खेतों की छिपी आग

सुबह की पहली किरणें अभी-अभी गांव पर पड़ रही थीं, जब मैं उठी। हर रोज की तरह, मैंने सबसे पहले चूल्हे पर चाय चढ़ाई और घर के छोटे-मोटे काम निपटाने लगी। हमारा घर गांव के बाहर बने खेतों के पास था, जहां ससुर जी सुबह से शाम तक काम करते रहते थे।

मेरा नाम रानी है, और मैं पिछले दो साल से इस घर में बहू बनकर रह रही हूं। मेरी शादी रमेश से हुई थी, जो शहर में नौकरी करता है और महीने में एक-दो बार ही घर आता है। ससुर जी, हरि सिंह, घर के मुखिया हैं—एक मजबूत इरादों वाले किसान, जो अपनी जमीन से बेहद लगाव रखते हैं।

आज का दिन भी वैसा ही था। मैंने नाश्ता बनाया और ससुर जी को आवाज दी। वे खेत से लौटकर आए, हाथ धोए और चुपचाप बैठकर खाने लगे। हमारी बातचीत ज्यादा नहीं होती, बस जरूरी कामों की। रमेश के जाने के बाद घर में एक अजीब सा सन्नाटा रहता है, जो कभी-कभी भारी लगता है।

नाश्ते के बाद मैंने घर साफ किया और कपड़े धोने लगी। बाहर धूप निकल आई थी, और खेतों से हवा में मिट्टी की खुशबू आ रही थी। ससुर जी फिर से खेत की ओर चले गए, और मैंने सोचा कि आज दोपहर का खाना लेकर उनके पास जाऊंगी। यह हमारी रोज की आदत थी—मैं खाना पहुंचाती, वे थोड़ी देर आराम करते।

गांव का जीवन सरल है, लेकिन इसमें अपनी चुनौतियां हैं। मैं शहर से आई थी, जहां सब कुछ तेज रफ्तार था, लेकिन यहां समय धीरे-धीरे गुजरता है। ससुर जी की उम्र पचास के आसपास होगी, लेकिन उनकी मेहनत उन्हें जवान बनाए रखती है। रमेश की अनुपस्थिति में वे ही घर का सहारा हैं।

दोपहर हुई, मैंने रोटी-सब्जी पैक की और खेत की ओर चल पड़ी। रास्ते में पड़ोस की औरतें मिलीं, हमने थोड़ी बातें कीं। खेत पहुंचकर मैंने देखा कि ससुर जी फसल की सिंचाई कर रहे थे। उन्होंने मुझे देखा और मुस्कुराकर इशारा किया कि वहीं बैठ जाऊं।

हमने साथ में खाना खाया। बातों-बातों में उन्होंने खेत की फसल के बारे में बताया—इस बार बारिश अच्छी हुई है, तो पैदावार बढ़ेगी। मैं चुपचाप सुनती रही, उनके शब्दों में एक अजीब सी गहराई थी। खाना खत्म होने के बाद वे थोड़ा आराम करने लगे, और मैंने पानी की बोतल उनके पास रख दी।

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वापस घर लौटते हुए मुझे लगा कि आज ससुर जी की नजरें कुछ अलग थीं। शायद थकान की वजह से, मैंने सोचा। शाम को रमेश का फोन आया, उसने बताया कि इस महीने नहीं आ पाएगा। मैंने हां-हूं करके बात खत्म की, लेकिन मन में एक उदासी सी छा गई।

रात हुई, नींद नहीं आ रही थी। मैं बिस्तर पर करवटें बदलती रही। ससुर जी का कमरा बगल में था, और कभी-कभी उनकी खांसी की आवाज आती। अगली सुबह फिर वही रूटीन—चाय, नाश्ता, काम। लेकिन आज ससुर जी ने कहा, "रानी, आज खेत में मदद चाहिए। फसल काटनी है।"

मैं तैयार हो गई और उनके साथ चल पड़ी। खेत में पहुंचकर हमने काम शुरू किया। धूप तेज थी, पसीना बह रहा था। ससुर जी ने अपनी कमीज उतार दी, और मैंने नजरें फेर लीं। हमारी बातें बढ़ीं—वे पुराने दिनों की यादें साझा करने लगे, कैसे उन्होंने यह जमीन संभाली।

काम करते-करते हम करीब आ गए। एक बार मेरा हाथ उनके हाथ से छू गया, और मैं झिझकी। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस काम जारी रखा। लेकिन उस स्पर्श में कुछ था जो मुझे अंदर तक हिला गया। मैंने खुद को संभाला और काम पर ध्यान दिया।

दोपहर में हमने ब्रेक लिया। ससुर जी ने कहा, "रानी, तुम अच्छी बहू हो। रमेश खुशकिस्मत है।" उनकी आवाज में एक नरमी थी। मैंने शरमाकर नजरें झुका लीं। उस पल में एक अजीब सी चुप्पी छा गई, जैसे कुछ अनकहा हो।

