मामी के साथ वो अनकही रात
सुबह की धूप कमरे में झाँक रही थी, जब मैं अपनी कॉफी का कप लेकर बालकनी में खड़ा हुआ। दिल्ली की ये व्यस्त सड़कें हमेशा की तरह गाड़ियों के शोर से भरी हुई थीं, और मैं अपने दफ्तर जाने की तैयारी में लगा था। रोज की तरह, आज भी मेरा दिन वही था – नाश्ता करना, माँ से बात करना और फिर मेट्रो पकड़कर ऑफिस पहुँचना।
मैं राहुल हूँ, पच्चीस साल का, एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता हूँ। घर में माँ, पापा और छोटी बहन हैं। पिछले कुछ महीनों से मामी भी हमारे साथ रह रही हैं। मामी का नाम रीता है, वो माँ की छोटी बहन हैं। मामू की मौत हुए तीन साल हो चुके हैं, दिल का दौरा पड़ा था अचानक। तब से मामी अकेली हो गईं, उनके कोई बच्चा नहीं है, सो माँ ने उन्हें अपने पास बुला लिया।
मामी रोज घर के कामों में हाथ बटाती हैं, कभी किचन में माँ की मदद करतीं, कभी बाजार से सामान लातीं। वो चुपचाप रहती हैं, ज्यादा बात नहीं करतीं, लेकिन उनकी आँखों में एक उदासी हमेशा झलकती है। मैं उन्हें बचपन से जानता हूँ, लेकिन अब बड़ा हो गया हूँ, सो बातें कम होती हैं। आज सुबह भी मैंने उन्हें देखा, वो बालकनी में कपड़े सुखा रही थीं।
दफ्तर में दिनभर मीटिंग्स चलीं, प्रोजेक्ट की डेडलाइन नजदीक आ रही थी। शाम को घर लौटा तो थका हुआ था। माँ ने बताया कि कल हमें एक फैमिली फंक्शन के लिए जाना है, मामी के गाँव के पास। लेकिन पापा की तबीयत ठीक नहीं थी, सो उन्होंने मना कर दिया। माँ बोलीं, "राहुल, तू मामी को लेकर चला जा, मैं घर पर रहूँगी।"
मैंने हामी भरी, क्योंकि छुट्टी मिल रही थी। मामी ने भी सहमति जताई, लेकिन उनकी आवाज में एक हिचकिचाहट थी। रात को पैकिंग की, और सुबह हम दोनों निकल पड़े। ट्रेन से जाना था, दिल्ली से हरिद्वार तक। रास्ते में मामी खिड़की के पास बैठी बाहर देखती रहीं, मैंने अपने फोन पर कुछ पढ़ा।
हरिद्वार पहुँचे तो शाम हो चुकी थी। फंक्शन अगले दिन था, सो हमने एक होटल में रुकने का फैसला किया। होटल साधारण था, गंगा के किनारे। रिसेप्शन पर दो कमरे बुक किए, लेकिन उन्होंने कहा कि सिर्फ एक डबल रूम खाली है। मैंने मामी की तरफ देखा, वो चुप रहीं। "ठीक है," मैंने कहा, "हम मैनेज कर लेंगे।"
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कमरे में पहुँचे तो मामी ने अपना बैग रखा और बाथरूम चली गईं। मैं बेड पर बैठा, टीवी ऑन किया। बाहर गंगा की लहरों की आवाज आ रही थी, मन को शांति दे रही थी। मामी बाहर आईं, उन्होंने साड़ी बदली थी, साधारण नीली साड़ी में वो और भी सादगी भरी लग रही थीं।
हमने डिनर ऑर्डर किया, रूम सर्विस से। खाते हुए मामी ने पूछा, "राहुल, तेरी जॉब कैसी चल रही है?" मैंने बताया, "ठीक है मामी, बस व्यस्त रहता हूँ।" वो मुस्कुराईं, लेकिन उनकी मुस्कान में एक दर्द था। मैंने पूछा, "आप कैसी हैं? मामू की याद आती है?"
