देवर की मीठी प्यास
सुबह की धूप अभी-अभी खिड़की से झांक रही थी, जब मैं रसोई में चाय की केतली चढ़ा रही थी। घर में सब कुछ वैसा ही था जैसा रोज होता है—राहुल ऑफिस के लिए निकल चुके थे, और अजय, मेरा देवर, अभी सो रहा था। मैंने घड़ी देखी, नौ बजने वाले थे, और आज उसका कॉलेज बंद था, तो मैंने सोचा कि उसे थोड़ा और सोने दूं।
मैं रिया हूं, अट्ठाईस साल की, और हमारा छोटा-सा परिवार दिल्ली के एक अपार्टमेंट में रहता है। राहुल मेरे पति हैं, तीस साल के, एक कंपनी में जॉब करते हैं, और अजय उनका छोटा भाई है, बाईस का, इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है। हम तीनों ही यहां रहते हैं, क्योंकि अजय का हॉस्टल दूर है और घर का खाना उसे पसंद है।
चाय बनाकर मैंने ट्रे में रखी और सोचा कि अजय को जगा दूं। उसकी पढ़ाई के चलते वह देर रात तक जागता है, और सुबह उठना उसके लिए मुश्किल होता है। मैं उसके कमरे की तरफ बढ़ी, दरवाजा खटखटाया, लेकिन कोई जवाब नहीं आया।
दरवाजा धीरे से खोलकर मैं अंदर झांकी, वह बिस्तर पर गहरी नींद में सो रहा था। उसका चेहरा इतना शांत लग रहा था कि मैंने उसे जगाना ठीक नहीं समझा। मैंने ट्रे साइड टेबल पर रखी और बाहर आ गई।
दिन भर की दिनचर्या शुरू हो गई—कपड़े धोना, घर साफ करना, और दोपहर का खाना तैयार करना। हमारा घर छोटा है, लेकिन साफ-सुथरा रखना मुझे पसंद है। राहुल शाम को लौटते हैं, तो मैं कोशिश करती हूं कि सब कुछ व्यवस्थित रहे।
अजय दोपहर में उठा, आंखें मलते हुए रसोई में आया। "भाभी, चाय मिलेगी?" उसने मुस्कुराते हुए पूछा। मैंने हंसकर कहा, "हां, अभी गर्म कर देती हूं। इतनी देर सोते हो, सेहत खराब हो जाएगी।"
वह कुर्सी पर बैठ गया, और मैंने चाय उसके सामने रखी। हम दोनों बातें करने लगे—उसकी पढ़ाई के बारे में, कॉलेज की छुट्टियों के बारे में। अजय हमेशा से ही शर्मीला रहा है, लेकिन घर में वह खुलकर बात करता है।
शाम को राहुल लौटे, और हम तीनों ने साथ डिनर किया। बातें चलती रहीं, लेकिन मुझे लगा कि अजय थोड़ा उदास है। "क्या बात है, अजय? सब ठीक है न?" मैंने पूछा। उसने मुस्कुराकर कहा, "हां भाभी, बस थकान है।"
रात को सोने से पहले मैंने सोचा कि शायद उसे कोई चिंता है। अगले दिन सुबह फिर वही रूटीन, लेकिन अजय बिस्तर से नहीं उठा। मैं उसके कमरे में गई, तो देखा वह बुखार में तप रहा है।
इसे भी पढ़ें: देवर की छिपी आग
मैं घबरा गई, तुरंत थर्मामीटर लाकर नापा—102 डिग्री। "अजय, डॉक्टर को बुलाती हूं," मैंने कहा। लेकिन उसने मना किया, "नहीं भाभी, बस दवा दे दो, ठीक हो जाएगा।" मैंने राहुल को फोन किया, वे बोले कि शाम को आकर देखेंगे।
मैंने उसे पैरासिटामॉल दी, और ठंडे पानी की पट्टियां रखीं। वह कमजोर लग रहा था, आंखें बंद करके लेटा हुआ। मैं उसके पास बैठी रही, कभी-कभी उसका माथा सहलाती।
