दीदी की मालिश और वो रात
शाम का वक्त था, और मैं घर पर अपनी किताबों में डूबा हुआ था। कॉलेज से लौटकर मैंने चाय बनाई और बालकनी में बैठकर शहर की हलचल को देख रहा था। माँ बाजार गई हुई थीं, और पापा ऑफिस से देर से लौटने वाले थे। घर में एक शांत सा माहौल था, जैसे हर रोज़ की तरह।
तभी दरवाजे पर घंटी बजी। मैंने उठकर दरवाजा खोला तो प्रिया दीदी खड़ी थीं, उनके चेहरे पर थोड़ी थकान थी। वो पिछले हफ्ते से हमारे घर पर ही रुकी हुई थीं, क्योंकि उनका पति राकेश भैया किसी काम से शहर से बाहर गए थे। दीदी ने मुस्कुराकर कहा, "रोहन, क्या कर रहा है? मैं बस थोड़ी देर बाहर घूमकर आई हूँ।"
मैंने उन्हें अंदर बुलाया और सोफे पर बैठाया। दीदी ने अपनी बैग रखी और पानी का ग्लास मांगा। हम दोनों भाई-बहन हमेशा से करीब थे, लेकिन अब दीदी की शादी हो चुकी थी, और उनका अपना घर था। फिर भी, जब भैया बाहर जाते, दीदी हमारे पास आ जातीं। मैंने पूछा, "दीदी, सब ठीक है न? आप थकी लग रही हो।"
दीदी ने सिर हिलाया और कहा, "हाँ, बस आज काम ज्यादा था। ऑफिस से लौटी तो पीठ में थोड़ा दर्द हो रहा है। शायद ज्यादा देर बैठने से।" मैंने चाय का कप उनके हाथ में थमाया और खुद भी बैठ गया। हमने थोड़ी देर परिवार की बातें कीं, माँ की सेहत के बारे में, पापा के काम के बारे में। वो पल इतना सामान्य था कि कुछ खास लग ही नहीं रहा था।
रात होने लगी थी, और माँ अभी तक नहीं लौटी थीं। दीदी ने कहा कि वो थोड़ा आराम करना चाहती हैं। मैंने अपना कमरा साफ किया और पढ़ाई में लग गया। लेकिन थोड़ी देर बाद दीदी मेरे कमरे में आईं और बोलीं, "रोहन, क्या तू मेरी पीठ की थोड़ी मालिश कर देगा? दर्द बढ़ता जा रहा है।" मैंने हिचकिचाते हुए हाँ कहा, क्योंकि बचपन में भी मैं कभी-कभी उनकी मालिश करता था।
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हम दीदी के कमरे में गए। वो बिस्तर पर उल्टी लेट गईं, और मैंने उनके कंधों पर हाथ रखा। दीदी ने अपनी कुर्ती थोड़ी ऊपर की ताकि मैं ठीक से मालिश कर सकूं। उनकी त्वचा नरम थी, लेकिन मैंने सिर्फ दर्द कम करने पर ध्यान दिया। "यहाँ दबा, रोहन," दीदी ने कहा, और मैंने धीरे-धीरे दबाया। कमरे में सिर्फ हमारी सांसों की आवाज़ थी।
मालिश करते-करते दीदी ने आह भरी, लेकिन वो दर्द की नहीं लग रही थी। मैंने रुककर पूछा, "दीदी, ठीक है न?" वो मुड़ीं और बोलीं, "हाँ, अच्छा लग रहा है। तू हमेशा अच्छी मालिश करता है।" उनकी आँखों में कुछ था, एक चुप्पी जो मुझे असहज कर रही थी। मैंने जारी रखा, लेकिन अब मेरे मन में कुछ उथल-पुथल हो रही थी।
दीदी की शादी को दो साल हो चुके थे, और मैं जानता था कि भैया के साथ उनकी जिंदगी ठीक चल रही थी। लेकिन इन दिनों दीदी थोड़ी उदास लगती थीं। शायद अकेलापन, या कुछ और। मालिश करते हुए मैंने उनके बालों को छुआ, और वो सिहर गईं। "रोहन, थोड़ा नीचे," दीदी ने धीमी आवाज़ में कहा। मैंने हाथ नीचे सरकाए, और अब माहौल बदल रहा था।
