लॉकडाउन की अनकही कहानी
उस समय लॉकडाउन का दौर चल रहा था, जब पूरा शहर जैसे थम सा गया था। मैं अपने छोटे से अपार्टमेंट में अकेला था, सुबह उठकर कॉफी बनाता, फिर लैपटॉप पर काम करता। बाहर की सड़कें खाली पड़ी रहतीं, बस कभी-कभी कोई पड़ोसी बालकनी से झांकता नजर आता।
मेरा नाम राहुल है, उम्र उनतीस साल, और मैं एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूं। दिल्ली में अकेला रहता हूं, परिवार लखनऊ में है। लॉकडाउन ने सब कुछ बदल दिया था, ऑफिस जाना बंद, बस घर से ही सब मैनेज कर रहा था। दिनचर्या साधारण थी – सुबह योग, दोपहर में मीटिंग्स, शाम को किताब पढ़ना या टीवी देखना।
पड़ोस में एक फैमिली रहती थी, जिन्हें मैं ज्यादा जानता नहीं था। बस कभी-कभी लिफ्ट में मिलते तो सिर हिलाकर अभिवादन कर लेते। उनकी बेटी नेहा थी, जो शायद कॉलेज में पढ़ती थी। मैंने उसे कभी ध्यान से नहीं देखा था, बस इतना पता था कि वह शांत और सादगी वाली लड़की लगती थी।
एक दिन सुबह मैं बालकनी में खड़ा चाय पी रहा था, तभी नेहा की बालकनी से आवाज आई। वह अपनी मां से बात कर रही थी, कुछ सब्जियों की लिस्ट बना रही थी। लॉकडाउन में दुकानें कम खुलतीं, तो लोग एक-दूसरे की मदद करते। मैंने सोचा, शायद मैं भी कुछ मदद कर सकता हूं, लेकिन फिर काम में व्यस्त हो गया।
शाम को दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने खोला तो नेहा खड़ी थी, मास्क लगाए, हाथ में एक थैला। उसने कहा, "राहुल भैया, मम्मी ने कहा कि ये सब्जियां आपको भी दे दूं, ज्यादा आ गईं हैं।" मैंने थैंक यू कहा और थैला लिया। वह मुस्कुराई और चली गई।
उस छोटी सी मुलाकात से कुछ बदलाव आया। अगले दिन मैंने अपनी बालकनी से देखा, वह किताब पढ़ रही थी। मैंने आवाज दी, "क्या पढ़ रही हो?" वह चौंकी, फिर बोली, "एक नॉवेल, लॉकडाउन में टाइम पास हो रहा है।" हमारी बातचीत शुरू हुई, दूर से ही, बालकनी से बालकनी।
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नेहा ने बताया कि वह एमए कर रही है, घर पर ही ऑनलाइन क्लासेस। उसके पापा रिटायर्ड हैं, मां हाउसवाइफ। मैंने अपनी जॉब के बारे में बताया, कैसे लॉकडाउन ने सब उलट-पुलट कर दिया। हम हंसते, कभी मौसम की बात, कभी न्यूज की।
धीरे-धीरे ये बातें रोज की आदत बन गईं। शाम को हम बालकनी में खड़े होकर घंटों बातें करते। नेहा की आवाज में एक अजीब सी शांति थी, जो मुझे अच्छी लगती। मैं अकेला था, परिवार दूर, तो उससे बात करके मन हल्का होता।
एक शाम बारिश हो रही थी। मैं बालकनी में खड़ा था, नेहा भी। हम भीगते हुए बात कर रहे थे। उसने कहा, "राहुल, ये लॉकडाउन कब खत्म होगा? मैं बाहर जाना चाहती हूं।" मैंने हंसकर कहा, "सब्र रखो, जल्दी ही।" लेकिन अंदर से मैं भी वही सोचता था।
उस रात मैं सो नहीं पाया। नेहा की बातें दिमाग में घूमती रहीं। वह कितनी सरल थी, लेकिन उसकी आंखों में एक गहराई थी। अगले दिन मैंने उसे मैसेज किया – नंबर हमने एक्सचेंज कर लिया था। "चाय पीने आओगी?" उसने रिप्लाई किया, "मम्मी घर पर हैं, लेकिन शाम को ट्राई करूंगी।"
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शाम को वह आई, दरवाजा खटखटाया। मैंने खोला, वह अंदर आई। हम सोफे पर बैठे, चाय पी। बातें की, हंसे। नेहा ने कहा, "तुम्हारा घर कितना साफ है, मैं तो अपना रूम नहीं संभाल पाती।" मैंने मजाक किया, "तुम्हें मदद चाहिए तो बता दो।"
उस मुलाकात से हमारी दोस्ती गहरी हुई। वह कभी-कभी आती, हम फिल्म देखते या गाने सुनते। लॉकडाउन की वजह से बाहर जाना मुश्किल था, तो यही हमारा दुनिया थी। मैं महसूस करता कि नेहा के प्रति मेरी भावनाएं बदल रही हैं, लेकिन मैं चुप रहता।
