देवर की छिपी आग
सुबह की धूप खिड़की से झांक रही थी, और मैं अपनी रोज की तरह चाय की केतली चढ़ा रही थी। घर में अभी सब शांत था, बस दूर से बाजार की आवाजें आ रही थीं। मैं रिया हूं, अट्ठाईस साल की, और पिछले तीन साल से राहुल से शादी हुई है। हमारा छोटा सा घर दिल्ली की एक कॉलोनी में है, जहां परिवार के साथ रहना आरामदायक लगता है।
राहुल सुबह जल्दी ऑफिस निकल जाता है, और मैं घर संभालती हूं। आज भी वही रूटीन था – नाश्ता बनाना, कपड़े धोना, और शाम को कुछ पढ़ना। मेरी सास ऊपर के कमरे में आराम कर रही थीं, और देवर अजय अभी सो रहा था। अजय राहुल का छोटा भाई है, चौबीस साल का, कॉलेज खत्म करके नौकरी की तलाश में है।
मैंने चाय बनाई और ट्रे में रखकर ऊपर ले जाने लगी। सीढ़ियां चढ़ते हुए मुझे याद आया कि कल शाम अजय ने कहा था कि वह आज कुछ दोस्तों से मिलने जाएगा। घर में उसकी मौजूदगी से एक तरह की जीवंतता रहती है, जो राहुल की व्यस्तता में कम हो जाती है। मैंने दरवाजा खटखटाया और अंदर जाकर ट्रे रख दी।
अजय बिस्तर पर लेटा था, आंखें बंद, लेकिन लगता था जाग रहा है। मैंने धीरे से कहा, "अजय, चाय रख दी है। उठ जाओ, देर हो रही है।" वह मुस्कुराया और आंखें खोलकर बैठ गया। "धन्यवाद भाभी, आप हमेशा इतनी जल्दी उठ जाती हैं।" उसकी आवाज में एक सादगी थी, जो मुझे अच्छी लगती थी।
मैं नीचे आ गई और अपनी दिनचर्या में लग गई। दोपहर को खाना बनाते हुए मैं सोच रही थी कि जीवन कितना साधारण है। राहुल शाम को लौटता है, हम साथ खाना खाते हैं, और फिर रात हो जाती है। लेकिन कभी-कभी मन में एक खालीपन सा लगता है, जैसे कुछ अधूरा है। अजय घर में रहता है, तो बातें करके समय कट जाता है।
शाम को राहुल का फोन आया कि वह देर से आएगा, किसी मीटिंग में फंस गया है। मैंने सास को खाना परोस दिया और खुद बालकनी में बैठ गई। बाहर की हवा ठंडी थी, और दूर से ट्रैफिक की आवाजें आ रही थीं। अजय नीचे आया और मेरे पास बैठ गया। "भाभी, आज मौसम अच्छा है न?" उसने पूछा।
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हम दोनों ने कुछ देर बातें कीं – उसके कॉलेज के दिनों की, मेरी पुरानी नौकरी की। अजय की आंखों में एक चमक थी, जो मुझे हमेशा आकर्षित करती थी, लेकिन मैंने कभी गौर नहीं किया। वह हंसता था तो उसके चेहरे पर डिंपल पड़ते थे, और बातें इतनी सहज लगती थीं। मैंने खुद को टोका कि यह सिर्फ परिवार का रिश्ता है।
रात हो गई, राहुल अभी नहीं आया था। मैं अपने कमरे में लेटी थी, किताब पढ़ने की कोशिश कर रही थी, लेकिन मन नहीं लग रहा था। अजय का कमरा बगल में था, और कभी-कभी उसकी आवाजें सुनाई देती थीं। आज रात एक अजीब सी बेचैनी थी, जैसे कुछ होने वाला है। मैंने लाइट बंद की और सोने की कोशिश की।
अचानक दरवाजे पर हल्की सी खटखट हुई। मैं उठी और दरवाजा खोला तो अजय खड़ा था। "भाभी, नींद नहीं आ रही। क्या बात कर सकते हैं थोड़ी देर?" उसकी आवाज में एक झिझक थी। मैंने हां कहा और उसे अंदर आने दिया। हम बिस्तर पर बैठ गए, और वह अपनी नौकरी की चिंताओं के बारे में बताने लगा।
