दोस्त की छुपी प्यास

सुबह की धूप हल्की-हल्की कमरे में घुस रही थी, जब मैं अपनी कॉफी का मग हाथ में लेकर बालकनी में खड़ा था। आज का दिन वैसे ही सामान्य लग रहा था, जैसे हर शनिवार होता है – काम से छुट्टी, कोई खास प्लान नहीं, बस थोड़ा आराम और शाम को दोस्तों से मिलना। मैं राहुल हूं, दिल्ली में एक आईटी कंपनी में जॉब करता हूं, और पिछले पांच साल से यही रूटीन चला आ रहा है।

अजय मेरा सबसे पुराना दोस्त है, कॉलेज के दिनों से। वो अब शादीशुदा है, नेहा से, जो एक स्कूल टीचर है, और उनकी छोटी बहन प्रिया भी उनके साथ ही रहती है, जो अभी कॉलेज में पढ़ रही है। मैं अक्सर उनके घर चला जाता हूं, क्योंकि मेरा अपार्टमेंट थोड़ा अकेला लगता है। आज भी मैंने सोचा कि शाम को उनके यहां जाऊंगा, थोड़ी गपशप करेंगे, और शायद कोई मूवी देखेंगे।

दोपहर को मैंने अजय को कॉल किया। "भाई, आज शाम फ्री है? चल, तेरे घर आता हूं," मैंने कहा। वो हंसकर बोला, "आ जा यार, नेहा ने आज स्पेशल चाय बनाई है। प्रिया भी घर पर है।" मैंने अपनी बाइक निकाली और उनके अपार्टमेंट की तरफ चल पड़ा। रास्ते में ट्रैफिक था, लेकिन मन हल्का था, कोई टेंशन नहीं।

उनके घर पहुंचते ही दरवाजा नेहा ने खोला। वो मुस्कुराई और बोली, "आओ राहुल, अजय अभी बाथरूम में है।" मैं अंदर आया, सोफे पर बैठ गया। घर हमेशा की तरह साफ-सुथरा था, दीवार पर फैमिली फोटोज लगी हुईं। प्रिया किचन से निकली, हाथ में स्नैक्स की प्लेट लिए, और बोली, "हाय भैया, कितने दिनों बाद आए हो।" मैंने हंसकर कहा, "हां, काम में忙 था।"

अजय बाहर आया, हमने बातें शुरू कीं। वो अपनी जॉब के बारे में बता रहा था, कैसे बॉस की वजह से परेशान है। नेहा चाय लेकर आई, और हम सब बैठकर गप मारने लगे। प्रिया भी बीच-बीच में अपनी कॉलेज की स्टोरीज सुना रही थी। शाम ढल रही थी, और घर में एक आरामदायक माहौल था। मैंने सोचा, ऐसे दोस्त और उनका परिवार होना कितना अच्छा है।

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रात होने लगी थी, और अजय को अचानक ऑफिस से कॉल आ गया। "यार, इमरजेंसी है, मुझे जाना पड़ेगा। रात को लेट हो सकता हूं," उसने कहा। मैंने कहा, "कोई बात नहीं, मैं भी निकलता हूं।" लेकिन नेहा ने रोका, "अरे राहुल, रुक जाओ न, डिनर करके जाना। अजय चला जाएगा, लेकिन हम लोग अकेले बोर हो जाएंगे।" प्रिया ने भी कहा, "हां भैया, रहो न।" मैं रुक गया, सोचा ठीक है।

अजय चला गया, और हम तीनों डाइनिंग टेबल पर बैठे। नेहा ने डिनर सर्व किया – दाल, सब्जी, रोटी, सब घर का बना। खाते हुए नेहा ने पूछा, "राहुल, तुम्हारी कोई गर्लफ्रेंड बनी या नहीं?" मैं हंस पड़ा, "नहीं भाभी, अभी तक नहीं।" प्रिया चुपचाप मुस्कुरा रही थी। बातें चलती रहीं, लेकिन अब माहौल थोड़ा अलग लग रहा था, जैसे कोई अनकही बात हवा में घुली हो।