दोपहर में उसने थोड़ा सूप पिया, लेकिन शाम तक बुखार नहीं उतरा। राहुल आए, डॉक्टर को बुलाया, इंजेक्शन दिया गया। रात को मैं उसके कमरे में सोफे पर सोई, ताकि जरूरत पड़े तो मदद कर सकूं।
आधी रात को वह कराह उठा, मैं जाग गई। "भाभी, प्यास लग रही है," उसने धीमी आवाज में कहा। मैंने पानी का गिलास दिया, लेकिन वह बोला, "कुछ ठंडा चाहिए।" फ्रिज में दूध था, मैंने गर्म करके दिया।
अगले दिन बुखार कम हुआ, लेकिन वह अभी भी कमजोर था। डॉक्टर ने कहा कि आराम करे, कुछ दिन घर पर ही रहे। मैं उसकी देखभाल करती रही—खाना बनाना, दवा देना, बातें करना।
एक शाम हम दोनों बालकनी में बैठे थे, चाय पी रहे थे। अजय बोला, "भाभी, आपकी वजह से इतनी जल्दी ठीक हो रहा हूं। भाई तो हमेशा忙 रहते हैं।" मैंने मुस्कुराकर कहा, "अरे, परिवार है, ये तो करना ही पड़ता है।"
उसकी नजरें थोड़ी देर मेरी तरफ टिकी रहीं, और मुझे लगा जैसे वह कुछ कहना चाहता है। लेकिन वह चुप रहा। रात को सोते समय मुझे याद आया कि मेरा बच्चा नहीं है, लेकिन शादी के बाद से मेरे शरीर में कुछ बदलाव आए हैं, खासकर जब मैंने दवा ली थी।
दरअसल, कुछ महीने पहले डॉक्टर ने मुझे हार्मोनल ट्रीटमेंट दिया था, जिससे मेरे स्तनों में दूध आने लगा था। यह अजीब था, लेकिन मैं इसे छुपाती रही। राहुल को पता था, लेकिन हम इस बारे में बात नहीं करते।
इसे भी पढ़ें: दोस्त की छुपी प्यास
अगले दिन अजय फिर थोड़ा असहज लग रहा था। "भाभी, रात को नींद नहीं आ रही," उसने कहा। मैंने पूछा, "क्यों, क्या दिक्कत है?" वह हिचकिचाया, "बस, शरीर में कुछ अजीब सा लगता है।"
मैं उसके पास बैठी, उसका हाथ पकड़ा। "तुम्हें क्या चाहिए, बताो?" वह चुप रहा, लेकिन उसकी आंखों में एक प्यास थी। धीरे-धीरे बातें बढ़ीं, और मैंने महसूस किया कि हमारा रिश्ता बदल रहा है।
एक रात राहुल बाहर गए थे, मीटिंग के लिए। घर में सिर्फ मैं और अजय थे। वह सो नहीं पा रहा था, मैं उसके कमरे में गई। "भाभी, आप बैठो न मेरे पास," उसने कहा। मैं बैठ गई, हम बातें करने लगे।
बातों-बातों में उसने अपनी जिंदगी के बारे में बताया—कॉलेज की लड़कियां, लेकिन कोई गर्लफ्रेंड नहीं। मैंने हंसकर कहा, "अभी समय है, मिल जाएगी।" लेकिन उसकी नजरें मेरे चेहरे पर टिकी रहीं, और धीरे से नीचे सरकीं।
मुझे असहज लगा, लेकिन मैं चुप रही। फिर वह बोला, "भाभी, आप बहुत अच्छी हैं। मुझे आपसे बात करके अच्छा लगता है।" मैंने उसका हाथ थामा, और उस पल में कुछ बदल गया।
रात गहराती गई, और हमारी बातें व्यक्तिगत होने लगीं। अजय ने बताया कि वह अकेला महसूस करता है, और मैंने अपनी जिंदगी के बारे में शेयर किया। धीरे-धीरे हम करीब आए, और मैंने महसूस किया कि मेरे शरीर में वह दूध की वजह से दर्द हो रहा है।
