लॉकडाउन की कैद में
उस सुबह मैं अपनी बालकनी में खड़ी थी, चाय की प्याली हाथ में थामे हुए। लॉकडाउन के चलते शहर की सड़कें बिल्कुल खाली पड़ी थीं, और हवा में एक अजीब सी शांति छाई हुई थी। मैं रिया हूं, बीस साल की, कॉलेज में पढ़ती हूं, लेकिन ये सब कुछ महीनों से ठप पड़ा था।
मामा के घर में मैं पिछले हफ्ते से फंसी हुई थी। मम्मी-पापा गांव में थे, और मैं यहां शहर में मामा के पास आई थी कुछ दिनों के लिए, लेकिन अचानक लॉकडाउन लग गया। मामा अजय, जो चालीस के करीब थे, अकेले रहते थे, उनकी पत्नी कुछ साल पहले गुजर चुकी थीं।
हमारी दिनचर्या अब एक जैसी हो गई थी। सुबह उठकर मैं किचन में मदद करती, मामा ऑफिस का काम घर से करते। दोपहर में हम साथ बैठकर टीवी देखते या किताबें पढ़ते। शाम को बालकनी में बैठकर बातें करते, दुनिया की खबरों पर चर्चा करते।
मामा हमेशा से मेरे लिए एक दोस्त जैसे थे। बचपन से वो मुझे कहानियां सुनाते, मेरी पढ़ाई में मदद करते। अब भी, इस कैद में, वो मेरी हिम्मत बढ़ाते रहते थे। "रिया, ये वक्त भी गुजर जाएगा," वो कहते, और मैं मुस्कुरा देती।
एक शाम हम लिविंग रूम में बैठे थे। बाहर बारिश हो रही थी, और बिजली चली गई थी। मोमबत्ती की रोशनी में हम बातें कर रहे थे। मामा ने पूछा, "कॉलेज की याद आती है न?" मैंने हां में सिर हिलाया, "हां मामा, दोस्तों की, क्लास की, सबकी।"
उस रात डिनर के बाद मैं अपने कमरे में थी, किताब पढ़ रही थी। मामा ने दरवाजा खटखटाया, "रिया, सो गई क्या? कुछ बात करनी है।" मैंने उन्हें अंदर बुलाया। वो बैठे और बोले, "ये लॉकडाउन मुझे अकेलेपन की याद दिला रहा है। तेरी मामी के जाने के बाद..."
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उनकी आंखों में एक उदासी थी। मैंने उनका हाथ थामा, "मामा, आप अकेले नहीं हो। मैं हूं न।" वो चुपचाप मेरी तरफ देखते रहे। उस पल में कुछ बदला सा लगा, लेकिन मैंने ज्यादा सोचा नहीं।
अगले दिन सुबह मैं किचन में नाश्ता बना रही थी। मामा पीछे से आए, "रिया, चाय बना दूं?" उनकी आवाज करीब थी। मैं मुड़ी तो हमारी नजरें मिलीं। एक सेकंड के लिए समय रुक सा गया।
दोपहर में हम सोफे पर बैठे थे, कोई फिल्म देख रहे थे। मेरी टांग उनकी टांग से छू गई। मैंने हटाने की कोशिश नहीं की। मामा ने भी कुछ नहीं कहा। बस, हम चुपचाप बैठे रहे, दिल की धड़कनें तेज होती गईं।
शाम को बालकनी में, बारिश फिर शुरू हो गई। मैं भीग रही थी, मामा ने मुझे अंदर खींचा, "पागल हो क्या, बीमार पड़ जाएगी।" उनके हाथ मेरे कंधों पर थे, गर्माहट महसूस हुई। मैंने उनकी आंखों में देखा, कुछ कहना चाहा लेकिन शब्द नहीं निकले।
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रात को मैं बिस्तर पर लेटी थी, नींद नहीं आ रही थी। मामा का चेहरा बार-बार आंखों के सामने आ रहा था। क्या ये गलत है? वो मेरे मामा हैं, लेकिन ये भावनाएं... मैं खुद को समझा रही थी।
अगली सुबह मामा ने कहा, "रिया, आज पार्क में टहलने चलें? घर के अंदर ही सही।" हम घर के छोटे से गार्डन में घूमे। बातें करते-करते हमारा हाथ छू गया। इस बार मैंने पकड़ लिया। मामा रुके, "रिया..."
