ससुर की छाया में
सुबह की धूप अभी-अभी खिड़की से झांक रही थी, जब मैं रसोई में चाय की केतली चढ़ा रही थी। घर की दिनचर्या हमेशा की तरह शांत थी – बच्चे स्कूल चले गए थे, और पति ऑफिस के लिए निकल चुके थे। मैंने घड़ी की तरफ देखा, साढ़े आठ बज रहे थे, और ससुर जी अभी अपने कमरे में ही थे। रोज की तरह, मैंने उनके लिए मजबूत चाय बनाई, ट्रे में रखी, और धीरे से उनके दरवाजे पर दस्तक दी।
ससुर जी ने दरवाजा खोला और मुस्कुराते हुए कहा, "बहू, आओ अंदर।" मैं ट्रे लेकर अंदर गई, और उन्हें चाय का कप थमाया। वे बिस्तर पर बैठे थे, अखबार पढ़ते हुए। हमारा घर पुराना था, शहर के किनारे पर, जहां शोर कम था और हवा ताजी आती थी। मैंने पिछले दस सालों से यही दिनचर्या निभाई थी – शादी के बाद से ससुर जी हमारे साथ रहते थे, और पति की नौकरी की वजह से मैं घर की सारी जिम्मेदारी संभालती थी।
उस दिन ससुर जी थोड़े उदास लग रहे थे। मैंने पूछा, "क्या बात है, पापा? कुछ परेशान लग रहे हैं।" उन्होंने सिर हिलाया और बोले, "कुछ नहीं, बहू। बस पुरानी यादें आ रही हैं। तुम्हारी सास के जाने के बाद यह घर कितना खाली लगता है।" मैं चुपचाप उनकी बात सुनती रही। सास जी को गुजरे पांच साल हो चुके थे, और ससुर जी ने कभी दोबारा शादी नहीं की। वे साठ के पार थे, लेकिन अभी भी मजबूत दिखते थे, गांव से आए हुए किसान की तरह।
मैंने चाय का कप उठाया और वापस रसोई की तरफ मुड़ी। दिन भर की व्यस्तता शुरू हो गई – कपड़े धोना, खाना बनाना, और शाम को बच्चों की पढ़ाई। पति रात को देर से लौटते थे, कभी-कभी बाहर की मीटिंग्स में। ससुर जी ज्यादातर अपने कमरे में रहते, किताबें पढ़ते या टीवी देखते। लेकिन उस शाम, जब मैं डिनर की तैयारी कर रही थी, वे रसोई में आ गए। "बहू, मदद करूं?" उन्होंने पूछा। मैंने मुस्कुराकर कहा, "नहीं पापा, आप आराम करो।"
फिर भी, वे वहीं खड़े रहे, सब्जियां काटने में हाथ बंटाने लगे। उनकी मौजूदगी से रसोई थोड़ी गर्म लग रही थी, लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया। हम बातें करने लगे – गांव की फसल के बारे में, बच्चों की पढ़ाई के बारे में। ससुर जी की आवाज हमेशा गहरी और स्थिर होती थी, जो मुझे सुरक्षित महसूस कराती थी। रात का खाना खाकर सब सो गए, लेकिन मुझे नींद नहीं आ रही थी। पति आज भी देर से आने वाले थे।
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अगले कुछ दिन ऐसे ही बीते। ससुर जी अब ज्यादा समय मेरे साथ बिताने लगे थे। सुबह चाय के बाद वे बगीचे में मेरे साथ काम करते, या शाम को बच्चों के साथ खेलते। एक दोपहर, जब मैं कपड़े सुखा रही थी, वे अचानक पीछे से आए और बोले, "बहू, यह भारी लग रहा है, मैं उठा लूं।" उनकी उंगलियां मेरी कमर को छू गईं, लेकिन मैंने सोचा यह संयोग होगा। फिर भी, उस स्पर्श में कुछ अलग सा लगा, जैसे कोई पुरानी याद जाग रही हो।
मेरा नाम रानी है, और मैं पैंतीस साल की हूं। शादी को पंद्रह साल हो चुके हैं, दो बच्चे हैं – एक बेटा और एक बेटी। पति अच्छे हैं, लेकिन उनकी व्यस्तता ने घर को थोड़ा खाली कर दिया है। ससुर जी, जिनका नाम हरिशंकर है, हमेशा से परिवार के स्तंभ रहे हैं। वे गांव से शहर आए थे, और अब रिटायर हो चुके थे। उनकी आंखों में एक गहराई थी, जो कभी-कभी मुझे असहज कर देती थी, लेकिन मैं इसे नजरअंदाज करती रही।
