चाची और मम्मी के साथ अनकही चाहतें

सुबह की धूप अभी-अभी खिड़की से झांक रही थी, जब मैं बिस्तर से उठा। घर में सब कुछ वैसा ही था जैसा रोज होता है—रसोई से चाय की खुशबू आ रही थी, और बाहर गली में पड़ोस के बच्चे स्कूल जाने की तैयारी में लगे थे। मैंने घड़ी देखी, अभी आठ बजे ही हुए थे, और आज कॉलेज की छुट्टी होने की वजह से दिन लंबा लग रहा था।

मैं राहुल हूं, उन्नीस साल का, दिल्ली के एक छोटे से अपार्टमेंट में रहता हूं। मम्मी सरिता घर संभालती हैं, पापा की मौत के बाद से उन्होंने सब कुछ अकेले ही संभाला है। वो चालीस की हैं, लेकिन उनकी मुस्कान में अब भी वही पुरानी चमक है। चाची कविता, मम्मी की छोटी बहन, पिछले हफ्ते हमारे साथ रहने आई हैं। वो भी लगभग मम्मी की उम्र की हैं, लेकिन शहर से आई हैं, जहां वो एक छोटी सी नौकरी करती हैं।

नीचे उतरकर मैंने देखा कि मम्मी रसोई में नाश्ता बना रही थीं। "बेटा, उठ गए? चाय बना दूं?" उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा। मैंने हां में सिर हिलाया और सोफे पर बैठ गया। चाची अभी सो रही थीं, शायद थकी हुई थीं रात की ट्रेन से आने की वजह से।

दिन बीतने लगा। मैंने किताबें निकालीं और पढ़ाई में लग गया, लेकिन मन कहीं और था। घर में चाची के आने से थोड़ी रौनक बढ़ गई थी। वो और मम्मी शाम को साथ बैठकर पुरानी बातें करतीं, हंसतीं। मैं कभी-कभी उनकी बातों में शामिल हो जाता, लेकिन ज्यादातर चुपचाप सुनता रहता।

शाम को चाची उठीं और मम्मी के साथ बाजार जाने की बात करने लगीं। "सरिता दी, चलो कुछ सब्जियां ले आएं," उन्होंने कहा। मम्मी ने सहमति जताई और मुझे भी साथ चलने को कहा। हम तीनों निकल पड़े, गली से होते हुए लोकल मार्केट की ओर।

मार्केट में भीड़ थी, लेकिन हम धीरे-धीरे घूमते रहे। चाची ने कुछ फल चुने, और मम्मी ने मुझसे पूछा कि क्या मुझे कुछ चाहिए। मैंने मना कर दिया, लेकिन उनकी नजरों में एक अलग सी गर्माहट महसूस हो रही थी। शायद मैं ज्यादा सोच रहा था।

घर लौटकर रात का खाना तैयार हुआ। हम सब साथ बैठे, टीवी पर कोई पुरानी फिल्म चल रही थी। चाची ने कहा, "राहुल, तुम्हारी मम्मी कह रही थीं कि तुम पढ़ाई में बहुत अच्छे हो।" मैंने शरमाते हुए जवाब दिया, "बस कोशिश करता हूं, चाची।"

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रात गहराने लगी। मम्मी ने कहा कि वो थक गई हैं और सोने जा रही हैं। चाची भी अपने कमरे की ओर चली गईं। मैं अपने कमरे में लेटा, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। बाहर बारिश शुरू हो गई थी, और उसकी आवाज कमरे में गूंज रही थी।

कुछ देर बाद मैं पानी पीने के लिए रसोई की ओर गया। वहां अंधेरा था, लेकिन हल्की सी रोशनी में मैंने देखा कि चाची भी वहां खड़ी थीं, पानी का गिलास हाथ में लिए। "नींद नहीं आ रही?" उन्होंने धीमे से पूछा। मैंने हां में सिर हिलाया।

हम दोनों चुपचाप खड़े रहे। चाची की आंखों में कुछ अनकहा सा था, जैसे कोई पुरानी याद। "तुम्हारी मम्मी बहुत मजबूत हैं, राहुल। पापा के जाने के बाद भी उन्होंने सब संभाला," उन्होंने कहा। मैंने सहमति जताई, लेकिन मन में एक अजीब सी उथल-पुथल थी।

अगले दिन सुबह फिर वही रूटीन। लेकिन आज चाची ने मुझसे कहा कि वो मुझे शहर घुमाने ले जाना चाहती हैं। मम्मी ने हंसकर कहा, "जा बेटा, थोड़ा घूम आ।" हम निकल पड़े, मेट्रो से पुरानी दिल्ली की ओर।