उस रात डिनर के बाद हम फिर लिविंग रूम में थे। बिजली गई, अंधेरा छा गया। मामा ने मोमबत्ती जलाई। उनकी रोशनी में उनका चेहरा और आकर्षक लग रहा था। मैं करीब गई, "मामा, मुझे डर लग रहा है इस अकेलेपन से।"
वो मुझे गले लगा लिए, "मैं हूं न, रिया।" उनका स्पर्श अलग था, गर्म और आरामदायक। मैंने अपना सिर उनके कंधे पर रख दिया। धीरे-धीरे उनके होंठ मेरे कान के पास आए, एक चुंबन सा।
मेरा दिल जोर से धड़क रहा था। मैं पीछे नहीं हटी। मामा ने मुझे देखा, "रिया, क्या ये सही है?" मैंने कुछ नहीं कहा, बस उनकी आंखों में देखती रही। फिर, हम एक-दूसरे के करीब आ गए।
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उनके होंठ मेरे होंठों से मिले। वो चुंबन धीमा था, भावनाओं से भरा। मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं, सब कुछ भूलकर। उनके हाथ मेरी कमर पर फिसले, मुझे और करीब खींचा।
हम बेडरूम की तरफ बढ़े। मामा ने मुझे बिस्तर पर लिटाया, धीरे-धीरे मेरे कपड़े उतारे। उनकी उंगलियां मेरी त्वचा पर चल रही थीं, जैसे कोई नया संगीत बजा रही हों। मैं कांप रही थी, उत्साह और डर से।
"रिया, तुम खूबसूरत हो," मामा ने फुसफुसाया। मैंने उन्हें छुआ, उनके सीने पर हाथ फेरा। हमारा शरीर एक हो रहा था, धीरे-धीरे, बिना जल्दबाजी के। हर स्पर्श में एक नई अनुभूति थी।
जब वो मेरे अंदर आए, एक दर्द हुआ, लेकिन वो जल्दी ही सुख में बदल गया। हमारी सांसें मिलीं, शरीर की लय एक हुई। मैंने अपनी आंखें खोलीं, मामा को देखा, उनकी आंखों में प्यार था, या शायद कुछ और।
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उस रात हम कई बार एक हुए। हर बार कुछ नया था – कभी तेज, कभी धीमा। मैंने खुद को पूरी तरह सौंप दिया, उन भावनाओं में डूबकर। सुबह होने तक हम थक चुके थे, लेकिन संतुष्ट।
अगले दिन हमने बात नहीं की उस रात की। लेकिन नजरें मिलतीं तो मुस्कान आ जाती। शाम को फिर वही हुआ। इस बार ज्यादा आत्मविश्वास से। मामा ने मुझे नए तरीके से छुआ, मेरे शरीर के हर हिस्से को एक्सप्लोर किया।
मैंने महसूस किया कि ये सिर्फ शारीरिक नहीं था। इसमें भावनाएं थीं, वो अकेलापन जो हम दोनों महसूस कर रहे थे। लॉकडाउन ने हमें करीब ला दिया था, शायद ज्यादा करीब।
एक शाम हम बालकनी में थे। बारिश हो रही थी। मामा ने मुझे पीछे से गले लगाया, "रिया, क्या हम गलत कर रहे हैं?" मैंने मुड़कर कहा, "मामा, ये वक्त हमें मिला है, इसे जी लें।"
उस रात हम फिर एक हुए, लेकिन इस बार ज्यादा इंटेंस था। मैं ऊपर थी, नियंत्रण मेरे हाथ में। उनके शरीर पर सवार होकर मैंने खुद को महसूस किया, शक्तिशाली और मुक्त।
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हर सांस, हर स्पर्श में नई ऊर्जा थी। मामा के हाथ मेरे स्तनों पर थे, धीरे-धीरे दबाते हुए। मैं कराह रही थी, खुशी से। वो पल अनंत लग रहे थे।
कुछ दिनों बाद लॉकडाउन थोड़ा ढीला हुआ, लेकिन हमारी दुनिया वही थी। हम जानते थे ये छिपा रहेगा, लेकिन वो भावनाएं हमेशा रहेंगी। एक रात फिर, हम बिस्तर पर थे, एक-दूसरे में खोए हुए।
मामा ने मुझे कसकर पकड़ा, हमारी लय तेज हो गई। मैंने अपनी आंखें बंद कीं, उस सुख में डूबकर। अभी भी वो स्पर्श जारी था, जैसे समय रुक गया हो।