नए फ्लैट की अनकही कहानी
सुबह की हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही थी, और मैं अपने नए फ्लैट में बॉक्स खोलकर सामान निकाल रहा था। शहर की इस व्यस्त कॉलोनी में शिफ्ट हुए अभी दो दिन ही हुए थे, और रोज़ की तरह मैंने सबसे पहले चाय बनाई, फिर बालकनी में खड़े होकर बाहर की हलचल देखी। काम का बोझ था, लेकिन आज छुट्टी का दिन था, तो सोचा धीरे-धीरे सब सेट कर लूं।
मेरा नाम अजय है, और मैं 28 साल का हूं, एक सॉफ्टवेयर कंपनी में जॉब करता हूं। कॉलेज के दिनों से राहुल मेरा सबसे अच्छा दोस्त है, हम साथ पढ़े, साथ घूमे, और अब भी वक्त मिले तो मिलते हैं। राहुल की फैमिली मेरी फैमिली जैसी ही है, उसके पापा रिटायर्ड हैं, और मम्मी रीता आंटी घर संभालती हैं। जब मैंने ये फ्लैट लिया, तो राहुल ने कहा था कि वो मदद करेगा, लेकिन वो काम से बाहर गया हुआ था, तो आंटी ने खुद फोन करके कहा कि वो आकर देख लेंगी अगर कुछ चाहिए तो।
दोपहर होते-होते दरवाजे पर नॉक हुई, और मैंने खोला तो रीता आंटी खड़ी थीं, हाथ में एक थैला लिए। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "अजय बेटा, कैसा है तू? राहुल ने बताया था कि तू अकेला ही सब कर रहा है, सोचा कुछ खाने-पीने का सामान लेकर आ जाऊं।" मैंने उन्हें अंदर बुलाया, और हम लिविंग रूम में बैठे जहां अभी तक सोफा नहीं लगा था, तो फर्श पर ही बैठ गए। आंटी करीब 45 साल की होंगी, लेकिन हमेशा इतनी एनर्जेटिक रहती हैं कि लगता नहीं।
हमने चाय पीते हुए बातें कीं, आंटी ने पूछा कि नौकरी कैसी चल रही है, और मैंने बताया कि ठीक है, बस ये शिफ्टिंग का झंझट है। उन्होंने हंसकर कहा, "अरे, मैं मदद कर दूं? राहुल तो आ नहीं पाया, लेकिन मैं हूं ना।" मैंने मना किया, लेकिन वो नहीं मानीं, और साथ में बॉक्स खोलने लगीं। फ्लैट छोटा सा था, दो कमरे का, किचन अलग, और बालकनी अच्छी। आंटी ने किचन का सामान सेट करना शुरू किया, और मैं उनके साथ लगा रहा।
शाम होने लगी थी, और हम थक चुके थे, लेकिन काफी कुछ हो गया था। आंटी ने कहा, "अजय, अब डिनर बना लेते हैं साथ में, तू अकेला क्या खाएगा?" मैंने हामी भरी, और हम किचन में लग गए। वो सब्जियां काट रही थीं, और मैं चावल धो रहा था। बातों-बातों में पुरानी यादें ताजा हो गईं, जैसे कॉलेज के दिनों में राहुल और मैं कैसे मस्ती करते थे, और आंटी कैसे हमें डांटती थीं। हंसी-मजाक में समय कट रहा था, और मुझे अच्छा लग रहा था कि कोई अपना सा साथ है इस नए जगह में।
डिनर के बाद हम बालकनी में बैठे, बाहर की ठंडी हवा आ रही थी। आंटी ने कहा, "अजय, तू बड़ा हो गया है अब, लेकिन अभी भी वही शरारती लड़का लगता है।" मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया, "आंटी, आप भी तो वही हैं, हमेशा सबकी फिक्र करने वाली।" वो चुप हो गईं, और थोड़ी देर हम दोनों खामोश बैठे रहे। अचानक उन्होंने पूछा, "तेरी कोई गर्लफ्रेंड है क्या? राहुल तो बताता नहीं।" मैं हंस पड़ा, "नहीं आंटी, अभी कहां समय मिलता है।"
इसे भी पढ़ें: नए फ्लैट में अनकही चाहत
रात गहराने लगी थी, और आंटी ने कहा कि अब चलती हैं, लेकिन बाहर बारिश शुरू हो गई। मैंने कहा, "आंटी, रुक जाओ, बारिश रुक जाएगी।" वो सहमत हो गईं, और हम अंदर आकर टीवी ऑन किया। लेकिन बिजली चली गई, और कमरे में अंधेरा हो गया। मैंने मोबाइल की लाइट जलाई, और कैंडल ढूंढी। आंटी पास खड़ी थीं, और उस हल्की रोशनी में उनकी आंखें चमक रही थीं। हम दोनों कैंडल जलाकर बैठे, और बातें करने लगे।
