चाची की चाहत और बेटी का राज़
सुबह का समय था, जब सूरज की पहली किरणें हमारे छोटे से घर की खिड़की से झांक रही थीं। मैं रोज की तरह उठा, चाय की केतली चढ़ाई और बालकनी में खड़े होकर शहर की हलचल को देखने लगा। दिल्ली की इस कॉलोनी में रहते हुए अब दो साल हो चुके थे, और चाची का घर मेरे लिए अपना सा लगने लगा था। नौकरी की तलाश में गांव से आया था, और चाची ने बिना कुछ कहे मुझे अपने पास रख लिया। दिनचर्या सिंपल थी – सुबह चाय, फिर तैयार होकर ऑफिस, शाम को लौटकर डिनर और थोड़ी बातें।
चाची का नाम सुनीता था, मेरी माँ की छोटी बहन। पति के गुजरने के बाद से वो अकेली ही सब संभाल रही थीं। उनकी बेटी प्रिया कॉलेज जाती थी, और मैं घर में एक तरह से उनके सहारे का काम करता था। आज भी वही रूटीन था। मैंने चाय बनाई और ट्रे में रखकर चाची के कमरे की तरफ बढ़ा। दरवाजा खुला था, वो बिस्तर पर बैठी किताब पढ़ रही थीं। "चाची, चाय," मैंने मुस्कुराकर कहा। उन्होंने किताब बंद की और मुझे देखा, "आज जल्दी उठ गए राहुल? अच्छा हुआ, आज प्रिया की क्लास लेट है, तो साथ में नाश्ता करेंगे।"
हम तीनों डाइनिंग टेबल पर बैठे। प्रिया अपनी किताबों में खोई हुई थी, कभी-कभी मुस्कुराकर मुझसे बात करती। वो 22 साल की थी, कॉलेज के आखिरी साल में, और चाची 45 की, लेकिन उनकी आंखों में एक अलग सी चमक थी। मैं 25 का था, और इस घर में रहते हुए मुझे लगता था कि जीवन की भागदौड़ में थोड़ी शांति मिल गई है। नाश्ते के बाद मैं ऑफिस चला गया, लेकिन मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। शाम को लौटा तो घर में सन्नाटा था। चाची किचन में थीं, प्रिया बाहर गई हुई थी।
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रात का खाना खाने के बाद हम बालकनी में बैठे। चाची ने कहा, "राहुल, तुम्हारे चाचा के जाने के बाद से ये घर सूना लगता था। तुम्हारे आने से अच्छा लगता है।" उनकी आवाज में एक गहराई थी, जो मुझे छू गई। मैंने हंसकर कहा, "चाची, आपने मुझे अपनाया है, मैं क्या कहूं।" वो चुप हो गईं, बस बाहर की लाइट्स को देखती रहीं। उस रात मुझे नींद नहीं आई। चाची के बारे में सोचता रहा – उनकी मुस्कान, उनकी देखभाल। लेकिन मैंने खुद को रोका, वो मेरी चाची थीं।
अगले दिन ऑफिस से जल्दी लौटा। घर पहुंचा तो चाची अकेली थीं। प्रिया दोस्त के घर गई थी। चाची सोफे पर बैठी टीवी देख रही थीं। मैं उनके पास बैठ गया। "कुछ परेशान लग रही हो चाची?" मैंने पूछा। उन्होंने सिर हिलाया, "बस, अकेलापन कभी-कभी काटता है। प्रिया बड़ी हो गई है, अपनी दुनिया में।" उनकी आंखें नम थीं। मैंने उनका हाथ पकड़ा, "मैं हूं ना।" वो मेरी तरफ मुड़ीं, और एक पल के लिए हमारी नजरें मिलीं। वो चुप्पी भारी थी।
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उस शाम हम बातें करते रहे। चाची ने अपनी जिंदगी के बारे में बताया – शादी, चाचा की मौत, प्रिया को अकेले पालना। मैंने अपनी कहानी शेयर की – गांव की जिंदगी, शहर की मुश्किलें। धीरे-धीरे बातें गहरी होती गईं। रात हो गई, प्रिया अभी नहीं लौटी थी। चाची ने कहा, "राहुल, तुम मेरे लिए बहुत मायने रखते हो।" मैंने कुछ नहीं कहा, बस उनके करीब सरक गया। उनकी सांसें तेज हो रही थीं। मैंने उनका चेहरा अपने हाथों में लिया और धीरे से吻 किया। वो पीछे नहीं हटीं।
