भाभी की अनकही चाहत

सुबह की पहली किरण कमरे में घुस आई थी, और मैं अपनी पुरानी अलार्म घड़ी की टिक-टिक से जागा। घर में सब कुछ वैसा ही था, जैसे हर रोज़ होता है—माँ रसोई में चाय बना रही थीं, और बाहर से पड़ोस के बच्चों की हँसी-मजाक की आवाज़ें आ रही थीं। मैंने बिस्तर से उठकर खिड़की खोली, ताजी हवा अंदर आई, और दूर खेतों में किसान अपने काम में लगे दिखे।

हमारा घर छोटे से शहर में है, जहाँ जीवन की रफ्तार धीमी है। मैं राहुल हूँ, तीस साल का, और पिछले दो साल से घर पर ही रहकर परिवार का छोटा-मोटा कारोबार संभालता हूँ। भाई की मौत के बाद सब कुछ बदल गया था—वह सड़क हादसे में चला गया, और घर की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गई। माँ अब ज्यादा बात नहीं करतीं, बस अपने काम में लगी रहती हैं।

प्रिया भाभी, मेरे भाई की पत्नी, अब घर की एक हिस्सा बन चुकी हैं। वह तेईस साल की हैं, लेकिन विधवा होने के बाद उनकी जिंदगी जैसे ठहर सी गई है। सुबह उठकर वह घर के कामों में हाथ बँटाती हैं, माँ के साथ रसोई संभालती हैं, और शाम को कभी-कभी छत पर बैठकर किताब पढ़ती हैं। मैं उन्हें कभी परेशान नहीं करता, बस दूर से देखता हूँ कि वह ठीक हैं या नहीं।

आज का दिन भी वैसा ही था। मैं नहाकर नीचे आया, तो माँ ने चाय का कप थमा दिया। "राहुल, आज दुकान जल्दी जाना है न?" उन्होंने पूछा। मैंने हामी भरी और चाय पीते हुए अखबार खोला। प्रिया भाभी रसोई से निकलीं, उनके हाथ में पराठों की प्लेट थी। उन्होंने मुस्कुराकर प्लेट मेरे सामने रखी, "भैया, गरम हैं, जल्दी खा लो।"

मैंने उन्हें देखा, उनकी आँखों में वही शांति थी जो हमेशा रहती है। भाई के जाने के बाद वह ज्यादा चुप रहने लगी हैं, लेकिन घर को संभाले हुए हैं। मैंने पराठा तोड़ा और खाने लगा, मन में सोच रहा था कि आज दुकान पर क्या-क्या काम हैं। बाहर बारिश की बूँदें गिरने लगीं, जो मौसम को और ठंडा बना रही थीं।

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दोपहर को दुकान से लौटकर मैं घर आया, तो देखा प्रिया भाभी छत पर कपड़े सुखा रही हैं। माँ सो रही थीं, घर में सन्नाटा था। मैं ऊपर गया और बोला, "भाभी, मदद कर दूँ?" उन्होंने मुड़कर देखा, उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई, "नहीं भैया, हो गया। तुम आराम करो।" मैं वहीं खड़ा रहा, हवा तेज चल रही थी।

हम दोनों कुछ देर चुप रहे। फिर भाभी ने कहा, "राहुल, भाई के जाने के बाद घर कितना खाली लगता है न?" उनकी आवाज़ में दर्द था। मैंने सिर हिलाया, "हाँ भाभी, लेकिन हम सब साथ हैं। तुम अकेली नहीं हो।" वह मेरी तरफ देखती रहीं, जैसे कुछ कहना चाहती हों, लेकिन चुप रह गईं। मैंने कपड़े की टोकरी उठाई और नीचे रख दी।

शाम हुई, तो माँ ने पूजा की थाली सजाई। प्रिया भाभी भी साथ में थीं। पूजा के बाद हम सब ने खाना खाया। रात को मैं अपने कमरे में लेटा था, किताब पढ़ रहा था। बाहर से बारिश की आवाज़ आ रही थी। तभी दरवाज़े पर खटखटाहट हुई। मैंने खोला, तो भाभी खड़ी थीं, उनके हाथ में दूध का गिलास। "भैया, सो गए थे क्या? दूध पी लो।"

मैंने गिलास लिया और अंदर आने को कहा। वह हिचकिचाईं, लेकिन अंदर आ गईं। कमरे की लाइट मद्धम थी। हम दोनों बैठे, और बातें करने लगे। भाभी ने बताया कि भाई के साथ उनकी शादी कितनी जल्दी हुई थी, और अब सब कुछ कितना अलग है। उनकी आँखें नम हो गईं। मैंने उनका हाथ थामा, "भाभी, मैं हूँ न твоего साथ।"

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उस पल में कुछ बदला। भाभी ने मेरी तरफ देखा, उनकी साँसें तेज़ हो गईं। मैं भी महसूस कर रहा था कि हमारा रिश्ता अब सिर्फ देवर-भाभी का नहीं रह गया। लेकिन मैंने खुद को रोका, और बोला, "भाभी, रात हो गई है, सो जाओ।" वह उठीं और चली गईं, लेकिन उनकी आँखों में एक अनकही बात थी।