शाम को घर लौटे, तो मैं थक चुकी थी। रात के खाने के समय ससुर जी ने ज्यादा बात नहीं की। लेकिन उनकी नजरें मुझ पर टिकी रहीं। मैं असहज हो गई, लेकिन कुछ कह न सकी। नींद में भी वह स्पर्श याद आता रहा।

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अगले दिन बारिश की संभावना थी, लेकिन ससुर जी ने कहा कि खेत में कुछ काम बाकी है। मैं उनके साथ गई। बादल घिर आए थे, और हम जल्दी-जल्दी काम निपटाने लगे। अचानक बारिश शुरू हो गई, और हम एक छोटी सी झोपड़ी में भागे।

भीगकर हम अंदर पहुंचे। ससुर जी ने अपनी गीली कमीज उतारी, और मैंने अपनी साड़ी संभाली। हमारी सांसें तेज थीं। उन्होंने मुझे देखा, और कहा, "रानी, ठंड लग जाएगी।" उनकी आंखों में कुछ था—एक चाहत, जो अब छिप नहीं रही थी।

मैं चुप रही, लेकिन मेरा दिल तेज धड़क रहा था। उन्होंने धीरे से मेरा हाथ पकड़ा, और मैंने विरोध नहीं किया। उस पल में सारी दूरियां मिट गईं।他们的 स्पर्श गर्म था, और मैं खुद को रोक न सकी।

बारिश की आवाज बाहर तेज हो गई, और अंदर हम एक-दूसरे के करीब आ गए। ससुर जी ने मुझे अपनी बाहों में लिया, और मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं। उनके होंठ मेरे होंठों पर रखे, और एक मीठी सी सिहरन दौड़ गई।

हमारी सांसें मिलीं, और शरीर एक हो गए। खेत की मिट्टी की खुशबू, बारिश की ठंडक—सब कुछ उस पल में घुल गया। मैंने महसूस किया उनकी मजबूत बाहें मुझे सहारा दे रही थीं, और मेरी उंगलियां उनके बालों में उलझ गईं।

धीरे-धीरे हम जमीन पर लेट गए। ससुर जी के हाथ मेरे शरीर पर फिसले, और हर स्पर्श में एक नई उत्तेजना थी। मैंने अपनी साड़ी ढीली की, और उन्होंने मुझे पूरी तरह अपने में समाहित कर लिया। वह पल इतना गहरा था कि समय रुक सा गया।

उनकी हर हरकत में एक कोमलता थी, लेकिन साथ ही एक जुनून। मैंने अपनी आहें दबीं, लेकिन भावनाएं उफान पर थीं। खेत की झोपड़ी में हमारा मिलन एक तूफान की तरह था—बारिश के साथ ताल मिलाता हुआ।

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जब सब शांत हुआ, तो हम एक-दूसरे की बाहों में लेटे रहे। ससुर जी ने मेरे माथे पर चुंबन किया, और कहा, "रानी, यह हमारा राज रहेगा।" मैंने हां में सिर हिलाया, लेकिन मन में एक कन्फ्लिक्ट था—यह सही था या नहीं?

बारिश थम गई, और हम घर लौटे। अगले दिन सब सामान्य लग रहा था, लेकिन अंदर कुछ बदल चुका था। ससुर जी की नजरें अब अलग अर्थ रखती थीं, और मैं खुद को उनमें खोती जा रही थी।

कुछ दिन बाद रमेश का फोन आया, लेकिन मैंने बात छोटी की। ससुर जी के साथ खेत जाना अब एक बहाना बन गया था। एक दोपहर हम फिर झोपड़ी में थे, लेकिन इस बार सब ज्यादा गहरा था।

उनके स्पर्श अब परिचित लगते थे, लेकिन हर बार नई सनसनी देते। मैंने खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया, और हमारा मिलन लंबा चला। उनकी उंगलियां मेरे शरीर के हर हिस्से को छूतीं, और मैं आनंद में डूब जाती।

एक शाम खेत में सूरज ढल रहा था। ससुर जी ने मुझे पकड़ा और वहीं घास पर लिटा दिया। आसपास कोई नहीं था, और हमारी चाहत उफान पर थी। उनका शरीर मेरे ऊपर था, और मैंने अपनी टांगें फैलाईं।

हर धक्के में एक नई लहर आती, और मैं अपनी सिसकियां रोक न सकी। खेत की हवा हमारी पसीने की खुशबू से भर गई। वह पल इतना तीव्र था कि मैं सब भूल गई—केवल हम थे, और हमारी यह गुप्त दुनिया।

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रातें अब लंबी लगतीं। ससुर जी कभी-कभी मेरे कमरे में आ जाते, और हम चुपके से मिलते। लेकिन मन में डर था—अगर किसी को पता चला तो? फिर भी, वह आकर्षण रोक नहीं पाता।

