लॉकडाउन की वो अनकही रातें

उस दिन सुबह की शुरुआत हमेशा की तरह हुई थी। मैं अपने कमरे में बैठा, लैपटॉप पर ऑनलाइन क्लास अटेंड कर रहा था, जबकि बाहर से किचन की आवाजें आ रही थीं। लॉकडाउन ने सब कुछ बदल दिया था; कॉलेज बंद था, और घर ही हमारा पूरा संसार बन गया था।

प्रिया दीदी, जो मुझसे तीन साल बड़ी हैं, अपनी जॉब से छुट्टी पर थीं। वो सुबह उठकर चाय बनातीं, फिर माँ के साथ घर के कामों में हाथ बंटातीं। मैं 22 साल का था, और वो 25 की, लेकिन लॉकडाउन ने हमें फिर से बच्चों की तरह एक साथ बांध दिया था।

दोपहर को हम सब साथ बैठकर खाना खाते। पापा अपने कमरे में काम करते रहते, और माँ टीवी देखतीं। प्रिया दीदी और मैं कभी-कभी पुरानी यादें ताजा करते, हंसते-बतियाते। बाहर की दुनिया थम सी गई थी, लेकिन घर के अंदर जीवन अपनी रफ्तार से चल रहा था।

शाम ढलने पर मैं बालकनी में खड़ा होकर सूरज को डूबते देखता। प्रिया दीदी कभी मेरे पास आकर खड़ी हो जातीं, और हम शहर की खामोशी पर बात करते। "कितना अजीब है ना, राज? सब कुछ रुक सा गया है," वो कहतीं, और मैं हामी भरता।

रात को डिनर के बाद हम सब अपने-अपने कमरों में चले जाते। लेकिन लॉकडाउन के इन दिनों में नींद जल्दी नहीं आती थी। मैं बिस्तर पर लेटकर किताब पढ़ता या फोन स्क्रॉल करता। प्रिया दीदी का कमरा मेरे बगल में था, और कभी-कभी दीवार के पार से उनकी हल्की-हल्की आवाजें सुनाई देतीं।

एक शाम, जब बारिश हो रही थी, हम दोनों बालकनी में खड़े थे। पानी की बूंदें छत पर गिर रही थीं, और हवा ठंडी थी। प्रिया दीदी ने कहा, "राज, याद है बचपन में हम कैसे बारिश में भीगते थे?" मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया, "हां दीदी, लेकिन अब तो हम बड़े हो गए हैं।"

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उस रात, डिनर के बाद माँ-पापा जल्दी सो गए। मैं अपने कमरे में था, लेकिन मन नहीं लग रहा था। प्रिया दीदी का दरवाजा खुला था, और वो बिस्तर पर बैठी किताब पढ़ रही थीं। मैं अंदर चला गया, "दीदी, नींद नहीं आ रही?"

वो हंसीं, "तुम्हें भी नहीं? आओ, बैठो। चलो कोई फिल्म देखते हैं।" हमने लैपटॉप ऑन किया और एक पुरानी फिल्म लगाई। कमरे की लाइट बंद थी, सिर्फ स्क्रीन की रोशनी थी। हम पास-पास बैठे थे, और धीरे-धीरे बातें होने लगीं।

फिल्म के बीच में प्रिया दीदी ने कहा, "राज, ये लॉकडाउन कब खत्म होगा? मुझे बाहर की दुनिया मिस हो रही है।" मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा, "जल्दी ही, दीदी। लेकिन अच्छा है ना, हम सब साथ हैं।" वो मेरी तरफ मुड़ीं, और उनकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी।

उस पल में कुछ बदला सा लगा। हमारी नजरें मिलीं, और चुप्पी फैल गई। मैंने हाथ हटाया नहीं, और वो भी नहीं हटीं। दिल की धड़कन तेज हो गई थी, लेकिन मैंने कुछ कहा नहीं। फिल्म चलती रही, लेकिन हमारा ध्यान कहीं और था।

अगले दिन सुबह सब सामान्य था। लेकिन शाम को जब हम फिर बालकनी में थे, प्रिया दीदी ने मेरी तरफ देखा और कहा, "कल रात अच्छी लगी फिल्म?" मैंने हां में सर हिलाया, लेकिन मन में कुछ और चल रहा था। वो करीब आईं, और हमारी उंगलियां छू गईं।

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रात को फिर वही हुआ। मैं उनके कमरे में गया, और हम बातें करने लगे। इस बार हम बिस्तर पर लेटे थे, साइड बाय साइड। प्रिया दीदी ने कहा, "राज, तुम्हें कभी अकेलापन महसूस होता है?" मैंने जवाब दिया, "हां दीदी, लेकिन तुम्हारे साथ तो नहीं।"

उनकी सांसें मेरे करीब महसूस हो रही थीं। मैंने धीरे से उनका हाथ पकड़ा, और वो चुप रहीं। मन में उथल-पुथल थी – ये गलत था, लेकिन लॉकडाउन की इस कैद में सब कुछ अलग लग रहा था। हमारी आंखें बंद हुईं, और हम एक-दूसरे के और करीब आ गए।

पहली बार जब हमारे होंठ मिले, तो वो पल अनोखा था। प्रिया दीदी की सांसें गर्म थीं, और उनका स्पर्श नरम। मैंने उन्हें अपनी बाहों में लिया, और वो मेरे सीने से लग गईं। मन में अपराधबोध था, लेकिन इच्छा उससे ज्यादा मजबूत थी।