मैंने खुद को रोका, लेकिन दीदी ने मेरे हाथ पकड़ लिए। "रुक मत, रोहन। मुझे अच्छा लग रहा है।" उनकी आवाज़ में एक कंपन था। मैं असमंजस में था, क्योंकि वो मेरी दीदी थीं, लेकिन वो पल इतना करीब था कि मैं पीछे नहीं हट सका। दीदी ने करवट ली और मुझे देखा, उनकी आँखें नम थीं।
हम दोनों चुप थे, लेकिन वो चुप्पी बोल रही थी। दीदी ने अपना हाथ मेरे चेहरे पर रखा और बोलीं, "तू बड़ा हो गया है, रोहन। कभी-कभी लगता है कि मैंने तुझे खो दिया है।" मैंने कुछ नहीं कहा, बस उनकी आँखों में देखता रहा। फिर अचानक, दीदी ने मुझे अपनी ओर खींचा, और हमारे होंठ मिल गए। वो चुंबन इतना अप्रत्याशित था कि मैं स्तब्ध रह गया।
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लेकिन वो पल गुज़र गया, और मैंने खुद को अलग किया। "दीदी, ये गलत है," मैंने कहा, लेकिन मेरी आवाज़ कमज़ोर थी। दीदी ने सिर हिलाया और बोलीं, "शायद, लेकिन अभी मुझे तेरी ज़रूरत है। राकेश इतने दिनों से दूर है, और मैं अकेली हूँ।" उनकी बातों में दर्द था, और मैं समझ रहा था। हमारा रिश्ता हमेशा से गहरा था, लेकिन ये नया मोड़ डरावना था।
फिर भी, मैं रुक नहीं सका। दीदी ने अपनी कुर्ती उतारी, और मैंने उन्हें देखा। उनकी बॉडी इतनी परिचित लग रही थी, लेकिन अब अलग तरीके से। मैंने उनके कंधों को चूमा, और दीदी ने आह भरी। हम दोनों बिस्तर पर लेट गए, और मैंने उनकी पीठ पर फिर से हाथ फेरा, लेकिन अब ये मालिश नहीं थी।
दीदी की सांसें तेज़ हो रही थीं, और मैंने उनके गले पर चुंबन किए। "रोहन, धीरे," दीदी ने कहा, लेकिन उनके हाथ मेरी कमर पर थे। मैंने उनकी ब्रा खोली, और उनके स्तनों को छुआ। वो नरम और गर्म थे, और दीदी ने मुझे कसकर पकड़ लिया। कमरे की रोशनी मद्धम थी, और बाहर से शहर की आवाज़ें आ रही थीं।
हमारा मिलन धीरे-धीरे बढ़ रहा था। मैंने दीदी के पेट पर हाथ फेरा, और वो सिहर उठीं। "तू जानता है, रोहन, मैंने कभी सोचा नहीं था कि ऐसा होगा," दीदी ने फुसफुसाकर कहा। मैंने जवाब नहीं दिया, बस उनके होंठों को चूमा। अब हम दोनों के कपड़े उतर चुके थे, और मैं उनकी बॉडी को महसूस कर रहा था।
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दीदी ने मुझे ऊपर खींचा, और मैं उनके ऊपर आ गया। हमारी आँखें मिलीं, और वो पल इतना भावुक था कि मैं भूल गया कि ये गलत है। मैंने धीरे से प्रवेश किया, और दीदी ने आह भरी। हमारा ритम शुरू हो गया, धीमा और गहरा। दीदी के नाखून मेरी पीठ में गड़ रहे थे, और मैं उनकी सांसों को महसूस कर रहा था।
हर धक्के के साथ दीदी की आवाज़ ऊँची हो रही थी। "रोहन, और तेज़," उन्होंने कहा, और मैंने गति बढ़ाई। हमारा पसीना मिल रहा था, और कमरे में गर्मी बढ़ गई थी। दीदी ने अपनी टांगें मेरी कमर पर लपेट लीं, और हम एक हो गए। वो अनुभव इतना तीव्र था कि मैं खुद को खो रहा था।