"अजय, मुझे थोड़ा असहज लग रहा है," मैंने कहा। उसने पूछा, "क्यों भाभी?" मैं हिचकिचाई, लेकिन बताया, "डॉक्टर की दवा से... मेरे में दूध आता है, कभी-कभी दर्द होता है।"
उसकी आंखें चमक उठीं, लेकिन वह चुप रहा। फिर बोला, "भाभी, अगर आप कहें तो... मैं मदद कर सकता हूं।" मैं चौंक गई, लेकिन मेरे मन में भी एक उथल-पुथल थी।
इसे भी पढ़ें: सासू मां की मीठी शरारतें
उस रात हमने बात की, और धीरे-धीरे मैंने खुद को उसके करीब पाया। वह मेरे पास आया, और मैंने उसे गले लगाया। उसकी सांसें तेज हो गईं, और मैंने महसूस किया कि यह रिश्ता अब सामान्य नहीं रहा।
मैंने अपनी ब्लाउज की बटन खोली, और उसे अपना स्तन दिखाया। "अजय, यह... मीठा है," मैंने धीमी आवाज में कहा। वह हिचकिचाया, लेकिन फिर करीब आया, और धीरे से मेरे स्तन को मुंह में लिया।
दूध की धार उसके मुंह में गई, और मैंने एक अजीब सी राहत महसूस की। उसकी जीभ मेरे निप्पल पर फिर रही थी, और मैं आंखें बंद करके उस पल में खो गई। यह दर्द और सुख का मिश्रण था।
वह धीरे-धीरे चूसता रहा, और मैं उसके बालों में उंगलियां फिराती रही। "भाभी, यह इतना मीठा है," उसने फुसफुसाया। मैंने कुछ नहीं कहा, बस उसे और करीब खींच लिया।
उस रात हमने घंटों ऐसे ही बिताए, कभी बातें करके, कभी चुपचाप एक-दूसरे को छूते हुए। मेरे मन में अपराधबोध था, लेकिन वह प्यास जो अजय की आंखों में थी, उसे देखकर मैं रुक नहीं पाई।
अगले दिन सुबह हम दोनों चुप थे, लेकिन नजरें मिलीं तो मुस्कुरा दिए। राहुल घर पर थे, तो हम सामान्य रहे, लेकिन शाम को जब वे सो गए, अजय मेरे कमरे में आया।
"भाभी, कल रात... वह अद्भुत था," उसने कहा। मैंने उसे चुप कराया, और फिर से वही पल दोहराया। इस बार वह और जोर से चूस रहा था, और मैं कराह उठी। मेरे शरीर में एक आग लग गई थी।
धीरे-धीरे हमारी अंतरंगता बढ़ती गई। एक शाम हम लिविंग रूम में थे, टीवी चल रहा था। अजय मेरे पास बैठा, और उसने मेरा हाथ पकड़ा। मैंने उसे अपनी गोद में सिर रखने दिया, और फिर से दूध पिलाया।
इसे भी पढ़ें: अम्मी की अनकही प्यास
उसकी जीभ अब और कुशल हो गई थी, वह मेरे निप्पल को चाटता, चूसता, और मैं सिसकियां भरती। "अजय, धीरे," मैंने कहा, लेकिन मेरे मन में और तेज होने की इच्छा थी।
हमारे बीच अब सिर्फ दूध नहीं था, बल्कि एक गहरा बंधन। वह मेरे पूरे शरीर को छूता,吻 करता, और मैं उसे रोक नहीं पाती। एक रात हम बिस्तर पर थे, और उसने मुझे पूरी तरह नंगा कर दिया।
उसकी उंगलियां मेरे शरीर पर फिर रही थीं, और मैंने उसे अपने ऊपर खींच लिया। "भाभी, मैं तुम्हें चाहता हूं," उसने कहा। मैंने हां में सिर हिलाया, और हम एक हो गए।
उसकी हरकतें तेज हो गईं, और मैं चीख पड़ी। दूध अब उसके मुंह में नहीं, बल्कि हमारे बीच बह रहा था। वह चूसता रहा, और मैं उसके नीचे तड़पती रही।
