बड़ी मामी के साथ अनोखा बंधन

सुबह की धूप कमरे में हल्की-हल्की झांक रही थी, और मैं अपनी किताबों के बीच बैठा कॉलेज की पढ़ाई में डूबा हुआ था। घर में सब कुछ वैसा ही था जैसा रोज होता है—माँ रसोई में नाश्ता तैयार कर रही थीं, पापा अखबार पढ़ते हुए चाय की चुस्कियां ले रहे थे, और बाहर से पड़ोस की आवाजें आ रही थीं। आज का दिन भी आम दिनों जैसा लग रहा था, बस बड़ी मामी कुछ दिन पहले हमारे घर आई थीं, और उनकी मौजूदगी से घर में एक अलग सा सुकून महसूस हो रहा था।

मैं राहुल हूं, कॉलेज के आखिरी साल में पढ़ता हूं, और घर दिल्ली के एक शांत इलाके में है। बड़ी मामी का नाम सरिता है, वो माँ की बड़ी बहन हैं और हाल ही में उनके पति का देहांत हो गया था, इसलिए माँ ने उन्हें कुछ समय हमारे साथ रहने के लिए बुला लिया। सरिता मामी करीब चालीस साल की हैं, लेकिन उनकी आंखों में एक ऐसी शांति है जो देखते ही दिल को छू जाती है। वो घर के कामों में हाथ बंटाती हैं, और शाम को कभी-कभी मेरे साथ बातें करती हैं, जैसे पुराने दिनों की यादें साझा करना।

उस दिन दोपहर में मैं अपनी किताबें समेटकर लिविंग रूम में आया, जहां सरिता मामी सोफे पर बैठी कुछ सिलाई का काम कर रही थीं। माँ बाजार गई हुई थीं, और पापा ऑफिस में थे, इसलिए घर में थोड़ी शांति थी। मैंने उनसे पूछा, "मामी, चाय बनाऊं क्या?" उन्होंने मुस्कुराकर सिर हिलाया और कहा, "नहीं राहुल, मैं बना देती हूं। तू बैठ, थक गया होगा पढ़ाई से।" उनकी आवाज में वो अपनापन था जो हमेशा मुझे अच्छा लगता था।

चाय पीते हुए हमने बातें शुरू कीं, पहले तो कॉलेज की, फिर उनके गांव की यादों की। सरिता मामी बताने लगीं कि कैसे बचपन में वो और माँ साथ खेलती थीं, और अब समय कितना बदल गया है। मैं सुनता रहा, उनकी बातों में एक उदासी थी, लेकिन वो उसे छिपाने की कोशिश कर रही थीं। अचानक मेरी नजर उनके हाथों पर गई, जो थोड़े थके हुए लग रहे थे, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप उनकी बातें सुनता रहा।

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शाम होने लगी थी, और घर में रोशनी कम हो रही थी। सरिता मामी उठीं और रसोई की तरफ गईं, मैं भी उनके पीछे चला गया, मदद करने के बहाने। वो सब्जियां काट रही थीं, और मैंने चाकू लेकर उनकी मदद की। हमारी उंगलियां एक-दूसरे से छू गईं, लेकिन वो एक सामान्य स्पर्श था, जैसे परिवार में होता है। फिर भी, उस पल में मुझे लगा कि सरिता मामी की आंखों में कुछ अलग सा भाव था, शायद अकेलेपन का।

रात का खाना खाने के बाद सब अपने-अपने कमरों में चले गए। मैं अपने कमरे में लेटा सोच रहा था कि सरिता मामी कितनी मजबूत हैं, इतने दुख के बाद भी मुस्कुराती रहती हैं। अगले दिन सुबह, जब मैं उठा, तो देखा वो बालकनी में खड़ी चाय पी रही थीं। मैं उनके पास गया और कहा, "मामी, आज मौसम अच्छा है न?" उन्होंने हंसकर जवाब दिया, "हां राहुल, ऐसे दिन यादों को ताजा कर देते हैं।" हमारी बातें लंबी होने लगीं, और धीरे-धीरे मैं महसूस करने लगा कि उनकी कंपनी मुझे सुकून देती है।

