सासू मां की मीठी शरारतें

सुबह के नौ बजे का समय था, जब मैं किचन में चाय की केतली चढ़ा रही थी। घर की रोज की दिनचर्या चल रही थी – अमित ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था, और मैं ब्रेकफास्ट की तैयारी में लगी हुई थी। बाहर बालकनी से हल्की धूप अंदर आ रही थी, जो कमरे को एक सुखद गर्माहट दे रही थी।

मैं रिया हूँ, अमित की पत्नी, और हमारी शादी को दो साल हो चुके हैं। सरला जी, जिन्हें मैं सासू मां कहती हूँ, हमारे साथ ही रहती हैं। उनके पति का देहांत पाँच साल पहले हो गया था, और तब से वे घर की सारी जिम्मेदारियाँ संभालती आई हैं। वे करीब पचास साल की हैं, लेकिन उनकी ऊर्जा देखकर लगता नहीं कि उम्र ने उन्हें छुआ भी है।

अमित ने जल्दी से चाय का कप लिया और बोला, "रिया, आज लेट हो जाऊँगा, शाम को मीटिंग है।" मैंने मुस्कुराकर सिर हिलाया और उन्हें दरवाजे तक छोड़ा। घर में अब सिर्फ मैं और सासू मां रह गए थे। वे लिविंग रूम में अखबार पढ़ रही थीं, और मैंने सोचा कि आज का दिन भी वैसा ही गुजरेगा जैसा रोज गुजरता है।

किचन साफ करने के बाद मैं उनके पास गई और पूछा, "मां जी, क्या बनाऊँ दोपहर में? कुछ स्पेशल?" उन्होंने अखबार नीचे रखा और मुस्कुराईं, "जो तुम्हें अच्छा लगे, बेटी। वैसे, आज मौसम अच्छा है, चलो साथ में बाजार हो आएँ।" उनकी बात सुनकर मुझे अच्छा लगा, क्योंकि अकेले घर में बोरियत हो जाती है।

हम दोनों तैयार होकर निकले। बाजार में घूमते हुए उन्होंने कुछ सब्जियाँ लीं, और मैंने फल। रास्ते में वे पुरानी कहानियाँ सुनाती रहीं – अपनी जवानी के दिनों की, जब वे अमित के पिता के साथ घूमती थीं। उनकी आवाज में एक पुरानी मिठास थी, जो मुझे हमेशा आकर्षित करती।

घर लौटकर हमने साथ में खाना बनाया। सासू मां आटे की लोई बनातीं, और मैं सब्जी काटती। कभी-कभी हमारी उँगलियाँ टकरा जातीं, लेकिन वह बस एक सामान्य स्पर्श था। खाना बनाते हुए उन्होंने कहा, "रिया, तुम्हारी वजह से घर में रौनक है। अमित खुशकिस्मत है।" मैंने शरमाकर हँस दिया।

दोपहर में अमित का फोन आया कि वे देर से आएँगे। मैंने सासू मां को बताया, तो उन्होंने कहा, "कोई बात नहीं, हम दोनों शाम को साथ में टीवी देखेंगे।" शाम हुई, और हम सोफे पर बैठकर एक पुरानी फिल्म देखने लगे। फिल्म में कुछ भावुक सीन थे, जो हमें दोनों को छू गए।

फिल्म के दौरान सासू मां ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और बोलीं, "बेटी, जीवन में ऐसे पल कम ही आते हैं।" उनकी आँखों में एक गहराई थी, जो मैंने पहले नहीं देखी थी। मैंने उनका हाथ थाम लिया, और हम चुपचाप फिल्म देखते रहे। दिल में एक अजीब सी शांति थी।

रात का खाना हमने साथ बनाया। सासू मां मजाक करतीं, "रिया, तुम्हारी रोटियाँ इतनी गोल कैसे बनती हैं? मेरी तो हमेशा टेढ़ी-मेढ़ी।" मैं हँस पड़ी और बोली, "मां जी, आपकी सब्जी का स्वाद तो लाजवाब है।" हमारी हँसी घर में गूँज रही थी, और वह शाम कुछ खास लग रही थी।