बातों में आंटी ने अपनी जिंदगी के बारे में बताया, कैसे शादी के बाद सब कुछ बदला, पति की नौकरी, बच्चे, और अब अकेलापन सा लगता है क्योंकि राहुल बाहर रहता है। मैंने सुना, और कहा, "आंटी, आप बहुत स्ट्रॉन्ग हैं, हम सबके लिए।" वो मुस्कुराईं, लेकिन उनकी आंखों में कुछ उदासी थी। मैंने उनका हाथ पकड़ा, बस सहानुभूति में, और वो नहीं हटीं। उस पल में कुछ बदला सा लगा, जैसे हवा में कोई तनाव आ गया हो।
बारिश तेज हो गई थी, और आंटी ने कहा, "अजय, लगता है रात यहां ही गुजारनी पड़ेगी।" मैंने सहमति में सिर हिलाया, और गेस्ट रूम तैयार किया। लेकिन वो बोलीं, "नहीं, मैं तेरे साथ ही सो जाऊंगी, अकेले डर लगता है अंधेरे में।" मेरा दिल थोड़ा तेज धड़का, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। हम बेड पर लेटे, और बातें करते रहे। आंटी की सांसें पास से महसूस हो रही थीं, और धीरे-धीरे हम करीब आ गए।
रात के सन्नाटे में, मैंने महसूस किया कि आंटी की बॉडी मेरी तरफ मुड़ी हुई है। मैंने पूछा, "आंटी, नींद नहीं आ रही?" वो बोलीं, "नहीं अजय, तेरी बातें अच्छी लग रही हैं।" मैंने अपना हाथ उनके कंधे पर रखा, और वो नहीं हटीं। धीरे से मैंने उन्हें गले लगाया, और वो भी मेरी तरफ झुकीं। उस पल में सब कुछ नैचुरल लग रहा था, जैसे सालों का कोई बंधन खुल रहा हो।
इसे भी पढ़ें: खेतों की वो अनकही कहानी
हमारे होंठ मिले, और वो चुंबन इतना गहरा था कि समय रुक सा गया। आंटी की सांसें तेज हो गईं, और मैंने उनके ब्लाउज के बटन खोले। उनकी त्वचा गर्म थी, और मैंने धीरे-धीरे उनके शरीर को छुआ। वो बोलीं, "अजय, ये गलत है, लेकिन रोक नहीं पा रही हूं।" मैंने कहा, "आंटी, ये हमारा पल है, किसी को पता नहीं चलेगा।" हम एक-दूसरे में खो गए, और वो रात हमारी जिंदगी का सबसे इंटिमेट मोमेंट बन गई।
सुबह हुई, लेकिन हम दोनों अभी भी बेड पर थे, एक-दूसरे से लिपटे। आंटी ने मेरी आंखों में देखा, और कहा, "अजय, कल रात जो हुआ, वो मेरे लिए नया जीवन सा था।" मैंने उन्हें चूमा, और हम फिर से करीब आए। इस बार सब कुछ ज्यादा पैशनेट था, मैंने उनके शरीर के हर हिस्से को महसूस किया, और वो मेरी हर हरकत पर सिहर उठती थीं।
दिन चढ़ने लगा, लेकिन हम नहीं रुके। आंटी ने कहा, "अजय, मुझे ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ।" मैंने उन्हें पलटा, और धीरे से उनकी गांड पर हाथ फेरा। वो शर्मा गईं, लेकिन मैंने जारी रखा। वो बोलीं, "अजय, सावधानी से।" मैंने लुब्रिकेंट लिया, और धीरे-धीरे अंदर प्रवेश किया। दर्द और प्लेजर का मिश्रण था, लेकिन आंटी की आंखों में संतुष्टि थी।
हमारे बीच का ये रिश्ता अब बदल चुका था, हर पल में नई गहराई आ रही थी। मैंने महसूस किया कि ये सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी था। आंटी की सिसकियां कमरे में गूंज रही थीं, और मैं उनके साथ बहता चला गया। वो बोलीं, "अजय, और तेज।" मैंने रफ्तार बढ़ाई, और हम दोनों चरम पर पहुंच गए।
थककर हम लेटे रहे, आंटी मेरे सीने पर सिर रखकर। उन्होंने कहा, "ये फ्लैट अब मेरा भी घर लगता है।" मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया, "आंटी, आप हमेशा यहां आ सकती हैं।" हम फिर से चुंबन में खो गए, और दिन की शुरुआत ऐसी हुई कि लगता था ये कभी खत्म नहीं होगा।
इसे भी पढ़ें: लॉकडाउन की अनकही कहानी