अगले दिन सुबह उठा, तो मन अजीब सा था। दुकान गया, लेकिन ध्यान भाभी पर ही अटका रहा। शाम को घर लौटा, तो देखा भाभी अकेली रसोई में काम कर रही हैं। माँ बाज़ार गई थीं। मैं रसोई में गया, "भाभी, क्या मदद करूँ?" उन्होंने मुस्कुराया, "हाँ, सब्ज़ी काट दो।"

हम साथ काम करने लगे। उनके हाथ मेरे हाथ से छुए, और एक झटका सा लगा। भाभी ने नज़रें झुका लीं, लेकिन कुछ नहीं कहा। काम खत्म होने के बाद हम बाहर बरामदे में बैठे। बारिश फिर शुरू हो गई। भाभी ने कहा, "राहुल, कल रात की बात... मैं डरती हूँ।" मैंने पूछा, "किससे?" "खुद से," उन्होंने जवाब दिया।

मैं उनके करीब सरका। हमारी नजरें मिलीं, और मैंने उनका चेहरा अपने हाथों में लिया। उनकी साँसें गर्म थीं। मैंने धीरे से उनके होंठों को छुआ, और वह पिघल सी गईं। हम दोनों ने एक-दूसरे को बाहों में भर लिया। वह पल इतना गहरा था कि समय रुक सा गया।

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उस रात, जब माँ सो गईं, भाभी मेरे कमरे में आईं। उनकी आँखों में डर और चाहत दोनों थे। मैंने दरवाज़ा बंद किया, और उन्हें बिस्तर पर बिठाया। "भाभी, क्या तुम तैयार हो?" मैंने पूछा। उन्होंने सिर हिलाया, "हाँ राहुल, लेकिन धीरे से।"

मैंने उनकी साड़ी की पिन खोली, और वह धीरे-धीरे उतर गई। उनका बदन गोरा और नरम था। मैंने उनके गले पर吻 किया, और वह सिहर उठीं। हमारी बॉडी एक-दूसरे से सटी, गर्मी बढ़ती गई। भाभी ने मेरे कपड़े उतारे, उनकी उंगलियाँ काँप रही थीं।

मैंने उन्हें लिटाया, और उनके स्तनों को छुआ। वह कराह उठीं, "राहुल... आह..." मैंने धीरे-धीरे उनके शरीर पर हाथ फेरा, हर हिस्से को महसूस किया। उनकी आँखें बंद थीं, चेहरा लाल हो रहा था। मैं उनके नीचे उतरा, और जीभ से उनके संवेदनशील हिस्से को छुआ। वह जोर से सिसकीं।

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फिर मैंने अपना शरीर उनके ऊपर रखा, और धीरे से प्रवेश किया। वह दर्द से चीखीं, लेकिन फिर आनंद में डूब गईं। हम दोनों का मिलन तीव्र था, साँसें तेज़, पसीना बह रहा था। भाभी ने मुझे कसकर पकड़ा, "राहुल, और तेज़..." मैंने गति बढ़ाई, और हम दोनों चरम पर पहुँचे।

उसके बाद हम लेटे रहे, एक-दूसरे की बाहों में। भाभी ने कहा, "यह गलत है, लेकिन मैं रोक नहीं पाई।" मैंने उन्हें चुप कराया, "यह हमारी चाहत है, भाभी।" अगली रात फिर वही हुआ, लेकिन इस बार ज्यादा भावुक। मैंने उनके पूरे शरीर को吻 से भरा, हर स्पर्श में प्यार था।

भाभी अब खुलने लगीं। एक शाम हम छत पर थे, बारिश में भीगते हुए। उन्होंने मुझे दीवार से सटाया, और खुद से चिपक गईं। मैंने उनकी कमर पकड़ी, और जोरदार吻 किया। नीचे उतरकर कमरे में, हमने नए तरीके आजमाए। भाभी ऊपर आईं, और खुद गति संभाली। उनकी कराहें कमरे में गूँज रही थीं।

हर बार कुछ नया था। कभी धीमा और भावुक, कभी तेज़ और जंगली। भाभी की आँखों में अब डर नहीं, सिर्फ संतुष्टि थी। लेकिन मन में एक कन्फ्लिक्ट था—समाज क्या कहेगा? फिर भी, हम रुक नहीं पा रहे थे।

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एक रात, जब हम साथ थे, भाभी ने रोते हुए कहा, "राहुल, मैं तुम्हें प्यार करने लगी हूँ।" मैंने उन्हें गले लगाया, और फिर से हम एक हो गए। उनका बदन मेरे साथ ताल मिला रहा था, हर धक्के में इमोशन्स उमड़ रहे थे। हम चरम पर पहुँचे, और लेटे रहे, साँसें मिलाकर।

समय बीतता गया, लेकिन हमारी चाहत कम नहीं हुई। हर पल में नई गहराई आती। भाभी अब ज्यादा खुश रहतीं, उनकी मुस्कान लौट आई थी। लेकिन हम जानते थे, यह राज़ हमारा है।

फिर एक शाम, जब बारिश जोरों पर थी, हम फिर मिले। भाभी ने मुझे बिस्तर पर धकेला, और खुद मेरे ऊपर आईं। उनकी हर हरकत में जुनून था। मैंने उनकी कमर पकड़ी, और हम दोनों ने मिलकर ритम बनाया। आनंद की लहरें उठीं, और हम खो गए उस पल में।