दीदी के साथ अनकही चाहत
शाम का समय था, जब मैं कॉलेज से घर लौटा। बाहर हल्की बारिश हो रही थी, और घर की बालकनी से ठंडी हवा आ रही थी। मैंने अपना बैग सोफे पर रखा और किचन की तरफ बढ़ा, जहां रोज की तरह चाय बनाने की आदत थी।
प्रिया दीदी उस वक्त लिविंग रूम में बैठी किताब पढ़ रही थी। वो हमेशा की तरह शांत लग रही थी, उसके बाल खुले थे और चेहरे पर एक हल्की मुस्कान। मैंने कहा, "दीदी, चाय बनाऊं?" वो बोली, "हां रोहन, बना ले, मैं भी पीऊंगी।"
हमारा घर छोटा सा था, दिल्ली के एक अपार्टमेंट में। मां-पापा दोनों जॉब करते थे, इसलिए शाम को घर में सिर्फ हम दोनों ही रहते थे। मैं बीस साल का था, इंजीनियरिंग का स्टूडेंट, और दीदी चौबीस की, एक स्कूल में टीचर।
चाय बनाते हुए मैंने सोचा कि आज का दिन कितना थकान भरा था। लेक्चर्स, असाइनमेंट्स, सब कुछ। दीदी ने किताब बंद की और किचन में आ गई, चाय की केतली देखते हुए। "कैसा रहा आज का दिन तेरा?" उसने पूछा।
मैंने बताया, "बस वही, क्लासेस और प्रोजेक्ट। तू बता, स्कूल में क्या हुआ?" हम दोनों चाय लेकर सोफे पर बैठ गए। दीदी ने अपनी क्लास के बच्चों की कहानियां सुनाई, कैसे एक बच्चा आज रो रहा था।
बातें करते-करते शाम ढल गई। बाहर बारिश तेज हो गई थी, और घर में लाइट्स जलानी पड़ीं। मैंने टीवी ऑन किया, कोई पुरानी फिल्म चल रही थी। दीदी पास ही बैठी थी, उसके कंधे से मेरे कंधे का स्पर्श हो रहा था।
हमारा परिवार हमेशा से करीब रहा था। बचपन से दीदी मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी। वो मुझसे चार साल बड़ी थी, लेकिन कभी बॉस नहीं बनती। पापा की जॉब ट्रांसफर के बाद हम दिल्ली आ गए थे, और यहां नई जिंदगी शुरू हुई।
रात का खाना हमने साथ बनाया। दीदी ने सब्जी काटी, मैंने रोटियां सेंकी। हंसते-हंसते हमने प्लेट्स सजाईं। "तू कितना बड़ा हो गया है रोहन," दीदी ने कहा, मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए।
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खाना खाने के बाद हम बालकनी में खड़े हो गए। बारिश रुक चुकी थी, लेकिन हवा में नमी थी। दीदी ने कहा, "पता है, कभी-कभी लगता है जिंदगी कितनी तेज भाग रही है।" मैंने सहमति में सिर हिलाया।
उस रात मैं अपने कमरे में लेटा सोच रहा था। दीदी का कमरा बगल में था। हमारा घर छोटा होने से आवाजें साफ सुनाई देती थीं। मैंने किताब उठाई, लेकिन मन नहीं लगा।
अगले दिन सुबह उठा तो दीदी पहले से तैयार थी। "चल, आज मैं तुझे कॉलेज ड्रॉप कर दूंगी," उसने कहा। कार में जाते हुए हमने गाने सुने। दीदी का हाथ गियर पर था, और मेरा ध्यान उसकी उंगलियों पर गया।
शाम को लौटते वक्त मैंने सोचा कि दीदी कितनी केयरिंग है। घर पहुंचा तो वो किचन में थी, कुछ स्पेशल बना रही थी। "आज तेरा फेवरेट पास्ता," उसने मुस्कुराते हुए कहा।
