खेतों की छाया में
सुबह की पहली किरणें अभी-अभी गांव पर पड़नी शुरू हुई थीं। मैं बिस्तर से उठा, खिड़की से बाहर झांका जहां दूर तक फैले हरे-भरे खेत नजर आ रहे थे। रोज की तरह, चाय की तलब हुई तो रसोई की ओर चला गया, जहां मामा पहले से ही अखबार पढ़ रहे थे।
मैं राहुल हूं, शहर में पढ़ाई करता हूं, लेकिन छुट्टियों में यहां अपने मामा के घर आता हूं। इस बार गर्मियों की लंबी छुट्टी थी, और गांव की शांति मुझे हमेशा सुकून देती है। मामा खेतीबाड़ी करते हैं, और मैं कभी-कभी उनकी मदद करता हूं, बस ऐसे ही समय कट जाता है।
रसोई में मामी चाय बना रही थीं। सरिता मामी, मामा की पत्नी, हमेशा मुस्कुराती रहती हैं। उन्होंने मुझे देखकर कहा, "राहुल, उठ गए? चाय तैयार है।" मैंने हां में सिर हिलाया और कुर्सी पर बैठ गया।
मामा ने अखबार से नजरें उठाकर पूछा, "आज खेत पर चलोगे? फसल की सिंचाई करनी है।" मैंने सोचा, क्यों नहीं, कुछ काम तो करना चाहिए। मामी ने चाय का कप मेरे सामने रखा और बोलीं, "हां, जाओ, लेकिन धूप तेज है, सावधान रहना।"
नाश्ता करने के बाद हम खेत की ओर निकले। मामा आगे-आगे चल रहे थे, मैं उनके पीछे। रास्ते में गांव के लोग मिलते, सब अभिवादन करते। खेत पहुंचकर मामा ने काम बांट दिया, "राहुल, तुम उस तरफ की नाली साफ करो।"
मैं काम में जुट गया। धूप अब तेज हो रही थी, लेकिन हवा में ठंडक थी। थोड़ी देर बाद मामी पानी और कुछ खाने का सामान लेकर आईं। उन्होंने मामा से कहा, "आप काम करो, मैं राहुल को मदद कर दूं।"
मामा ने सहमति जताई और अपने काम में लग गए। मामी मेरे पास आईं और बोलीं, "राहुल, यहां की मिट्टी सख्त है, सावधानी से।" हम साथ में नाली साफ करने लगे, बातें करते हुए।
बातों-बातों में मामी ने पूछा, "शहर में पढ़ाई कैसी चल रही है? कोई लड़की-वड़की?" मैं हंस पड़ा, "नहीं मामी, अभी तो बस किताबें हैं।" उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "अच्छा है, ध्यान रखना।"
इसे भी पढ़ें: खेतों की छाया में
काम करते-करते दोपहर हो गई। मामा ने कहा, "मैं गांव जाकर कुछ सामान लाता हूं, तुम दोनों जारी रखो।" वे चले गए, और अब खेत में सिर्फ मैं और मामी थे। सन्नाटा था, बस पक्षियों की आवाजें।
मामी ने काम जारी रखा, लेकिन मैंने देखा उनकी साड़ी मिट्टी से सन गई थी। मैंने कहा, "मामी, आप आराम कर लो, मैं कर लूंगा।" उन्होंने मना किया, "नहीं, साथ में जल्दी हो जाएगा।"
हम पास-पास काम कर रहे थे। कभी-कभी हमारी नजरें मिलतीं, और एक अजीब सी चुप्पी छा जाती। मैं सोच रहा था, मामी कितनी मेहनती हैं, हमेशा परिवार के लिए सब कुछ करती हैं।
थोड़ी देर बाद मामी ने कहा, "राहुल, यहां थोड़ा पानी डालो, मिट्टी नरम हो जाएगी।" मैंने वैसा ही किया। पानी बहते हुए उनकी ओर गया, और उनकी साड़ी भीग गई। वे हंस पड़ीं, "अरे, सावधान!"
