रात भर की वो अनकही चाहत

शाम का वक्त था, जब मैं अपनी पुरानी किताबों को अलमारी में व्यवस्थित कर रहा था। घर में हल्की-हल्की ठंडक फैल रही थी, और बाहर से आती हवा खिड़की के पर्दों को हल्के से हिला रही थी। रोज की तरह, मैंने चाय का कप उठाया और बालकनी में जाकर बैठ गया, जहां से शहर की रोशनी दूर-दूर तक फैली हुई नजर आ रही थी।

मैं राहुल हूं, और ये मेरा छोटा सा अपार्टमेंट है दिल्ली में। पिछले कुछ सालों से यहां अकेले रहता हूं, नौकरी की वजह से। परिवार गांव में है, लेकिन छुट्टियों में मिलना-जुलना होता रहता है। आज ऑफिस से जल्दी लौट आया था, सोचा थोड़ा आराम कर लूं।

तभी फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर प्रिया का नाम चमका। प्रिया मेरी फुफेरी बहन है, फूफा जी की बेटी। हम बचपन से साथ खेले-बढ़े हैं, लेकिन अब वो भी दिल्ली में पढ़ाई कर रही है। "हैलो, राहुल भैया? मैं स्टेशन पर हूं, क्या आ सकती हूं तुम्हारे पास? हॉस्टल बंद है आज," उसकी आवाज थोड़ी थकी हुई लगी।

मैंने हां कह दिया। क्यों नहीं, आखिर परिवार है। आधे घंटे बाद वो दरवाजे पर थी, बैग लिए हुए। "कैसी हो प्रिया? अंदर आओ," मैंने मुस्कुराते हुए कहा। वो अंदर आई, और हम सोफे पर बैठ गए। उसने बताया कि कॉलेज में कोई इवेंट था, लेकिन रात हो गई तो हॉस्टल नहीं जा पाई।

हमने साथ डिनर किया। मैंने किचन में जो कुछ था, वो गर्म करके परोसा। बातें चलती रहीं – उसके कॉलेज की, मेरी नौकरी की। प्रिया अब 22 की हो गई है, कॉलेज के आखिरी साल में। मैं 26 का हूं, और हमारा रिश्ता हमेशा से दोस्तों जैसा रहा है। कोई औपचारिकता नहीं, बस सहजता।

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रात गहराने लगी। मैंने उसे अपना कमरा दे दिया, खुद गेस्ट रूम में सोने का सोचा। लेकिन वो बोली, "भैया, अकेले डर लगता है। क्या हम साथ सो सकते हैं? जैसे बचपन में।" मैं हंस पड़ा, "ठीक है, लेकिन मैं सोफे पर सो जाऊंगा।" वो जिद करने लगी, और आखिरकार हम एक ही बेड पर लेट गए, अलग-अलग किनारों पर।

लाइट बंद होते ही कमरे में सन्नाटा छा गया। मैं करवटें बदलता रहा, नींद नहीं आ रही थी। प्रिया की सांसें नियमित थीं, शायद वो सो गई थी। लेकिन मेरे मन में कुछ अजीब सा चल रहा था। बचपन की यादें, लेकिन अब वो बच्ची नहीं थी।

अचानक उसने करवट ली, और उसका हाथ मेरी तरफ आ गया। मैं सिहर उठा, लेकिन कुछ नहीं कहा। "भैया, नींद नहीं आ रही?" उसकी फुसफुसाहट आई। मैंने हल्के से हां कहा। हम बातें करने लगे, धीमी आवाज में। उसके कॉलेज के दोस्तों की, मेरी पुरानी गर्लफ्रेंड की।

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बातों-बातों में वो करीब आ गई। उसकी गर्म सांस मेरे कंधे पर महसूस हुई। मैंने खुद को रोकने की कोशिश की, लेकिन मन में एक उथल-पुथल थी। वो हमारी फुफेरी बहन है, लेकिन ये भावनाएं... कहां से आ रही थीं? "प्रिया, सो जाओ," मैंने कहा, लेकिन मेरी आवाज कांप रही थी।

