दीदी की ससुराल में छुपा तूफान

सुबह की धूप धीरे-धीरे कमरे में घुस रही थी, और मैं अपनी चारपाई पर लेटी हुई चाय की चुस्की ले रही थी। ससुराल में रहते हुए अब दो साल हो चुके थे, लेकिन हर रोज की शुरुआत वैसी ही शांत और नियमित लगती थी। अमित काम पर निकल चुके थे, और मैं घर के कामों में लगने से पहले थोड़ा सुकून ले रही थी।

सासु मां रसोई में कुछ बड़बड़ा रही थीं, शायद आज के खाने की प्लानिंग कर रही थीं। ससुर जी अखबार पढ़ते हुए बालकनी में बैठे थे, और देवर विक्रम अभी-अभी उठा था, अपने कमरे से निकलकर बाथरूम की तरफ जा रहा था। यह सब इतना सामान्य था कि कभी-कभी लगता था जिंदगी एक ही ढर्रे पर चल रही है।

मैं प्रिया हूं, 26 साल की, अमित से शादी के बाद इस घर में आई थी। अमित एक अच्छे इंसान हैं, बैंक में जॉब करते हैं, लेकिन उनकी व्यस्तता ने हमारे बीच की वो पुरानी गर्माहट थोड़ी कम कर दी है। सासु मां अमिता जी सख्त लेकिन प्यार करने वाली हैं, ससुर जी राजेश जी रिटायर्ड हैं और घर की जिम्मेदारियां संभालते हैं।

विक्रम, अमित का छोटा भाई, 24 साल का है, कॉलेज खत्म करके अब जॉब की तलाश में है। वो घर में सबसे ज्यादा हंसमुख है, हमेशा मजाक करता रहता है। मैंने कभी उसके बारे में कुछ गलत नहीं सोचा था, बस उसे अपना छोटा भाई जैसा मानती थी। लेकिन पिछले कुछ दिनों से घर में एक अजीब सी शांति थी, जैसे कोई तूफान आने वाला हो।

उस दिन दोपहर को मैं कपड़े धो रही थी, जब विक्रम अचानक पीछे से आया और बोला, "भाभी, क्या मैं मदद कर दूं? तुम अकेले ही सारे काम कर रही हो।" उसकी आवाज में कुछ नरमी थी, जो सामान्य से अलग लगी। मैंने मुस्कुराकर कहा, "नहीं विक्रम, मैं कर लूंगी। तुम जाओ पढ़ाई करो।"

वो वहीं खड़ा रहा, थोड़ी देर तक मुझे देखता रहा। उसकी नजरें मेरी कमर पर टिकी हुई थीं, लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया। फिर वो चला गया, और मैं अपने काम में लग गई। शाम को अमित घर लौटे, थके हुए लग रहे थे। हमने साथ खाना खाया, लेकिन बातें कम हुईं।

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रात को बिस्तर पर लेटे हुए मैं सोच रही थी कि शादी के बाद जिंदगी कितनी बदल गई है। अमित जल्दी सो गए, लेकिन मुझे नींद नहीं आ रही थी। बाहर से कुछ आवाज आई, शायद विक्रम का कमरा था। मैं उठकर पानी पीने गई, और रसोई में अंधेरा था।

अचानक विक्रम वहां आ गया, शर्टलेस, सिर्फ शॉर्ट्स में। "भाभी, तुम भी नींद नहीं आ रही?" उसने पूछा। मैं चौंक गई, लेकिन सामान्य रहने की कोशिश की। "हां, थोड़ी गर्मी है न।" हम थोड़ी देर बातें करते रहे, घर की छोटी-मोटी बातें।

उसकी आंखों में कुछ था, एक चमक, जो मुझे असहज कर रही थी। लेकिन मैंने खुद को समझाया कि ये सिर्फ मेरा वहम है। अगले दिन सुबह, सासु मां बाजार गईं, ससुर जी दोस्त से मिलने निकले, और अमित काम पर। घर में सिर्फ मैं और विक्रम थे।

मैं कपड़े सुखा रही थी, जब विक्रम आया और बोला, "भाभी, आज कुछ स्पेशल बनाओ न खाने में।" मैंने हंसकर कहा, "ठीक है, क्या बनाऊं?" वो करीब आया, और अचानक मेरे हाथ को छुआ। "जो तुम्हें अच्छा लगे।" उसका स्पर्श गर्म था, और मैं पीछे हट गई।

दिल में एक अजीब सी हलचल हुई। क्या ये गलत है? विक्रम मेरा देवर है, लेकिन उसकी नजरें कुछ और कह रही थीं। मैंने बात बदल दी, और काम में लग गई। लेकिन पूरे दिन वो मेरे आसपास मंडराता रहा, छोटी-छोटी मदद करता। शाम को जब अमित आए, सब सामान्य लग रहा था।

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रात को फिर वही, नींद नहीं आ रही थी। मैं बालकनी में खड़ी थी, चांदनी रात थी। विक्रम आया, चुपचाप मेरे पास खड़ा हो गया। "भाभी, तुम बहुत खूबसूरत हो।" उसने धीरे से कहा। मैं स्तब्ध रह गई, क्या कहूं? "विक्रम, ये क्या बात कर रहे हो?"