एक दिन हम खेत के दूर वाले हिस्से में थे। ससुर जी ने मुझे पेड़ के सहारे खड़ा किया और पीछे से पकड़ लिया। उनका हाथ मेरी कमर पर फिसला, और मैंने खुद को उनके हवाले कर दिया।

उस स्थिति में मिलन अलग था—अधिक जंगली, अधिक भावुक। मैंने अपनी आंखें बंद कीं, और केवल सनसनी महसूस की। बार-बार ऊंचाई पर पहुंचकर गिरना, जैसे कोई लहर हो।

समय बीतता गया, और हमारा रिश्ता गहराता गया। लेकिन अंदर एक संघर्ष था—रमेश के प्रति वफादारी, समाज का डर। फिर भी, खेतों में वह पल हमें बांधे रखते।

एक दोपहर हम फिर मिले। ससुर जी ने धीरे-धीरे मेरे कपड़े उतारे, और हर हिस्से को चूमा। मैंने उनकी पीठ पर नाखून गड़ाए, और हम एक ритम में खो गए।

उस दिन कुछ अलग था—भावनाएं उफान पर थीं, और मिलन लंबा चला। अंत में हम थककर लेटे, और ससुर जी ने कहा, "रानी, तुम मेरी जिंदगी हो।"

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मैं चुप रही, लेकिन आंसू आ गए। यह रिश्ता क्या था? प्यार, वासना, या मजबूरी? खेतों की हवा में वह सवाल लहराता रहा।

अगली बारिश में हम फिर झोपड़ी में थे। इस बार मैंने पहल की, और उन्हें चूमा। हमारा मिलन अब अधिक समान था—दोनों की चाहत बराबर।

हर स्पर्श में नई कहानी थी, हर चुंबन में गहराई। मैंने महसूस किया कि यह केवल शारीरिक नहीं, भावनात्मक भी था।

लेकिन एक दिन रमेश अचानक आ गया। सब सामान्य दिखाने की कोशिश की, लेकिन ससुर जी की नजरें मुझे देखती रहीं। रात में रमेश के साथ होना अजीब लगा।

रमेश चला गया, और हम फिर खेतों में थे। इस बार मिलन में एक हताशा थी—जैसे समय कम हो। ससुर जी ने मुझे कसकर पकड़ा, और मैंने खुद को खो दिया।

खेतों की मिट्टी पर लेटकर, सूरज की रोशनी में, हम एक हो गए। हर पल में नई उत्तेजना, नई भावना।

अब यह रूटीन बन चुका था, लेकिन हर बार अलग। कभी कोमल, कभी तीव्र। मन में सवाल थे, लेकिन शरीर जवाब देता रहा।

एक शाम हम दूर के खेत में थे। ससुर जी ने मुझे उठाया और अपनी गोद में लिया। उस स्थिति में मिलन अनोखा था—गहरा, जुड़ा हुआ।

मैंने अपनी सांसें उनकी सांसों से मिलाईं, और आनंद की चरम सीमा पर पहुंची। वह पल हमेशा याद रहेगा।

समय गुजरता रहा, और हमारा राज बरकरार। लेकिन अंदर एक तूफान था—कब तक छिपेगा? फिर भी, खेतों में वह आग जलती रही।

एक दिन ससुर जी बीमार पड़े। मैंने उनकी देखभाल की, और रात में उनके पास बैठी। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा, और कहा, "रानी, तुम्हारे बिना नहीं जी सकता।"

मैंने चुपके से उन्हें चूमा, और हम फिर करीब आए। बीमारी में भी वह जुनून था।

स्वस्थ होने के बाद हम खेत गए। इस बार मिलन में कृतज्ञता थी—धीमा, भावुक।

हर स्पर्श में धन्यवाद, हर चुंबन में प्यार। मैं खुद को रोक न सकी।

लेकिन村 में अफवाहें शुरू हो गईं। मैं डर गई, लेकिन ससुर जी ने कहा, "चिंता मत करो।"

फिर भी, हम सावधान हो गए। मिलन अब कम, लेकिन गहरे।

एक रात हम चुपके से खेत में मिले। चांदनी रात थी, और हमारा मिलन रोमांटिक था।

धीरे-धीरे, कोमल स्पर्श, लंबे चुंबन। आनंद की नई ऊंचाइयां।

मैंने सोचा, शायद यह हमेशा रहे। लेकिन जीवन अनिश्चित है।

रमेश फिर आया, और इस बार लंबे समय के लिए। सब सामान्य लग रहा था, लेकिन ससुर जी की आंखों में उदासी थी।

रात में रमेश के साथ, लेकिन मन कहीं और।

रमेश चला गया, और हम फिर खेतों में थे। इस बार मिलन में एक विदाई की भावना थी—तीव्र, भावुक।

हम एक-दूसरे में खो गए, और वह पल अनंत लगा।