परिवार की छिपी इच्छाएँ
सुबह के नौ बजे थे, और हमारा घर अपनी रोज की शांति में डूबा हुआ था। मैं, राहुल, अपनी किताबों के बीच बैठा कॉलेज की पढ़ाई में लगा हुआ था। बाहर से पक्षियों की चहचहाहट आ रही थी, और रसोई से नेहा भाभी के बर्तन धोने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। पापा विजय जी अपने कमरे में अखबार पढ़ रहे थे, जबकि दीदी प्रिया ऊपर वाले कमरे में अपने काम में व्यस्त थी। हमारा परिवार दिल्ली के एक छोटे से मोहल्ले में रहता था, जहां हर दिन एक जैसा लगता था – सुबह का नाश्ता, दिन की भागदौड़, और शाम को सबका साथ में बैठना।
मैं 22 साल का था, इंजीनियरिंग के आखिरी साल में, और घर में सबसे छोटा। पापा 50 के थे, अपना छोटा सा बिजनेस चलाते थे, जो कपड़ों का था। दीदी 28 की थी, दो साल पहले उनकी शादी हुई थी, लेकिन उनका पति जॉब के सिलसिले में मुंबई चला गया था, तो वो हमारे साथ ही रहती थी। नेहा भाभी 26 की थीं, मेरे बड़े भाई अजय की पत्नी, जो 30 का था और बैंक में काम करता था। अजय भैया पिछले महीने से बाहर ट्रेनिंग पर थे, इसलिए भाभी भी घर पर ही थीं। माँ का देहांत पांच साल पहले हो गया था, जिसके बाद घर की जिम्मेदारी पापा और दीदी पर ज्यादा थी।
उस दिन मैंने नाश्ता किया और कॉलेज जाने की तैयारी करने लगा। पापा ने मुझे आवाज़ दी, "राहुल, आज शाम को जल्दी आ जाना, घर पर कुछ काम है।" मैंने हामी भरी और निकल गया। कॉलेज में दिन सामान्य गुजरा, दोस्तों के साथ बातें, लेक्चर, और शाम को घर लौटते हुए मैं सोच रहा था कि पापा ने क्या काम कहा था। घर पहुंचा तो देखा कि सब लोग लिविंग रूम में बैठे थे। दीदी चाय बना रही थी, और भाभी कुछ किताब पढ़ रही थीं। पापा ने मुस्कुराते हुए कहा, "बैठो बेटा, आज हम सब मिलकर पुरानी एल्बम देखेंगे।"
हम सबने मिलकर पुरानी तस्वीरें निकालीं। दीदी हंसते हुए बोली, "देखो राहुल, ये वो समय है जब तू छोटा था और मैं तुझे गोद में उठाती थी।" भाभी ने भी हंसकर कहा, "प्रिया दी, आप कितनी प्यारी लग रही हो इसमें।" पापा की आंखों में एक पुरानी याद की चमक थी। वो बोले, "हां, वो दिन अच्छे थे। अब तो सब बड़े हो गए हैं।" शाम ऐसे ही गुजरी, लेकिन मुझे लगा कि पापा की नजरें कभी-कभी दीदी और भाभी पर थोड़ी ज्यादा देर रुकती थीं। शायद मैं गलत सोच रहा था, क्योंकि घर में सब कुछ सामान्य था।
रात को डिनर के बाद मैं अपने कमरे में चला गया। लेकिन नींद नहीं आ रही थी, तो मैं पानी पीने नीचे गया। रसोई में अंधेरा था, लेकिन हॉल से हल्की रोशनी आ रही थी। मैंने देखा कि पापा और दीदी सोफे पर बैठे बातें कर रहे थे। दीदी के चेहरे पर एक उदासी थी, वो बोली, "पापा, रोहन (उसका पति) से बात हुई, वो कह रहा है कि अभी दो महीने और लगेंगे। मैं अकेली महसूस करती हूं।" पापा ने उसके कंधे पर हाथ रखा, "बेटी, मैं हूं ना। तू चिंता मत कर।" उनकी आवाज़ में एक गर्माहट थी, जो मुझे थोड़ा अजीब लगा, लेकिन मैं चुपचाप वापस चला गया।
