होने वाली बहू की अनकही चाहत
सुबह की धूप अभी-अभी खिड़की से झांक रही थी, जब मैं अपनी रोज की तरह चाय की प्याली हाथ में लेकर बालकनी में खड़ा हो गया। घर में सब कुछ वैसा ही था जैसा हमेशा रहता है – सरिता रसोई में नाश्ता तैयार कर रही थी, और अक्षय अभी सोया हुआ था। मैंने घड़ी की ओर देखा, नौ बजने वाले थे, और आज का दिन भी बाकी दिनों जैसा लग रहा था, बस थोड़ा सा खास इसलिए क्योंकि प्रिया आने वाली थी।
प्रिया हमारे बेटे अक्षय की मंगेतर है, और आज वह हमारे घर पर कुछ दिन रहने के लिए आ रही थी। हमारा परिवार दिल्ली के एक छोटे से अपार्टमेंट में रहता है, जहां मैं रिटायर्ड सरकारी अधिकारी हूं, सरिता घर संभालती है, और अक्षय अपनी नौकरी में व्यस्त रहता है। शादी की तैयारियां चल रही थीं, और प्रिया का यहां आना इसी सिलसिले में था – कुछ रस्में निभानी थीं, परिवार के साथ समय बिताना था। मैंने चाय का एक घूंट लिया और सोचा कि जीवन कितना सरल है, बस दिनचर्या में बंधा हुआ।
दोपहर तक प्रिया आ गई। वह एक साधारण साड़ी में थी, बाल खुले हुए, और चेहरे पर मुस्कान। अक्षय ने उसे दरवाजे पर गले लगाया, और सरिता ने आशीर्वाद दिया। मैंने भी मुस्कुरा कर स्वागत किया, "आओ बेटी, घर तुम्हारा ही है।" हम सब लिविंग रूम में बैठे, चाय पीते हुए बातें करने लगे। प्रिया ने बताया कि वह एक स्कूल टीचर है, और शादी के बाद भी अपनी नौकरी जारी रखना चाहती है। उसकी बातों में एक मासूमियत थी, जो मुझे अच्छी लगी।
शाम को डिनर के समय हम सब एक साथ टेबल पर थे। अक्षय काम से थका हुआ था, इसलिए जल्दी सोने चला गया। सरिता भी रसोई का काम निपटा कर आराम करने लगी। मैं और प्रिया अकेले रह गए, टीवी देखते हुए। वह सोफे पर बैठी थी, और मैं कुर्सी पर। हमने कुछ पुरानी फिल्मों के बारे में बात की, और हंसते-हंसते समय बीतता गया। रात गहराने लगी थी, लेकिन बातें खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं।
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उस रात जब सब सो चुके थे, मैं अपनी स्टडी रूम में किताब पढ़ रहा था। प्रिया का कमरा मेरे कमरे के बगल में था, क्योंकि अक्षय का कमरा दूसरी तरफ था। अचानक दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई। मैंने दरवाजा खोला तो प्रिया खड़ी थी, पानी की बोतल हाथ में। "अंकल, मेरे कमरे में पानी खत्म हो गया है," उसने धीरे से कहा। मैंने उसे अंदर आने को कहा और किचन से पानी लाकर दिया। वह थोड़ी देर खड़ी रही, जैसे कुछ कहना चाहती हो।
उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी, जो मैंने पहले नहीं देखी थी। हम थोड़ी देर बात करते रहे, घर-परिवार की बातें। लेकिन धीरे-धीरे बातें व्यक्तिगत होने लगीं। प्रिया ने बताया कि वह गांव से है, जहां जीवन बहुत सख्त था, और अब शहर में आकर उसे आजादी मिली है। मैंने अपनी जवानी के किस्से सुनाए, कैसे मैंने सरिता से शादी की थी। बातों-बातों में समय निकलता गया, और मैं महसूस कर रहा था कि उसके पास बैठना कितना सहज लग रहा है।
अगले दिन सुबह सब कुछ सामान्य था। लेकिन दोपहर में जब सरिता बाजार गई और अक्षय ऑफिस, तो घर में सिर्फ मैं और प्रिया थे। वह रसोई में कुछ बना रही थी, और मैं अखबार पढ़ रहा था। अचानक उसने कहा, "अंकल, आप चाय बनाते हैं न? सिखाइए मुझे आपकी स्पेशल चाय।" मैं हंस पड़ा और रसोई में चला गया। हम साथ खड़े होकर चाय बना रहे थे, और उसका हाथ गलती से मेरे हाथ से छू गया। वह शरमा गई, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा।
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उस स्पर्श में कुछ था जो मुझे अंदर तक छू गया। मैंने खुद को संभाला, लेकिन मन में एक उथल-पुथल शुरू हो गई। प्रिया इतनी युवा थी, 24 साल की, और मैं 48 का। लेकिन उसकी मुस्कान, उसकी बातें, सब कुछ मुझे आकर्षित कर रहा था। शाम को जब हम बालकनी में खड़े थे, हवा चल रही थी, और उसने अपनी चुनरी संभाली। मैंने उसकी ओर देखा, और वह भी मेरी आंखों में देख रही थी। चुप्पी थी, लेकिन वो चुप्पी बोल रही थी।
