छोटी चाची की अनकही चाहत

सुबह की धूप कमरे में हल्की-हल्की चमक रही थी, और मैं अपनी किताब के पन्ने पलटते हुए बिस्तर पर बैठा था। आज छुट्टी का दिन था, कॉलेज बंद था, तो मैंने सोचा कि थोड़ा आराम कर लूं। घर में सब अपनी-अपनी दिनचर्या में लगे थे, पापा ऑफिस चले गए थे, और मम्मी किचन में नाश्ता बना रही थीं।

नीचे से आवाज आई, "राहुल, नीचे आओ, नाश्ता तैयार है।" वो मम्मी की आवाज थी। मैं किताब बंद करके उठा और सीढ़ियां उतरकर डाइनिंग टेबल पर पहुंचा। वहां मेरी छोटी चाची नेहा भी बैठी थीं, जो कुछ दिनों से हमारे घर पर रह रही थीं क्योंकि चाचा जी की पोस्टिंग शहर से बाहर हो गई थी। नेहा चाची हमेशा मुस्कुराती रहती थीं, और आज भी उन्होंने मुझे देखकर हल्की सी मुस्कान दी।

मैंने अपनी प्लेट में परांठा लिया और बैठ गया। नेहा चाची ने पूछा, "राहुल, आज क्या प्लान है तेरा? कॉलेज तो बंद है न?" उनकी आवाज में वही सौम्यता थी जो हमेशा मुझे अच्छी लगती थी। मैंने कहा, "कुछ खास नहीं चाची, बस घर पर ही रहूंगा, शायद कोई फिल्म देख लूं।" हम सबने साथ में नाश्ता किया, और बातें घर-परिवार की चलती रहीं।

नेहा चाची हमारे परिवार में सबसे छोटी थीं, चाचा जी से शादी के बाद से ही वे घर की रौनक बनी हुई थीं। उनकी उम्र करीब बत्तीस साल की होगी, लेकिन वे हमेशा जवान और ऊर्जावान लगती थीं। मैं राहुल, पच्चीस साल का, इंजीनियरिंग का छात्र, अपने माता-पिता के साथ इसी घर में रहता हूं। चाचा जी की नौकरी की वजह से नेहा चाची अक्सर अकेली रहती थीं, इसलिए मम्मी ने उन्हें हमारे पास बुला लिया था।

नाश्ते के बाद मैं अपने कमरे में चला गया, लेकिन थोड़ी देर बाद नेहा चाची ऊपर आईं। वे कहने लगीं, "राहुल, क्या तुम मेरी मदद करोगे? मुझे कुछ सामान अलमारी से निकालना है, लेकिन ऊंचाई पर है।" मैंने हामी भरी और उनके साथ उनके कमरे में गया। अलमारी खोलकर मैंने सामान निकाला, और वे मुझे धन्यवाद देती रहीं। उस पल में कुछ नहीं था, बस एक साधारण मदद।

दिन बीतता गया, और शाम को घर में सब इकट्ठा हुए। नेहा चाची किचन में मम्मी की मदद कर रही थीं, और मैं टीवी देख रहा था। रात का खाना खाने के बाद, जब सब सोने चले गए, मैं अपने कमरे में लेटा सोच रहा था कि जीवन कितना साधारण है। नेहा चाची के बारे में कभी कोई गलत ख्याल नहीं आया था, वे तो परिवार का हिस्सा थीं।

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अगले कुछ दिन ऐसे ही गुजरे। नेहा चाची घर के कामों में व्यस्त रहतीं, और मैं अपनी पढ़ाई में। लेकिन एक दिन, जब मैं लाइब्रेरी से किताबें लेकर लौटा, तो घर खाली था। मम्मी और पापा किसी रिश्तेदार के यहां गए थे, और नेहा चाची अकेली थीं। मैंने पूछा, "चाची, सब कहां हैं?" उन्होंने कहा, "वे शाम को लौटेंगे, मैंने सोचा अकेले क्या करूंगी, तो चाय बना ली है।"

हम दोनों ड्राइंग रूम में बैठे चाय पीने लगे। बातों-बातों में नेहा चाची ने अपनी जिंदगी के बारे में बताना शुरू किया। "राहुल, चाचा जी की नौकरी ऐसी है कि वे महीनों बाहर रहते हैं। कभी-कभी लगता है कि जीवन में कुछ कमी सी है।" उनकी आंखों में एक उदासी थी, जो मैंने पहले नहीं देखी थी। मैंने कहा, "चाची, आप तो हमेशा खुश रहती हैं, फिर ऐसा क्यों लगता है?"

