परिवार की छिपी आग

सुबह की धूप कमरे में छनकर आ रही थी, और मैं अपनी किताब पढ़ते हुए बिस्तर पर लेटा हुआ था। घर में हमेशा की तरह शांति थी, माँ किचन में चाय बना रही थीं, और पापा अखबार पढ़ते हुए सोफे पर बैठे थे। आज रविवार था, इसलिए कोई जल्दी नहीं थी, बस आराम से दिन गुजारने का प्लान था।

मैं राहुल हूँ, 22 साल का, और हमारा परिवार छोटा सा है – पापा राजेश, माँ, मेरी बड़ी बहन प्रिया और मैं। प्रिया 25 की है, और वो घर से ही अपना फ्रीलांस काम करती है। पापा एक फैक्ट्री में मैनेजर हैं, और माँ घर संभालती हैं। हम दिल्ली के एक छोटे से अपार्टमेंट में रहते हैं, जहां हर दिन एक जैसा लगता है।

उस दिन माँ ने आवाज लगाई, "राहुल, प्रिया, नाश्ता तैयार है।" मैं किताब बंद करके उठा और डाइनिंग टेबल पर चला गया। प्रिया पहले से वहाँ बैठी थी, अपने फोन में कुछ देख रही थी। पापा भी अखबार मोड़कर आ गए। हम सबने साथ में परांठे खाए, और बातें कीं – पापा ने अपनी नौकरी के बारे में बताया, प्रिया ने अपने नए प्रोजेक्ट की चर्चा की।

नाश्ते के बाद माँ बाजार चली गईं, कुछ सामान लाने। घर में अब सिर्फ हम तीन थे। मैं अपने कमरे में वापस चला गया, लेकिन प्रिया और पापा लिविंग रूम में बैठे रहे। मैंने दरवाजा थोड़ा खुला छोड़ दिया था, क्योंकि गर्मी लग रही थी। बाहर से उनकी बातें सुनाई दे रही थीं, कुछ हल्की-फुल्की हंसी।

प्रिया हमेशा से ही घर की लाड़ली रही है। वो मुझसे तीन साल बड़ी है, लेकिन हमारी बॉन्डिंग अच्छी है। बचपन में हम साथ खेलते थे, अब भी कभी-कभी फिल्में देखते हैं। पापा उसके साथ ज्यादा कनेक्टेड लगते हैं, शायद इसलिए कि वो पहली संतान है। मैंने कभी इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

उस दोपहर को मैंने कुछ अजीब महसूस किया। मैं पानी पीने किचन गया, तो देखा प्रिया पापा के बगल में सोफे पर बैठी है, और पापा का हाथ उसके कंधे पर है। वो बात कर रहे थे, लेकिन आवाज धीमी थी। मैंने कुछ नहीं कहा और वापस आ गया। मन में एक हल्की सी बेचैनी हुई, लेकिन मैंने इग्नोर कर दिया।

शाम होने लगी थी। माँ अभी तक नहीं लौटीं, शायद किसी सहेली से मिलने चली गईं। मैं अपने कमरे में लैपटॉप पर काम कर रहा था, जब प्रिया अंदर आई। "राहुल, क्या कर रहा है?" उसने पूछा। मैंने मुस्कुराकर कहा, "बस असाइनमेंट। तू?" वो बिस्तर पर बैठ गई, "कुछ नहीं, बोर हो रही हूँ। पापा बाहर बालकनी में हैं।"

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हम थोड़ी देर बातें करते रहे। प्रिया ने अपनी जॉब के बारे में बताया, कैसे क्लाइंट्स परेशान करते हैं। उसकी आँखों में एक थकान थी, लेकिन वो हमेशा की तरह चुलबुली लग रही थी। फिर अचानक पापा की आवाज आई, "प्रिया, इधर आना।" वो उठी और चली गई। मैंने सोचा, शायद कुछ काम होगा।

कुछ मिनट बाद मैं बाहर गया, तो देखा लिविंग रूम खाली है। पापा और प्रिया उनके कमरे में थे, दरवाजा बंद। मैंने कान लगाया, लेकिन कुछ सुनाई नहीं दिया। मन में एक शक सा उठा, लेकिन मैंने खुद को समझाया कि ज्यादा सोच रहा हूँ। फिर भी, मैं वहीं खड़ा रहा।