रात को फिर वही हुआ। प्रिया मेरे कमरे में आई, इस बार बहाना कुछ और था – उसे नींद नहीं आ रही थी। हम बैठकर बात करने लगे। बातों-बातों में उसने अपनी जिंदगी के बारे में बताया, कैसे अक्षय से मिली, लेकिन मन में कुछ कमी सी महसूस होती है। मैंने सुना, और धीरे से उसका हाथ थाम लिया। वह नहीं हटी, बल्कि मेरी ओर झुक गई। मेरे मन में संघर्ष था – यह गलत है, लेकिन भावनाएं उफान पर थीं।
उस रात हम ज्यादा करीब आ गए। मैंने उसे गले लगाया, और वह मेरे सीने से लग गई। उसकी सांसें तेज थीं, और मैं महसूस कर रहा था उसकी गर्माहट। लेकिन मैंने खुद को रोका, कहा कि यह सही नहीं है। वह चुप रही, लेकिन आंखों में आंसू थे। अगले दिन सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन अंदर एक तूफान था। सरिता ने नोटिस किया कि मैं चुप-चुप सा हूं, लेकिन मैंने बहाना बना दिया।
दोपहर में प्रिया मेरे पास आई, जब घर खाली था। "अंकल, कल रात की बात... मैं सोच रही हूं," उसने कहा। मैंने उसे देखा, और हमारी नजरें मिलीं। इस बार मैं नहीं रुका। मैंने उसे अपनी बाहों में लिया, और हमारे होंठ मिल गए। वह पहला चुंबन था, जो इतना गहरा और भावुक था कि समय रुक सा गया। उसकी देह कांप रही थी, और मैं उसे सहारा दे रहा था।
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हम कमरे में चले गए। मैंने धीरे-धीरे उसकी साड़ी उतारी, और वह शरमाती हुई खड़ी रही। उसकी त्वचा इतनी मुलायम थी, जैसे रेशम। मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया, और उसके शरीर को चूमा। वह पहली बार थी, यह मैं जानता था, इसलिए मैं बहुत सावधानी से आगे बढ़ा। उसकी आंखें बंद थीं, और सांसें तेज। जब मैं उसके अंदर प्रवेश किया, तो वह दर्द से सिहर उठी, लेकिन फिर आनंद में डूब गई।
वह पल अविस्मरणीय था। उसकी सील टूटने का दर्द मिश्रित था उसकी चाहत से। हम एक-दूसरे में खोए हुए थे, हर स्पर्श नया अनुभव दे रहा था। मैंने उसके स्तनों को चूमा, उसके कानों में फुसफुसाया कि वह कितनी खूबसूरत है। वह मेरी पीठ पर नाखून गड़ाती हुई कराह रही थी, और हमारा मिलन गहरा होता गया। समय जैसे थम गया था, सिर्फ हमारी सांसें और दिल की धड़कनें सुनाई दे रही थीं।
उसके बाद हम थक कर लेटे रहे, एक-दूसरे को देखते हुए। प्रिया की आंखों में संतुष्टि थी, लेकिन साथ ही डर भी। "अंकल, यह हमारा राज रहेगा," उसने कहा। मैंने हामी भरी, लेकिन मन में अपराध बोध था। फिर भी, वह पल इतना सुंदर था कि मैं उसे भुला नहीं पा रहा था। अगले दिनों में हम चोरी-छिपे मिलते रहे, हर बार नई भावना के साथ।
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एक शाम हम फिर अकेले थे। इस बार प्रिया ज्यादा बोल्ड थी। उसने मुझे कमरे में खींचा और खुद ही मेरे कपड़े उतारने लगी। मैं हैरान था, लेकिन खुश भी। हमने इस बार अलग-अलग तरीके आजमाए – वह ऊपर थी, और मैं उसके नीचे। उसकी हरकतें इतनी कामुक थीं कि मैं नियंत्रण खो बैठा। उसका शरीर मेरे साथ लय में था, और हम दोनों चरम पर पहुंचे। सेंसेशन इतना तीव्र था कि मैं उसके नाम पुकारता रहा।
लेकिन हर मिलन के साथ कन्फ्लिक्ट बढ़ता गया। मैं सोचता कि अक्षय को पता चलेगा तो क्या होगा। प्रिया भी कभी-कभी उदास हो जाती, लेकिन हमारी चाहत रुक नहीं रही थी। एक रात हम बालकनी में खड़े थे, चांदनी रात थी। उसने मेरे कंधे पर सिर रखा, और हम चुपचाप खड़े रहे। फिर अचानक उसने मुझे चूमा, और हम फिर कमरे में चले गए।
इस बार मिलन ज्यादा इमोशनल था। मैंने उसे धीरे-धीरे प्यार किया, हर हिस्से को छुआ। उसकी कराहें कमरे में गूंज रही थीं, और मैं उसके साथ बहता चला गया। जब हम खत्म हुए, तो वह मेरे सीने पर लेटी रही, आंसू बहाते हुए। "मैं आपको प्यार करने लगी हूं, अंकल," उसने कहा। मेरे मन में उथल-पुथल थी – यह प्यार था या सिर्फ आकर्षण?
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दिन बीतते गए, और शादी का समय नजदीक आ रहा था। हमारी मुलाकातें कम हो गईं, लेकिन हर नजर में वही आग थी। एक आखिरी रात, जब सरिता और अक्षय बाहर गए थे, हम फिर एक हुए। इस बार सब कुछ वैरायटी से भरा था – हमने शावर में कोशिश की, पानी की बौछारों के बीच। उसकी गीली देह मेरे साथ चिपकी हुई थी, और आनंद की ऊंचाइयां छू रही थीं।
लेकिन अब मुझे लग रहा था कि यह खत्म होना चाहिए। प्रिया भी समझ रही थी। हमने वादा किया कि शादी के बाद सब सामान्य हो जाएगा। लेकिन उस रात की यादें हमेशा रहेंगी। हम लेटे हुए थे, एक-दूसरे को देखते हुए, और