हर रात नई थी—कभी बालकनी में, कभी रसोई में। एक बार मैं खाना बना रही थी, वह पीछे से आया, और मेरी कमर पकड़ ली। "भाभी, प्यास लगी है," उसने कहा। मैंने मुड़कर उसे दूध पिलाया, जबकि स्टोव पर सब्जी उबल रही थी।
मेरे मन में कन्फ्लिक्ट था—राहुल के प्रति वफादारी, लेकिन अजय की प्यास मुझे खींचती थी। वह अब और मांग करने लगा, और मैं देती गई।
एक शाम हम पार्क में घूम रहे थे, घर से दूर। वहां एक कोने में उसने मुझे दीवार से सटा लिया, और दूध पिया। हवा ठंडी थी, और मेरी सांसें गर्म।
घर लौटकर हमने पूरी रात साथ बिताई, उसके हाथ मेरे हर हिस्से को छू रहे थे। "भाभी, तुम्हारा दूध मेरी जिंदगी है," उसने कहा। मैंने उसे चूम लिया, और हम फिर से एक हुए।
इसे भी पढ़ें: अम्मी की अनकही प्यास
समय बीतता गया, लेकिन हमारी यह दुनिया अलग थी। राहुल को शक नहीं हुआ, और हम सावधान रहते। लेकिन मेरे दिल में एक डर था—यह कब तक चलेगा?
फिर एक रात, जब राहुल बाहर थे, अजय ने कहा, "भाभी, आज कुछ नया करते हैं।" उसने मुझे बांधा, और धीरे-धीरे दूध चूसता रहा। मैं तड़प रही थी, लेकिन सुख की लहरें आ रही थीं।
उसकी हर चाल नई थी, कभी तेज, कभी धीमी। मैं उसके नाम पुकारती, और वह मुझे और गहराई में ले जाता।
सुबह होने से पहले हम थककर लेटे रहे, उसका सिर मेरी छाती पर। दूध की आखिरी बूंदें उसके होंठों पर थीं, और मैंने उन्हें चूम लिया।
हमारी कहानी जारी थी, हर पल में नई भावनाएं। अजय अब मेरा हिस्सा बन गया था, और मैं उसकी प्यास।
एक दोपहर, जब घर खाली था, वह मुझे बाथरूम में ले गया। पानी की फुहारों के नीचे उसने दूध पिया, और हमारा मिलन और गहरा हो गया।
मेरी सिसकियां पानी की आवाज में घुल गईं, और वह रुक नहीं रहा था। "अजय, और..." मैंने कहा, और उसने मुझे पूरा किया।
रात को बिस्तर पर लेटे हम बातें कर रहे थे, उसके हाथ मेरे पेट पर। "भाभी, क्या हम हमेशा ऐसे रह सकते हैं?" उसने पूछा। मैं चुप रही, लेकिन मेरे दिल में वही सवाल था।
अगले दिन सुबह, राहुल घर पर थे, लेकिन अजय की नजरें मुझ पर टिकी रहीं। दोपहर में जब वे सो रहे थे, अजय मेरे पास आया, और चुपके से मेरे स्तन को छुआ।
मैंने उसे रोका नहीं, और धीरे से दूध की एक धार उसके मुंह में डाली। वह चुपचाप पिया, और हमारी आंखें मिलीं।
यह पल अब हमारी जिंदगी का हिस्सा थे, छिपे हुए लेकिन जीवंत। मेरे मन में डर और उत्साह दोनों थे, लेकिन अजय की प्यास मुझे रोकती नहीं।
शाम को हम बाजार गए, और रास्ते में उसने मेरा हाथ पकड़ा। घर लौटकर रात गहराई, और हम फिर से एक-दूसरे में खो गए।
उसकी जीभ अब मेरे पूरे शरीर पर थी, दूध सिर्फ शुरुआत था। मैं कराहती रही, और वह मुझे नई ऊंचाइयों पर ले जाता।
सुबह की पहली किरण में हम लेटे थे, उसका सिर मेरी गोद में। मैं उसके बाल सहला रही थी, और वह मुस्कुरा रहा था।