खेत की छाया
सुबह की पहली किरण जैसे ही मेरे कमरे की खिड़की से झाँकती, मैं उठकर तैयार हो जाती। गाँव का हमारा घर छोटा सा था, लेकिन चारों तरफ फैले खेतों से घिरा हुआ। रोज की तरह आज भी मैंने चाय बनाई, माँ को दी, और फिर खेत की ओर निकल पड़ी। दिनचर्या ऐसी थी कि सूरज ढलने तक काम चलता रहता, लेकिन उस शांति में एक अलग सुकून था।
मैं रिया हूँ, बीस साल की, और हमारे गाँव में सब मुझे जानते हैं। पापा खेती करते हैं, और मैं उनकी मदद में लगी रहती हूँ। आज खेत में पानी देना था, तो मैं बाल्टी लेकर पहुँच गई। दूर से विजय भैया दिखे, जो हमारे पड़ोसी हैं और हमेशा मदद करते हैं। वे थोड़े बड़े हैं मुझसे, शायद पच्चीस के आसपास, और गाँव में सब उन्हें भैया कहते हैं।
विजय भैया ने मुस्कुराकर अभिवादन किया और कहा, "रिया, आज अकेले आई हो? पापा कहाँ हैं?" मैंने बताया कि पापा बाजार गए हैं, और वे हँसकर बोले कि ठीक है, मैं मदद कर दूँगा। हम साथ में काम करने लगे, फसलें सींचते हुए। हवा में मिट्टी की महक थी, और आसपास चिड़ियों की आवाजें गूँज रही थीं।
काम करते-करते दोपहर हो गई, और हमने थोड़ा आराम किया। विजय भैया ने अपने दोस्त अजय को बुलाया, जो शहर से आया था और गाँव में कुछ दिन रुक रहा था। अजय भी हमारे उम्र का ही था, मजाकिया स्वभाव का। वे दोनों खेत के किनारे बैठे बातें करने लगे, और मैं भी उनके पास जाकर बैठ गई।
बातों का सिलसिला शुरू हुआ। विजय भैया ने पूछा कि मैं स्कूल के दिनों को कितना मिस करती हूँ। मैंने हँसकर कहा कि बहुत, लेकिन अब तो खेत ही मेरा स्कूल है। अजय ने मजाक किया कि शहर में लड़कियाँ कितनी आजाद होती हैं, और मैंने जवाब दिया कि गाँव की आजादी भी कम नहीं। हमारी बातें सामान्य थीं, लेकिन कहीं न कहीं एक अनकही उत्सुकता थी।
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शाम होने लगी थी, और सूरज ढल रहा था। विजय भैया ने कहा कि आज रात खेत में रखवाली करनी पड़ेगी, क्योंकि जानवरों का डर है। मैंने सोचा कि घर जाऊँ, लेकिन वे बोले कि अगर मैं रुकूँ तो अच्छा रहेगा, कंपनी मिलेगी। मैं सहमत हो गई, क्योंकि अकेले उन्हें छोड़ना ठीक नहीं लगा। अजय भी रुक गया।
रात गहराने लगी, और हमने खेत के बीच में एक छोटी सी झोपड़ी बनाई हुई थी, वहीं बैठे। चाँदनी रात थी, और तारे चमक रहे थे। विजय भैया ने कुछ कहानियाँ सुनानी शुरू कीं, बचपन की। मैं सुनती रही, लेकिन मेरे मन में एक अजीब सी बैचेनी थी। अजय ने कहा, "रिया, तुम इतनी शांत क्यों हो? कुछ बताओ अपनी।"
मैंने अपनी जिंदगी के बारे में बताया, कैसे मैं हमेशा गाँव में ही रही हूँ, सपने बड़े हैं लेकिन रास्ते सीमित। विजय भैया की नजरें मुझ पर टिकी हुई थीं, जैसे वे कुछ कहना चाहते हों लेकिन चुप रहते। उस चुप्पी में एक तनाव था, जो धीरे-धीरे बढ़ रहा था।
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रात और गहरी हुई, और हम तीनों झोपड़ी में लेटे हुए थे। हवा ठंडी थी, और मैंने अपनी शाल ओढ़ ली। विजय भैया ने कहा, "रिया, अगर ठंड लग रही हो तो पास आ जाओ।" उनकी आवाज में एक नरमी थी, जो पहले नहीं थी। मैं थोड़ा हिचकिचाई, लेकिन पास सरक गई। अजय भी करीब आ गया।
उस पल में कुछ बदल सा गया। विजय भैया की साँसें मेरे कानों में महसूस हो रही थीं, और मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई। मैंने सोचा कि ये गलत है, लेकिन शरीर की एक अलग चाहत थी। अजय ने धीरे से मेरा हाथ छुआ, और मैंने विरोध नहीं किया।