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खाना खाने के बाद मैं बर्तन धो रही थी, जब सासू मां आईं और बोलीं, "मदद करूँ?" मैंने मना किया, लेकिन वे पास खड़ी हो गईं। उनकी साड़ी का पल्लू मेरे हाथ से छू गया, और एक पल के लिए हमारी नजरें मिलीं। दिल में कुछ हलचल हुई, लेकिन मैंने उसे नजरअंदाज कर दिया।

रात को सोने से पहले मैं अपने कमरे में थी, अमित अभी नहीं आए थे। सासू मां ने दरवाजा खटखटाया और अंदर आईं। "नींद नहीं आ रही, बेटी? चलो बातें करें।" वे बिस्तर पर बैठ गईं, और हम घर-परिवार की बातें करने लगे। उनकी आवाज इतनी नरम थी कि मुझे सुकून मिल रहा था।

बातों-बातों में उन्होंने मेरे बालों में उँगलियाँ फेरते हुए कहा, "तुम्हारे बाल कितने मुलायम हैं।" मैंने कुछ नहीं कहा, बस महसूस किया कि उनका स्पर्श अलग था। दिल की धड़कन तेज हो गई, लेकिन मैं चुप रही। क्या यह सामान्य था?

धीरे-धीरे बातें गहरी होने लगीं। सासू मां ने बताया कि उनके पति के जाने के बाद वे कितना अकेला महसूस करती थीं। "लेकिन तुम्हारी वजह से अब सब ठीक लगता है," उन्होंने कहा। मैंने उनकी आँखों में देखा, और वहाँ एक अनकही भावना थी।

मैंने हिम्मत करके पूछा, "मां जी, आप कभी उदास नहीं होतीं?" उन्होंने मुस्कुराकर मेरे गाल पर हाथ फेरा। "अब नहीं, क्योंकि तुम हो।" उनका हाथ मेरे गाल से नीचे सरक गया, और एक पल के लिए मेरी गर्दन पर रुका। मेरे शरीर में एक झुरझुरी दौड़ गई।

हमारी नजरें मिलीं, और समय जैसे रुक गया। सासू मां ने धीरे से मेरे करीब आकर मेरे होंठों पर एक हल्का सा चुंबन दिया। मैं स्तब्ध थी, लेकिन विरोध नहीं किया। दिल में उथल-पुथल थी – यह गलत था या सही?

वे पीछे हटीं और बोलीं, "माफ करना, बेटी। बस... भावनाएँ उमड़ आईं।" लेकिन उनकी आँखों में पछतावा नहीं था। मैंने उनका हाथ पकड़ा और कहा, "मां जी, मुझे भी अच्छा लगा।" हम दोनों चुप हो गईं, लेकिन हवा में कुछ बदल गया था।

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अगली सुबह सब सामान्य लग रहा था, लेकिन मेरे मन में रात की यादें घूम रही थीं। अमित ऑफिस चला गया, और मैं किचन में थी। सासू मां आईं और मुस्कुराईं, "चाय बनाऊँ?" मैंने हाँ कहा, लेकिन हमारी नजरें बार-बार मिल रही थीं।

चाय पीते हुए उन्होंने कहा, "रिया, कल की बात... क्या तुम परेशान हो?" मैंने नजर झुकाकर कहा, "नहीं, मां जी। बल्कि... मुझे अजीब सा सुकून मिला।" उन्होंने मेरा हाथ थामा, और हम दोनों की उँगलियाँ आपस में उलझ गईं।

उस दिन हमने साथ में घर साफ किया। झाड़ू लगाते हुए वे मेरे पास से गुजरीं, और उनका शरीर मेरे से सटा। मैंने महसूस किया कि यह जानबूझकर था। दिल तेज धड़क रहा था, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। शाम को फिर वही फिल्म देखने का बहाना।