मैंने माफी मांगी, लेकिन अंदर ही अंदर एक अजीब सा एहसास हो रहा था। मामी ने अपनी साड़ी झाड़ी और काम जारी रखा। हमारी बातें अब थोड़ी व्यक्तिगत हो गईं, जैसे परिवार की पुरानी यादें।
मामी ने बताया, "जब मैं तुम्हारी उम्र की थी, तब भी ऐसे ही खेतों में काम करती थी। जीवन कितना सरल था।" मैंने कहा, "हां मामी, शहर में तो सब भागदौड़ है। यहां सुकून है।"
धीरे-धीरे सूरज ढलने लगा। मामा अभी नहीं लौटे थे। मामी ने कहा, "चलो, थोड़ा आराम कर लें।" हम एक पेड़ की छाया में बैठ गए। हवा चल रही थी, और चारों ओर शांति थी।
इसे भी पढ़ें: खेत की छाया
बैठे-बैठे मामी ने अपनी थकान का जिक्र किया, "पैर दुख रहे हैं।" मैंने कहा, "मैं दबा दूं?" उन्होंने हिचकिचाते हुए हां कहा। मैं उनके पैर दबाने लगा, और एक अजीब सी निकटता महसूस हुई।
उनकी आंखों में कुछ था, शायद थकान, शायद कुछ और। मैंने नजरें झुका लीं। लेकिन अंदर का संघर्ष बढ़ रहा था। मामी मेरी मामी हैं, लेकिन ये एहसास... मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था।
मामी ने धीरे से कहा, "राहुल, तुम अच्छे लड़के हो।" उनकी आवाज में एक कोमलता थी। मैंने जवाब दिया, "आप भी बहुत अच्छी हैं, मामी।" हमारी नजरें फिर मिलीं, और इस बार चुप्पी लंबी खिंच गई।
अचानक मामी ने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। "तुम्हें यहां आना अच्छा लगता है न?" मैंने हां में सिर हिलाया। लेकिन दिल की धड़कन तेज हो गई। क्या ये सही है? मैं सोच रहा था।
खेत की हवा अब ठंडी हो रही थी। मामी उठीं और कहा, "चलो, काम पूरा कर लें।" लेकिन वापस काम पर लौटते हुए हमारा स्पर्श बार-बार हो रहा था। हर स्पर्श में एक करंट सा दौड़ता।
मैंने खुद को संभाला, लेकिन मन नहीं मान रहा था। मामी की मुस्कान, उनकी बातें, सब कुछ आकर्षित कर रहा था। शायद वे भी महसूस कर रही थीं, क्योंकि उनकी नजरें अब शर्मीली हो गई थीं।
फिर एक पल आया जब पानी की नाली टूट गई, और हम दोनों भीग गए। मामी हंस पड़ीं, और मैं भी। लेकिन हंसी रुकते ही हम एक-दूसरे के करीब थे। बहुत करीब।
इसे भी पढ़ें: खेतों की छिपी आग
मैंने धीरे से उनका हाथ पकड़ा। मामी ने कुछ नहीं कहा, बस नजरें झुका लीं। दिल की धड़कन अब कान में गूंज रही थी। क्या ये गलत है? लेकिन एहसास इतना मजबूत था।
खेत में अब शाम का अंधेरा छाने लगा था। मामा का इंतजार था, लेकिन समय रुक सा गया। मामी ने धीरे से कहा, "राहुल..." उनकी आवाज कांप रही थी। मैंने उन्हें अपनी ओर खींचा।
हमारे होंठ मिले। पहला चुंबन इतना कोमल था, जैसे वर्षों की प्यास बुझ रही हो। मामी की सांसें तेज थीं, मेरी भी। हम एक-दूसरे में खो गए, खेत की मिट्टी पर।
मामी के शरीर की गर्मी मुझे महसूस हो रही थी। मैंने उनकी साड़ी सरकाई, और他们的 कपड़े उतरते गए। हर स्पर्श में एक नई संवेदना थी, जैसे आग लगी हो।
वे मेरे ऊपर आईं, उनकी आंखों में इच्छा थी, लेकिन साथ में डर भी। मैंने उन्हें गले लगाया, और हमारा मिलन शुरू हुआ। खेत की घास नरम थी, लेकिन हमारी भावनाएं उफान पर।
हर गति में एक नई लय थी। मामी की सिसकियां, मेरी सांसें, सब मिश्रित हो गए। यह सिर्फ शारीरिक नहीं था, भावनाओं का तूफान था। मैं महसूस कर रहा था उनकी हर थरथराहट।
समय बीतता गया, लेकिन हम रुके नहीं। कभी मैं ऊपर, कभी वे। हर पल में नई गहराई, नई मिठास। मामी ने मेरे कान में फुसफुसाया, "राहुल, ये... इतना अच्छा..."