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अगले कुछ दिनों में घर का माहौल थोड़ा बदलने लगा। पापा ज्यादा समय घर पर बिताने लगे, और दीदी के साथ उनकी बातें बढ़ गईं। एक दोपहर मैं कॉलेज से जल्दी लौटा तो देखा कि भाभी और पापा रसोई में थे। भाभी कुछ सब्जी काट रही थीं, और पापा उनके पास खड़े होकर बात कर रहे थे। "नेहा, अजय कब आएगा?" पापा ने पूछा। भाभी ने मुस्कुराकर कहा, "पापा जी, अगले हफ्ते। लेकिन आप तो हैं ना, घर सूना नहीं लगता।" पापा की हंसी में कुछ अलग था, लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया।
फिर एक रात हुई, जब सब सो चुके थे। मैं जाग रहा था, क्योंकि परीक्षा की टेंशन थी। अचानक मुझे ऊपर से कुछ आवाज़ आई। दीदी का कमरा ऊपर था। मैं चुपके से गया तो देखा कि दरवाजा थोड़ा खुला था। अंदर पापा और दीदी थे। दीदी रो रही थी, और पापा उसे गले लगा रहे थे। "पापा, मैं इतनी अकेली हूं," दीदी ने कहा। पापा ने उसके बालों में हाथ फेरा, "मैं हूं ना, प्रिया। तुझे कभी अकेला नहीं होने दूंगा।" उनकी आंखों में एक ऐसी चमक थी जो पिता की नहीं लग रही थी। मैं स्तब्ध खड़ा रहा, लेकिन कुछ कहा नहीं।
उस रात मैं सो नहीं सका। मन में सवाल घूमते रहे। क्या पापा और दीदी के बीच कुछ गलत हो रहा है? लेकिन अगले दिन सब सामान्य था। शाम को भाभी ने मुझे बुलाया, "राहुल, आज मैंने स्पेशल डिनर बनाया है।" टेबल पर सब बैठे, पापा ने दीदी की तरफ देखकर कहा, "प्रिया, तू आज बहुत अच्छी लग रही है।" दीदी शरमा गई, "पापा, आप भी ना।" भाभी ने हंसकर कहा, "हां पापा जी, प्रिया दी सच में खूबसूरत हैं।" मुझे लगा कि घर में एक अजीब सी गर्माहट फैल रही है।
धीरे-धीरे मैंने नोटिस किया कि पापा भाभी के साथ भी ज्यादा समय बिताने लगे। एक दिन दोपहर में मैं घर आया तो देखा कि पापा और भाभी लिविंग रूम में थे। भाभी की आंखें नम थीं, वो बोली, "पापा जी, अजय इतने दिनों से दूर है, मैं उदास हो जाती हूं।" पापा ने उसके हाथ पकड़ा, "नेहा, मैं हूं। तुझे कभी कमी नहीं होने दूंगा।" उनकी उंगलियां भाभी के हाथ पर रुक गईं, और भाभी ने नजरें झुका लीं। मैं चुपचाप अपने कमरे में चला गया, लेकिन मन में उथल-पुथल मची थी।
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फिर वो रात आई जब सब कुछ बदल गया। मैं देर रात जागा हुआ था। घर में सन्नाटा था। अचानक मुझे पापा के कमरे से आवाज़ आई। मैं चुपके से गया तो दरवाजा बंद था, लेकिन अंदर से हल्की-हल्की बातें सुनाई दे रही थीं। मैंने कान लगाया तो दीदी की आवाज़ थी, "पापा, ये गलत है... लेकिन मैं रुक नहीं पा रही।" पापा ने कहा, "प्रिया, ये हमारी जरूरत है।" मैंने दरवाजा थोड़ा धकेला, वो खुला था। अंदर का दृश्य मुझे स्तब्ध कर गया।
