दुल्हन के बाद सास की बाहों में
सुबह के सात बजे का समय था, जब मैं अपनी नई-नई शादीशुदा जिंदगी में रोज की तरह उठा। घर की बालकनी में खड़े होकर चाय की चुस्की लेते हुए, मैं बाहर की सड़क पर गुजरते लोगों को देख रहा था। प्रिया अभी सो रही थी, और मां जी, यानी मेरी सास मधु, रसोई में नाश्ता तैयार कर रही थीं।
हमारा घर दिल्ली के एक शांत इलाके में था, जहां शादी के दो महीने बाद भी सब कुछ सामान्य लगता था। मैं एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता था, और प्रिया स्कूल टीचर थी। मां जी हमारे साथ रहती थीं, क्योंकि उनके पति का देहांत हो चुका था, और वो अकेली नहीं रहना चाहती थीं।
हर रोज की तरह, मैं चाय खत्म करके तैयार होने चला गया। ऑफिस के लिए निकलते वक्त मां जी ने आवाज दी, "राहुल बेटा, नाश्ता कर लो।" मैं मुस्कुराकर बोला, "जी मां जी, जल्दी है आज। शाम को जल्दी आऊंगा।" प्रिया भी उठ चुकी थी, और वो मुझे दरवाजे तक छोड़ने आई।
दिन भर ऑफिस में काम करते हुए, मेरे मन में घर की यादें घूमती रहीं। शादी के बाद प्रिया के साथ हमारी जिंदगी कितनी खुशहाल थी। वो हमेशा मेरी छोटी-छोटी बातों का ख्याल रखती थी, और मैं भी उसे खुश रखने की कोशिश करता था। शाम को घर लौटते वक्त मैंने सोचा कि आज कुछ स्पेशल बनाऊंगा।
घर पहुंचा तो प्रिया ने दरवाजा खोला। उसकी मुस्कान देखकर दिल खुश हो गया। "कैसा रहा दिन?" उसने पूछा। मैंने कहा, "ठीक था, लेकिन अब घर आकर अच्छा लग रहा है।" मां जी सोफे पर बैठी टीवी देख रही थीं। मैंने उन्हें प्रणाम किया और कमरे में चला गया।
रात का खाना हम सबने साथ में खाया। मां जी ने अपनी पसंदीदा सब्जी बनाई थी, और प्रिया ने सलाद तैयार किया था। बातें करते हुए समय बीत गया। मां जी ने बताया कि वो कल बाजार जाना चाहती हैं, कुछ सामान लाने। मैंने कहा, "मैं ले आऊंगा, आप बताओ क्या चाहिए।"
खाने के बाद प्रिया और मैं अपने कमरे में चले गए। वो थोड़ी थकी हुई लग रही थी। "आज स्कूल में बहुत काम था," उसने कहा। मैंने उसके कंधे दबाए और कहा, "आराम करो।" हम दोनों जल्दी सो गए, क्योंकि अगले दिन फिर व्यस्त था।
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अगले कुछ दिनों में घर की दिनचर्या वैसी ही चलती रही। लेकिन एक शाम, जब मैं घर लौटा, तो प्रिया ने बताया कि उसे ऑफिस ट्रिप पर जाना है। "दो दिन की ट्रेनिंग है, मुंबई में," उसने कहा। मैंने सहमति दी, क्योंकि ये उसके करियर के लिए अच्छा था। मां जी भी खुश हुईं।
प्रिया के जाने के बाद घर थोड़ा खाली लगने लगा। मैं ऑफिस से लौटता, तो मां जी अकेली बैठी मिलतीं। एक शाम, मैंने उन्हें चाय बनाते देखा। "मां जी, मैं बना दूं?" मैंने पूछा। वो मुस्कुराईं, "नहीं बेटा, तुम आराम करो।"
हम दोनों सोफे पर बैठकर बातें करने लगे। मां जी ने अपनी पुरानी यादें साझा कीं। "तुम्हारे ससुर जी बहुत मेहनती थे," उन्होंने कहा। उनकी आंखों में एक उदासी थी, जो मुझे छू गई। मैंने कहा, "आप अकेली नहीं हैं, हम हैं ना।"
उस रात, जब मैं सोने गया, तो मन में एक अजीब सा एहसास था। मां जी की वो उदासी मुझे सोने नहीं दे रही थी। अगले दिन प्रिया की ट्रिप थी, और मैं उसे स्टेशन छोड़ने गया। लौटकर घर आया, तो मां जी ने खाना तैयार रखा था।
शाम को हम दोनों ने साथ खाना खाया। बातों-बातों में मां जी ने प्रिया की तारीफ की। "बहुत अच्छी लड़की है," उन्होंने कहा। मैंने हामी भरी। लेकिन जैसे-जैसे रात गहराई, घर की चुप्पी मुझे बेचैन करने लगी।
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अगली सुबह, मैं उठा तो मां जी पहले से उठ चुकी थीं। वो योग कर रही थीं। मैंने उन्हें देखा, उनकी उम्र पचास के करीब थी, लेकिन वो खुद को फिट रखती थीं। "गुड मॉर्निंग मां जी," मैंने कहा। वो बोलीं, "गुड मॉर्निंग बेटा, चाय बनाऊं?"