घूमते-घूमते चाची ने अपनी जिंदगी की बातें बताईं। कैसे उनकी शादी टूट गई थी, और अब वो अकेली रहती हैं। उनकी आवाज में दर्द था, लेकिन आंखों में एक चमक। मैं सुनता रहा, और कहीं न कहीं उनके करीब महसूस करने लगा।

शाम को घर लौटे तो मम्मी ने डिनर तैयार किया था। खाने के दौरान चाची ने मम्मी से कहा, "दी, राहुल बहुत समझदार हो गया है।" मम्मी ने मुस्कुराकर मेरी ओर देखा, और उस नजर में कुछ गहरा सा था।

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रात को फिर नींद नहीं आई। मैं बिस्तर पर करवटें बदलता रहा। अचानक दरवाजे पर हल्की सी खटखट हुई। मैंने उठकर देखा, चाची खड़ी थीं। "राहुल, क्या तुम जाग रहे हो? मुझे कुछ बात करनी है," उन्होंने धीमे से कहा।

मैंने उन्हें अंदर आने दिया। वो बिस्तर के किनारे बैठ गईं, और बोलीं, "तुम्हारी मम्मी और मैं बचपन से बहुत करीब हैं। लेकिन कभी-कभी जिंदगी में कुछ चाहतें ऐसी होती हैं जो कह नहीं पाते।" उनकी बातों में एक गहराई थी, जो मुझे छू गई।

उस रात हम देर तक बातें करते रहे। चाची ने अपनी भावनाएं साझा कीं, कैसे वो अकेलापन महसूस करती हैं। मैंने भी अपनी बातें बताईं, कॉलेज की जिंदगी, दोस्तों की कमी। धीरे-धीरे हमारा बातचीत का सिलसिला गहरा होता गया।

अगले कुछ दिन ऐसे ही बीते। चाची और मम्मी के बीच की बॉन्डिंग मुझे दिख रही थी, लेकिन अब उसमें कुछ और मिश्रित हो रहा था। एक शाम मम्मी ने कहा, "राहुल, आज चाची को मालिश की जरूरत है, उनकी पीठ दर्द कर रही है। क्या तुम मदद करोगे?"

मैं सहमत हो गया। चाची कमरे में लेटी थीं, और मैंने धीरे से उनकी पीठ पर हाथ फेरा। उनकी सांसें तेज हो गईं, और मम्मी बाहर से देख रही थीं। "अच्छा लग रहा है?" मम्मी ने पूछा। चाची ने हां कहा, लेकिन उनकी आंखों में कुछ और था।

उस रात मम्मी मेरे कमरे में आईं। "बेटा, तुम चाची को पसंद करने लगे हो न?" उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। मैं चौंक गया, लेकिन मना नहीं कर सका। वो करीब आईं और बोलीं, "हम सब इंसान हैं, भावनाएं होती हैं।"

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धीरे-धीरे चीजें बदलने लगीं। एक रात चाची और मम्मी दोनों मेरे कमरे में थीं। हम बातें कर रहे थे, और अचानक चाची ने मेरे हाथ को छुआ। उनकी उंगलियां गर्म थीं, और मैंने महसूस किया कि मम्मी भी करीब आ गईं।

उस पल में सब कुछ बदल गया। चाची ने धीरे से मेरे गाल पर हाथ रखा, और बोली, "राहुल, क्या तुम हमें समझते हो?" मैंने हां कहा, और फिर मम्मी ने मुझे गले लगा लिया। उनकी छाती की गर्माहट मुझे महसूस हुई, और दिल की धड़कन तेज हो गई।

चाची ने मम्मी की ओर देखा, और दोनों ने एक-दूसरे को छुआ। यह सब इतना नैचुरल लग रहा था, जैसे कोई पुरानी चाहत पूरी हो रही हो। मैं उनके बीच में था, और धीरे-धीरे हमारी बॉडीज एक-दूसरे से जुड़ने लगीं।

मम्मी ने मेरे होंठों पर अपने होंठ रखे, उनका स्वाद मीठा था, जैसे कोई लंबे समय का इंतजार खत्म हो रहा हो। चाची ने मेरी कमर को छुआ, और उनकी उंगलियां नीचे सरकने लगीं। मैंने महसूस किया कि मेरी सांसें तेज हो रही थीं, और शरीर में एक आग सी जल रही थी।

हम तीनों बिस्तर पर लेट गए। चाची ने अपनी साड़ी ढीली की, और मम्मी ने मेरी शर्ट उतारी। उनकी त्वचा इतनी मुलायम थी, जैसे रेशम। मैंने चाची की छाती को छुआ, और वो सिहर उठीं। "धीरे से, राहुल," उन्होंने कहा, लेकिन उनकी आंखों में उत्साह था।