वे मुस्कुराईं और बोलीं, "खुश तो हूं, लेकिन कभी-कभी अकेलापन महसूस होता है। तुम्हारी उम्र में तो सब कुछ नया लगता है, लेकिन मेरी उम्र में स्थिरता की जरूरत होती है।" हमारी बातें गहराती गईं, और मैंने महसूस किया कि नेहा चाची सिर्फ चाची नहीं, एक औरत भी हैं जिनकी अपनी भावनाएं हैं। उस शाम हमने घंटों बात की, परिवार की यादों से लेकर सपनों तक।

धीरे-धीरे, नेहा चाची के साथ मेरी नजदीकियां बढ़ने लगीं। एक दिन, जब मैं कमरे में पढ़ रहा था, वे आईं और बोलीं, "राहुल, क्या तुम मुझे शहर घुमा सकते हो? बहुत दिन हो गए बाहर नहीं गई।" मैंने हां कहा, और हम दोनों कार लेकर निकले। रास्ते में हंसी-मजाक चलता रहा, और एक जगह रुककर हमने कॉफी पी। उनकी हंसी में एक अलग सी मिठास थी, जो मुझे छू गई।

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घर लौटते हुए, कार में एक चुप्पी छा गई। नेहा चाची ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा, "तुम बहुत अच्छे हो राहुल, तुम्हारे साथ समय अच्छा लगता है।" उस स्पर्श में कुछ था, जो साधारण नहीं लग रहा था। मैंने कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुरा दिया। लेकिन रात को सोते हुए, मेरे मन में नेहा चाची की वो उदासी घूमती रही।

कुछ दिनों बाद, घर में एक छोटा सा फंक्शन था। नेहा चाची ने साड़ी पहनी थी, और वे बेहद खूबसूरत लग रही थीं। मैंने उन्हें कॉम्प्लिमेंट दिया, "चाची, आज आप बहुत अच्छी लग रही हैं।" उन्होंने शरमाते हुए कहा, "धन्यवाद राहुल, तुम भी स्मार्ट लगते हो।" शाम को जब सब थककर सो गए, मैं बालकनी में खड़ा था, तभी नेहा चाची आईं।

हमने सितारों की बात की, और अचानक उन्होंने कहा, "राहुल, क्या तुम्हें कभी ऐसा लगा है कि जीवन में कुछ अधूरा सा है?" मैंने कहा, "हां चाची, कभी-कभी।" उनकी आंखों में एक गहराई थी, और मैंने महसूस किया कि हमारी बातें अब भावनात्मक हो रही थीं। मैंने हिम्मत करके कहा, "चाची, अगर आपको कभी बात करनी हो, तो मैं हूं।"

उस रात के बाद, नेहा चाची के साथ मेरी बातें और गहरी होने लगीं। एक दोपहर, जब घर खाली था, वे मेरे कमरे में आईं और बोलीं, "राहुल, मुझे तुमसे कुछ कहना है। चाचा जी के जाने के बाद, मैं खुद को बहुत अकेला महसूस करती हूं। तुम्हारी कंपनी मुझे सुकून देती है।" मैंने उनकी आंखों में देखा, और वहां एक चाहत थी जो शब्दों से परे थी।

मैंने धीरे से उनका हाथ पकड़ा और कहा, "चाची, मैं समझता हूं। आप मेरे लिए बहुत खास हैं।" उस पल में, हमारी नजरें मिलीं, और एक चुप्पी ने सब कुछ कह दिया। नेहा चाची ने मेरे करीब आकर मेरे सीने से लग गईं, और मैंने उन्हें अपनी बाहों में भर लिया। वो पल इतना भावुक था कि आंसू आ गए।

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धीरे-धीरे, हमारी नजदीकियां शारीरिक होने लगीं। एक शाम, जब हम अकेले थे, नेहा चाची ने मुझे किस किया। उनके होंठ इतने नरम थे, और वो चुंबन में इतनी गहराई थी कि मैं खो सा गया। मैंने कहा, "चाची, क्या ये सही है?" उन्होंने कहा, "राहुल, भावनाएं सही-गलत नहीं देखतीं।"

उस रात, हमने एक-दूसरे को पूरी तरह महसूस किया। नेहा चाची के शरीर की गर्माहट, उनकी सांसों की रफ्तार, सब कुछ नया और रोमांचक था। मैंने उनके गालों को चूमा, उनके बालों में उंगलियां फिराईं, और वे मेरे स्पर्श से सिहर उठीं। हमारा मिलन इतना भावनात्मक था कि हर पल में प्यार की गहराई महसूस हो रही थी।

