लॉकडाउन की अनकही रातें

उस सुबह की शुरुआत बिल्कुल सामान्य थी। अप्रैल 2020 का वो समय था जब पूरा देश लॉकडाउन में कैद था, और मैं, अजय, अपने छोटे से अपार्टमेंट में अकेला बैठा चाय की चुस्कियां ले रहा था। बाहर सड़कें सूनी थीं, सिर्फ दूर से किसी गाड़ी की आवाज़ आती थी, और मैं अपनी बालकनी से शहर की खामोशी को निहारता रहता था। दिनचर्या वही थी – सुबह उठना, लैपटॉप पर काम करना, और शाम को थोड़ी देर टहलना, लेकिन घर की चारदीवारी में ही।

मेरा परिवार गांव में फंस गया था, और मैं यहां दिल्ली में अकेला था। 28 साल की उम्र में IT कंपनी में काम करता था, घर से ही सब कुछ संभाल रहा था। वो दिन भी वैसा ही था – ब्रेकफास्ट के बाद मैंने लैपटॉप खोला और ईमेल चेक करने लगा। बाहर से कभी-कभी पुलिस की जीप की आवाज़ आती थी, जो लोगों को घर में रहने की हिदायत देती थी।

दोपहर होते-होते मुझे थोड़ी भूख लगी, तो मैंने किचन में जाकर कुछ बनाया। अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स में ज्यादा लोग नहीं थे, ज्यादातर बाहर से आए थे जो अब अपने घरों को लौट चुके थे। मैंने सोचा कि शाम को बालकनी में बैठकर किताब पढ़ूंगा, क्योंकि इंटरनेट भी कभी-कभी धोखा दे जाता था।

शाम ढलने लगी थी जब मैं बालकनी में आया। नीचे गेट पर एक पुलिस वाली खड़ी थी, जो कॉम्प्लेक्स की सिक्योरिटी चेक कर रही थी। मैंने उसे पहले भी देखा था, लेकिन कभी ध्यान नहीं दिया। वो अपनी यूनिफॉर्म में सख्त लग रही थी, और लोगों से बात करते हुए नियमों की याद दिला रही थी।

मैंने अपनी किताब खोली और पढ़ने लगा, लेकिन मेरी नजर बार-बार नीचे जाती थी। वो पुलिस वाली, जिसका नाम बाद में पता चला रिया था, अब गेट के पास बैठी फोन पर बात कर रही थी। लॉकडाउन की वजह से ड्यूटी लंबी हो गई थी, शायद। मैंने सोचा कि कितना मुश्किल होगा इनके लिए, दिन-रात बाहर रहना।

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अगले दिन सुबह फिर वही रूटीन। चाय बनाई, काम शुरू किया। लेकिन दोपहर में दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने खोला तो वही पुलिस वाली खड़ी थी। "सर, आप अकेले रहते हैं? कॉम्प्लेक्स में चेकिंग है, कोई समस्या तो नहीं?" उसने पूछा। मैंने हामी भरी और कहा कि सब ठीक है। वो मुस्कुराई और चली गई।

उस छोटी सी बातचीत ने मुझे थोड़ा सोचने पर मजबूर कर दिया। मैं अकेला था, और शायद वो भी अपनी ड्यूटी में अकेली महसूस करती होगी। शाम को फिर बालकनी से देखा, वो नीचे थी। इस बार मैंने हिम्मत करके आवाज़ दी, "चाय पिएंगी?" वो ऊपर देखकर हंसी और बोली, "नहीं सर, ड्यूटी पर हूं।"

लेकिन अगले दिन वो खुद आई। "कल आपने चाय ऑफर की थी, आज समय है अगर..." मैंने खुशी से हां कहा और किचन में गया। हम बालकनी में बैठे, बातें कीं। रिया 25 साल की थी, पुलिस में दो साल से थी, और लॉकडाउन में घर नहीं जा पा रही थी। उसका परिवार हरियाणा में था।

हमारी बातें धीरे-धीरे लंबी होने लगीं। वो बताती कि ड्यूटी कितनी थकान वाली होती है, लोग कैसे नियम तोड़ते हैं। मैं अपनी नौकरी की बोरियत शेयर करता। एक शाम बारिश हुई, और वो भीगते हुए आई। मैंने तौलिया दिया, और हम अंदर बैठे। उसकी आंखों में थकान थी, लेकिन मुस्कान में गर्माहट।

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उस रात हम देर तक बातें करते रहे। रिया ने बताया कि वो बचपन से पुलिस बनना चाहती थी, लेकिन अब ये जिम्मेदारी भारी लगती है। मैंने अपनी जिंदगी के बारे में बताया, कैसे लॉकडाउन ने सब कुछ बदल दिया। हमारी बातों में एक अजीब सी करीबी आ गई थी, जैसे दो अकेले लोग एक-दूसरे को सहारा दे रहे हों।

कुछ दिनों बाद, एक शाम वो आई और बोली, "अजय, आज ड्यूटी जल्दी खत्म हुई। क्या मैं थोड़ी देर रुक सकती हूं?" मैंने हां कहा। हम सोफे पर बैठे, टीवी पर न्यूज चल रही थी। उसकी मौजूदगी से कमरा भरा-भरा लग रहा था। मैंने कॉफी बनाई, और हम बातें करने लगे।