पापा और दीदी बिस्तर पर थे। दीदी की साड़ी थोड़ी सरकी हुई थी, और पापा उसके कंधे चूम रहे थे। दीदी की सांसें तेज़ थीं, वो बोली, "पापा, मुझे डर लगता है।" पापा ने उसके होंठों पर उंगली रखी, "शश... ये हमारा राज़ है।" उनकी उंगलियां दीदी की कमर पर फिसलने लगीं, और दीदी ने आंखें बंद कर लीं। मैं वहां से हट गया, लेकिन मन में एक अजीब सी जलन थी। क्या ये सही है? लेकिन मैं कुछ कर नहीं सका।
अगले दिन मैंने दीदी से बात करने की कोशिश की, लेकिन वो सामान्य लग रही थी। शाम को पापा ने कहा, "राहुल, आज रात हम सब मिलकर मूवी देखेंगे।" हम सब बैठे, लेकिन मेरी नजरें पापा और दीदी पर थीं। मूवी के दौरान पापा का हाथ दीदी की जांघ पर था, और दीदी ने कुछ नहीं कहा। भाभी भी पास बैठी थी, और मुझे लगा कि वो भी कुछ महसूस कर रही है। रात गहराने लगी।
उस रात फिर मैं जागा। इस बार भाभी के कमरे से आवाज़ आई। मैं गया तो देखा पापा अंदर थे। भाभी बिस्तर पर लेटी थी, और पापा उसके पास बैठे थे। "नेहा, तू इतनी उदास क्यों है?" पापा ने पूछा। भाभी ने कहा, "पापा जी, अकेलापन खाए जा रहा है।" पापा ने उसे गले लगाया, और धीरे-धीरे उनके होंठ भाभी के गले पर उतर आए। भाभी ने सिसकी ली, "पापा जी... ये..." लेकिन वो रुकी नहीं। पापा की उंगलियां भाभी की साड़ी खोलने लगीं।
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मैं वहां खड़ा देखता रहा। पापा ने भाभी को बिस्तर पर लिटाया, और उनके चुंबन गहरे होने लगे। भाभी की सांसें तेज़ हो गईं, वो बोली, "पापा जी, मुझे अच्छा लग रहा है।" पापा ने उसके स्तनों को छुआ, और भाभी ने आह भरी। उनकी हर हरकत में एक भावनात्मक गहराई थी, जैसे वो भाभी की उदासी को दूर कर रहे हों। पापा ने धीरे से भाभी की साड़ी उतारी, और उनके शरीर पर हाथ फेरा। भाभी की आंखों में आंसू थे, लेकिन होंठों पर मुस्कान।
पापा ने अपना कमीज उतारा, और भाभी को अपनी बाहों में लिया। उनके शरीर एक-दूसरे से सट गए, और पापा ने भाभी के कान में कुछ फुसफुसाया। भाभी ने हामी भरी, और पापा ने धीरे से प्रवेश किया। भाभी की आह निकली, लेकिन वो खुशी की थी।他们的 गतिविधियां धीमी और भावुक थीं, हर पल में भाभी की उदासी कम होती लग रही थी। पापा के हर धक्के के साथ भाभी की सांसें मिल रही थीं, और कमरे में एक अजीब सी शांति थी।
उसके बाद पापा उठे और बाहर आए। मुझे देखकर वो रुक गए, लेकिन कुछ नहीं कहा। अगले दिन दीदी और भाभी दोनों खुश लग रही थीं। शाम को पापा ने हमें बुलाया, "आज हम सब एक साथ रहेंगे।" रात हुई, और इस बार सब एक कमरे में थे। दीदी और भाभी पापा के पास थीं। पापा ने दीदी को गले लगाया, और भाभी को भी। धीरे-धीरे उनके चुंबन शुरू हुए। दीदी ने भाभी का हाथ पकड़ा, "नेहा, हम साथ हैं।"
