बरसात की रात में दीदी के साथ

शाम का समय था, और बाहर हल्की-हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी। मैं अपने कमरे में बैठा था, किताब खोलकर पढ़ने की कोशिश कर रहा था, लेकिन मन कहीं और भटक रहा था। घर में सन्नाटा था, माँ-पापा काम से देर रात लौटते थे, और आज तो बारिश की वजह से और भी देरी हो सकती थी।

मैं अमित हूँ, कॉलेज का आखिरी साल चल रहा है, और घर दिल्ली के एक छोटे से फ्लैट में है। रोज की तरह, मैंने चाय बनाई और किचन में रखी कुर्सी पर बैठ गया। बाहर की बारिश की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी, और हवा ठंडी हो गई थी।

तभी दीदी आईं, प्रिया दीदी, जो मुझसे तीन साल बड़ी हैं। वो एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करती हैं, और आज जल्दी घर आ गई थीं। "अमित, चाय बना ली क्या?" उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा, और मैंने हाँ में सिर हिलाया।

हम दोनों किचन में बैठे, चाय पीते हुए। दीदी ने अपने दिन की बातें बताईं, ऑफिस की राजनीति, बॉस की डाँट, और मैंने कॉलेज की गॉसिप शेयर की। बाहर बारिश तेज हो गई थी, और बिजली की चमक से कमरा रोशन हो रहा था।

हमारा परिवार छोटा सा है, सिर्फ हम चार लोग। माँ स्कूल टीचर हैं, पापा बैंक में काम करते हैं। दीदी और मैं हमेशा से करीब रहे हैं, बचपन से ही एक-दूसरे के राज़दार। लेकिन अब हम बड़े हो गए हैं, मैं 22 का, दीदी 25 की।

रात हो गई थी, माँ-पापा का फोन आया कि बारिश की वजह से वो देर से आएँगे, शायद रात को ही। दीदी ने कहा, "चलो, कुछ खाना बनाते हैं।" हम दोनों किचन में लग गए, सब्जी काटते हुए, रोटी सेंकते हुए। हँसी-मजाक चल रहा था।

खाना खाकर हम लिविंग रूम में बैठे, टीवी ऑन किया। कोई पुरानी फिल्म चल रही थी, लेकिन हमारी बातें जारी थीं। दीदी ने अपनी जॉब की टेंशन बताई, कि कैसे वो थक जाती हैं। मैंने सुना, और कहा कि वो स्ट्रॉन्ग हैं।

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बाहर गरज रही थी, और अचानक बिजली चली गई। कमरा अंधेरा हो गया, सिर्फ बारिश की आवाज़। दीदी ने कहा, "अमित, मोमबत्ती जला ना।" मैंने उठकर एक मोमबत्ती जलाई, और टेबल पर रख दी।

हम दोनों सोफे पर बैठे, मोमबत्ती की रोशनी में। दीदी थोड़ा करीब आ गईं, शायद ठंड लग रही थी। मैंने अपनी जैकेट उन्हें दे दी। वो मुस्कुराईं, और बोलीं, "तू हमेशा मेरा ख्याल रखता है।"

बातों-बातों में पुरानी यादें आने लगीं। बचपन की शरारतें, स्कूल के दिन। मैंने देखा कि दीदी की आँखें थोड़ी उदास हैं, शायद जॉब की वजह से। मैंने उनका हाथ पकड़ा, और कहा, "सब ठीक हो जाएगा, दीदी।"

उस स्पर्श में कुछ अलग सा लगा, लेकिन मैंने सोचा नहीं। बारिश और तेज हो गई थी, खिड़की से पानी की बूँदें टपक रही थीं। हम चुप हो गए, सिर्फ बारिश की आवाज़।

दीदी ने सिर मेरे कंधे पर रख दिया, और बोलीं, "अमित, कभी-कभी लगता है कि जिंदगी कितनी तेज भाग रही है।" मैंने सहमति में सिर हिलाया, और उनका हाथ थामे रखा। वो पल शांत था, लेकिन अंदर कुछ हलचल हो रही थी।

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मैंने महसूस किया कि दीदी का शरीर मेरे करीब है, उनकी साँसें महसूस हो रही हैं। लेकिन मैंने खुद को रोका, ये क्या सोच रहा हूँ? वो मेरी दीदी हैं। फिर भी, वो closeness अलग लग रही थी।

बिजली अभी भी नहीं आई थी, हम दोनों उठे और बालकनी में गए। बाहर बारिश का पानी बह रहा था, सड़कें खाली। दीदी ने कहा, "कितना अच्छा लगता है ना, बारिश में।" मैंने हाँ कहा, और हम वहीं खड़े रहे।

अचानक एक तेज गरज हुई, और दीदी डरकर मेरी तरफ झुक गईं। उनका शरीर मेरे से सट गया, और मैंने उन्हें पकड़ लिया। वो पल लंबा खिंचा, हमारी नजरें मिलीं।

उस नजर में कुछ था, जो शब्दों से परे था। दीदी की आँखें बंद हो गईं, और मैंने खुद को रोक नहीं पाया। धीरे से मैंने उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। वो चौंकीं नहीं, बल्कि साथ दीं।