बातों-बातों में उसने अपनी थकान का जिक्र किया। "कंधे दर्द कर रहे हैं," उसने कहा। मैंने हिचकिचाते हुए पूछा, "मालिश कर दूं?" वो हंसी, लेकिन फिर सहमत हो गई। मैंने उसके कंधों पर हाथ रखे, धीरे-धीरे दबाया। उसकी सांसें तेज़ हो गईं, लेकिन हम चुप रहे।

उस पल में कुछ बदल गया। मेरे हाथ उसकी गर्दन पर फिसले, और वो पीछे मुड़ी। हमारी नजरें मिलीं, और एक लंबी चुप्पी छा गई। मैंने महसूस किया कि ये सिर्फ थकान नहीं थी, बल्कि कुछ और जो हम दोनों महसूस कर रहे थे। रिया ने मेरे हाथ पकड़े और बोली, "अजय, ये सही है?"

मैंने जवाब नहीं दिया, बस उसे करीब खींच लिया। हमारे होंठ मिले, और वो चुंबन इतना नरम था जितना मैंने कभी सोचा नहीं था। उसके शरीर की गर्माहट मेरे अंदर एक आग जला रही थी। हम सोफे पर ही लेट गए, और मैंने उसकी यूनिफॉर्म के बटन खोलने शुरू किए।

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रिया की सांसें तेज़ थीं, और उसने मेरी कमीज उतारी। उसके स्तन मेरे हाथों में थे, नरम और गर्म। मैंने उन्हें चूमा, और वो कराह उठी। हमारा ये पहला स्पर्श इतना भावुक था कि समय रुक सा गया। लॉकडाउन की खामोशी में सिर्फ हमारी सांसों की आवाज़ थी।

मैंने उसे बेडरूम में ले जाकर लिटाया। उसकी पैंट उतारी, और उसकी योनि को छुआ। वो गीली थी, इंतजार में। मैंने अपनी जीभ से उसे चाटा, और वो मेरे बालों में उंगलियां फिराने लगी। "अजय, धीरे..." उसने कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में चाहत थी।

फिर मैं उसके ऊपर आया, और धीरे से प्रवेश किया। उसकी चूत इतनी टाइट थी कि मैं रुक गया। हमारी आंखें बंद थीं, और हर धक्के के साथ एक नई भावना उभर रही थी। रिया ने मुझे कसकर पकड़ा, और हम एक लय में बहने लगे।

उस रात हम कई बार रुके, बातें कीं, फिर शुरू हुए। कभी मैं नीचे था, कभी वो ऊपर। उसकी कराहें कमरे में गूंज रही थीं, और मैं उसके हर हिस्से को महसूस कर रहा था। लॉकडाउन की वो रात हमारी दुनिया बन गई थी।

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अगले दिन सुबह वो चली गई, लेकिन शाम को फिर आई। इस बार हम ज्यादा बेफिक्र थे। मैंने उसे बाथरूम में ले जाकर नहलाया, पानी की बौछारों के नीचे हम फिर एक हुए। उसकी चूत पर साबुन लगाया, और वो हंसते हुए मुझे चूमने लगी।

हमारी मुलाकातें अब रोज की हो गईं। एक शाम हम किचन में थे, मैं खाना बना रहा था। रिया पीछे से आई और मुझे गले लगाया। उसके हाथ मेरी पैंट में घुसे, और मैंने उसे काउंटर पर बिठा दिया। वहां खड़े-खड़े मैंने उसे चोदा, तेज़ और जोशीले अंदाज में।

लेकिन हर बार कुछ नया था। कभी हम धीरे-धीरे प्यार करते, कभी जंगली हो जाते। रिया की आंखों में वो डर और उत्साह मिला रहता, जैसे ये सब चोरी का मजा हो। मैं उसके शरीर के हर कोने को जानने लगा था।

एक रात हम बालकनी में थे, बाहर अंधेरा था। रिया ने मुझे कुर्सी पर बिठाया और मेरे ऊपर बैठ गई। उसकी चूत मेरे लंड पर फिसल रही थी, और हम चुपचाप ये सब कर रहे थे, जैसे दुनिया से छुपकर। हवा की ठंडक और उसकी गर्माहट का मिश्रण अविस्मरणीय था।

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समय बीतता गया, लेकिन हमारी चाहत नहीं रुकी। रिया बताती कि ड्यूटी में उसका मन मेरे पास आता है, और मैं भी काम के बीच उसे याद करता। हमारा रिश्ता अब सिर्फ शारीरिक नहीं था, बल्कि भावनात्मक भी।

फिर एक शाम वो आई, आंखों में आंसू थे। "अजय, लॉकडाउन खत्म होने वाला है। मुझे घर जाना होगा।" मैंने उसे गले लगाया, और हम आखिरी बार प्यार किया। वो इतना भावुक था कि हम दोनों रो पड़े। मैंने उसकी चूत को इतने प्यार से चूमा जितना कभी नहीं।

हम लेटे रहे, एक-दूसरे को महसूस करते हुए। रिया की सांसें मेरे सीने पर थीं, और मैं उसके बालों में उंगलियां फिरा रहा था। वो पल इतना गहरा था कि शब्द कम पड़ रहे थे।