बातें करते-करते समय बीतता गया। अजय ने कहा, "भाभी, आप बहुत मजबूत हैं। भैया इतने व्यस्त रहते हैं, फिर भी आप सब संभालती हैं।" उसकी तारीफ में एक गर्माहट थी, जो मुझे छू गई। मैंने मुस्कुराकर कहा, "यह तो जीवन है अजय, सब चलता है।" लेकिन मेरे मन में एक उथल-पुथल शुरू हो गई थी।
उसकी नजरें मेरी आंखों में टिकी थीं, और एक पल के लिए चुप्पी छा गई। मैंने महसूस किया कि हमारा पास होना कुछ अलग लग रहा था। अजय ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ा, "भाभी, मैं आपसे बहुत कुछ कहना चाहता हूं।" मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा।
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उस रात हमारी बातें लंबी चलीं। अजय ने बताया कि वह मुझे पहली नजर में पसंद करने लगा था, लेकिन रिश्ते की वजह से चुप रहा। मैं हैरान थी, क्योंकि मेरे मन में भी कभी-कभी ऐसी भावनाएं आती थीं, लेकिन मैं उन्हें दबाती थी। "अजय, यह गलत है," मैंने कहा, लेकिन मेरी आवाज कमजोर थी।
फिर भी, उसकी आंखों में देखकर मैं पिघलने लगी। वह करीब आया, और हमने एक-दूसरे को गले लगाया। वह गले लगना इतना सुखद था कि मैं विरोध नहीं कर पाई। मेरे मन में संघर्ष था – राहुल के प्रति वफादारी, लेकिन यह आकर्षण भी मजबूत था।
अगले दिन सब सामान्य लग रहा था, लेकिन मेरे मन में तूफान था। मैं रसोई में काम कर रही थी, अजय आया और पानी मांगा। उसकी उंगलियां मेरी उंगलियों से छुईं, और एक करंट सा दौड़ा। मैंने नजरें झुका लीं, लेकिन वह मुस्कुराया। शाम को सास बाहर गईं, और घर में सिर्फ हम दोनों थे।
राहुल का फिर फोन आया कि वह रात को नहीं आएगा, किसी काम से बाहर जाना है। मैं अकेली थी, और अजय ने कहा, "भाभी, आज साथ डिनर करते हैं।" हमने साथ खाना खाया, और बातें फिर गहरी होने लगीं। इस बार अजय ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, और मैंने उसे नहीं हटाया।
रात के समय हम मेरे कमरे में थे। अजय ने धीरे से मेरे होंठों पर吻 किया, और मैंने आंखें बंद कर लीं। वह चुंबन इतना कोमल था कि मेरी सारी हिचकिचाहट दूर हो गई। मैंने उसे कसकर पकड़ लिया, और हम एक-दूसरे में खो गए। मेरे मन में अपराधबोध था, लेकिन इच्छा ज्यादा मजबूत थी।
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अजय की उंगलियां मेरे शरीर पर फिसलने लगीं। उसने मेरी साड़ी का पल्लू सरकाया, और मैंने विरोध नहीं किया। उसकी सांसें मेरी गर्दन पर महसूस हो रही थीं, गर्म और उत्तेजक। मैंने अपनी बाहें उसके गले में डाल दीं, और हम बिस्तर पर लेट गए।
उसकी हर छुअन में एक नई संवेदना थी। वह मेरे स्तनों को सहलाने लगा, धीरे-धीरे, जैसे कोई कीमती चीज छू रहा हो। मैं कराह उठी, और मेरी सांसें तेज हो गईं। अजय ने मेरे कान में फुसफुसाया, "भाभी, आप कितनी सुंदर हैं।" उसकी बातों से मेरी उत्तेजना बढ़ गई।