वो चुंबन गहरा था, बारिश की आवाज़ के बीच। मेरे हाथ उनकी कमर पर गए, और उन्होंने मुझे कसकर पकड़ लिया। अंदर कुछ टूट रहा था, लेकिन वो feeling रोकने लायक नहीं थी।

हम कमरे में वापस आए, मोमबत्ती की रोशनी में। दीदी ने मेरी शर्ट उतारी, और मैंने उनकी टी-शर्ट। हमारा स्पर्श नया था, लेकिन जाना-पहचाना। मैंने उनके गाल चूमे, गर्दन पर।

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दीदी की साँसें तेज हो गईं, वो बोलीं, "अमित, ये गलत है..." लेकिन उनकी आँखें कुछ और कह रही थीं। मैंने कहा, "दीदी, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ।" और हम बिस्तर पर लेट गए।

बारिश बाहर जारी थी, और अंदर हमारी दुनिया बदल रही थी। मैंने उनके शरीर को छुआ, हर हिस्से को महसूस किया। उनकी त्वचा नरम थी, और वो मेरे स्पर्श पर सिहर उठीं।

धीरे-धीरे मैंने उनके कपड़े उतारे, और वो मेरे। हम नग्न थे, एक-दूसरे के सामने। दीदी की आँखों में शर्म थी, लेकिन इच्छा भी। मैंने उन्हें चूमा, छाती पर, पेट पर।

मेरा हाथ उनकी जाँघों पर गया, और वो कराह उठीं। "अमित..." उन्होंने पुकारा, और मैंने महसूस किया उनकी नमी। धीरे से मैंने उंगली अंदर की, और वो काँप गईं।

वो feeling अद्भुत था, हमारी बॉन्डिंग का नया रूप। मैंने खुद को उनके ऊपर किया, और धीरे से प्रवेश किया। दीदी ने आह भरी, दर्द और सुख का मिश्रण।

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हमारी गतिविधि शुरू हुई, धीमी और गहरी। हर धक्के के साथ दीदी की सिसकियाँ बढ़ती गईं। मैंने उनके स्तनों को चूसा, और वो मेरे बालों में उँगलियाँ फिराती रहीं।

बारिश की रिदम के साथ हमारी रिदम मिल गई। दीदी ने मुझे कसकर पकड़ा, और बोलीं, "और तेज, अमित।" मैंने गति बढ़ाई, और हम दोनों चरम पर पहुँच गए।

उसके बाद हम लेटे रहे, साँसें सामान्य हो रही थीं। दीदी ने मेरे सीने पर सिर रखा, और मैंने उन्हें गले लगाया। बाहर बारिश थम नहीं रही थी, और अंदर हमारी चुप्पी में कई भावनाएँ थीं।

कुछ देर बाद दीदी उठीं, और बोलीं, "ये क्या कर दिया हमने?" लेकिन उनकी मुस्कान बता रही थी कि कोई पछतावा नहीं। मैंने कहा, "ये हमारा प्यार है, दीदी।"

हम फिर से करीब आए, इस बार और धीरे। मैंने उनके पूरे शरीर को चूमा, हर हिस्से को। दीदी की कराहें कमरे में गूँज रही थीं।

मैंने उन्हें उल्टा किया, पीछे से प्रवेश किया। वो नया एंगल था, और दीदी की आवाज़ और तेज हो गई। हमारी बॉडीज एक हो गईं, पसीने से भीगी।

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चरम पर पहुँचकर हम थककर लेट गए। दीदी ने मेरे कान में फुसफुसाया, "तू मेरा सब कुछ है, अमित।" मैंने उन्हें चूमा, और हम सो गए, बारिश की लोरी सुनते हुए।

सुबह हुई, बारिश रुक चुकी थी। लेकिन वो रात हमारी जिंदगी बदल चुकी थी। दीदी ने मुझे देखा, और मुस्कुराईं। हम जानते थे कि ये शुरुआत है।

दिनचर्या फिर शुरू हुई, लेकिन अब सब कुछ अलग था। शाम को फिर बारिश आई, और हम फिर से उसी दुनिया में खो गए।

दीदी के स्पर्श में अब कोई हिचक नहीं थी। हम बिस्तर पर थे, और इस बार दीदी ऊपर थीं। उन्होंने मुझे निर्देशित किया, अपनी रिदम में।

मैंने उनके कूल्हों को पकड़ा, और वो ऊपर-नीचे हो रही थीं। हमारी आँखें मिलीं, प्यार और वासना का मिश्रण।

चरम के बाद, हम बातें करते रहे। दीदी ने अपनी fantasies बताईं, और मैंने सुनीं। वो रात फिर से जादुई थी।

कई दिन ऐसे ही बीते, हमारी closeness बढ़ती गई। लेकिन अंदर conflict था, समाज क्या कहेगा? फिर भी, हम रुक नहीं पाए।

एक रात फिर बारिश, और हम फिर से। इस बार और intense, दीदी की चूत में मैंने गहराई तक महसूस किया। उनकी सिसकियाँ, मेरी साँसें, सब एक।

हम चरम पर पहुँचे, और लेटे रहे, हाथों में हाथ डाले। दीदी की आँखें बंद थीं, और मैं उन्हें देखता रहा।