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पापा ने दीदी की साड़ी खोली, और भाभी की भी। उनके शरीर नंगे हो गए, और पापा के स्पर्श से दोनों की आंखें बंद हो गईं। पापा ने पहले दीदी को चूमा, उसके स्तनों को सहलाया, फिर भाभी की बारी आई। दीदी की सिसकियां कमरे में गूंज रही थीं, और भाभी ने पापा के शरीर पर हाथ फेरा। पापा ने दीदी को लिटाया, और प्रवेश किया। दीदी की आह में दर्द और सुख मिश्रित था। "पापा, और तेज़," दीदी ने कहा। पापा की गति बढ़ी, और दीदी का शरीर कांपने लगा।
फिर पापा भाभी की तरफ मुड़े। भाभी तैयार थी, उनकी आंखों में इच्छा थी। पापा ने भाभी को ऊपर लिया, और भाभी ने खुद को समर्पित कर दिया। उनके हर मूवमेंट में एक नई सेंसेशन थी, जैसे हवा में फैली गर्माहट। दीदी ने भाभी के स्तनों को छुआ, और तीनों एक-दूसरे में खो गए। पापा की सांसें तेज़ हो गईं, और उन्होंने दोनों को एक साथ संतुष्ट किया। कमरे में पसीने की महक थी, और भावनाओं का तूफान।
मैं वहां खड़ा सब देख रहा था, मन में कन्फ्लिक्ट था। लेकिन पापा ने मुझे देखा और कहा, "राहुल, आ जा। ये परिवार है।" मैं हिचकिचाया, लेकिन दीदी ने हाथ बढ़ाया। मैं उनके पास गया, और दीदी ने मुझे चूमा। उस पल में सब कुछ बदल गया। पापा ने भाभी को संभाला, और मैं दीदी के साथ था। दीदी की गर्माहट मुझे महसूस हुई, उसके होंठ मेरे होंठों पर थे। "राहुल, तू मेरा भाई है, लेकिन अब ज्यादा," दीदी ने कहा।
मैंने दीदी को लिटाया, और धीरे से उसके शरीर पर हाथ फेरा। दीदी की आंखें बंद थीं, और मैंने प्रवेश किया। उसकी आह में एक नई भावना थी, जैसे सालों की दबी इच्छा। पापा और भाभी पास ही थे, उनकी गतिविधियां जारी थीं। भाभी की सिसकियां मिल रही थीं दीदी की आवाज़ों से। हर पल नया था, सेंसरी अनुभवों से भरा – स्पर्श की कोमलता, सांसों की गर्मी, और भावनाओं की गहराई।
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फिर हम सब एक साथ हो गए। पापा ने हमें निर्देशित किया, और हमारी बॉडीज इंटरवाइन हो गईं। दीदी और भाभी ने एक-दूसरे को चूमा, जबकि पापा और मैं उन्हें संतुष्ट कर रहे थे। उस रात की हर हरकत में वैरायटी थी – कभी धीमी, कभी तेज़, कभी भावुक, कभी जंगली। मन के कन्फ्लिक्ट धुंधले हो गए, और सिर्फ सुख बचा।
सुबह होने को थी, लेकिन हम रुके नहीं। पापा ने भाभी को फिर से लिया, उसके शरीर को हर कोने से एक्सप्लोर किया। भाभी की आंखों में आंसू थे, लेकिन खुशी के। "पापा जी, ये कभी खत्म न हो," वो बोली। दीदी मेरे साथ थी, उसके स्पर्श में एक बहन की ममता और प्रेमिका की इच्छा मिश्रित थी। हमारी सांसें मिल रही थीं, और कमरा हमारी भावनाओं से भरा था।
फिर पापा ने दीदी को बुलाया, और हम सब फिर से जुड़ गए। उनके चुंबन, स्पर्श, और गतिविधियां एक अंतहीन लूप में थीं। हर सीन में नई भावना जुड़ रही थी – कभी ईर्ष्या, कभी समर्पण, कभी शुद्ध सुख। मैं दीदी के अंदर था, पापा भाभी के, और हमारी नजरें मिलीं। उस पल में परिवार की परिभाषा बदल गई।