उसने मेरी तरफ देखा, अंधेरे में उसकी आंखें चमक रही थीं। "भैया, तुम्हें पता है, मैं हमेशा तुम्हें पसंद करती थी। लेकिन डरती थी कहने से।" उसके शब्दों ने मुझे स्तब्ध कर दिया। क्या ये सच था? मैंने कुछ नहीं कहा, बस उसकी तरफ देखता रहा।

फिर धीरे से उसने अपना हाथ मेरे सीने पर रखा। मेरी धड़कन तेज हो गई। मैं जानता था ये गलत है, लेकिन उस पल में सब सही लग रहा था। "प्रिया, ये... हमारा रिश्ता," मैंने बुदबुदाया। वो चुप रही, बस करीब आती गई।

हमारी सांसें मिलने लगीं। मैंने उसे अपनी बाहों में लिया, और पहली बार उसके होंठों को छुआ। वो नरम थे, मीठे। kiss गहरा होता गया, और मेरे हाथ उसके बालों में उलझ गए। वो भी जवाब दे रही थी, जैसे सालों का दबा हुआ जज्बा बाहर आ रहा हो।

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कपड़े धीरे-धीरे उतरते गए। उसकी त्वचा गर्म थी, मुलायम। मैंने उसके गले पर kiss किया, और वो सिहर उठी। "राहुल... भैया," उसने फुसफुसाया। मैंने उसे रोका नहीं, बस महसूस करता रहा। हमारा रिश्ता अब बदल चुका था।

रात गहराती गई, और हम एक-दूसरे में खोते गए। उसकी आंखों में वो चाहत थी, जो मैंने कभी नहीं देखी। मैंने उसके शरीर को छुआ, हर हिस्से को। वो मेरे स्पर्श पर प्रतिक्रिया दे रही थी, जैसे कोई नई दुनिया खुल रही हो।

फिर वो पल आया जब हम पूरी तरह जुड़ गए। मैंने धीरे से प्रवेश किया, और वो दर्द से कराह उठी। लेकिन जल्दी ही वो लय में आ गई। हमारी गतियां सिंक्रोनाइज हो गईं, और कमरा हमारी सांसों से भर गया। रात भर हमने वो पल जिया, बार-बार।

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पहली बार के बाद हम थककर लेट गए, लेकिन नींद नहीं आई। उसने मेरे सीने पर सिर रखा, और मैं उसके बाल सहलाता रहा। "ये गलत है न?" मैंने पूछा। वो बोली, "लेकिन ये सच्चा है।" उसकी बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।

फिर से हम करीब आए। इस बार ज्यादा पैशन से। मैंने उसके स्तनों को छुआ, निपल्स को चूमा। वो मोअन कर रही थी, मेरे नाम से। हमारी बॉडीज पसीने से भीग गईं, लेकिन रुकना नहीं चाहते थे।

रात के तीसरे पहर में हम फिर एक हुए। इस बार वो ऊपर थी, कंट्रोल में। उसकी हरकतें मुझे पागल कर रही थीं। मैंने उसके हिप्स पकड़े, और हम तेज होते गए। क्लाइमैक्स इतना इंटेंस था कि हम दोनों चीख पड़े।

सुबह होने को थी, लेकिन हम अभी भी एक-दूसरे में उलझे थे। उसकी आंखों में संतुष्टि थी, और मेरे मन में एक नई भावना। क्या ये प्यार था? या सिर्फ आकर्षण? लेकिन उस पल में सब ठीक लग रहा था।

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हमने फिर से शुरुआत की, धीमी और इमोशनल। उसके आंसू निकले, खुशी के। मैंने उन्हें चूमा, और हम धीरे-धीरे चरम पर पहुंचे। रात खत्म हो रही थी, लेकिन हमारी चाहत नहीं।

प्रिया ने मेरे कान में फुसफुसाया, "ये रात याद रहेगी।" मैंने उसे कसकर पकड़ा, और हम लेटे रहे, सूरज की पहली किरण कमरे में आने तक।

उसकी सांसें अब शांत थीं, लेकिन मेरी धड़कन अभी भी तेज। मैं सोच रहा था कि आगे क्या होगा, लेकिन उस पल में बस वही था।

हम फिर से मिले, आखिरी बार उस रात। वो इतनी गहरी थी कि शब्दों में बयां नहीं कर सकता।