इस बार सोफे पर बैठते हुए उन्होंने मेरी कमर पर हाथ रखा। "आराम से बैठो, बेटी।" उनका हाथ धीरे-धीरे ऊपर सरक रहा था। मैंने आँखें बंद कर लीं, और महसूस किया कि मेरे शरीर में गर्मी बढ़ रही थी।

फिल्म खत्म होने से पहले ही हम दोनों एक-दूसरे की ओर मुड़ीं। सासू मां ने मुझे गले लगा लिया, और इस बार चुंबन गहरा था। उनके होंठ मेरे होंठों पर थे, और मैंने भी जवाब दिया। दिल में कन्फ्लिक्ट था – सास-बहू का रिश्ता, लेकिन यह भावना इतनी मजबूत थी।

हम बिस्तर पर लेट गईं। सासू मां ने मेरी साड़ी का पल्लू सरकाया और मेरे कंधे पर吻 किया। "तुम कितनी सुंदर हो, रिया।" उनकी उँगलियाँ मेरी पीठ पर घूम रही थीं, और मैं काँप रही थी। यह सब इतना नया था, लेकिन रोमांचक।

मैंने भी हिम्मत करके उनकी ब्लाउज के बटन खोले। उनके शरीर की गर्मी मुझे छू रही थी। हम दोनों की साँसें तेज थीं, और कमरे में सिर्फ हमारी धड़कनों की आवाज थी। सासू मां ने मजाक में कहा, "देखो, अब हम दोनों शरारती हो गईं।" मैं हँस पड़ी, और तनाव कम हो गया।

उनकी जीभ मेरे गले पर फिसली, और मैंने कराह उठी। यह मजेदार था – जैसे दो सहेलियाँ खेल रही हों। मैंने उनके स्तनों को छुआ, और वे मुस्कुराईं। "धीरे से, बेटी।" लेकिन उनकी आँखों में शरारत थी।

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हमारी बॉडीज एक-दूसरे से रगड़ रही थीं। सासू मां ने मेरी जाँघों के बीच हाथ डाला, और मैंने आह भरी। यह अनुभव इतना इंटेंस था कि मैं खुद को रोक नहीं पा रही थी। उन्होंने धीरे-धीरे मुझे छुआ, और मैंने भी वैसा ही किया।

कमरे की रोशनी मद्धम थी, और हमारी हँसी बीच-बीच में गूँजती। "मां जी, यह कितना अजीब है," मैंने कहा। उन्होंने जवाब दिया, "अजीब नहीं, मजेदार है।" उनकी उँगलियाँ अब तेज हो गईं, और मैं चरम पर पहुँच गई।

उस रात के बाद हमारी नजदीकी बढ़ गई। अगले दिन अमित घर पर था, लेकिन हमारी नजरें चोरी-चोरी मिलतीं। शाम को जब अमित सो गया, सासू मां मेरे कमरे में आईं। "आज फिर?" उन्होंने शरारती अंदाज में पूछा।

मैंने हाँ में सिर हिलाया, और हम फिर से एक हो गईं। इस बार हमने अलग-अलग तरीके आजमाए – कभी हल्के चुंबन, कभी गहरे स्पर्श। सासू मां ने मेरे कान में फुसफुसाया, "तुम्हारी वजह से जीवन में नई रौनक है।"

मेरे मन में अब कोई कन्फ्लिक्ट नहीं था। यह रिश्ता अब हमारा राज था, मजेदार और भावनात्मक। हमारी बॉडीज की भाषा एक हो गई थी, और हर स्पर्श में नई कहानी थी।

एक शाम हम बालकनी में खड़ी थीं, जब सासू मां ने मुझे पीछे से गले लगाया। उनकी साँस मेरी गर्दन पर थी, और मैंने महसूस किया कि यह पल कितना खास है। हम हँसते हुए अंदर गईं, और फिर वही शरारत शुरू हो गई।

उनकी उँगलियाँ मेरे शरीर के हर हिस्से को जानती थीं। मैंने भी उन्हें खुश करने की कोशिश की, और हमारी कराहें कमरे में गूँज रही थीं। यह सब इतना नैचुरल लग रहा था, जैसे हमेशा से ऐसा ही था।