मामी की आँखें नम हो गईं। "हाँ, हर पल। लेकिन जीवन तो चलता है न।" हमारी बातें लंबी खिंच गईं, बचपन की यादें, परिवार की कहानियाँ। रात गहराने लगी, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। मामी बेड के एक तरफ लेटीं, मैं दूसरी तरफ।
अंधेरे में उनकी साँसें सुनाई दे रही थीं। मैं करवट बदलता रहा, मन में अजीब सी बेचैनी थी। मामी ने धीरे से कहा, "राहुल, तू सो क्यों नहीं रहा?" मैंने जवाब दिया, "बस ऐसे ही, नींद नहीं आ रही।" वो चुप रहीं, लेकिन फिर बोलीं, "मुझे भी।"
उस चुप्पी में कुछ था, जो शब्दों से परे था। मैंने उनकी तरफ देखा, कमरे की हल्की रोशनी में उनका चेहरा नरम लग रहा था। मामी ने अपनी आँखें बंद कीं, लेकिन उनकी उँगलियाँ कंबल को कसकर पकड़े हुए थीं। मैंने सोचा, कितना अकेलापन सहा होगा उन्होंने।
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धीरे-धीरे मैं उनके करीब सरका, बस बात करने के लिए। "मामी, अगर कुछ कहना हो तो कहो," मैंने कहा। वो मुड़ीं, उनकी आँखों में एक सवाल था। "तू समझता है मुझे?" उनकी आवाज काँप रही थी। मैंने हाँ में सिर हिलाया, और अनायास मेरी उँगली उनकी उँगली से छू गई।
वो स्पर्श जैसे बिजली का झटका था, लेकिन हम दोनों रुके नहीं। मामी की साँसें तेज हो गईं, और मैंने महसूस किया कि मेरा दिल धड़क रहा है। वो बोलीं, "राहुल, ये गलत है," लेकिन उनकी आवाज में विरोध कम था। मैंने कहा, "मामी, बस आज की रात, हम दोनों अकेले हैं।"
उस पल में सब कुछ बदल गया। मैंने अपना हाथ उनके कंधे पर रखा, और वो सिहर उठीं। धीरे-धीरे मैंने उन्हें अपनी बाहों में लिया, उनकी साड़ी की सिलवटें महसूस हो रही थीं। मामी की आँखें बंद थीं, लेकिन उनका शरीर मेरे स्पर्श पर प्रतिक्रिया दे रहा था।
मैंने उनके होंठों को छुआ, वो नरम और गर्म थे। चुंबन गहरा होता गया, जैसे सालों का दर्द उसमें घुल रहा हो। मामी ने मेरे सीने पर हाथ रखा, उनकी उँगलियाँ मेरी शर्ट के बटन खोलने लगीं। मैंने उनकी साड़ी का पल्लू सरकाया, उनकी त्वचा की गर्माहट महसूस की।
हम दोनों बेड पर लेटे, उनके शरीर की सुगंध कमरे में फैल रही थी। मैंने उनके ब्लाउज के हुक खोले, उनकी छाती की उभार नजर आए। मामी शरमा रही थीं, लेकिन उनकी आँखों में एक नई चमक थी। "राहुल, धीरे," उन्होंने फुसफुसाया।
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मेरा हाथ उनकी कमर पर फिसला, पेटीकोट की डोरी ढीली की। उनकी जाँघें नरम थीं, मैंने उन्हें सहलाया। मामी की सिसकियाँ कमरे में गूँज रही थीं, जैसे वो अपना सारा दर्द निकाल रही हों। मैंने अपना शरीर उनके ऊपर रखा, हमारी साँसें एक हो गईं।
जब मैंने प्रवेश किया, तो वो दर्द और सुख की मिश्रित आवाज निकली। मामी ने मुझे कसकर पकड़ लिया, उनके नाखून मेरी पीठ में गड़ रहे थे। हमारा मिलन धीमा था पहले, फिर तेज होता गया। हर धक्के के साथ उनकी आँखों में आँसू थे, लेकिन मुस्कान भी।