एक शाम, बारिश हो रही थी। बच्चे सो चुके थे, और पति बाहर थे। मैं लिविंग रूम में बैठी टीवी देख रही थी, जब ससुर जी आए। वे मेरे पास सोफे पर बैठ गए, और बोले, "बहू, आज मन उदास है। क्या तुम्हारे साथ थोड़ी देर बात कर सकता हूं?" मैंने हामी भरी। हमने पुरानी बातें की – मेरी शादी की, सास जी की यादों की। उनकी आवाज में एक दर्द था, जो मुझे छू गया।
बातों-बातों में उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "तुम बहुत मजबूत हो, बहू। इस घर को संभालती हो।" मैंने कुछ नहीं कहा, लेकिन उनका हाथ वहां रहा। धीरे-धीरे, बातें व्यक्तिगत होने लगीं। उन्होंने बताया कि सास जी के जाने के बाद वे कितने अकेले हैं। मेरी आंखों में आंसू आ गए, और मैंने उन्हें गले लगा लिया। वह पल इतना भावुक था कि मैं खुद को रोक नहीं पाई।
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उस रात, जब मैं अपने कमरे में जाने लगी, ससुर जी ने मुझे रोका। "बहू, क्या तुम मेरे कमरे में थोड़ी देर रुक सकती हो? नींद नहीं आ रही।" मैं हिचकिचाई, लेकिन उनकी उदासी देखकर मान गई। हम उनके बिस्तर पर बैठे, और बातें जारी रहीं। अचानक, उन्होंने मेरी हथेली पकड़ ली। "तुम्हारी तरह कोई नहीं है, रानी।" उनका हाथ गर्म था, और मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई।
मैंने हाथ छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन वे नहीं माने। उनकी आंखों में एक अलग चमक थी, जो मुझे डराती भी थी और आकर्षित भी। "पापा, यह ठीक नहीं है," मैंने धीरे से कहा। लेकिन वे करीब आए, और उनके होंठ मेरे कान के पास थे। "शश्श, बहू। बस एक पल।" उनका शरीर मेरे खिलाफ दबा, और मैं स्तब्ध रह गई।
उस रात कुछ नहीं हुआ, लेकिन अगले दिन से सब बदल गया। ससुर जी की नजरें अब अलग थीं – वे मुझे देखते रहते, और मैं असहज महसूस करती। एक दोपहर, जब घर खाली था, वे रसोई में आए और मुझे दीवार से सटा लिया। "रानी, मैं खुद को रोक नहीं पा रहा," उन्होंने फुसफुसाया। मैंने विरोध किया, लेकिन उनके मजबूत हाथों ने मुझे दबा लिया। मेरी सांस तेज हो गई, और एक अजीब सी उत्तेजना जागी।
हमारी पहली अंतरंगता उस शाम हुई। बच्चे बाहर खेलने गए थे, और पति देर रात आने वाले थे। ससुर जी ने मुझे अपने कमरे में बुलाया। मैं गई, जानती हुई कि क्या होने वाला है। वे मुझे बाहों में भर लिया, और उनके चुंबन गहरे थे। मैंने विरोध किया, लेकिन मेरे शरीर ने साथ दे दिया। "पापा, यह गलत है," मैंने कहा, लेकिन उनकी पकड़ मजबूत थी।
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वे मुझे बिस्तर पर लिटा दिया, और मेरे कपड़े उतारने लगे। उनकी उंगलियां मेरी त्वचा पर फिसल रही थीं, और मैं कांप रही थी। डर, अपराधबोध और एक अनजानी चाहत का मिश्रण था। ससुर जी का शरीर मजबूत था, सालों की मेहनत से गढ़ा हुआ। उन्होंने मुझे दबाकर रखा, जैसे कोई पुरानी इच्छा पूरी कर रहे हों। मेरी सांसें उखड़ रही थीं, और दर्द के साथ एक अजीब सुख मिल रहा था।
