खेतों की वो अनकही कहानी
गांव की वो सुबह हमेशा की तरह शांत और साधारण थी। मैं राहुल, शहर से छुट्टियां मनाने आया था, और रोज की तरह सुबह उठकर घर के आंगन में चाय की प्याली थामे खड़ा था। सूरज अभी-अभी उगा था, और खेतों से आने वाली ठंडी हवा चेहरे को छू रही थी।
मामा का घर पुराना था, लेकिन आरामदायक। मैं यहां हर गर्मियों में आता था, बचपन से। इस बार कॉलेज की छुट्टियां थीं, और मैंने सोचा थोड़ा समय प्रकृति के बीच बिताऊं। मामी सीमा घर संभालती थीं, और मामा खेतों में व्यस्त रहते थे।
नाश्ता करने के बाद मैं बाहर निकला। गांव की गलियां संकरी थीं, और लोग अपनी दिनचर्या में लगे हुए थे। मैंने सोचा आज खेतों की ओर घूम आऊं, जहां मामा फसल की देखभाल कर रहे थे। सीमा मामी भी कभी-कभी वहां जाती थीं, पानी या खाना पहुंचाने।
रास्ते में पड़ोसियों से बात हुई। सब पूछते थे शहर की जिंदगी कैसी है, नौकरी मिली या नहीं। मैं हंसकर जवाब देता, लेकिन मन में गांव की सादगी की यादें ताजा हो जातीं। यहां का जीवन शहर की भागदौड़ से इतना अलग था।
खेतों तक पहुंचते-पहुंचते दोपहर हो चली थी। सूरज ऊपर चढ़ आया था, लेकिन पेड़ों की छाया में राहत मिल रही थी। मामा एक कोने में काम कर रहे थे, और मैं उनके पास जाकर बैठ गया। हमने फसल के बारे में बात की, इस साल की बारिश कितनी अच्छी हुई।
तभी सीमा मामी आईं। उनके हाथ में पानी की बोतल और कुछ फल थे। उन्होंने मामा को बुलाया और कहा, "खाना खा लो, देर हो रही है।" उनकी आवाज हमेशा की तरह नरम थी, लेकिन आज कुछ अलग सा लगा। मैंने उन्हें देखा, वो साड़ी में सजी हुई थीं, बाल खुले।
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मामा ने कहा, "राहुल, तुम मामी के साथ थोड़ा घूम लो, मैं ये काम खत्म कर लूं।" मैं सहमत हो गया। हम साथ चलने लगे, खेतों के बीच से। सीमा मामी ने पूछा, "शहर में सब ठीक है न? तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही?" मैंने बताया, लेकिन बातों में कुछ गहराई आ रही थी।
हम एक पुराने आम के पेड़ के नीचे रुके। वो बैठ गईं, और मैं भी। हवा चल रही थी, और चारों ओर हरियाली। मामी ने कहा, "यहां की हवा में सुकून है, शहर में कहां मिलता है ऐसा।" उनकी आंखों में कुछ उदासी थी, शायद मामा की व्यस्तता की वजह से।
मैंने पूछा, "मामी, आप ठीक तो हैं न?" उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "हां, बस कभी-कभी अकेलापन लगता है। मामा तो खेतों में ही रहते हैं।" उनकी बात में एक भावना थी, जो मुझे छू गई। हम चुपचाप बैठे रहे, सिर्फ हवा की सरसराहट सुनाई दे रही थी।
धीरे-धीरे बातें बढ़ीं। उन्होंने अपने बचपन की कहानियां सुनाईं, कैसे वो गांव में बड़ी हुईं। मैंने भी अपनी शहर की जिंदगी के किस्से साझा किए। हम हंसते, और कभी गंभीर हो जाते। वो पल इतने नैचुरल लग रहे थे, जैसे पुरानी दोस्ती हो।
फिर एक दिन, दोपहर को फिर खेतों में गए। इस बार मामा घर पर थे, और मामी ने कहा, "चलो राहुल, आज फसल देखने चलें।" हम साथ चले। रास्ते में उनकी साड़ी का पल्लू हवा में उड़ रहा था, और मैंने उसे संभाला। वो शरमा गईं, लेकिन कुछ नहीं कहा।
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खेत के बीच में एक छोटी सी झोपड़ी थी, जहां सामान रखा रहता था। हम वहां रुके। मामी ने कहा, "यहां बैठो, थोड़ा आराम कर लो।" मैं बैठ गया, और वो मेरे बगल में। हमारी नजरें मिलीं, और एक चुप्पी छा गई।
मैंने महसूस किया कि मेरे मन में कुछ उथल-पुथल है। मामी की मौजूदगी अब अलग लग रही थी। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा, "तुम अच्छे लड़के हो, राहुल।" वो स्पर्श गर्म था, और मैं सिहर गया। लेकिन मैंने खुद को संभाला।
उस दिन हम ज्यादा देर नहीं रुके, लेकिन वापसी में बातें कम हुईं। घर पहुंचकर मैं सोचता रहा। क्या ये सिर्फ स्नेह है, या कुछ और? मामी भी शायद वैसा ही महसूस कर रही थीं, क्योंकि अगले दिन उन्होंने मुझे फिर बुलाया।