रात हुई, और हम फिर सोफे पर बैठे। दीदी ने अपना सिर मेरे कंधे पर टिका लिया। "थक गई हूं आज," उसने कहा। मैंने उसके बालों में हाथ फेरा, बस ऐसे ही।
उस पल में कुछ अलग सा लगा। दीदी की सांसें मेरे करीब थीं। मैंने खुद को रोका, लेकिन मन में एक हलचल थी। वो उठी और बोली, "चल, सोते हैं।"
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कुछ दिनों बाद, एक वीकेंड था। मां-पापा बाहर गए थे, किसी फैमिली फंक्शन में। घर में सिर्फ हम दोनों। सुबह उठा तो दीदी योगा कर रही थी।
मैंने कॉफी बनाई और उसे दी। "थैंक्यू रोहन," उसने कहा, पसीने से तर चेहरे के साथ। हमने ब्रेकफास्ट साथ किया, बातें कीं जिंदगी के बारे में।
दोपहर को हमने फिल्म देखने का प्लान बनाया। लिविंग रूम में अंधेरा करके बैठे। फिल्म रोमांटिक थी, और एक सीन में हीरो-हीरोइन करीब आते हैं। दीदी ने मेरी तरफ देखा।
मेरा दिल तेज धड़का। दीदी का हाथ मेरे हाथ पर था। "ये फिल्म अच्छी है न?" उसने पूछा। मैंने हां कहा, लेकिन मन कहीं और था।
फिल्म खत्म हुई, लेकिन हम वैसे ही बैठे रहे। दीदी ने कहा, "रोहन, तू मेरे लिए कितना स्पेशल है।" उसकी आंखों में कुछ था, जो मैं समझ नहीं पाया।
शाम को हमने वॉक पर जाने का फैसला किया। पार्क में घूमते हुए दीदी ने मेरी बाजू पकड़ी। "बचपन याद आता है," उसने कहा। मैंने भी यादें शेयर कीं।
घर लौटे तो रात हो चुकी थी। दीदी ने कहा, "आज साथ सोएं क्या? मां-पापा नहीं हैं, डर लगता है।" मैं हंस पड़ा, लेकिन सहमत हो गया।
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मेरे कमरे में हम लेटे। दीदी मेरे बगल में थी। रात की चुप्पी में उसकी सांसें सुनाई दे रही थीं। मैंने करवट ली, और हमारा चेहरा आमने-सामने हो गया।
उसकी आंखें बंद थीं, लेकिन मैं जाग रहा था। मन में उथल-पुथल थी। दीदी कितनी खूबसूरत लग रही थी, लेकिन मैंने खुद को रोका। वो हमारी दीदी थी।
अचानक दीदी की आंखें खुलीं। "नींद नहीं आ रही?" उसने पूछा। मैंने ना कहा। वो करीब आई, उसका हाथ मेरे सीने पर। "मैं भी नहीं सो पा रही।"
उस पल में कुछ टूटा। मैंने उसकी कमर पर हाथ रखा। दीदी ने विरोध नहीं किया। हमारी सांसें मिल गईं, और पहली बार होंठ छुए।
वो चुंबन लंबा था, भावनाओं से भरा। दीदी की आंखों में आंसू थे। "ये गलत है रोहन," उसने कहा, लेकिन करीब आई। मैंने उसे गले लगाया।
हमारे कपड़े धीरे-धीरे उतरे। दीदी की त्वचा गर्म थी, मेरे स्पर्श से कांप रही थी। मैंने उसके कंधे चूमे, गर्दन पर होंठ फिराए।
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दीदी ने मेरे बालों में उंगलियां फंसाईं। "धीरे रोहन," उसने फुसफुसाया। हमारा शरीर एक हो गया, धीमी गति में। हर स्पर्श नया अनुभव था।
उस रात की शुरुआत डर से हुई, लेकिन जल्दी ही जुनून में बदल गई। दीदी की आहें कमरे में गूंजीं, मेरी हरकतों से। हमने समय भुला दिया।