कुछ दिनों बाद, एक शाम बारिश हो रही थी। घर में बिजली चली गई, और हम सब लिविंग रूम में मोमबत्ती जलाकर बैठे थे। सरिता मामी मेरे बगल में बैठी थीं, और अंधेरे में उनकी सांसें साफ सुनाई दे रही थीं। माँ और पापा थोड़ी देर बाद सोने चले गए, लेकिन हम दोनों बैठे रहे। मैंने पूछा, "मामी, आपको डर तो नहीं लग रहा अंधेरे में?" उन्होंने धीरे से कहा, "नहीं राहुल, तेरे साथ हूं तो क्या डर।" उस पल में पहली बार मुझे लगा कि हमारे बीच कुछ अनकहा सा रिश्ता पनप रहा है।

बारिश की आवाज के बीच हमने पुरानी बातें कीं, उनके पति की यादें, मेरे बचपन की शरारतें। सरिता मामी की आंखें नम हो गईं, और मैंने बिना सोचे उनका हाथ थाम लिया। वो चुप रही, लेकिन उनका हाथ मेरे हाथ में कस गया। उस स्पर्श में गर्माहट थी, जो धीरे-धीरे मेरे मन में एक अलग सा उथल-पुथल पैदा कर रही थी। मैं जानता था कि ये गलत है, लेकिन उस पल में सब सही लग रहा था।

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अगले दिन, मैं कॉलेज से लौटा तो सरिता मामी अकेली घर में थीं। उन्होंने मुझे देखकर मुस्कुराया और कहा, "राहुल, आज मैंने तेरी पसंद की सब्जी बनाई है।" हम साथ खाना खाने बैठे, और बातों-बातों में मैंने उनकी तारीफ की, "मामी, आप कितनी अच्छी हैं, सब कुछ संभाल लेती हैं।" उन्होंने शरमाकर नजरें झुका लीं, और मैंने महसूस किया कि मेरी नजरें उनके चेहरे पर ज्यादा देर टिक रही हैं।

शाम को, जब मैं पढ़ाई कर रहा था, सरिता मामी मेरे कमरे में आईं और कहा, "राहुल, थोड़ा आराम कर ले, सारी रात जागता रहता है।" वो मेरे बगल में बैठ गईं, और उनकी खुशबू कमरे में फैल गई। मैंने किताब बंद की और उनकी तरफ देखा, उनकी आंखों में एक期待 था, शायद मेरी ही तरह। धीरे से मैंने उनका हाथ छुआ, और इस बार वो पीछे नहीं हटीं।

उस रात, घर में सब सो चुके थे। मैं अपने कमरे में लेटा था, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। अचानक दरवाजा खुला, और सरिता मामी अंदर आईं। उन्होंने धीरे से कहा, "राहुल, मुझे नींद नहीं आ रही। क्या मैं यहां बैठ सकती हूं?" मैंने सिर हिलाया, और वो मेरे बिस्तर पर बैठ गईं। हम चुप रहे, लेकिन हवा में एक तनाव था, जो धीरे-धीरे बढ़ रहा था।

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मैंने हिम्मत करके उनका हाथ थामा, और इस बार उन्होंने मेरी तरफ देखा, उनकी आंखें भावुक थीं। "राहुल, ये गलत है," उन्होंने फुसफुसाकर कहा, लेकिन उनका शरीर मेरे करीब आ रहा था। मैंने जवाब दिया, "मामी, लेकिन ये सही लग रहा है।" हमारी सांसें मिलने लगीं, और पहली बार मैंने उनके होंठों को छुआ। वो पल इतना नाजुक था कि दिल की धड़कनें तेज हो गईं।