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रात गहराती गई, और हम एक-दूसरे में खोई रहीं। सासू मां ने कहा, "रिया, तुम मेरी जिंदगी की रोशनी हो।" मैंने उन्हें कसकर गले लगाया, और हमारी साँसें मिल गईं।

सुबह की पहली किरण कमरे में आई, लेकिन हम अभी भी एक-दूसरे के आगोश में थे। दिल में एक मीठी थकान थी, और आँखें बंद करके मैं सोच रही थी कि यह सफर कितना अनोखा है।

दिन गुजरते गए, और हमारी शरारतें जारी रहीं। कभी किचन में चोरी का चुंबन, कभी रात में लंबी बातें। सासू मां की हँसी अब मेरी जिंदगी का हिस्सा थी।

एक रात हमने वाइन की बोतल खोली। हँसते-खेलते हम नशे में डूब गईं। सासू मां ने मुझे डांस करने को कहा, और हम कमरे में घूमने लगे। उनकी बॉडी मेरी से सट रही थी, और जल्दी ही हम बिस्तर पर थीं।

इस बार खेल और मजेदार था – हमने एक-दूसरे को टिक्ल किया, हँसी से कमरा भर गया। फिर स्पर्श गहरा हुआ, और हमारी बॉडीज की लय एक हो गई। मैंने कभी सोचा नहीं था कि सेक्स इतना हल्का और खुशमिजाज हो सकता है।

सासू मां ने मेरे स्तनों को चूमा, और मैंने उनकी कमर पर हाथ फेरा। हमारी उँगलियाँ एक-दूसरे के गुप्तांगों पर नाच रही थीं, और हर पल नया रोमांच ला रहा था।

चरम पर पहुँचकर हम हाँफ रही थीं, लेकिन हँसी नहीं रुकी। "मां जी, आप कितनी शरारती हैं," मैंने कहा। उन्होंने जवाब दिया, "तुम्हारी वजह से, बेटी।"

उस रात हम देर तक बातें करती रहीं, एक-दूसरे के शरीर को सहलाते हुए। यह सिर्फ शारीरिक नहीं था, बल्कि भावनात्मक बंधन था।

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अगले दिनों में हमने और प्रयोग किए – कभी तेल से मालिश, कभी नए पोज़। हर बार मजा दोगुना होता। सासू मां की अनुभवी उँगलियाँ मुझे स्वर्ग दिखातीं, और मैं उन्हें अपनी जवानी से खुश करती।

एक शाम बारिश हो रही थी। हम बालकनी में खड़ी थीं, भीग रही थीं। सासू मां ने मुझे खींचकर अंदर लाया और कपड़े उतारने लगीं। "ठंड लग जाएगी," उन्होंने कहा, लेकिन उनकी आँखें कुछ और कह रही थीं।

हम गीले शरीरों से एक हो गईं। पानी की बूँदें हमारी त्वचा पर फिसल रही थीं, और स्पर्श और गीला हो गया। मैंने उनकी पीठ चूमी, और वे काँप उठीं।

बिस्तर पर हमने घंटों बिताए, हर हिस्से को एक्सप्लोर करते। सासू मां की कराहें मेरे कानों में संगीत थीं, और मैं खुद को रोक नहीं पा रही थी।

बारिश की आवाज बाहर थी, लेकिन अंदर हमारा तूफान था। चरम पर पहुँचकर हम लेट गईं, एक-दूसरे को देखते हुए।

समय बीतता गया, और हमारा रिश्ता और मजबूत होता गया। अब हर पल में शरारत थी, हर स्पर्श में प्यार। सासू मां मेरी सहेली, मेरी साथी बन गई थीं।

एक रात हम फिर से एक हो रही थीं, उनकी उँगलियाँ मेरे अंदर थीं, और मैं उनकी आँखों में खोई हुई थी। दिल की धड़कनें मिल रही थीं, और दुनिया बाहर थी।