं, "नहीं बेटा, तू आराम कर।" लेकिन उनकी नजरें मेरी तरफ थोड़ी देर रुकीं।
दिन बीतते गए, और हमारी बातचीत बढ़ने लगी। एक दोपहर चाची ने मुझसे कहा, "राहुल, तू बड़ा हो गया है। कभी-कभी लगता है जैसे तू मेरा सहारा है।" मैंने जवाब दिया, "चाची, आप मेरी फेवरेट हो। आपकी हर बात अच्छी लगती है।" वो शरमाकर मुस्कुराईं, और हमारी नजरें मिलीं। उस पल में कुछ अनकहा सा था, जैसे कोई टेंशन हवा में घुल रही हो। मैंने खुद को रोका, लेकिन मन में विचार आने लगे।
एक शाम हम घर में अकेले थे। माँ-पापा किसी रिश्तेदार के यहाँ गए थे। चाची टीवी देख रही थीं, और मैं उनके पास बैठ गया। "चाची, आप कभी बोर नहीं होतीं?" मैंने पूछा। वो बोलीं, "होती हूँ न, लेकिन क्या करूँ। जीवन ऐसा ही है।" मैंने उनका हाथ थामा और कहा, "चाची, अगर कुछ चाहिए तो बताओ। मैं हूँ न।" उनकी साँसें तेज हुईं, और वो मेरी तरफ देखने लगीं।
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उस रात बात आगे बढ़ी। चाची ने धीरे से कहा, "राहुल, तू समझता है न मेरी भावनाएँ?" मैंने हाँ में सिर हिलाया, और हम करीब आ गए। उनकी आँखों में डर था, लेकिन चाहत भी। "ये गलत है," उन्होंने फुसफुसाया, लेकिन मैंने उन्हें चुप करा दिया। हमारी बातें अब गहरी हो गईं, और मैंने महसूस किया कि चाची की जिंदगी में कितना खालीपन है।
धीरे-धीरे हमारी निकटता बढ़ी। एक दिन दोपहर में घर खाली था। चाची मेरे कमरे में आईं, कुछ बात करने। "राहुल, मुझे डर लगता है," उन्होंने कहा। मैंने उन्हें गले लगाया, और वो रोने लगीं। उनकी सिसकियाँ मेरे कंधे पर थीं, और मैंने उन्हें सहलाया। उस पल में भावनाएँ उमड़ पड़ीं, और हम एक-दूसरे के करीब आ गए।
चाची की साड़ी का पल्लू सरक गया, और मैंने उनकी कमर को छुआ। वो काँप उठीं, लेकिन पीछे नहीं हटीं। "राहुल, ये क्या कर रहे हैं हम?" उन्होंने पूछा, लेकिन उनकी आवाज में विरोध कम था। मैंने कहा, "चाची, ये हमारी चाहत है।" हम बिस्तर पर बैठ गए, और मैंने उन्हें चूमा। उनकी होंठ नरम थे, और वो मेरे चुंबन का जवाब देने लगीं।
बात आगे बढ़ी, और चाची ने मेरी शर्ट उतारी। उनकी उंगलियाँ मेरे सीने पर फिर रही थीं, जैसे सालों की प्यास बुझ रही हो। मैंने उनकी साड़ी खोली, और उनका शरीर मेरे सामने था। वो शरमाईं, लेकिन मैंने उन्हें आश्वासन दिया। हम एक-दूसरे को छूने लगे, हर स्पर्श में नई सनसनी थी। चाची की साँसें तेज थीं, और मैंने महसूस किया उनकी उत्तेजना।
फिर मैंने उन्हें सिखाया, धीरे-धीरे। "चाची, ऐसे करो," मैंने फुसफुसाया, अपना हाथ उनके सिर पर रखते हुए। वो हिचकिचाईं, लेकिन उत्सुक भी थीं। उनकी जीभ ने पहली बार छुआ, और मैं काँप उठा। वो सीख रही थीं, मेरी मार्गदर्शन में, हर पल में नई भावना जुड़ रही थी। उनकी आँखें मेरी तरफ उठीं, और मैंने देखा वो आनंद।
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हमारे बीच वो पल अनोखा था। चाची अब और सहज हो गईं, उनकी गति बढ़ी, और मैंने उनकी गर्दन को सहलाया। "चाची, तुम अद्भुत हो," मैंने कहा। वो मुस्कुराईं, और जारी रखा। हर चूसक में गहराई थी, जैसे वो अपनी सारी भावनाएँ व्यक्त कर रही हों। मैंने उनके बालों में उंगलियाँ फिराईं, और वो और जोर से लगीं।