सुबह हुई, लेकिन हम नहीं उठे। दीदी मेरे सीने पर सिर रखकर सोई थी। मैंने उसके बाल सहलाए, सोचते हुए कि ये क्या हो गया।
दिन चढ़ा, हमने बात की। "ये हमारा राज रहेगा," दीदी ने कहा। लेकिन उसकी आंखों में वही चाहत थी। शाम को फिर हम करीब आए।
इस बार ज्यादा आत्मविश्वास से। मैंने दीदी को बिस्तर पर लिटाया, उसके शरीर के हर हिस्से को चूमा। वो कांप रही थी, लेकिन खुश थी।
हमारी हरकतें तेज हुईं, जुनून भरी। दीदी ने मेरे कान में कहा, "और तेज रोहन।" मैंने वैसा ही किया, हम दोनों एक लय में।
उस अनुभव में दर्द और सुख मिला हुआ था। दीदी की आंखें बंद थीं, चेहरे पर संतुष्टि। हम थककर लेटे, एक-दूसरे को देखते हुए।
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रात फिर आई, और हमने नई चीजें आजमाईं। दीदी ऊपर आई, उसकी गतियां नियंत्रित। मैंने उसके स्तनों को छुआ, नरमी महसूस की।
हर पल अलग था, भावनाओं से भरा। दीदी की मुस्कान देखकर लगा सब ठीक है। हमने बातें कीं, हंसे, फिर करीब आए।
सुबह की रोशनी में दीदी ने कहा, "ये हमारी जिंदगी का हिस्सा है अब।" मैंने सहमति दी, उसके होंठ चूमे।
दिन बीतते गए, हमारा रिश्ता गहरा होता गया। हर शाम एक नई शुरुआत थी। दीदी की आंखों में वो प्यार था, जो शब्दों से परे था।
एक रात हम बालकनी में खड़े थे, बारिश देखते हुए। दीदी ने मेरी कमर पकड़ी। "चल अंदर," उसने कहा। कमरे में पहुंचते ही हम फिर एक हो गए।
इस बार दीदी की इच्छाएं ज्यादा थीं। उसने मुझे निर्देश दिए, मैंने सुना। हमारा मिलन लंबा चला, सेंसरी डिटेल्स से भरा।
दीदी की त्वचा पर पसीना, मेरे स्पर्श से। उसकी आहें, मेरे नाम की। हम थककर लेटे, लेकिन संतुष्ट।
अगले दिन हमने ट्रिप प्लान की, लेकिन घर में ही रहना पसंद किया। शाम को फिर वही जुनून। दीदी ने नई पोजीशन ट्राई की, हंसते हुए।
हर अनुभव में नई भावना जुड़ी। कभी कोमलता, कभी तेजी। दीदी का शरीर मेरे लिए जाना-पहचाना हो गया था।
रात गहरी हुई, हम बातें करते लेटे थे। दीदी ने अपनी भावनाएं शेयर कीं, मैंने सुना। फिर धीरे से हम फिर करीब आए, इस बार बहुत धीमे।
उसकी सांसें मेरी सांसों में मिलीं, शरीर एक लय में। दीदी की आंखें मेरी आंखों में थीं, प्यार से भरी।
सुबह की पहली किरण आई, हम अभी भी एक-दूसरे के आगोश में थे। दीदी ने मुस्कुराकर कहा, "ये कभी खत्म न हो।" मैंने उसे चूमा, और हम फिर से शुरू हो गए।
हर स्पर्श में वो गहराई थी, जो शब्दों से बयां नहीं होती। दीदी की उंगलियां मेरी पीठ पर, मेरे होंठ उसकी गर्दन पर।
समय रुक सा गया था। हमारी दुनिया बस हम दोनों की थी। दीदी की आह भरकर मेरे नाम पुकारना, वो पल अनमोल थे।
फिर से हम थककर लेटे, लेकिन मन नहीं भरा। दीदी ने कहा, "एक बार और।" मैंने हामी भरी, और हम फिर डूब गए उस समंदर में।
उसकी गर्माहट, मेरी चाहत, सब मिलकर एक हो गया। दीदी के चेहरे पर वो चमक थी, जो सिर्फ मेरे लिए थी।