दीदी के साथ अनकही चाहत

सुबह की धूप खिड़की से छनकर कमरे में फैल रही थी, और मैं अपनी किताबों के ढेर के बीच बैठा कॉलेज की तैयारी कर रहा था। घर छोटा सा था, दिल्ली के एक पुराने मोहल्ले में, जहाँ माँ रोज़ सुबह चाय बनातीं और पापा अपने ऑफिस के लिए निकल जाते। मैं राहुल, घर का छोटा बेटा, अभी 22 साल का था, और कॉलेज के आखिरी साल में था। दीदी, प्रिया, मुझसे तीन साल बड़ी, एक छोटी सी कंपनी में जॉब करती थी। वो रोज़ सुबह उठकर घर के कामों में हाथ बटाती, फिर तैयार होकर निकल जाती। आज भी वही रूटीन था – माँ रसोई में व्यस्त, पापा अखबार पढ़ते हुए, और दीदी अपने कमरे से निकलकर चाय की ट्रे लेकर आई।

मैंने किताब बंद की और दीदी की तरफ देखा। "चाय, राहुल?" उसने मुस्कुराते हुए पूछा। मैंने हाँ में सिर हिलाया और ट्रे से कप उठा लिया। घर में हमेशा एक शांति भरी हलचल रहती थी। दीदी और मैं बचपन से ही काफी करीब थे – स्कूल के दिनों में वो मुझे पढ़ाती, मेरी शिकायतें सुनती, और कभी-कभी मेरे दोस्तों से झगड़ भी लेती। अब बड़े हो गए थे, लेकिन वो बॉन्ड वैसा ही था। शाम को जब वो जॉब से लौटती, तो हम साथ बैठकर टीवी देखते या बस बातें करते। पापा का ट्रांसफर कुछ महीने पहले हो गया था, इसलिए अब वो हफ्ते में सिर्फ वीकेंड पर आते। माँ भी कभी-कभी अपनी बहन के घर चली जातीं, जिससे घर थोड़ा खाली सा लगता।

उस दिन कॉलेज से लौटकर मैं थका हुआ था। दीदी पहले ही घर आ चुकी थी, और रसोई में कुछ बना रही थी। "क्या हुआ, राहुल? चेहरा उतरा हुआ क्यों है?" उसने पूछा, जबकि मैं सोफे पर बैठ गया। मैंने बताया कि असाइनमेंट की वजह से सिर दर्द हो रहा था। वो हँसकर बोली, "चल, मैं मसाज कर दूँ। बचपन में तो तू ऐसे ही मुझसे कहता था।" मैंने मना नहीं किया। वो मेरे पास बैठी और धीरे से मेरे सिर पर हाथ फेरने लगी। उसकी उँगलियाँ नरम थीं, और थोड़ी देर में दर्द कम होने लगा। हम बातें करने लगे – उसके ऑफिस की, मेरे कॉलेज की। माँ उस शाम अपनी सहेली से मिलने गई थीं, तो घर में सिर्फ हम दोनों थे।

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रात का खाना हमने साथ खाया। दीदी ने अपनी पसंदीदा सब्जी बनाई थी, और हम हँसते-बतियाते खाते रहे। खाने के बाद मैं अपने कमरे में चला गया, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। बाहर लिविंग रूम में दीदी टीवी देख रही थी। मैं उठकर उसके पास गया। "क्या देख रही हो?" मैंने पूछा। "बस, कोई पुरानी फिल्म," उसने कहा। मैं उसके बगल में बैठ गया। फिल्म में एक सीन था जहाँ भाई-बहन का रिश्ता दिखाया गया था, और अचानक हम दोनों चुप हो गए। दीदी ने रिमोट बंद किया और बोली, "राहुल, तू बड़ा हो गया है न? कभी-कभी लगता है, हमारी पुरानी बातें अब बदल गई हैं।" मैंने उसकी आँखों में देखा, और कुछ अनकहा सा महसूस हुआ।