विजय भैया ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, और कहा, "रिया, तुम्हें पता है, मैं तुम्हें कितना पसंद करता हूँ।" उनकी बात सुनकर मैं स्तब्ध रह गई, लेकिन कहीं न कहीं मैं भी ये महसूस कर रही थी। अजय ने मुस्कुराकर कहा कि वे दोनों मुझे खुश देखना चाहते हैं। उस रात की चाँदनी में, हमारी बातें गहरी होने लगीं।
धीरे-धीरे, विजय भैया ने मुझे अपनी बाहों में लिया। उनकी छुअन गर्म थी, और मैंने खुद को रोकने की कोशिश की लेकिन नहीं कर पाई। अजय ने मेरे बालों में उँगलियाँ फिराईं, और मैंने आँखें बंद कर लीं। मन में संघर्ष था, लेकिन शरीर की आग बढ़ रही थी।
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खेत की ठंडी हवा में, हम तीनों एक-दूसरे के करीब आ गए। विजय भैया ने मेरे होंठों पर अपने होंठ रखे, और वो चुंबन इतना गहरा था कि मैं सब भूल गई। अजय ने मेरी गर्दन पर吻 किया, और मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। हमारी साँसें मिल रही थीं, और वो पल अनंत लग रहा था।
मैंने अपनी शाल उतारी, और विजय भैया ने मेरी कमीज के बटन खोले। उनकी उँगलियाँ मेरी त्वचा पर फिसल रही थीं, और हर स्पर्श में एक नई उत्तेजना थी। अजय ने मुझे पीछे से गले लगाया, उसके हाथ मेरी कमर पर थे। मैं उनके बीच में थी, और वो अनुभव अवर्णनीय था।
विजय भैया ने मुझे जमीन पर लिटाया, और खेत की मिट्टी की महक मेरे नथुनों में भर गई। उन्होंने मेरे शरीर को सहलाया, हर हिस्से को छुआ जैसे वो अपना हो। मैं कराह उठी, लेकिन वो कराह खुशी की थी। अजय ने मेरे स्तनों को दबाया, और मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
उस रात, हमने सीमाएँ लाँघीं। विजय भैया ने धीरे से मेरे अंदर प्रवेश किया, और वो दर्द मिश्रित सुख इतना गहरा था कि मैं चीख पड़ी। अजय ने मुझे चूमा, और हमारा त्रिकोण पूरा हो गया। हर गति में एक नई भावना थी, कभी कोमलता, कभी उन्माद।
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समय रुक सा गया था। विजय भैया की गति तेज हुई, और मैंने खुद को उनके साथ बहने दिया। अजय ने मेरे शरीर के दूसरे हिस्सों को उत्तेजित किया, और वो संयोजन मुझे पागल कर रहा था। मन में अपराधबोध था, लेकिन वो पल की मादकता सब कुछ भुला रही थी।
कुछ देर बाद, हमने पोजीशन बदली। अब अजय मेरे साथ था, और विजय भैया ने मुझे सहलाया। अजय की ताकत अलग थी, अधिक उग्र, और मैंने उसमें डूबकर खुद को पाया। विजय भैया की नजरें हमें देख रही थीं, और उसमें एक ईर्ष्या मिश्रित उत्साह था।
रात भर हमने विभिन्न तरीकों से एक-दूसरे को खोजा। कभी मैं ऊपर थी, कभी वे। हर बार नया अनुभव, नई गहराई। खेत की चुप्पी में हमारी सिसकियाँ गूँज रही थीं, और चाँद हमें देख रहा था।
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सुबह होने से पहले, हम थककर लेटे। विजय भैया ने मुझे गले लगाया, और अजय ने मेरे बाल सहलाए। उस पल में एक शांति थी, लेकिन अंदर से एक तूफान भी। मैं सोच रही थी कि ये क्या हो गया, लेकिन पछतावा नहीं था।
फिर से हमारी चाहत जागी, और इस बार अधिक कोमलता से। विजय भैया ने मुझे धीरे-धीरे प्यार किया, जैसे कोई कीमती चीज हो। अजय ने हमें जॉइन किया, और वो अंतिम दौर इतना भावुक था कि आँसू आ गए।
खेत की सुबह की ओस हमें जगाती रही, और हम एक-दूसरे की बाहों में लिपटे हुए थे। वो अनुभव मेरी जिंदगी का हिस्सा बन चुका था, और मैं जानती थी कि ये सिर्फ शुरुआत है।