शाम को आंटी घर जाने लगीं, लेकिन जाने से पहले हमने फिर से वक्त बिताया। किचन में खड़े होकर, मैंने उन्हें पीछे से गले लगाया, और धीरे से उनके कपड़े उतारे। वो बोलीं, "अजय, राहुल को पता चला तो?" मैंने कहा, "नहीं चलेगा, ये हमारा राज है।" हम फर्श पर ही एक हो गए, और इस बार गांड चुदाई ज्यादा इंटेंस थी, जैसे हम दोनों इसे जी रहे हों।
आंटी की बॉडी मेरे हर टच पर रिएक्ट कर रही थी, और मैंने महसूस किया कि ये आकर्षण कब से था, शायद सालों से। वो सिसक रही थीं, "अजय, मुझे ऐसा प्लेजर कभी नहीं मिला।" मैंने जारी रखा, हर थ्रस्ट में नई ऊर्जा डालकर। हमारा क्लाइमेक्स एक साथ आया, और हम हांफते हुए लेट गए।
रात फिर आई, और आंटी रुक गईं। हम बेड पर थे, बातें कर रहे थे। उन्होंने अपनी जिंदगी की तकलीफें बताईं, कैसे शादी में सब कुछ रूटीन हो गया था। मैंने सुना, और कहा, "आंटी, अब मैं हूं ना।" हम फिर से करीब आए, इस बार सब कुछ स्लो और इमोशनल था। मैंने उनकी गांड पर फोकस किया, धीरे-धीरे, हर मूवमेंट को एंजॉय करते हुए।
आंटी की आंखें बंद थीं, और वो मुस्कुरा रही थीं। "अजय, ये दर्द मीठा है," उन्होंने कहा। मैंने रिदम बनाया, और हम दोनों खो गए उस पल में। सेंसेशन इतना स्ट्रॉन्ग था कि लगता था दुनिया रुक गई है। हम चरम पर पहुंचे, और थककर एक-दूसरे से लिपटे रहे।
इसे भी पढ़ें: किरायेदारनी की अनकही चाहत
सुबह आंटी चली गईं, लेकिन वादा किया कि जल्दी आएंगी। फ्लैट अब खाली नहीं लगता था, उनकी यादें हर कोने में थीं। मैं काम पर गया, लेकिन दिमाग में वही पल घूमते रहे। शाम को फोन आया, आंटी का, "अजय, आज आ जाऊं?" मैंने हां कहा, और वो आईं।
इस बार हम सीधे बेडरूम में गए, और सब कुछ पहले से ज्यादा पैशनेट था। मैंने उन्हें पलटाया, और गांड चुदाई शुरू की। वो बोलीं, "अजय, और गहरा।" मैंने वैसा ही किया, हर मूवमेंट में वैरायटी डालकर। दर्द, प्लेजर, इमोशन्स सब मिक्स हो गए थे। हमारा बॉन्ड अब अटूट लग रहा था।
हम हांफते हुए लेटे, आंटी ने कहा, "अजय, ये जिंदगी का सबसे अच्छा हिस्सा है।" मैंने उन्हें चूमा, और हम फिर से शुरू हो गए। इस बार पोजीशन चेंज की, साइड से, और सेंसेशन नया था। वो सिहर उठीं, और मैं उनके साथ बहता रहा।
रात गहराती गई, और हम एक-दूसरे में खोए रहे। आंटी की बॉडी मेरी थी, और मैं उनकी। हर टच, हर किस में नई भावना थी। हम चरम पर पहुंचे, और थककर सो गए, लेकिन सुबह फिर वही जुनून जागा।
आंटी ने कहा, "अजय, अब ये रूटीन बन जाए।" मैंने हामी भरी, और हम फिर से करीब आए। गांड चुदाई इस बार सबसे लंबी थी, हर मिनट को जीते हुए। प्लेजर की लहरें आ रही थीं, और हम दोनों संतुष्ट होकर लेटे।
इसे भी पढ़ें: पड़ोस की वो अनकही कहानी
दिन बीतते गए, और हमारा रिश्ता गहराता गया। हर मुलाकात में नया अनुभव, नई भावना। फ्लैट अब हमारा गुप्त天堂 था, जहां कोई कन्फ्लिक्ट नहीं, सिर्फ प्यार और पैशन।
एक शाम आंटी आईं, और हम बालकनी में बैठे। बातों में उन्होंने कहा, "अजय, मुझे डर लगता है कभी-कभी।" मैंने उन्हें गले लगाया, और कहा, "डरो मत, मैं हूं।" हम अंदर गए, और फिर से वो पल शुरू हुआ। इस बार इमोशन्स हाई थे, जैसे डर और प्यार मिलकर कुछ नया बना रहे हों।
मैंने उन्हें पलटाया, और धीरे से अंदर गया। वो बोलीं, "अजय, ये मुझे पूरा करती है।" मैंने रफ्तार बढ़ाई, और हम दोनों के बीच का कनेक्शन मजबूत होता गया। क्लाइमेक्स इतना इंटेंस था कि हम हिल भी नहीं पा रहे थे।
हम लिपटे रहे, सांसें मिली हुईं, और वो पल जैसे अनंत हो गया।