उस रात हमने कई बार एक-दूसरे को खोजा, हर बार नया अनुभव। कभी मैं ऊपर, कभी वो। मामी की भावनाएँ उफान पर थीं, वो बोलीं, "राहुल, मुझे जीना सिखा दिया तूने।" मैंने उनके कान में फुसफुसाया, "मामी, ये हमारा राज है।"
सुबह की पहली किरण आई, लेकिन हम अभी भी एक-दूसरे की बाहों में थे। मामी की उँगलियाँ मेरे बालों में खेल रही थीं, उनकी आँखें शांत थीं। बाहर गंगा बह रही थी, जैसे हमारी कहानी को ले जाती हुई।
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फंक्शन में गए, लेकिन मन कहीं और था। शाम को वापसी की ट्रेन में मामी मेरे कंधे पर सिर रखकर सोईं। घर पहुँचे तो सब नॉर्मल था, लेकिन हमारी नजरें मिलतीं तो एक मुस्कान छिप जाती।
कुछ दिन बाद, मामी ने कहा कि वो गाँव वापस जाना चाहती हैं। मैंने पूछा क्यों, तो बोलीं, "राहुल, वो रात याद रहेगी, लेकिन जीवन अपनी राह पर है।" मैंने उन्हें रोका नहीं, लेकिन दिल में एक टीस थी।
वो गईं, लेकिन फोन पर बातें होती रहीं। एक दिन मामी ने कहा, "राहुल, दिल्ली आ रही हूँ, अकेले।" मेरा दिल जोर से धड़का। मैंने होटल बुक किया, वही पुराना। रात को वो आईं, दरवाजा खोला तो उनकी आँखों में वही उदासी नहीं थी।
हमने बातें कीं, लेकिन जल्दी ही स्पर्श में बदल गईं। इस बार मामी ज्यादा खुली थीं, उन्होंने मुझे बेड पर धकेला। उनकी साड़ी उतारी, शरीर की हर रेखा को छुआ। मामी ने मेरे कान में कहा, "आज मैं सब भूलना चाहती हूँ।"
हमारा मिलन और गहरा था, भावनाओं से भरा। मैंने उनकी गर्दन पर吻 किया, वो सिहर उठीं। हाथ उनकी चूत पर पहुँचा, गर्म और नम। मामी की सिसकियाँ तेज हो गईं, "राहुल, और..." मैंने उँगलियाँ अंदर कीं, वो कमर उठाकर मिलीं।
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फिर मैंने प्रवेश किया, इस बार तेज ритम में। मामी ने पैर मेरी कमर पर लपेटे, हर धक्के के साथ उनका शरीर काँपता। हम पसीने से तर थे, लेकिन सुख की लहरें थम नहीं रही थीं। मामी चरम पर पहुँची, उनकी चीख दब गई मेरे होंठों में।
उसके बाद हम लेटे रहे, बातें कीं भविष्य की। मामी बोलीं, "राहुल, ये गलत है, लेकिन मुझे जीने की वजह देता है।" मैंने कहा, "मामी, हम साथ हैं, बस।" रात भर हमने एक-दूसरे को महसूस किया, कभी कोमलता से, कभी उन्माद से।
सुबह वो गईं, लेकिन वादा किया अगली मुलाकात का। अब हर महीने हम मिलते हैं, उसी होटल में। हर बार नई भावना, नया स्पर्श। मामी की उदासी कम हो गई है, और मेरा जीवन में एक राज है, जो हमें बाँधे रखता है।
आज फिर रात है, होटल का कमरा। मामी मेरी बाहों में हैं, उनकी साँसें मेरी गर्दन पर। हमारा मिलन शुरू होने वाला है, धीरे-धीरे, भावनाओं की गहराई में।