मैंने उसके कपड़े उतारे, और उसका मजबूत शरीर देखकर मैं मोहित हो गई। हमारी बॉडीज एक-दूसरे से सट गईं, और वह मेरे अंदर प्रवेश करने लगा। वह पल इतना तीव्र था कि मैं चीख पड़ी। दर्द और सुख का मिश्रण, जो मुझे नई दुनिया में ले गया।
हमारी चुदाई की मस्ती शुरू हो गई। अजय के हर धक्के में एक रिदम था, जो मुझे मदहोश कर रहा था। मैंने अपनी कमर उठाई, और हम सिंक्रोनाइज हो गए। मेरी चूत में उसकी गर्माहट महसूस हो रही थी, और हर पल नया आनंद दे रहा था।
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कुछ देर बाद हमने पोजीशन बदली। मैं ऊपर आ गई, और अब मैं कंट्रोल में थी। उसके सीने पर हाथ रखकर मैं ऊपर-नीचे हो रही थी, और उसकी आंखें बंद थीं। मेरे मन में अब कोई अपराधबोध नहीं था, सिर्फ यह मस्ती।
अजय ने मुझे पलटा और पीछे से प्रवेश किया। यह नया अनुभव था, गहरा और उत्तेजक। उसकी उंगलियां मेरी क्लिट को रगड़ रही थीं, और मैं ऑर्गेज्म के कगार पर पहुंच गई। हम दोनों एक साथ झड़ गए, और वह आनंद अवर्णनीय था।
उस रात के बाद हमारी मुलाकातें छिपी हुईं लेकिन नियमित हो गईं। हर बार कुछ नया होता – कभी रसोई में, कभी बालकनी पर। एक दिन दोपहर को सास सो रही थीं, और अजय ने मुझे रसोई में पकड़ लिया। उसने मुझे दीवार से सटा दिया और मेरी साड़ी ऊपर की।
उसकी जीभ मेरी चूत पर फिरने लगी, और मैं कांप उठी। वह चाटता रहा, धीरे-धीरे, और मैंने उसके बाल पकड़ लिए। फिर वह खड़ा हुआ और अंदर घुसा। हमारी सांसें मिली हुई थीं, और वह मस्ती चरम पर थी।
लेकिन हर बार मन में एक डर रहता – अगर किसी को पता चला तो? फिर भी, वह आकर्षण रोक नहीं पाता। अजय की मोहब्बत में एक गहराई थी, जो मुझे बांधे रखती थी। एक शाम हम छत पर थे, और उसने मुझे कसकर गले लगाया।
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हमने वहां प्यार किया, खुले आसमान के नीचे। हवा हमारी बॉडीज को छू रही थी, और वह अनुभव रोमांचक था। अजय के हर स्पर्श में प्यार था, और मैं खुद को पूरी तरह समर्पित कर चुकी थी।
समय बीतता गया, और हमारी यह छिपी आग जलती रही। हर रात एक नई कहानी बनती, भावनाओं से भरी, मस्ती से सजी। मैं जानती थी कि यह जोखिम भरा है, लेकिन उसकी बाहों में मिलने वाला सुख सब भुला देता था।
एक रात फिर हम साथ थे, और अजय ने कहा, "भाभी, मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूंगा।" मैंने उसकी आंखों में देखा, और हम फिर एक हो गए। उसकी चुदाई की मस्ती में मैं खो गई, हर पल को जीते हुए।
उसकी गति तेज हो गई, और मैंने अपनी टांगें उसके कमर पर लपेट लीं। हमारी बॉडीज पसीने से भीगी हुई थीं, और वह गंध उत्तेजक थी। मैंने कराहते हुए कहा, "अजय, और तेज।" वह मेरी बात मानता रहा, और हम चरम पर पहुंचे।
उस पल में सब कुछ ठहर सा गया था। हमारी सांसें मिली हुईं, और दिल की धड़कनें एक साथ बज रही थीं।