मम्मी ने चाची को चूमा, और मैंने देखा कि उनकी बॉन्डिंग कितनी गहरी है। फिर मम्मी मेरी ओर मुड़ीं, और उनकी उंगलियां मेरे शरीर पर घूमने लगीं। हर स्पर्श में एक नई सनसनी थी, जैसे बिजली का झटका।

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चाची ने मुझे नीचे खींचा, और मैंने उनकी जांघों के बीच जगह बनाई। उनकी गर्माहट मुझे घेर रही थी, और मैं धीरे-धीरे अंदर सरका। वो कराह उठीं, लेकिन खुशी से। मम्मी ने मेरी पीठ सहलाई, और बोलीं, "तुम हमें पूरा कर रहे हो, बेटा।"

उस रात हमने कई बार एक-दूसरे को छुआ, हर बार एक नई भावना के साथ। कभी चाची ऊपर होतीं, कभी मम्मी। उनकी सांसें, उनकी कराहें, सब कुछ कमरे में गूंज रहा था। मैंने महसूस किया कि यह सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक बंधन था।

सुबह होने से पहले हम थककर लेटे रहे। चाची ने मेरे सीने पर सिर रखा, और मम्मी ने मेरे हाथ को थामा। "यह हमारा राज रहेगा," चाची ने कहा। मैंने सहमति जताई, लेकिन मन में एक नई दुनिया खुल गई थी।

अगले दिन सब सामान्य लग रहा था, लेकिन नजरें मिलने पर कुछ और कहानी बयां कर रही थीं। शाम को चाची ने कहा कि वो मम्मी के साथ अकेले समय बिताना चाहती हैं, और मुझे बाहर भेज दिया। लेकिन रात को जब मैं लौटा, तो वो दोनों इंतजार कर रही थीं।

इस बार सीन अलग था। मम्मी ने चाची को बिस्तर पर लिटाया, और मैंने देखा कि वो एक-दूसरे को कितनी गहराई से जानती हैं। मैं शामिल हुआ, और हमने नई पोजीशंस ट्राई कीं। चाची की गांड पर हाथ फेरते हुए मैंने महसूस किया कि उनकी हर हरकत में एक नई उत्तेजना है।

मम्मी ने मुझे निर्देश दिए, "अब चाची को पीछे से," और मैंने वैसा ही किया। चाची की कराहें तेज हो गईं, और मम्मी ने उनकी छाती को सहलाया। यह सब इतना इंटेंस था कि मैं खुद को रोक नहीं पाया।

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हर रात अब ऐसी ही गुजरने लगी। कभी हम तीनों साथ, कभी मैं चाची के साथ अकेले, या मम्मी के साथ। भावनाएं गहराती गईं, और कन्फ्लिक्ट भी। एक दिन मम्मी ने कहा, "राहुल, क्या यह सही है?" लेकिन उनकी आंखों में जवाब खुद था।

चाची ने बताया कि वो जल्दी लौट जाएंगी, लेकिन जाने से पहले हमने एक आखिरी रात साथ बिताई। उस रात सब कुछ चरम पर था—उनकी चूत की गर्माहट, गांड की टाइटनेस, सब कुछ मुझे狂 बना रहा था। हमने घंटों तक एक-दूसरे को एक्सप्लोर किया, हर सेंसेशन नया लग रहा था।

चाची चली गईं, लेकिन मम्मी और मेरे बीच अब एक नया रिश्ता था। हम बातें कम करते, लेकिन स्पर्श ज्यादा। एक शाम मम्मी ने मुझे गले लगाया, और फिर से वही आग जल उठी। मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया, और धीरे-धीरे उनकी गांड में प्रवेश किया। उनकी कराह में दर्द और खुशी मिश्रित थी।

हमारी हर मुलाकात में अब गहराई बढ़ गई थी। मम्मी की आंखों में प्यार था, और मेरे मन में उनका सम्मान। लेकिन यह चाहत रुकने वाली नहीं थी।

एक रात बारिश फिर शुरू हुई, और मम्मी मेरे कमरे में आईं। हम लेटे, और मैंने उनकी चूत को छुआ। वो गीली थी, और मैंने जीभ से उसे चाटा। उनकी सिसकियां कमरे में गूंजीं, और फिर मैंने गांड में उंगली डाली।

यह सब इतना नैचुरल हो गया था कि सोचना बंद हो गया। हम एक-दूसरे में खोए हुए थे, हर पल नया अनुभव लेकर आ रहा था।