वो और करीब आया, उसकी सांसें मेरे चेहरे पर महसूस हो रही थीं। "भाभी, मैं खुद को रोक नहीं पा रहा। अमित भैया तुम्हें वो प्यार नहीं देते जो तुम डिजर्व करती हो।" मेरे दिल में उथल-पुथल मच गई। एक तरफ वफादारी, दूसरी तरफ वो दबी हुई इच्छाएं।

मैंने उसे धक्का देकर दूर किया, "ये गलत है विक्रम। मैं तुम्हारी भाभी हूं।" लेकिन अंदर से मैं कांप रही थी। वो चला गया, लेकिन उस रात मुझे नींद नहीं आई। अगले दिन मैंने तय किया कि इस बारे में अमित से बात करूं, लेकिन कैसे?

दोपहर में विक्रम फिर आया, इस बार माफी मांगते हुए। "भाभी, सॉरी, मैंने गलती की।" लेकिन उसकी आंखें झूठ बोल रही थीं। हम बात करने लगे, और धीरे-धीरे वो फिर करीब आया। इस बार मैंने विरोध नहीं किया, शायद मेरी अपनी कमजोरी थी।

उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा, और मैं सिहर उठी। "विक्रम, मत करो।" लेकिन मेरी आवाज कमजोर थी। वो मुझे अपनी ओर खींचा, और हमारे होंठ मिल गए। वो चुंबन इतना तीव्र था कि मैं सब भूल गई। मेरे शरीर में आग लग गई।

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हम कमरे में चले गए, दरवाजा बंद किया। विक्रम ने मुझे बिस्तर पर लिटाया, मेरे कपड़े उतारने लगा। उसकी उंगलियां मेरी त्वचा पर रेंग रही थीं, हर स्पर्श में एक नई सनसनी। मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं, और खुद को बहने दिया।

उसका शरीर मेरे ऊपर था, गर्म और मजबूत। वो धीरे-धीरे मेरे स्तनों को सहला रहा था, निपल्स को चूस रहा था। मैं कराह उठी, "विक्रम... आह..." वो नीचे सरका, मेरी जांघों के बीच पहुंचा। उसकी जीभ ने मुझे पागल कर दिया, मैं कमर उचका रही थी।

फिर वो अंदर आया, धीरे लेकिन जोरदार। हर धक्के में एक नई दुनिया खुल रही थी। हम दोनों पसीने से तर थे, सांसें तेज। "भाभी, तुम कितनी मीठी हो," वो फुसफुसाया। मैंने उसे कसकर पकड़ लिया, climax के करीब पहुंचते हुए।

उसके बाद हम थककर लेटे रहे, लेकिन अपराधबोध ने मुझे घेर लिया। क्या ये सही था? लेकिन वो पल इतना सुंदर था कि मैं दोबारा विरोध नहीं कर पाई। अगले दिन घर वाले बाहर थे, और हम फिर मिले। इस बार ज्यादा जुनून था।

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विक्रम ने मुझे दीवार से सटाया, मेरी साड़ी ऊपर की, और पीछे से प्रवेश किया। दर्द और सुख का मिश्रण था, मैं चीखी लेकिन रुकने को नहीं कहा। वो मेरे बाल खींच रहा था, गर्दन पर काट रहा था। हर मूवमेंट में नई उत्तेजना।

हमारे बीच ये सिलसिला चलता रहा, चोरी-छिपे। एक दिन अमित घर जल्दी आ गए, लेकिन हम बच गए। लेकिन टेंशन बढ़ती जा रही थी। विक्रम कहता, "भाभी, मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता।" मैं भी अब उसकी आदी हो गई थी।

एक रात अमित सो रहे थे, और विक्रम मेरे कमरे में आया। हमने चुपचाप प्यार किया, सांसें दबाकर। उसकी हर हरकत में भावनाएं थीं, न सिर्फ शारीरिक। मैंने महसूस किया कि ये सिर्फ वासना नहीं, कुछ गहरा है।

लेकिन एक दिन सासु मां को शक हो गया। उन्होंने हमें देख लिया, जब हम करीब थे। घमासान मच गया, घर में चीख-पुकार। अमित को पता चला, और सब टूट गया। लेकिन उस वक्त विक्रम ने मुझे गले लगाया, और हमने तय किया कि भाग जाएंगे।

रात को हम घर से निकले, लेकिन रास्ते में अमित मिला। वो गुस्से में था, लेकिन बात की। "प्रिया, क्या ये सच है?" मैं रो पड़ी, "अमित, मुझे माफ कर दो।" लेकिन विक्रम ने कहा, "भैया, मैं प्रिया से प्यार करता हूं।"

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घर वापस लौटे, बातें हुईं। अमित सदमे में थे, लेकिन धीरे-धीरे समझे। अजीब बात, लेकिन उन्होंने हमें साथ रहने दिया, शायद अपनी गलतियां मानकर। अब घर में नई शुरुआत थी, लेकिन वो छुपी इच्छाएं अब खुलकर सामने आ गई थीं।

एक शाम विक्रम और मैं अकेले थे, अमित बाहर। हमने फिर प्यार किया, लेकिन इस बार अमित भी शामिल हुए। तीनों का मिलन, अजीब लेकिन रोमांचक। अमित ने मुझे चूमा, विक्रम ने सहलाया। हर स्पर्श में नई भावना।

हम बिस्तर पर थे, अमित सामने से, विक्रम पीछे से। सुख की लहरें उठ रही थीं, मैं बीच में पिस रही थी लेकिन खुश। "प्रिया, हम तीनों साथ हैं," अमित बोले। वो रात अविस्मरणीय थी, घमासान का असली मतलब समझ आया।

अब जिंदगी अलग थी, लेकिन भावनाएं गहरी। विक्रम की हर रात, अमित की सुबह। मैं खुद को भाग्यशाली मानती, लेकिन अंदर एक डर भी था। फिर भी, वो पल...