अंदर से हल्की सी हंसी की आवाज आई। मैंने दरवाजा थोड़ा धक्का दिया, वो लॉक नहीं था। अंदर का नजारा देखकर मैं स्तब्ध रह गया। प्रिया पापा की गोद में बैठी थी, और पापा उसके गाल पर हाथ फेर रहे थे। वो दोनों मुझे देखकर चौंक गए। "राहुल, तू..." प्रिया ने कहा, लेकिन पापा ने उसे चुप कराया।

मैं वहाँ से भागकर अपने कमरे में आ गया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। क्या ये सच था? पापा और प्रिया? मैंने कभी सोचा नहीं था। लेकिन अब सब कुछ याद आने लगा – उनकी करीबी बातें, वो स्पर्श जो सामान्य से ज्यादा लगते थे। मैं बिस्तर पर बैठा रहा, सोचता रहा।

कुछ देर बाद प्रिया मेरे कमरे में आई। उसकी आँखें लाल थीं। "राहुल, सुन... ये... ये सब..." वो बोल नहीं पा रही थी। मैंने गुस्से में कहा, "क्या है ये? पापा के साथ?" वो रोने लगी, "ये सालों से चल रहा है। माँ को पता नहीं। पापा... वो मुझे प्यार करते हैं, लेकिन अलग तरीके से।"

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मैं हैरान था। प्रिया ने बताया कि ये सब तब शुरू हुआ जब वो 18 की थी। पापा की करीबी बढ़ी, और फिर... मैं सुनकर सन्न रह गया। लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी, जैसे वो इसे स्वीकार कर चुकी हो। "तू किसी को मत बताना," उसने कहा। मैं चुप रहा।

रात हुई। माँ लौट आईं, और डिनर नॉर्मल तरीके से हुआ। लेकिन मेरे मन में तूफान था। पापा की नजर मुझ पर थी, जैसे चेतावनी दे रही हो। प्रिया सामान्य लगने की कोशिश कर रही थी। डिनर के बाद मैं सोने चला गया, लेकिन नींद नहीं आई।

अगले दिन सुबह माँ फिर बाहर गईं। घर में सन्नाटा था। मैं किचन में था, जब पापा आए। "राहुल, कल जो देखा, वो भूल जा," उन्होंने कहा। उनकी आवाज सख्त थी। मैंने कुछ नहीं कहा। फिर प्रिया आई, और पापा ने उसे बुलाया।

इस बार उन्होंने दरवाजा बंद नहीं किया। शायद जानबूझकर। मैं छिपकर देख रहा था। पापा ने प्रिया को अपनी ओर खींचा, और उसके होंठों पर kiss किया। मैं स्तब्ध था, लेकिन हिल नहीं पाया। प्रिया ने विरोध नहीं किया, बल्कि साथ दिया।

मेरा मन उलझ गया। एक तरफ गुस्सा, दूसरी तरफ एक अजीब सी उत्सुकता। मैं वहीं खड़ा रहा। पापा ने प्रिया की कमीज उतारी, और उसके शरीर को छूने लगे। प्रिया की सांसें तेज हो गईं। "पापा... राहुल..." उसने कहा, लेकिन पापा ने कहा, "उसे देखने दो। अब वो भी जानता है।"

मैं अंदर चला गया। दिल की धड़कन इतनी तेज थी कि लग रहा था बाहर निकल आएगी। पापा ने मुझे देखा, और मुस्कुराए। "आ जा, बेटा। ये हमारा राज है।" प्रिया की आँखों में शर्म थी, लेकिन वो चुप रही।

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पापा ने प्रिया को बिस्तर पर लिटाया। मैं बस देखता रहा। उनके हाथ प्रिया के शरीर पर घूम रहे थे, और वो आहें भर रही थी। मेरे मन में संघर्ष था – ये गलत था, लेकिन देखना रोक नहीं पा रहा था। पापा ने अपने कपड़े उतारे, और प्रिया को अपनी ओर खींचा।

उस पल में सब कुछ बदल गया। पापा ने प्रिया के साथ वो किया जो मैंने कभी सोचा नहीं था। उनकी हरकतें इतनी नैचुरल लग रही थीं, जैसे सालों का अभ्यास हो। प्रिया की आँखें बंद थीं, और उसके चेहरे पर दर्द और सुख का मिश्रण था। मैं वहीं खड़ा रहा, अपने शरीर में एक नई उत्तेजना महसूस करते हुए।

जब पापा ने प्रिया को चोदा, तो वो मेरे सामने था। उनकी सांसें तेज, प्रिया की कराहें कमरे में गूंज रही थीं। "देख, राहुल, ये है प्यार," पापा ने कहा। मैं कुछ बोल नहीं पाया। प्रिया ने मेरी तरफ देखा, उसकी आँखों में आंसू थे, लेकिन मुस्कान भी।