कुछ देर बाद हम दोनों थककर लेट गए। दीदी मेरे सीने पर सिर रखकर लेटी थीं, और मैं उनके बालों में उंगलियाँ फिरा रहा था। "ये हमारा राज़ रहेगा, रोहन," दीदी ने कहा। मैंने हाँ में सिर हिलाया, लेकिन मन में उथल-पुथल थी। वो रात बदल गई थी, लेकिन हम दोनों जानते थे कि ये सिर्फ एक पल था।
अगली सुबह सब सामान्य लग रहा था। माँ लौट आई थीं, और दीदी ने नाश्ता बनाया। लेकिन हमारी नज़रें मिलतीं तो कुछ अनकहा सा रह जाता। शाम को फिर वही रूटीन, लेकिन अब एक सीक्रेट था। दीदी ने शाम को कहा, "रोहन, आज फिर पीठ दर्द हो रहा है।"
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मैं समझ गया। हम फिर कमरे में गए, और इस बार मालिश सीधे चुंबन में बदल गई। दीदी ज्यादा आक्रामक थीं, उन्होंने मुझे दीवार से सटाकर चूमा। "तू मुझे पागल कर देता है," दीदी ने कहा। मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया और उनके पूरे शरीर पर चुंबन किए।
इस बार हमारा मिलन अलग था। दीदी ने ऊपर आकर कंट्रोल लिया, और उनका मूवमेंट इतना सेंसुअल था कि मैं बस उन्हें देखता रहा। उनके बाल मेरे चेहरे पर गिर रहे थे, और उनकी सांसें मेरी त्वचा पर महसूस हो रही थीं। हम दोनों चरम पर पहुँचे, और दीदी ने जोर से आह भरी।
रात गहराती गई, और हम बातें करते रहे। दीदी ने अपने वैवाहिक जीवन के बारे में बताया, कैसे भैया हमेशा व्यस्त रहते हैं। "तू मुझे वो प्यार देता है जो मुझे चाहिए," उन्होंने कहा। मैंने उन्हें गले लगाया, और हम फिर से शुरू हो गए। इस बार धीमा, ज्यादा इमोशनल।
दीदी के हाथ मेरी बॉडी पर घूम रहे थे, और मैंने उनके कानों में फुसफुसाया, "दीदी, मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूंगा।" हमारा मिलन अब एक रूटीन बन रहा था, लेकिन हर बार नया लगता था। वो रात हमने कई बार एक-दूसरे को महसूस किया, हर बार अलग भावना के साथ।
कुछ दिनों बाद भैया लौट आए, और दीदी अपने घर चली गईं। लेकिन हमारे बीच वो बॉन्ड बना रहा। कभी-कभी फोन पर बात होती, और वो कहतीं, "रोहन, मुझे तेरी मालिश की याद आती है।" मैं मुस्कुराता, क्योंकि जानता था कि वो सिर्फ मालिश नहीं थी।
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एक बार फिर दीदी घर आईं, भैया फिर बाहर थे। शाम को हम अकेले थे, और दीदी ने सीधे कहा, "आज पूरी रात तेरी हूँ।" हमने दरवाजा बंद किया, और फिर वही जादू शुरू हुआ। दीदी की बॉडी अब मेरी हो चुकी थी, और मैं उनकी हर इच्छा पूरी कर रहा था।
हम बिस्तर पर लेटे, और दीदी ने मेरे शरीर को चूमा। "तू इतना परफेक्ट है," उन्होंने कहा। मैंने उन्हें उल्टा किया और पीछे से प्रवेश किया। दीदी की आहें कमरे में गूँज रही थीं, और हमारा पसीना बिस्तर पर गिर रहा था। वो रात सबसे लंबी थी, सबसे ज्यादा भावुक।
सुबह होने से पहले दीदी मेरे बगल में लेटी थीं, उनकी सांसें शांत थीं। मैंने उन्हें देखा, और सोचा कि ये रिश्ता कितना जटिल है। लेकिन उस पल में सब सही लग रहा था। हम दोनों ने एक-दूसरे को गले लगाया, और चुपचाप लेटे रहे।