हम धीरे-धीरे कपड़े उतारने लगे। प्रिया दीदी की त्वचा मुलायम थी, और उनकी आंखों में एक मिश्रित भावना थी – डर और उत्साह। मैंने उनके गाल पर吻 किया, और वो मेरे बालों में उंगलियां फिराने लगीं। वो पल इतना इंटेंस था कि समय रुक सा गया।

जब हम एक हुए, तो वो अनुभव अवर्णनीय था। प्रिया दीदी की सिसकियां कमरे में गूंज रही थीं, और मैं उनकी हर हरकत में खोया हुआ था। हमारा शरीर एक लय में चल रहा था, जैसे सालों का बंधन अब खुल रहा हो। लेकिन अंदर ही अंदर एक संघर्ष था – ये रिश्ता क्या था?

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उस रात के बाद, दिनचर्या बदल गई। सुबह हम सामान्य दिखते, लेकिन आंखों में वो राज छिपा रहता। शाम को हम छुपकर मिलते, और रातें हमारी हो जातीं। प्रिया दीदी कहतीं, "राज, ये गलत है, लेकिन मैं रुक नहीं पा रही।"

मैं जवाब देता, "दीदी, लॉकडाउन ने हमें ये मौका दिया है। शायद ये हमारा सच है।" हमारी बातें अब गहरी हो गई थीं – बचपन की यादों से लेकर वर्तमान की इच्छाओं तक। हर मिलन में एक नई भावना जुड़ती, कभी कोमलता, कभी जुनून।

एक रात, बारिश फिर हो रही थी। हम बालकनी में खड़े थे, लेकिन इस बार हमने दरवाजा बंद किया और कमरे में आ गए। प्रिया दीदी ने मुझे दीवार से सटा लिया, और उनके吻 में एक नई तीव्रता थी। मैंने उन्हें गोद में उठाया, और बिस्तर पर लिटा दिया।

उनकी सांसें तेज थीं, और मैं उनके शरीर के हर हिस्से को छू रहा था। वो मेरे कान में फुसफुसाईं, "राज, और जोर से..." हमारा मिलन उस रात लंबा चला, पसीने से तर और भावनाओं से भरा। मन में डर था कि ये कब तक चलेगा, लेकिन वो पल ही सब कुछ था।

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दिन बीतते गए, और हमारा रिश्ता गहराता गया। प्रिया दीदी अब मेरे साथ ज्यादा समय बितातीं, और हमारी चुप्पियां अर्थपूर्ण हो गईं। लेकिन परिवार के सामने सब सामान्य रखना पड़ता, जो एक चुनौती थी।

एक दोपहर, जब माँ-पापा सो रहे थे, हम किचन में थे। प्रिया दीदी चाय बना रही थीं, और मैं उनके पीछे खड़ा हो गया। मेरे हाथ उनकी कमर पर रखे, और वो मुड़ीं। हमने जल्दी से एक吻 किया, लेकिन दिल की धड़कनें बता रही थीं कि खतरा है।

रात को हम फिर मिले। इस बार हमने बात की – हमारे भविष्य की, इस रिश्ते की। प्रिया दीदी ने कहा, "राज, लॉकडाउन खत्म होने के बाद क्या होगा?" मैंने जवाब नहीं दिया, बस उन्हें अपनी बाहों में लिया। हमारा मिलन उस रात भावुक था, आंसुओं और सिसकियों से भरा।

हर बार कुछ नया होता। कभी हम धीरे-धीरे एक-दूसरे को एक्सप्लोर करते, कभी जुनून में सब भूल जाते। प्रिया दीदी की त्वचा की खुशबू, उनके स्पर्श की गर्मी – सब कुछ यादगार था। लेकिन अंदर का संघर्ष कम नहीं हो रहा था।

एक शाम, हम छत पर गए। सितारे चमक रहे थे, और हम हाथ में हाथ डाले बैठे थे। प्रिया दीदी ने सिर मेरे कंधे पर रखा, "राज, मैं तुमसे प्यार करती हूं, लेकिन ये प्यार कैसा है?" मैंने कहा, "दीदी, ये हमारा है, बस।"

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उस रात कमरे में आकर हमने फिर वही जादू दोहराया। मैं उनके शरीर पर吻 करता रहा, और वो मेरे नाम की पुकार लगाती रहीं। हमारी लय तेज होती गई, और चरम पर पहुंचकर हम थककर लेट गए। लेकिन वो पल खत्म नहीं हुआ था; हमारी सांसें अभी भी एक-दूसरे में उलझी हुई थीं।

लॉकडाउन के दिन अब खत्म होने वाले थे। प्रिया दीदी और मैं जानते थे कि सब बदल जाएगा। लेकिन उन आखिरी रातों में हमने सब कुछ जी लिया। एक रात, हम बिस्तर पर लेटे थे, नंगे और संतुष्ट।

मैंने उनके बालों में उंगलियां फिराईं, और वो मेरे सीने पर सर रखकर सो गईं। मन में हजार सवाल थे, लेकिन वो शांति अनमोल थी। हम फिर से करीब आए, धीरे-धीरे, जैसे आखिरी बार हो।

उनकी सिसकियां फिर गूंजीं, और मैं उनके साथ बहता रहा। हमारा शरीर एक हो गया, भावनाओं की लहरों में। वो पल इतना गहरा था कि...