सरिता मामी ने मुझे अपनी बाहों में खींच लिया, और हम दोनों के बीच की दूरी मिट गई। उनकी साड़ी की सिलवटें मेरे हाथों में आईं, और मैंने धीरे-धीरे उन्हें खोलना शुरू किया। उनकी त्वचा गर्म थी, और हर स्पर्श में एक नई उत्तेजना थी। वो मेरे कान में फुसफुसाई, "राहुल, धीरे से," और मैंने उनकी बात मानी, हर पल को जीते हुए।

हमारे शरीर एक-दूसरे से लिपट गए, और मैंने महसूस किया उनकी चूत की गर्माहट, जो मुझे आमंत्रित कर रही थी। धीरे-धीरे मैंने प्रवेश किया, और वो कराह उठीं, लेकिन वो कराह दर्द की नहीं, सुख की थी। हमारा मिलन भावनाओं से भरा था, जहां हर धक्का एक नई कहानी कह रहा था। सरिता मामी की आंखें बंद थीं, और उनके चेहरे पर संतुष्टि का भाव था।

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उस रात हमने कई बार एक-दूसरे को खोजा, हर बार कुछ नया अनुभव करते हुए। कभी मैं ऊपर था, कभी वो, और हमारी सांसें मिलकर एक लय बना रही थीं। उनकी चूत इतनी गीली और गर्म थी कि मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था, लेकिन मैंने कोशिश की कि हर पल लंबा चले। वो मेरे सीने पर सिर रखकर लेटीं, और हमने बातें कीं, हमारे रिश्ते की गहराई के बारे में।

अगले दिनों में ये मिलन गुप्त रूप से जारी रहा। एक दोपहर, जब घर खाली था, सरिता मामी ने मुझे रसोई में खींचा और कहा, "राहुल, अब और इंतजार नहीं होता।" हमने वहां ही शुरू किया, काउंटर पर उन्हें उठाकर। उनकी टांगें मेरी कमर से लिपटीं, और मैंने गहराई तक प्रवेश किया। वो चिल्लाईं, लेकिन खुशी से, और हमारा क्लाइमेक्स एक साथ आया, जैसे लहरें आपस में मिल गईं।

हर बार कुछ अलग था—कभी धीमा और भावुक, कभी तेज और जुनूनी। सरिता मामी की चूत का मजा ऐसा था कि मैं भूल नहीं पाता, वो नरमाहट, वो गर्मी, सब कुछ परफेक्ट। लेकिन हमारे मन में कन्फ्लिक्ट था, ये रिश्ता समाज की नजरों में गलत था, फिर भी हमारी भावनाएं इसे सही ठहरा रही थीं।

एक शाम, बारिश फिर शुरू हुई, और हम बालकनी में खड़े थे। सरिता मामी ने मेरे कंधे पर सिर रखा, और मैंने उन्हें पीछे से पकड़ा। धीरे-धीरे मेरे हाथ उनकी कमर से नीचे सरके, और हमने वहां ही मिलन किया, बारिश की बूंदों के बीच। उनकी कराहें बारिश की आवाज में घुल गईं, और मैंने महसूस किया कि ये बंधन अब हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है।

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रात गहराने लगी थी, और हम बिस्तर पर लेटे थे। सरिता मामी मेरे सीने पर उंगलियां फिरा रही थीं, और मैं उनकी आंखों में देख रहा था। हम फिर से करीब आए, इस बार और ज्यादा गहराई से। मैंने उनकी चूत को छुआ, और वो सिहर उठीं। धीरे-धीरे मैंने प्रवेश किया, और हमारी लय तेज हो गई।

हर धक्के के साथ हमारी भावनाएं उफान पर थीं, और क्लाइमेक्स के करीब पहुंचते हुए मैंने महसूस किया कि ये मजा अनंत है। सरिता मामी की आंखें बंद हो गईं, और वो मेरे नाम का उच्चारण कर रही थीं, जैसे