डिनर के बाद हम लिविंग रूम में बैठे। नेहा ने टीवी ऑन किया, लेकिन उसकी नजरें बार-बार मुझ पर टिक रही थीं। प्रिया सोफे पर मेरे बगल में बैठी थी, उसके कंधे कभी-कभी मेरे से टच हो जाते। मैंने महसूस किया कि नेहा की सांसें थोड़ी तेज हैं, लेकिन मैंने इग्नोर किया। "चलो, कोई मूवी लगाते हैं," मैंने कहा। नेहा ने सहमति दी, लेकिन उसकी आंखों में कुछ था जो पहले नहीं था।

मूवी शुरू हुई, लेकिन नेहा बीच में उठी और किचन चली गई। प्रिया मेरे पास सरक आई, और धीरे से बोली, "भैया, तुम्हें पता है, भाभी को अजय भैया के जाने से बुरा लगता है। वो अकेली महसूस करती हैं।" मैं चौंक गया, "क्या मतलब?" वो चुप रही, लेकिन उसकी उंगली मेरे हाथ पर फेरने लगी। दिल की धड़कन तेज हो गई, लेकिन मैंने खुद को संभाला।

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नेहा वापस आई, उसके हाथ में वाइन की बॉटल थी। "चलो, थोड़ा मूड बनाते हैं," उसने कहा। मैं हिचकिचाया, लेकिन प्रिया ने ग्लास भर दिया। हम पीने लगे, और बातें अब पर्सनल होने लगीं। नेहा ने कहा, "राहुल, तुम इतने अच्छे हो, कभी सोचा क्यों नहीं शादी के बारे में?" उसकी आवाज में एक उदासी थी, जैसे कोई दबी हुई इच्छा। प्रिया की नजरें भी अब अलग लग रही थीं।

वाइन का असर होने लगा था। नेहा मेरे करीब आ बैठी, उसका हाथ मेरे कंधे पर रखा। "अजय हमेशा बिजी रहता है, मैं अकेली पड़ जाती हूं," उसने धीरे से कहा। मैंने उसकी आंखों में देखा, वहां एक प्यास थी, जो शब्दों से ज्यादा बोल रही थी। प्रिया ने अपना सिर मेरे कंधे पर टिका दिया, और बोली, "मैं भी, भैया, कॉलेज में सब कुछ है, लेकिन घर में..." उसकी बात अधूरी रही।

माहौल अब गर्म हो चुका था। नेहा की उंगलियां मेरी गर्दन पर फिसल रही थीं, और मैं महसूस कर रहा था कि मेरा शरीर प्रतिक्रिया दे रहा है। मैंने कहा, "भाभी, ये ठीक नहीं..." लेकिन मेरी आवाज कमजोर थी। प्रिया ने मेरे होंठों पर उंगली रख दी, "शशश, कुछ मत कहो।" नेहा ने मुझे अपनी तरफ खींचा, और हमारा पहला चुंबन हुआ – नरम, लेकिन गहरा।

हम बेडरूम में चले गए। नेहा के कपड़े उतरते ही उसकी त्वचा की गर्माहट ने मुझे घेर लिया। मैंने उसके शरीर को छुआ, हर स्पर्श में उसकी उदासी पिघल रही थी। प्रिया भी साथ थी, उसकी युवा ऊर्जा ने सब कुछ और जीवंत कर दिया। नेहा की सांसें तेज हो गईं, जैसे सालों की प्यास बुझ रही हो। मैंने उसे अपनी बाहों में लिया, हमारा मिलन धीमा लेकिन भावुक था।

प्रिया की बारी आई। वो शर्माती हुई आई, लेकिन उसकी आंखों में उत्सुकता थी। मैंने उसके बालों में उंगलियां फिराईं, उसके होंठों को चूमा। नेहा हमें देख रही थी, उसकी मुस्कान में संतोष था। हम तीनों एक-दूसरे में खो गए, हर पल नया अनुभव लेकर आ रहा था। प्रिया की कोमलता और नेहा की परिपक्वता का मिश्रण अविस्मरणीय था।

