खेतों की छाया में

सुबह की पहली किरणें अभी-अभी फैल रही थीं जब मैं अपने मामा के घर की छत से नीचे उतरा। गांव का यह पुराना घर हमेशा मुझे शांति देता था, खासकर शहर की भागदौड़ से दूर। मैं राज हूं, और हर साल गर्मियों की छुट्टियों में यहां आता हूं, जहां दिन की शुरुआत चाय की प्याली और खेतों की हरी-भरी सुबह से होती है।

आज भी वही रूटीन था। मामा जी खेतों की ओर निकल चुके थे, और मैंने सोचा कि थोड़ी मदद कर दूं। प्रिया, मेरी कजिन, जो मामा की इकलौती बेटी है, रसोई में व्यस्त थी। हम दोनों की उम्र लगभग एक जैसी है, मैं छब्बीस का और वो पच्चीस की, लेकिन बचपन से साथ खेलते-कूदते बड़े हुए हैं। शहर में मेरी नौकरी है, और वो यहां कॉलेज खत्म करके घर संभालती है।

खेतों तक पहुंचते-पहुंचते सूरज थोड़ा ऊपर चढ़ आया था। हवा में मिट्टी की महक थी, और दूर-दूर तक हरी फसलें लहरा रही थीं। मैंने मामा जी को देखा, वो ट्रैक्टर चला रहे थे। "राज बेटा, आ जा, आज तू भी सीख ले थोड़ा," उन्होंने हंसते हुए कहा। मैंने मुस्कुराकर हामी भरी और उनके साथ लग गया।

दोपहर होने को आई तो प्रिया पानी और नाश्ता लेकर आई। वो हमेशा की तरह साड़ी में थी, साधारण लेकिन सुंदर। "भैया, आप थक गए होंगे," उसने कहा और मुझे एक गिलास ठंडा पानी दिया। मैंने धन्यवाद कहा, और हम थोड़ी देर बैठकर बातें करने लगे। बचपन की यादें, शहर की कहानियां – सब कुछ इतना सहज लग रहा था।

शाम ढलने लगी थी जब मामा जी ने कहा कि कल सुबह फिर आना। मैंने सोचा कि थोड़ा टहल लूं। प्रिया भी साथ हो ली, "चलो भैया, मैं भी चलती हूं, खेतों में घूम आएं।" हम दोनों साथ चल पड़े, रास्ते में फसलों के बीच से गुजरते हुए। हवा ठंडी हो रही थी, और सूरज की आखिरी किरणें हमें छू रही थीं।

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हम एक पुराने आम के पेड़ के नीचे रुक गए। प्रिया ने जमीन पर बैठते हुए कहा, "याद है भैया, बचपन में यहां कितना खेलते थे?" मैंने हां में सिर हिलाया, और अचानक एक अजीब सी चुप्पी छा गई। उसकी आंखों में कुछ था, शायद वही पुरानी दोस्ती जो अब कुछ और लग रही थी। मैंने अपना हाथ उसके कंधे पर रखा, सिर्फ सहजता से।

उस पल में कुछ बदल सा गया। प्रिया ने मेरी ओर देखा, और उसकी सांसें थोड़ी तेज हो गईं। "भैया, कभी-कभी लगता है कि समय रुक क्यों नहीं जाता," उसने धीरे से कहा। मैंने कुछ नहीं कहा, बस उसकी आंखों में देखता रहा। हमारा रिश्ता हमेशा से करीब था, लेकिन आज वो करीब कुछ ज्यादा महसूस हो रहा था।

खेतों की छाया लंबी हो रही थी। हम उठकर आगे बढ़े, लेकिन मेरे मन में एक उथल-पुथल थी। प्रिया मेरी कजिन है, मामा की बेटी, लेकिन वो भावनाएं जो दबे हुए थे, अब उभर रहे थे। मैंने खुद को रोका, लेकिन उसकी मुस्कान ने सब कुछ मुश्किल कर दिया।

रात होने से पहले हम घर लौट आए। डिनर के समय सब साथ थे, मामा जी, मामी और प्रिया। बातें चल रही थीं, लेकिन मेरी नजर बार-बार प्रिया पर जा रही थी। वो भी चुपके से देखती और मुस्कुराती। रात को सोते समय मैं सोचता रहा कि क्या ये सिर्फ मेरी कल्पना है या सच में कुछ है।

अगले दिन सुबह फिर खेतों में था। आज प्रिया जल्दी आ गई, "भैया, आज मैं भी मदद करूंगी।" हम साथ काम करने लगे, फसलों के बीच झुककर। कभी-कभी हमारे हाथ छू जाते, और वो पल रुक सा जाता। मैंने महसूस किया कि वो जानबूझकर पास आ रही है।

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दोपहर में जब सब आराम कर रहे थे, प्रिया ने कहा, "चलो भैया, वो दूर वाला खेत देख आएं।" हम चल पड़े, खेतों के बीच एकांत था। वहां पहुंचकर वो रुक गई, और अचानक मेरे करीब आ गई। "भैया, मुझे लगता है कि मैं तुम्हें पसंद करने लगी हूं, वो वाली पसंद," उसने शर्माते हुए कहा।