उस पल में, मैंने अपनी भावनाओं से लड़ाई की। "क्यों कर रहे हैं यह?" मैंने पूछा, आंसू बहाते हुए। उन्होंने जवाब दिया, "क्योंकि तुममें वो सब है जो मैंने खोया है, रानी।" उनका हर स्पर्श सेंसरी था – गर्म सांसें, मजबूत पकड़, और एक गहरा संबंध। मैंने खुद को छोड़ दिया, और वह रात हमारी जिंदगी बदल गई।
अगले हफ्तों में, यह सब छिपकर चलता रहा। हर बार, टेंशन बढ़ती जाती। एक रात, जब बारिश जोरों से हो रही थी, ससुर जी मेरे कमरे में आए। पति सो रहे थे, लेकिन वे नहीं रुके। उन्होंने मुझे दबाकर चुप कराया, और हमारा मिलन और तीव्र हो गया। मेरे मन में कन्फ्लिक्ट था – अपराधबोध की लहरें, लेकिन साथ ही एक भावनात्मक जुड़ाव।
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हर सीन अलग था। कभी धीमा और भावुक, कभी तेज और दबावपूर्ण। एक दोपहर, जब हम अकेले थे, उन्होंने मुझे सोफे पर दबाया। उनकी उंगलियां मेरे शरीर पर नाच रही थीं, और मैंने नई संवेदनाएं महसूस कीं – जैसे आग और पानी का मिलन। "रानी, तुम मेरी हो," उन्होंने कहा, और मैंने विरोध नहीं किया।
समय बीतता गया, और हमारी यह छिपी दुनिया गहरी होती गई। मैं अपनी भावनाओं से जूझ रही थी – परिवार के लिए, पति के लिए, लेकिन ससुर जी की छाया में एक नई जिंदगी मिल रही थी। एक शाम, जब वे मुझे फिर बाहों में भर रहे थे, मैंने सोचा कि यह कब तक चलेगा। उनकी पकड़ अब और मजबूत थी, और मैं उसमें खो रही थी।
उस रात, हम बिस्तर पर थे, और उनका हर स्पर्श नया था। उन्होंने मुझे धीरे से दबाया, लेकिन इस बार प्यार से। मेरी सांसें मिल रही थीं, और भावनाएं उफान पर थीं। "पापा, यह हमारी सच्चाई है," मैंने फुसफुसाया। वे मुस्कुराए, और हम एक हो गए।
दिन गुजरते रहे, और हर मिलन में नई गहराई आती। कभी रसोई में चुपके से, कभी रात के अंधेरे में। मेरे मन का संघर्ष कम हो रहा था, और एक अजीब शांति मिल रही थी। ससुर जी की आंखों में अब सिर्फ चाहत नहीं, बल्कि एक गहरा लगाव था।
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एक बार, जब पति बाहर थे, हमने पूरे दिन साथ बिताया। उन्होंने मुझे बगीचे में ले जाकर दबाया, फूलों की महक के बीच। वह अनुभव अलग था – प्रकृति के साथ हमारी चाहत का मिलन। मैंने खुद को पूरी तरह सौंप दिया, और दर्द अब सुख में बदल गया था।
लेकिन हर बार, अपराधबोध की एक लहर आती। "क्या यह सही है?" मैं खुद से पूछती। ससुर जी जवाब देते, "यह हमारा है, रानी।" उनकी बातों में सच्चाई लगती, और मैं आगे बढ़ जाती।
समय के साथ, हमारी कहानी और जटिल हो गई। बच्चे बड़े हो रहे थे, पति की व्यस्तता बढ़ रही थी, और ससुर जी मेरे जीवन का हिस्सा बन चुके थे। एक रात, जब वे मुझे दबाकर अपने साथ जोड़ रहे थे, मैंने महसूस किया कि यह अब सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक बंधन है। उनकी सांसें मेरी सांसों से मिल रही थीं, और दुनिया बाहर थी।
उस पल में, सब कुछ शांत लग रहा था। हम एक-दूसरे में खोए हुए, बिना किसी डर के।