इसे भी पढ़ें: खेतों की वो अनकही कहानी
क्लाइमेक्स आया, जैसे बांध टूट गया। हम दोनों थककर लेट गए, एक-दूसरे को देखते हुए। मामी की आंखों में आंसू थे, शायद खुशी के, शायद पछतावे के।
लेकिन वो पल हमारा था। खेत की छाया में, जहां कोई नहीं देख रहा था। हमने कपड़े पहने, और चुपचाप काम पूरा किया। मामा लौट आए, लेकिन हमारा रहस्य सुरक्षित था।
अगले दिन फिर वही दिनचर्या। लेकिन अब हर नजर में एक अर्थ था। मामी मुस्कुरातीं, और मैं समझ जाता। शाम को फिर खेत गए, मामा व्यस्त थे।
इस बार हम ज्यादा साहसी थे। मामी ने मुझे पेड़ के पीछे खींचा। "राहुल, कल की याद..." मैंने उन्हें चुप कराया एक चुंबन से। हमारा मिलन अब और गहरा था।
मैंने उनके शरीर के हर हिस्से को छुआ, जैसे पहली बार। उनकी त्वचा की नरमी, गंध, सब कुछ नशा सा था। हम खड़े-खड़े एक हुए, पेड़ का सहारा लेकर।
हर धक्के में नई ऊर्जा। मामी की कराहें दबाई हुई थीं, लेकिन उतनी ही तीव्र। मैं महसूस कर रहा था उनकी गर्मी, उनका समर्पण।
फिर हम जमीन पर लेटे, और विविधताएं आजमाईं। कभी धीमे, कभी तेज। हर बार एक नई भावना, जैसे प्यार और वासना का मिश्रण।
क्लाइमेक्स के बाद हम लंबे समय तक गले लगे रहे। मामी ने कहा, "ये गलत है, लेकिन रोक नहीं पा रही।" मैंने जवाब दिया, "मैं भी नहीं, मामी।"
इसे भी पढ़ें: माँ की छाया में
दिन बीतते गए, हमारा रिश्ता गहराता गया। हर खेत का कोना हमारा गुप्त स्थान बन गया। लेकिन अंदर का संघर्ष भी बढ़ता गया। क्या ये जारी रखें?
एक शाम, बारिश शुरू हो गई। हम खेत में फंस गए। मामी भीगी हुई थीं, उनकी साड़ी शरीर से चिपकी। मैंने उन्हें गले लगाया, और बारिश में हमारा मिलन हुआ।
पानी की बूंदें हमारी त्वचा पर गिरतीं, सेंसेशन को बढ़ातीं। मामी की ठंडी त्वचा मेरी गर्मी से मिली, और हम एक ритम में बह गए।
इस बार ज्यादा जुनूनी, ज्यादा भावुक। मैंने उनके कान में कहा, "मामी, तुम मेरी हो।" उन्होंने जवाब दिया, "हां, राहुल।"
बारिश रुकी, लेकिन हम नहीं। हर पल में नई खोज, नई खुशी। क्लाइमेक्स के बाद हम हंसते हुए लौटे, लेकिन दिल भारी था।
छुट्टियां खत्म होने वाली थीं। आखिरी शाम, हम फिर खेत में। मामी उदास थीं। "राहुल, शहर जाओगे तो याद रखना।" मैंने उन्हें गले लगाया।
हमारा आखिरी मिलन सबसे गहरा था। हर स्पर्श में विदाई की पीड़ा, लेकिन साथ में सुख भी। हम धीरे-धीरे एक हुए, हर पल को जीते हुए।
मामी की आंखें बंद थीं, उनकी सांसें मेरी सांसों से मिलीं। मैं महसूस कर रहा था उनकी हर भावना, हर थरक।
समाप्ति के बाद हम लेटे रहे, सितारों को देखते हुए। मामी ने मेरे सीने पर सिर रखा