उसके बाद सब कुछ और गहरा हो गया। पापा ने मुझे भी शामिल होने को कहा, लेकिन मैं पीछे हट गया। फिर भी, वो सीन मेरे दिमाग में बस गया। प्रिया उठी, और मेरे पास आई। "राहुल, समझ," उसने कहा। लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा था।

दिन बीतते गए। घर में अब एक नई टेंशन थी। माँ को कुछ पता नहीं चला, लेकिन हम तीनों के बीच एक राज था। एक शाम, जब माँ बाहर थीं, पापा ने फिर प्रिया को बुलाया। इस बार मैं खुद अंदर गया।

पापा ने प्रिया को किस किया, उनके हाथ उसके स्तनों पर थे। प्रिया ने आह भरी। मैं देखता रहा, मेरे शरीर में गर्मी बढ़ रही थी। पापा ने कहा, "राहुल, अब तू भी।" मैं हिचकिचाया, लेकिन प्रिया ने मेरा हाथ पकड़ा।

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उस रात, सब कुछ हुआ। पापा ने प्रिया को मेरे सामने फिर चोदा, लेकिन इस बार ज्यादा भावनात्मक तरीके से। उनकी हरकतें धीमी थीं, प्रिया की सिसकियां कमरे में फैल रही थीं। मैंने भी छुआ, पहली बार। वो अनुभव अजीब था – गलत, लेकिन रोमांचक।

प्रिया के शरीर की गर्मी, पापा की मजबूत पकड़ – सब मिलकर एक तूफान सा था। जब पापा ने उसे पीछे से लिया, तो प्रिया की चीख निकली। मैंने उसके होंठ चूमे, ताकि आवाज बाहर न जाए। वो पल इतना इंटेंस था कि समय रुक सा गया।

फिर पापा ने मुझे मौका दिया। मैंने प्रिया को छुआ, उसके अंदर गया। वो कराह रही थी, "राहुल... पापा..." पापा देखते रहे, मुस्कुराते हुए। वो अनुभव नया था, भावनाओं से भरा। दर्द, प्यार, गुस्सा – सब मिक्स।

उसके बाद कई बार ऐसा हुआ। हर बार नया लगता। कभी पापा उसे अकेले लेते, मैं देखता। कभी हम साथ। प्रिया की भावनाएं बदलती रहतीं – कभी शर्म, कभी खुशी। मेरे मन में कन्फ्लिक्ट था, लेकिन रोक नहीं पाता।

एक रात, जब माँ सो रही थीं, पापा ने प्रिया को अपने कमरे में बुलाया। मैं भी चला गया। पापा ने उसे बिस्तर पर पटका, उसके कपड़े फाड़ दिए। प्रिया की सांसें तेज थीं। पापा ने उसे जोर से चोदा, मेरे सामने। उसकी चीखें दबी हुई थीं।

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मैंने भी हिस्सा लिया। प्रिया के शरीर की हर गंध, हर स्पर्श याद है। पापा की ताकत, प्रिया की नरमी – वो मिश्रण अद्भुत था। जब हम खत्म हुए, प्रिया रो रही थी, लेकिन गले लग गई।

अब ये हमारी जिंदगी का हिस्सा था। टेंशन, प्यार, राज – सब intertwined। हर सीन में नई भावना जुड़ती, कभी jealousy, कभी possession।

एक शाम, पापा ने प्रिया को सोफे पर लिया। मैं पास खड़ा था। उनकी हरकतें तेज थीं, प्रिया की आँखें बंद। मैंने उसके हाथ पकड़े, जबकि पापा अंदर-बाहर कर रहे थे। वो पल इतना सेंसरी था – पसीने की गंध, सांसों की आवाज।

फिर मैंने प्रिया को चोदा, पापा देखते रहे। उसकी आहें अलग थीं, ज्यादा इमोशनल। "राहुल, I love you," उसने कहा। पापा हंस पड़े।

हर बार वैरायटी – कभी धीमा, कभी रफ। भावनाएं बदलती रहतीं। कन्फ्लिक्ट हमेशा था, लेकिन आकर्षण मजबूत।

अब भी याद आता है वो रात जब पापा ने प्रिया को मेरे सामने लंबे समय तक चोदा। उनकी stamina, प्रिया की submission – सब परफेक्ट। मैं छूता रहा, महसूस करता रहा।

प्रिया की आँखों में वो चमक, पापा की मुस्कान। हम तीनों connected, एक राज में।