एक दिन नेहा उदास लग रही थी। मैंने पूछा, "क्या हुआ?" उसने बताया, "मेरा एक्स बॉयफ्रेंड मैसेज कर रहा है, लेकिन मैं उसे इग्नोर कर रही हूं।" मैंने उसे सांत्वना दी, "तुम स्ट्रॉन्ग हो, भूल जाओ।" हमारी बातें इमोशनल हो गईं।
उस रात वह मेरे घर रुकी, क्योंकि उसके घर में कुछ इश्यू था। हम सोफे पर बैठे बातें करते रहे। नेहा की आंखों में आंसू थे, मैंने उसे गले लगाया। वह रोई, फिर शांत हुई। उस पल में कुछ बदला, हम करीब आ गए।
अगली सुबह नेहा ने कहा, "राहुल, थैंक यू। तुम्हारे बिना ये लॉकडाउन असहनीय होता।" मैंने मुस्कुराया, लेकिन अंदर से उथल-पुथल थी। मैं उसे पसंद करने लगा था, लेकिन डर था कि ये सिर्फ अकेलेपन की वजह से तो नहीं।
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दिन बीतते गए, हमारी मुलाकातें बढ़ीं। एक शाम हम बालकनी में थे, सूरज ढल रहा था। नेहा ने मेरी ओर देखा, उसकी आंखों में कुछ था। मैंने उसका हाथ पकड़ा, वह चुप रही। हम अंदर आए, दरवाजा बंद किया।
हम सोफे पर बैठे, नेहा मेरे कंधे पर सिर रखकर लेट गई। मैंने उसके बालों में उंगलियां फिराईं। वह बोली, "राहुल, मुझे अच्छा लगता है तुम्हारे साथ।" मैंने कहा, "मुझे भी।" हमारी सांसें तेज हो गईं।
मैंने धीरे से उसके होंठों को छुआ। नेहा ने आंखें बंद कीं, और हम चुंबन में खो गए। उसका स्पर्श नरम था, जैसे कोई सपना। हम एक-दूसरे को महसूस करने लगे, कपड़े उतरते गए।
नेहा की त्वचा गर्म थी, मैंने उसके गले पर吻 किया। वह कराह उठी, "राहुल..." हम बेडरूम में गए, लाइट्स मद्धम। मैंने उसे बाहों में लिया, हमारा शरीर एक हो गया। हर स्पर्श में भावनाएं थीं, जैसे लॉकडाउन की सारी उदासी दूर हो रही हो।
उस रात हमने प्यार किया, धीरे-धीरे, हर पल को जीते हुए। नेहा की सांसें मेरी सांसों से मिलीं, हमारा पसीना एक हुआ। वह बोली, "ये कभी न भूलूंगी।" मैंने उसे कसकर पकड़ा, जैसे वो मेरी हो।
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सुबह हम जागे, नेहा मेरी छाती पर सिर रखे सो रही थी। मैंने उसे देखा, उसकी मुस्कान में शांति थी। हमने नाश्ता किया, बातें की। लेकिन अंदर से एक कन्फ्लिक्ट था – क्या ये सही है? पड़ोसी, लॉकडाउन, क्या ये टेम्पररी है?
फिर भी हम मिलते रहे। एक दिन नेहा ने कहा, "राहुल, मुझे डर लगता है कि लॉकडाउन खत्म होने पर क्या होगा।" मैंने कहा, "हम साथ रहेंगे।" लेकिन मन में शंका थी। हमारी अंतरंगता बढ़ी, हर बार नई भावना के साथ।
एक शाम हम फिर करीब आए। नेहा ने मेरे कपड़े उतारे, मैंने उसके। हम फर्श पर लेटे, बारिश की आवाज बाहर। उसका शरीर मेरे नीचे था, हम लय में खोए। नेहा की आंखों में प्यार था, मेरी में चाहत।
हमने नए तरीके आजमाए, कभी धीमे, कभी तेज। नेहा ने मेरे कान में फुसफुसाया, "तुम मुझे पूरा करते हो।" मैंने उसके हर हिस्से को छुआ, जैसे वो मेरी दुनिया हो। वो पल अनंत लगे, सेंसेशन से भरे।
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लेकिन समय बदलता है। लॉकडाउन ढीला होने लगा, नेहा की क्लासेस शुरू हुईं। हम मिलते कम हुए, लेकिन भावनाएं वही रहीं। एक रात हम फिर मिले, आखिरी बार जैसा। नेहा बोली, "राहुल, ये यादें हमेशा रहेंगी।"
हम बिस्तर पर थे, नेहा मेरे ऊपर। उसने मुझे吻 किया, हमारा शरीर फिर एक हुआ। हर थ्रस्ट में उदासी थी, जैसे अलविदा। नेहा कराही, मैंने उसे कसकर पकड़ा। हम चरम पर पहुंचे, सांसें थम गईं।
उसके बाद नेहा अपने घर लौट गई। हम अब भी बात करते हैं, लेकिन वो करीबियां दूर हो गईं। लॉकडाउन की वो शामें अब यादें हैं, जो दिल में बसी हैं। नेहा की मुस्कान, उसका स्पर्श, सब कुछ जीवंत है।
आज भी बालकनी से देखता हूं, वो वहां किताब पढ़ती है। हमारी नजरें मिलती हैं, और एक चुप्पी में सब कुछ कह जाती है। शायद फिर कभी, लेकिन अब तो बस ये अनकही कहानी है।