उनके शरीर की हर वक्रता को मैंने प्यार से छुआ, और नेहा चाची ने मेरे नाम का उच्चारण करते हुए खुद को समर्पित कर दिया। वो रात हमारी चाहतों का उत्सव थी, जहां दर्द और सुख मिलकर एक हो गए। अगले दिनों में, हमारी ये नजदीकियां और बढ़ीं, हर बार एक नई भावना के साथ।

एक दोपहर, जब बारिश हो रही थी, हम कमरे में थे। नेहा चाची ने मुझे अपनी बाहों में लिया, और हमने बारिश की आवाज में खुद को खो दिया। उनका स्पर्श अब इतना परिचित हो गया था, लेकिन हर बार नया लगता था। मैंने उनके कान में फुसफुसाया, "चाची, तुम मेरी जिंदगी हो।" उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "राहुल, ये पल हमेशा याद रहेंगे।"

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हमारी कहानी अब सिर्फ भावनाओं की नहीं, शारीरिक आकर्षण की भी हो गई थी। नेहा चाची की आंखों में वो चमक थी जो पहले नहीं थी, और मैं खुद को उनके बिना अधूरा महसूस करता था। एक रात, जब हम साथ लेटे थे, उन्होंने मेरे सीने पर सिर रखा और कहा, "राहुल, क्या हम ये रिश्ता छुपा पाएंगे?" मैंने कहा, "चाची, प्यार छुपाने के लिए नहीं होता।"

उस रात का मिलन और भी गहरा था। मैंने उनके शरीर को हर कोण से महसूस किया, उनकी सिसकियां सुनकर खुद को और जोश में पाया। नेहा चाची ने मेरे साथ हर पल को जीया, जैसे वो उनकी आखिरी रात हो। हमारी सांसें एक हो गईं, और वो चरमोत्कर्ष इतना तीव्र था कि समय रुक सा गया।

दिन बीतते गए, और हमारी ये गुप्त दुनिया मजबूत होती गई। नेहा चाची अब और खुश लगती थीं, और मैं उनकी हर छोटी-छोटी खुशी का ख्याल रखता था। एक शाम, जब हम बालकनी में खड़े थे, उन्होंने मेरे हाथ में हाथ डाला और दूर की रोशनी को देखते हुए चुप रही। वो चुप्पी सब कुछ कह रही थी, हमारी चाहत की गहराई को।

फिर एक रात, जब घर में सन्नाटा था, नेहा चाची मेरे कमरे में आईं। उन्होंने दरवाजा बंद किया और मेरे पास आकर बैठ गईं। उनकी आंखों में वही चाहत थी, और मैंने उन्हें अपनी ओर खींच लिया। हमने धीरे-धीरे एक-दूसरे के कपड़े उतारे, हर स्पर्श में प्यार भरा। नेहा चाची की त्वचा इतनी मुलायम थी, और मैंने उनके हर हिस्से को चूमा।

वे मेरे ऊपर आईं, और हमारा मिलन अब और भी सिंक्रोनाइज्ड था। उनकी गतियां, मेरी सांसें, सब एक लय में थे। वो पल इतना सेंसरी था कि मैं हर सुगंध, हर स्पर्श को महसूस कर रहा था। नेहा चाची ने मेरे कान में कहा, "राहुल, तुम मुझे पूरा करती हो।" और हम साथ में उस ऊंचाई पर पहुंचे जहां सिर्फ हम दोनों थे।

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हमारी ये यात्रा अब रोज की हो गई थी, लेकिन हर बार नई लगती थी। नेहा चाची की भावनाएं, उनका संघर्ष, सब कुछ मुझे और करीब लाता था। एक दोपहर, जब हम अकेले थे, उन्होंने मुझे गले लगाया और कहा, "राहुल, क्या ये हमेशा ऐसे ही रहेगा?" मैंने कहा, "चाची, मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूंगा।"

उस दिन का मिलन अलग था, ज्यादा कोमल और भावुक। मैंने उनके पैरों से शुरू करके पूरे शरीर को प्यार किया, और वे मेरे हर स्पर्श पर मुस्कुराती रहीं। हमारी सांसें तेज हुईं, और वो चरम इतना शांत लेकिन गहरा था कि हम दोनों थककर एक-दूसरे की बाहों में सो गए।

समय के साथ, हमारा रिश्ता और मजबूत हुआ। नेहा चाची अब मेरी जिंदगी का हिस्सा थीं, और मैं उनकी। एक शाम, जब हम साथ बैठे थे, उन्होंने मेरे बालों में उंगलियां फिराईं और चुपचाप मुझे देखती रहीं। वो नजरें सब कुछ कह रही थीं, हमारी अनकही चाहत की कहानी को।