उस रात मैं बिस्तर पर लेटा सोचता रहा। दीदी हमेशा मेरी देखभाल करती थी, लेकिन अब उसकी मौजूदगी में कुछ अलग सा लगने लगा था। अगले दिन सुबह उठा तो दीदी तैयार हो रही थी। मैंने चाय बनाई और उसके कमरे में ले गया। "वाह, आज तू चाय लेकर आया?" उसने हँसकर कहा। हम दोनों ने साथ चाय पी, और वो ऑफिस चली गई। शाम को जब वो लौटी, तो थकी हुई लग रही थी। "आज बॉस ने बहुत काम दिया," उसने शिकायत की। मैंने कहा, "चलो, मैं तुम्हें कॉफी बनाकर देता हूँ।" रसोई में हम साथ खड़े थे, और अचानक उसका हाथ मेरे कंधे से टकराया। वो पल कुछ सेकंड के लिए रुक सा गया।

धीरे-धीरे हमारे बीच की बातें गहरी होने लगीं। एक शाम माँ घर पर नहीं थीं, और हम दोनों बालकनी में खड़े बारिश देख रहे थे। दीदी ने कहा, "राहुल, तू कभी सोचता है कि जीवन में क्या चाहता है?" मैंने उसकी तरफ देखा, उसकी आँखें नम थीं। "दीदी, तुम्हारे बिना तो कुछ नहीं," मैंने मजाक में कहा, लेकिन वो गंभीर हो गई। उसने मेरे हाथ पर अपना हाथ रखा, और हम चुपचाप खड़े रहे। उस स्पर्श में कुछ था जो मुझे अंदर तक छू गया। रात को जब वो सोने गई, तो मैं उसके कमरे के बाहर रुका। "गुडनाइट, दीदी," मैंने कहा। "गुडनाइट, राहुल," उसने जवाब दिया, लेकिन उसकी आवाज में एक कंपकंपी थी।

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कुछ दिन बाद, घर में बिजली चली गई थी। बाहर तेज बारिश हो रही थी, और माँ पापा के साथ उनके शहर गई हुई थीं। दीदी और मैं मोमबत्ती की रोशनी में बैठे थे। "डर लग रहा है," उसने कहा, और मेरे करीब आ गई। मैंने उसका हाथ थामा। "मैं हूँ न," मैंने कहा। उसकी साँसें तेज़ थीं, और अचानक उसने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया। मैंने उसे गले लगा लिया। वो पल इतना स्वाभाविक लगा, जैसे हमेशा से ऐसा होना था। "राहुल, क्या ये गलत है?" उसने धीरे से पूछा। मैंने कुछ नहीं कहा, बस उसे और कसकर पकड़ लिया।

उस रात हम दोनों एक-दूसरे के करीब आए। दीदी के कमरे में मोमबत्ती की हल्की रोशनी थी। मैंने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया और धीरे से उसके होंठों पर अपने होंठ रखे। वो थरथरा रही थी, लेकिन पीछे नहीं हटी। हमारा चुंबन गहरा होता गया, और मैंने महसूस किया कि उसकी साँसें मेरी साँसों में घुल रही थीं। "राहुल, मैं डर रही हूँ," उसने फुसफुसाया। "मत डरो, दीदी। मैं तुम्हें कभी दुख नहीं दूँगा," मैंने कहा। मैंने उसके ब्लाउज के बटन खोले, और उसकी त्वचा की गर्माहट महसूस की। वो इतनी नरम थी, जैसे रेशम।