फिर मैंने उन्हें ऊपर खींचा, और हम एक हो गए। उनका शरीर मेरे साथ लय में था, हर धक्के में इमोशन्स उफान पर। चाची की आहें कमरे में गूँज रही थीं, और मैंने महसूस किया उनकी संतुष्टि। "राहुल, ये सपना जैसा है," उन्होंने कहा। हमारा मिलन लंबा चला, हर पल में नई वैरायटी – कभी धीमा, कभी तेज।
रात गहराती गई, और हम बातें करते रहे। चाची ने बताया अपनी दबी इच्छाएँ, और मैंने सुना। अगले दिन फिर वही, लेकिन अब हमारा रिश्ता बदल चुका था। एक दोपहर चाची ने मुझे बुलाया, और हम फिर करीब आए। इस बार वो ज्यादा आत्मविश्वासी थीं, मुझे सिखाने लगीं अपनी पसंद।
उनकी उंगलियाँ मेरे शरीर पर नाच रही थीं, और मैंने उन्हें फिर से निर्देश दिया। "चाची, अब ऐसे ट्राई करो," मैंने कहा, और वो उत्साह से लगीं। उनकी जीभ की गर्माहट अवर्णनीय थी, हर बार नया अनुभव। मैंने उनके स्तनों को छुआ, और वो कराह उठीं। हमारा खेल जारी रहा, भावनाओं से भरा।
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कई दिन ऐसे बीते। चाची अब खुल गईं थीं, उनकी शर्म कम हो गई। एक शाम हम छत पर थे, और बात फिर वहीँ पहुँच गई। "राहुल, तूने मुझे जिंदा कर दिया," उन्होंने कहा। मैंने उन्हें चूमा, और नीचे कमरे में आकर हम फिर एक हुए। इस बार चाची ने लीड लिया, मुझे चूसते हुए, अपनी स्किल्स दिखाते हुए।
हर सीन में नई भावना थी – कभी प्यार, कभी जुनून। चाची की आँखें चमक रही थीं, और मैंने महसूस किया हमारा बंधन। रात को लेटे हुए, वो मेरे सीने पर सिर रखकर सोईं, उनकी साँसें मेरी त्वचा पर।
समय बीतता गया, और हमारी गुप्त दुनिया बढ़ती गई। चाची अब और मांग करने लगीं, और मैं खुशी से देता। एक दिन सुबह, जब घर खाली था, चाची ने मुझे रसोई में खींचा। "राहुल, अब सिखा न," उन्होंने शरारत से कहा। मैंने हँसकर उन्हें उठाया, और काउंटर पर बिठाया।
वो नीचे झुकीं, और फिर से वो पल शुरू हुआ। उनकी होंठों की नरमी, जीभ की चाल, सब कुछ परफेक्ट हो गया था। मैंने उनकी पीठ सहलाई, और वो और जोश में आईं। हमारा मिलन अब रूटीन नहीं, हर बार नया था। चाची की कराहें, मेरी सिसकियाँ, सब मिश्रित।
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फिर हम बेडरूम में गए, जहां मैंने उन्हें पूरी तरह संतुष्ट किया। उनका शरीर मेरे नीचे काँप रहा था, हर धक्के में आनंद। "चाची, तुम मेरी हो," मैंने कहा। वो बोलीं, "हाँ, राहुल, हमेशा।" हमारा प्यार अब गहरा हो चुका था, भावनाओं से भरा।
दिन गुजरते रहे, और हमारी कहानी जारी। चाची की मुस्कान अब ज्यादा चमकदार थी, और मैं जानता था ये हमारा राज है। एक रात, जब सब सोए थे, चाची मेरे कमरे में आईं। "राहुल, आज फिर," उन्होंने फुसफुसाया। मैंने उन्हें बाहों में लिया, और हम फिर से उस दुनिया में खो गए।
उनकी उंगलियाँ मेरे बालों में, मेरी होंठ उनकी गर्दन पर। चाची ने फिर से सीखा, लेकिन अब वो मास्टर थीं। हर चूसक में प्यार था, और मैंने महसूस किया वो पूर्णता। हम एक-दूसरे में विलीन हो गए, सारी रात।