उस पल सब कुछ बदल गया। चाची की आंखों में एक आग थी, जो सालों से दबी हुई थी। मैंने उन्हें अपनी बाहों में लिया, और हम कमरे की तरफ बढ़े। बिस्तर पर गिरते ही उनके होंठ मेरे होंठों से मिल गए। उनकी साड़ी सरक रही थी, और मैं उनकी गर्दन पर kiss कर रहा था। "राहुल, ये गलत है," उन्होंने फुसफुसाया, लेकिन उनके हाथ मुझे रोक नहीं रहे थे। मैंने उनकी ब्लाउज खोली, उनके स्तनों को छुआ। वो सिहर उठीं। हमारी बॉडी एक हो गईं, और वो रात हमने एक-दूसरे को पूरी तरह समर्पित कर दिया।
सुबह उठा तो चाची मेरे बगल में सो रही थीं। मैंने उन्हें जगाया नहीं, बस देखता रहा। प्रिया घर आ चुकी थी, लेकिन कुछ नहीं बोली। दिन बीता, लेकिन चाची और मेरे बीच एक राज़ था। शाम को चाची ने कहा, "राहुल, प्रिया के बारे में सोचो। वो तुम्हें पसंद करती है।" मैं चौंक गया। "क्या?" उन्होंने मुस्कुराया, "हां, वो तुमसे बात करती है, तुम्हारी तारीफ करती है। लेकिन मैं... मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती।"
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उस रात प्रिया से बात हुई। वो अपने कमरे में थी, मैं अंदर गया। "प्रिया, चाची ने कुछ कहा है?" वो शर्मा गई, "हां, राहुल भैया, मुझे तुम अच्छे लगते हो। लेकिन मम्मी..." मैंने उसे चुप कराया, "सब ठीक होगा।" चाची बाहर से देख रही थीं। धीरे-धीरे मैंने प्रिया को करीब किया, चाची की मदद से। चाची ने उसे समझाया, "बेटी, जीवन में कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो दिल से आती हैं।"
एक शाम हम तीनों साथ थे। चाची ने प्रिया का हाथ मेरे हाथ में रखा। "अब तुम दोनों का समय है," उन्होंने कहा। प्रिया की आंखें चमक रही थीं। मैंने उसे kiss किया, और चाची देखती रहीं। वो रात प्रिया मेरे साथ थी। उसकी बॉडी नरम थी, युवा। मैंने उसे धीरे-धीरे छुआ, उसके होंठ चूमे। वो सिहर रही थी, "राहुल, ये पहली बार है।" मैंने उसे संभाला, और हम एक हो गए। चाची बाहर इंतजार कर रही थीं।
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अगले दिन चाची ने कहा, "राहुल, अब प्रिया तुम्हारी है, लेकिन मुझे मत भूलना।" मैंने उन्हें गले लगाया। शाम को फिर हम साथ थे। चाची और प्रिया दोनों। मैं चाची के साथ शुरू किया, फिर प्रिया को शामिल किया। उनकी बॉडी एक-दूसरे से टकरा रही थीं, और कमरा हमारी सांसों से भर गया। प्रिया की आहें, चाची की फुसफुसाहट – सब मिक्स हो गया।
समय बीतता गया। हमारा रिश्ता गहरा होता गया। एक रात चाची ने कहा, "राहुल, प्रिया को खुश रखना।" मैंने प्रिया को बाहों में लिया, उसकी कमर पर हाथ फेरा। वो मुड़ी, और हम फिर से एक हो गए। चाची देख रही थीं, उनकी आंखों में संतोष था।
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उस पल मैंने महसूस किया कि ये सब कितना जटिल है, लेकिन कितना सच्चा। प्रिया की सांसें तेज थीं, और मैं उसके अंदर गहराई तक जा रहा था।