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हम बिस्तर पर लेट गए। मैंने उसके शरीर को सहलाया, हर हिस्से को प्यार से छुआ। उसकी आँखें बंद थीं, और वो मेरे नाम का उच्चारण कर रही थी। "राहुल... ओह, राहुल..." उसकी आवाज में एक मिठास थी। मैंने उसके स्तनों को चूमा, और वो कराह उठी। हमारा मिलन धीमा और भावुक था। मैं उसके अंदर प्रवेश किया, और वो मेरे साथ ताल मिलाने लगी। हर धक्के के साथ हमारी भावनाएँ उफान पर थीं – प्यार, डर, उत्साह। "ये हमारा राज़ रहेगा," उसने कहा, जबकि हम एक-दूसरे में खोए हुए थे।

उस रात के बाद, हमारे बीच का रिश्ता बदल गया। लेकिन हम सावधान रहते। एक दोपहर, जब घर खाली था, दीदी ने मुझे अपने कमरे में बुलाया। "राहुल, आज कुछ अलग ट्राई करें?" उसने शरमाते हुए कहा। मैंने हाँ कहा। वो मेरे ऊपर आई, और खुद को नियंत्रित करते हुए मुझे प्यार करने लगी। उसकी हरकतें इतनी कामुक थीं कि मैं खुद को रोक नहीं पाया। हमने नए तरीके आजमाए – कभी धीमे, कभी तेज़। उसकी कराहें कमरे में गूँज रही थीं, और मैं उसके शरीर की हर रेखा को महसूस कर रहा था। "तुम इतनी खूबसूरत हो, दीदी," मैंने कहा।

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कभी-कभी कन्फ्लिक्ट भी आता। एक शाम, दीदी उदास थी। "राहुल, क्या ये सही है? समाज क्या कहेगा?" उसने पूछा। मैंने उसे गले लगाया। "हमारा प्यार सच्चा है, दीदी। बस यही मायने रखता है।" हमारी बातें गहरी होतीं, और फिर वो भावनाएँ शारीरिक रूप ले लेतीं। एक बार हम किचन में थे, और अचानक हम एक-दूसरे पर टूट पड़े। दीदी ने मुझे काउंटर पर धकेला और मेरे कपड़े उतारने लगी। हमारा मिलन वहाँ ही हुआ, तेज़ और जुनूनी। उसकी साँसें मेरे कान में गर्म हवा की तरह लग रही थीं।

समय बीतता गया, और हमारे पल और गहरे होते गए। एक रात, हम बाहर घूमने गए थे, और घर लौटकर हमने पूरे कमरे को अपनी चाहत से भर दिया। दीदी ने नए कपड़े पहने थे, जो उसके शरीर को और आकर्षक बना रहे थे। मैंने उसे धीरे-धीरे नंगा किया, हर हिस्से को चूमा। "राहुल, आज मुझे सब कुछ दे दो," उसने कहा। हमारा सीन लंबा चला, जिसमें प्यार की हर परत खुलती गई। कभी वो मेरे नीचे थी, कभी ऊपर। हमारी भावनाएँ उफान पर थीं, और हर पल नया अनुभव दे रहा था।

फिर एक शाम, जब माँ घर पर थीं, हम चुपके से मिले। दीदी के कमरे में, दरवाजा बंद करके। "जल्दी करो, राहुल," उसने फुसफुसाया। हमारा मिलन छोटा लेकिन तीव्र था। मैंने उसके शरीर को सहलाया, और वो मेरे साथ बह गई। उसकी आँखों में वो चाहत थी जो कभी कम नहीं होती। हम जानते थे कि ये रिश्ता हमेशा छिपा रहेगा, लेकिन हमारी भावनाएँ हमें बाँधे रखतीं।

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एक और रात, हमने बातें कीं। "राहुल, तुम्हारे बिना मैं अधूरी हूँ," दीदी ने कहा। मैंने उसे चूमा, और हम फिर से एक हो गए। उस बार, मिलन में एक नई कोमलता थी। मैंने उसके हर हिस्से को प्यार किया, और वो मेरे नाम से पुकारती रही। हमारी साँसें मिलीं, शरीर एक हुए, और वो पल अनंत लग रहा था।