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रात गहराती गई। नेहा ने मुझे कसकर पकड़ा, उसके शरीर की कंपकंपी告诉我 कि वो कितनी संतुष्ट है। प्रिया मेरे सीने पर सिर रखकर लेटी, उसकी सांसें शांत हो चुकी थीं। हम बातें कर रहे थे, छोटी-छोटी, लेकिन गहरी। नेहा बोली, "राहुल, तुमने आज हमें जीना सिखाया।" मैंने कुछ नहीं कहा, बस उन्हें महसूस किया।

सुबह होने को थी, लेकिन हम अभी भी एक-दूसरे की बाहों में थे। प्रिया ने मेरे कान में फुसफुसाया, "फिर कब?" नेहा हंस पड़ी। मैंने सोचा, ये रिश्ता अब बदल चुका है, लेकिन इसमें एक अजीब सा सुकून है। हम फिर से एक हो गए, इस बार और गहराई से।

दिन चढ़ रहा था, लेकिन हमारा समय रुका हुआ लग रहा था। नेहा की उंगलियां मेरी पीठ पर नाच रही थीं, प्रिया की हंसी कमरे में गूंज रही थी। हर स्पर्श, हर चुंबन अब ज्यादा अर्थपूर्ण लग रहा था। मैंने महसूस किया कि ये सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक बंधन है।

अजय के आने का समय हो रहा था, लेकिन हम अभी भी खोए हुए थे। नेहा ने मुझे चूमा, प्रिया ने गले लगाया। हम जानते थे कि ये छुपा रहेगा, लेकिन ये पल हमेशा हमारे साथ रहेंगे। रात की यादें अब दिन में भी जीवित थीं।

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हम उठे, कपड़े पहने, लेकिन नजरें मिलती रहीं। नेहा किचन में चली गई, प्रिया ने मुझे देखकर मुस्कुराया। मैं सोफे पर बैठा, सोच रहा था कि जीवन कितना अप्रत्याशित है।

अजय आया, लेकिन हम सामान्य लग रहे थे। वो थका हुआ था, हमने बातें कीं। लेकिन अंदर से सब बदल चुका था। नेहा की नजर मुझ पर टिकी, प्रिया की मुस्कान छुपी हुई। मैंने विदा ली, लेकिन दिल जानता था कि ये कहानी अभी जारी है।

अगले दिन मैं फिर उनके घर गया। अजय बाहर था, और नेहा ने दरवाजा खोला। इस बार कोई हिचक नहीं थी। हम सीधे बेडरूम में, प्रिया भी शामिल। नेहा की प्यास अब और गहरी लग रही थी, प्रिया की उत्सुकता नई ऊंचाइयों पर।

हमारे मिलन में अब वैरायटी थी – कभी धीमा, कभी तेज। नेहा के शरीर की हर रेखा मुझे बुला रही थी, प्रिया की युवा ऊर्जा सब कुछ रोमांचक बना रही थी। मैंने उन्हें महसूस किया, जैसे वो मेरी हो गईं।

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रात फिर से हमारी थी। नेहा की सिसकियां, प्रिया की हंसी, सब मिश्रित हो गया। हम थककर लेटे, लेकिन संतुष्टि अपार थी। ये पल, ये भावनाएं, सब कुछ वास्तविक लग रहा था।

समय बीतता गया, लेकिन हमारा रिश्ता मजबूत होता गया। हर मुलाकात में नई गहराई, नई इच्छाएं। नेहा की उदासी गायब हो चुकी थी, प्रिया की आंखों में चमक थी। मैं उनके साथ था, पूरी तरह।

एक शाम, जब अजय दूर था, हम फिर से एक हुए। नेहा ने मुझे कसकर पकड़ा, प्रिया ने मेरे शरीर को छुआ। हर स्पर्श में प्यार था, प्यास थी। हम खो गए, दुनिया से दूर।