अब रोज का सिलसिला बन गया। हम खेतों में जाते, बातें करते। एक बार बारिश हो गई, और हम झोपड़ी में छिपे। भीगते हुए, मामी की साड़ी गीली हो गई। मैंने अपना शर्ट उतारकर उन्हें दिया। वो हिचकिचाईं, लेकिन ले लिया।
उस पल में हमारी नजरें टकराईं। मामी ने धीरे से कहा, "राहुल, ये सब ठीक नहीं है।" लेकिन उनकी आंखों में विरोध नहीं था। मैंने उनका हाथ पकड़ा, और हम करीब आ गए। दिल की धड़कन तेज हो रही थी।
फिर वो दिन आया जब सब कुछ बदल गया। दोपहर की धूप में हम खेतों के बीच थे। चारों ओर सुनसान, सिर्फ चिड़ियों की आवाज। मामी ने कहा, "राहुल, मुझे डर लगता है, लेकिन तुम्हारे साथ अच्छा लगता है।"
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मैंने उन्हें गले लगा लिया। उनका शरीर गर्म था, और मैंने महसूस किया वो भी वैसा ही चाहती हैं। हमारी सांसें मिलीं, और होंठ करीब आए। वो चुंबन इतना गहरा था, जैसे सालों की प्यास बुझ रही हो।
मामी ने मेरी कमर पर हाथ फेरा, और मैंने उनकी साड़ी का पल्लू सरकाया। उनकी त्वचा नरम थी, और मैं धीरे-धीरे उसे छूता गया। हम जमीन पर लेट गए, घास की मुलायम चादर पर।
उनकी आंखों में एक मिश्रित भाव था, प्यार और डर का। मैंने कहा, "मामी, अगर नहीं चाहतीं तो रुक जाते हैं।" लेकिन उन्होंने मुझे खींच लिया। हमारा मिलन शुरू हुआ, धीमा और भावुक।
मैंने उनके गले पर चुंबन किया, और वो सिसकीं। उनके स्तनों को छुआ, नरमी से। हर स्पर्श में एक नई संवेदना थी, जैसे पहली बार हो। मामी ने मेरे बालों में उंगलियां फिराईं, और धीरे से कराह उठीं।
हमारा शरीर एक हो गया। मैं उनके अंदर प्रवेश किया, और वो चीखीं। लेकिन वो दर्द नहीं, सुख का था। हमारी गति बढ़ी, और चारों ओर की दुनिया गायब हो गई। सिर्फ हम थे, और वो पल।
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बाद में हम लेटे रहे, सांसें संभालते। मामी ने कहा, "ये गलत है, लेकिन कितना सही लगता है।" मैंने उन्हें चुप कराया, और फिर से गले लगाया। वो दोपहर अविस्मरणीय थी।
अगले दिनों में हम और साहसी हुए। एक बार रात को खेतों में मिले, चांदनी में। मामी की आंखें चमक रही थीं। हमने फिर वही किया, लेकिन इस बार और गहराई से। हर बार नया अनुभव, नई भावना।
मामी ने मुझे अपनी जिंदगी के राज बताए, कैसे शादी के बाद सपने दब गए। मैंने उन्हें सुना, और अपना प्यार दिया। हमारा रिश्ता अब सिर्फ शारीरिक नहीं था, भावनात्मक भी।
एक दिन फिर खेत में, बारिश के बाद। जमीन गीली थी, और हम वहां लेटे। मामी ने मेरे ऊपर आकर नियंत्रण लिया। उनकी हरकतें तेज थीं, और मैं हैरान। वो अनुभव अलग था, शक्ति और समर्पण का मिश्रण।
हम चरम पर पहुंचे, साथ में। मामी की आंखों में आंसू थे, खुशी के। मैंने उन्हें पोंछा, और कहा, "मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं।" वो मुस्कुराईं, और हम चुपचाप लेटे रहे।
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समय बीतता गया, लेकिन वो पल हमेशा याद रहते। गांव की वो दोपहरें, खेतों की हरियाली, और हमारा मिलन। सब कुछ इतना नैचुरल लगता था।
फिर एक शाम, हम फिर खेतों में थे। सूरज डूब रहा था, और हवा ठंडी। मामी ने मेरे सीने पर सिर रखा, और हम बातें करते रहे।
उस रात हम और करीब आए, भावनाओं की गहराई में। हर स्पर्श, हर चुंबन में एक कहानी थी। हमने खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया।
सुबह होने से पहले हम अलग हुए, लेकिन दिल जुड़े रहे। वो अनुभव जीवन बदल देने वाला था।
अब भी जब सोचता हूं, वो खेत, वो मामी, सब जीवंत लगता है। हमारा रिश्ता गुप्त था, लेकिन सच्चा।
एक आखिरी बार, हम खेत की झोपड़ी में थे। मामी ने कहा, "राहुल, तुम शहर जाओगे, लेकिन याद रखना।" मैंने वादा किया, और हम फिर एक हुए।
उस मिलन में सब कुछ था, प्यार, जुनून, और अलविदा की उदासी। हमारी सांसें मिलीं, शरीर एक हुए, और समय रुक सा गया।