दिन भर ऑफिस में रहा, लेकिन शाम को घर लौटते वक्त मैंने कुछ फूल खरीदे। मां जी को देने के लिए। घर पहुंचा तो उन्हें दिए। "ये आपके लिए," मैंने कहा। उनकी आंखें चमक उठीं। "कितने अच्छे हो तुम," उन्होंने कहा और गले लगा लिया।
उस पल में कुछ बदला सा लगा। उनका स्पर्श गर्म था, और मैं थोड़ा असहज हो गया। लेकिन मैंने खुद को संभाला। रात को खाने के बाद हम टीवी देखने बैठे। मां जी ने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा, "तुम्हें प्रिया की याद आ रही होगी?"
मैंने कहा, "हां, लेकिन आप हैं ना।" वो मुस्कुराईं। धीरे-धीरे बातें व्यक्तिगत होने लगीं। उन्होंने अपनी शादी की बातें बताईं, कैसे वो अकेलापन महसूस करती हैं। मेरे मन में एक करुणा उमड़ी।
रात गहराने लगी, और हम दोनों अपने-अपने कमरों में चले गए। लेकिन नींद नहीं आ रही थी। मैं उठकर पानी पीने गया, तो देखा मां जी की रूम की लाइट जल रही है। मैंने दरवाजा खटखटाया, "मां जी, सब ठीक है?"
वो बोलीं, "हां बेटा, बस नींद नहीं आ रही।" मैं अंदर गया। वो बिस्तर पर बैठी थीं। हम बातें करने लगे। उनकी उदासी देखकर मैंने उनका हाथ थामा। "आप चिंता मत करो," मैंने कहा।
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उस स्पर्श में कुछ था। उनकी आंखों में एक चमक थी। धीरे से उन्होंने मेरा हाथ दबाया। मेरा दिल तेज धड़कने लगा। मैं जानता था ये गलत है, लेकिन वो पल मुझे खींच रहा था।
मैंने खुद को रोका, लेकिन मां जी ने कहा, "राहुल, इतने सालों बाद किसी का साथ अच्छा लगता है।" उनकी आवाज में एक कमजोरी थी। मैं करीब आया, और हम दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया।
उस गले लगने में सब कुछ बदल गया। उनके शरीर की गर्मी मुझे महसूस हुई। मैंने उनके होंठों को छुआ, और वो पीछे नहीं हटीं। हमारा चुंबन गहरा होता गया। मेरे मन में अपराधबोध था, लेकिन इच्छा मजबूत थी।
धीरे-धीरे मैंने उनके कपड़े उतारे। उनकी त्वचा नरम थी, और मैंने हर हिस्से को सहलाया। वो सिसक रही थीं, "राहुल, ये सही नहीं है।" लेकिन उनकी आंखें कुछ और कह रही थीं।
हम बिस्तर पर लेट गए। मैंने उनके शरीर को चूमा, हर अंग को महसूस किया। उनकी सांसें तेज थीं, और मैंने खुद को उनके अंदर महसूस किया। वो पल अवर्णनीय था, दर्द और सुख का मिश्रण।
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उस रात हमने कई बार एक-दूसरे को महसूस किया। हर बार नई भावना थी, कभी कोमलता, कभी उन्माद। सुबह होने तक हम थक चुके थे, लेकिन संतुष्ट।
अगले दिन प्रिया लौट आई। सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन मेरे मन में वो रात घूम रही थी। शाम को मां जी से नजर मिली, तो एक मुस्कान थी।
कुछ दिनों बाद, प्रिया फिर एक ट्रिप पर गई। इस बार मां जी और मैं ज्यादा खुल गए। हमने बातें की, और फिर वही पल दोहराया। इस बार ज्यादा भावनात्मक था, जैसे हम एक-दूसरे की जरूरत थे।
मैंने उनके कानों में फुसफुसाया, "मां जी, आप बहुत खास हैं।" वो बोलीं, "तुम भी, राहुल।" हमारा मिलन अब और गहरा था, हर स्पर्श में प्यार था।
एक शाम, जब प्रिया घर पर थी, लेकिन सो गई थी, मां जी मेरे कमरे में आईं। "नींद नहीं आ रही," उन्होंने कहा। मैंने उन्हें बांहों में लिया, और चुपके से हमने एक-दूसरे को महसूस किया।
उनकी सांसें मेरे कान पर लग रही थीं, और मैंने उनके शरीर को सहलाया। वो दबी हुई आवाज में सिसक रही थीं। वो पल जोखिम भरा था, लेकिन रोमांचक।
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समय बीतता गया, और हमारा रिश्ता गुप्त रहा। प्रिया के साथ मेरी जिंदगी सामान्य थी, लेकिन मां जी के साथ वो छिपा हुआ बंधन मजबूत होता गया।
एक रात, जब घर में अकेले थे, हमने पूरी रात साथ बिताई। मैंने उनके हर हिस्से को चूमा, और वो मेरे शरीर पर हाथ फेरती रहीं। हमारी सांसें एक हो गईं, और सुख की लहरें उठती रहीं।
उस मिलन में मैंने महसूस किया कि ये सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक था। उनकी आंखों में आंसू थे, खुशी के। मैंने उन्हें चूमा, और हम एक-दूसरे में खो गए।
अब हर पल में वो एहसास रहता है। प्रिया के साथ खुश हूं, लेकिन मां जी की वो गर्माहट अलग है। आज फिर रात है, और मैं उनके कमरे की तरफ जा रहा हूं।
दरवाजा खुला है, वो इंतजार कर रही हैं। मैं अंदर गया, और हमारी बाहें फिर एक हो गईं। उनकी सांसें तेज हैं, और मैं