मैं स्तब्ध था। "प्रिया, हम कजिन हैं, ये गलत है," मैंने कहा, लेकिन मेरी आवाज में conviction नहीं था। वो करीब आई, और उसकी आंखों में आंसू थे। "क्या फर्क पड़ता है, अगर दिल मानता है?" उसने पूछा। मैंने उसे गले लगा लिया, वो भावनात्मक पल था।

उस गले लगने से सब कुछ बदल गया। हमारी सांसें मिलीं, और मैंने उसके होंठों को छुआ। वो kiss इतनी गहरी थी कि समय भूल गया। खेतों की हवा हमें घेर रही थी, और हम दोनों खो से गए थे।

हम जमीन पर बैठ गए, फसलों की छाया में। प्रिया की साड़ी थोड़ी सरक गई, और मैंने उसके कंधे को चूमा। वो सिहर उठी, "भैया, धीरे," उसने कहा। मेरे हाथ उसके शरीर पर घूमने लगे, हर स्पर्श में एक नई उत्तेजना थी।

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उसकी आंखें बंद थीं, और मैंने उसके ब्लाउज के बटन खोले। उसकी त्वचा इतनी मुलायम थी, जैसे रेशम। मैंने उसके स्तनों को छुआ, और वो कराह उठी। हमारा आकर्षण अब नियंत्रण से बाहर था, भावनाएं उफान पर थीं।

प्रिया ने मेरी कमीज उतारी, और उसके हाथ मेरे सीने पर फिसले। "तुम कितने मजबूत हो," उसने कहा। हम एक-दूसरे के शरीर को एक्सप्लोर करने लगे, हर पल में एक नई संवेदना। खेत की मिट्टी हमारे नीचे थी, लेकिन वो पल paradisiacal लग रहा था।

मैंने उसे लिटाया, और उसके ऊपर झुका। हमारी बॉडीज मिलीं, और वो पल इतना intense था कि शब्द कम पड़ जाएं। प्रिया की सांसें तेज थीं, और मैंने धीरे-धीरे उसके अंदर प्रवेश किया। वो दर्द और खुशी से चीखी, लेकिन फिर मुस्कुराई।

हमारा मिलन rhythmatic था, कभी तेज, कभी धीमा। हर thrust में एक नई भावना जुड़ रही थी – प्यार, guilt, excitement। प्रिया ने मेरे कान में फुसफुसाया, "और तेज, भैया।" मैंने वैसा ही किया, और हम दोनों climax की ओर बढ़े।

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उसके बाद हम थककर लेटे रहे, एक-दूसरे को देखते हुए। "ये हमारा राज रहेगा," उसने कहा। मैंने हां में सिर हिलाया, लेकिन मन में conflict था। क्या ये सही था? लेकिन उस पल में सब कुछ सही लग रहा था।

अगले दिनों हमारा रिश्ता और गहरा हो गया। हर शाम खेतों में मिलना, बातें करना, और कभी-कभी फिर वही intimacy। एक दिन बारिश हो रही थी, हम भीगते हुए खेत में थे। प्रिया ने मुझे खींचा, और हम बारिश में kiss करने लगे।

बारिश की बूंदें हमारे शरीर पर गिर रही थीं, और हमने कपड़े उतारे। उसकी गीली बॉडी चमक रही थी, और मैंने उसे फिर से प्यार किया। वो सीन अलग था, पानी की ठंडक और हमारी गर्मी का मिश्रण।

प्रिया की moans बारिश की आवाज में घुल गईं, और हम फिर एक हो गए। हर बार कुछ नया था – कभी tenderness, कभी passion। मैं महसूस कर रहा था कि ये सिर्फ physical नहीं, emotional bond था।

एक शाम, जब सूरज डूब रहा था, हम फिर खेत में थे। प्रिया ने कहा, "भैया, अगर ये गलत है तो क्यों इतना अच्छा लगता है?" मैंने कोई जवाब नहीं दिया, बस उसे कसकर पकड़ लिया। हमारा मिलन उस दिन और intense था, जैसे आखिरी बार हो।

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मैंने उसके हर हिस्से को चूमा, और वो मेरे साथ ताल मिलाती रही। climax के बाद हम लेटे रहे, सितारों को देखते हुए। प्रिया की सिर मेरे सीने पर था, और उसकी सांसें शांत हो रही थीं।

समय बीतता गया, लेकिन वो पल हमेशा याद रहेंगे। खेतों की छाया में हमारा रिश्ता कुछ और बन गया था, और अब वापस शहर जाने का समय आ रहा था। लेकिन उस रात, हम फिर मिले, और सब कुछ दोहराया।

प्रिया की आंखों में वो ही चमक थी, और मैंने उसे फिर से महसूस किया। हमारा प्यार अब रुकने वाला नहीं था, भले दुनिया कुछ भी कहे।