दीदी के साथ वो अनोखी रात

सुबह की धूप अभी-अभी कमरे में घुसी थी, जब मैं बिस्तर से उठा। घर में सब कुछ वैसा ही था जैसा रोज होता है—माँ रसोई में चाय बना रही थीं, पापा अखबार पढ़ते हुए तैयार हो रहे थे। मैं राहुल, बीस साल का, कॉलेज जाने की तैयारी में था। आज का दिन भी बाकी दिनों जैसा लग रहा था, बस शाम को दीदी के साथ थोड़ी बात करने का मौका मिलेगा, जो हाल ही में अपनी नौकरी से छुट्टी लेकर घर आई थी।

कॉलेज से लौटकर मैंने बैग फेंका और सोफे पर बैठ गया। दीदी, रिया, जो मुझसे चार साल बड़ी है, लिविंग रूम में किताब पढ़ रही थी। वो दिल्ली में मार्केटिंग की जॉब करती है, लेकिन इस बार घर पर कुछ दिन रुकने का प्लान था। माँ-पापा शाम को किसी रिश्तेदार के यहां जा रहे थे, तो घर में सिर्फ हम दोनों रहने वाले थे। मैंने सोचा, आज रात कोई फिल्म देखेंगे साथ में, जैसे बचपन में करते थे।

दोपहर का खाना खाकर मैंने अपना होमवर्क शुरू किया। रिया दीदी किचन में कुछ स्नैक्स बना रही थी। वो हमेशा से ही घर की लाड़ली रही है—स्मार्ट, कॉन्फिडेंट, और परिवार की देखभाल करने वाली। मैं छोटा भाई हूं, तो उसकी आंखों में हमेशा एक प्यार भरी चिंता रहती है। शाम होते-होते माँ-पापा निकल गए, और घर में एक अजीब सा शांत वातावरण छा गया।

रिया दीदी ने मुझे आवाज दी, "राहुल, चल कुछ चाय पीते हैं।" हम दोनों किचन में बैठे, चाय की चुस्कियां लेते हुए पुरानी यादें ताजा कर रहे थे। वो बताने लगी अपनी जॉब की परेशानियां, कैसे बॉस हमेशा प्रेशर डालता है। मैंने भी कॉलेज की कहानियां सुनाईं—दोस्तों के साथ की मस्ती, एग्जाम का तनाव। बातों-बातों में समय निकलता गया, और बाहर अंधेरा घिर आया।

रात के नौ बजे हमने डिनर किया। दीदी ने कहा, "चल, कोई मूवी लगाते हैं। तू चुन, क्या देखना है?" मैंने सोचा, कुछ लाइट-हार्टेड कॉमेडी अच्छी रहेगी। लेकिन मेरे लैपटॉप में कुछ पुरानी फिल्में थीं, और अचानक एक विचार आया। मैंने हंसते हुए कहा, "दीदी, याद है बचपन में हम छुप-छुपकर टीवी देखते थे? आज कुछ एडवेंचर वाली देखें?" वो मुस्कुराई और बोली, "हां, क्यों नहीं। लेकिन कुछ अच्छी वाली चुनना।"

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मैंने लैपटॉप ऑन किया और नेटफ्लिक्स पर सर्च करने लगा। लेकिन मन में कुछ और चल रहा था। हाल ही में दोस्तों से सुनी कुछ बातें याद आ रही थीं—ब्लू फिल्मों की, जो छुपाकर देखी जाती हैं। मैंने कभी दीदी के साथ ऐसा कुछ सोचा नहीं था, लेकिन आज घर में अकेले थे, तो एक जिज्ञासा सी जागी। मैंने धीरे से कहा, "दीदी, अगर कुछ बोल्ड वाली देखें तो?" वो चौंकी, लेकिन फिर हंस पड़ी, "पागल है तू? ठीक है, ट्राई करते हैं, लेकिन अगर बोरिंग लगी तो बंद कर देंगे।"

मैंने एक ऐसी फिल्म चुनी जो ज्यादा वल्गर न हो, लेकिन थोड़ी एडल्ट थी। हम दोनों सोफे पर बैठे, लाइट्स बंद करके। फिल्म शुरू हुई, और शुरुआत में सब नॉर्मल था—कहानी, डायलॉग्स। लेकिन जैसे-जैसे सीन आगे बढ़े, कुछ इंटिमेट मोमेंट्स आने लगे। मैंने दीदी की तरफ देखा, वो शांत बैठी थी, लेकिन उसकी सांसें थोड़ी तेज लग रही थीं। मेरे मन में एक अजीब सा उल्लास था, जैसे कुछ नया अनुभव हो रहा हो।

फिल्म में एक सीन आया जहां कैरेक्टर्स करीब आते हैं। दीदी ने असहज होकर कहा, "राहुल, ये तो थोड़ी ज्यादा है न?" लेकिन वो रिमोट नहीं मांगा। मैंने जवाब दिया, "दीदी, अगर बंद कर दें?" वो बोली, "नहीं, चलने दे, देखते हैं क्या होता है।" हम दोनों की नजरें स्क्रीन पर टिकी रहीं, लेकिन बीच-बीच में एक-दूसरे की तरफ देखते। कमरे में गर्माहट बढ़ती जा रही थी, या शायद ये मेरा वहम था।

फिल्म आधी हुई, और अब सीन काफी बोल्ड हो चुके थे। मैंने महसूस किया कि दीदी की बॉडी थोड़ी सिकुड़ी हुई है, जैसे वो कुछ महसूस कर रही हो। मेरे अंदर भी एक टेंशन थी—ये सब देखकर मन में विचार आने लगे थे, जो पहले कभी नहीं आए। मैंने सोचा, क्या दीदी भी वैसा ही महसूस कर रही है? मैंने धीरे से उसका हाथ छुआ, बस सहारा देने के लिए, लेकिन वो चौंककर पीछे नहीं हटी।

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फिल्म खत्म होने से पहले ही दीदी ने कहा, "राहुल, बंद कर दे। ये... ये कुछ ज्यादा हो गया।" मैंने लैपटॉप बंद किया, और कमरे में सन्नाटा छा गया। हम दोनों एक-दूसरे की तरफ देख रहे थे, आंखों में एक अनकही बात थी। मैंने पूछा, "दीदी, तुम ठीक हो?" वो मुस्कुराई, लेकिन उसकी आंखें कुछ और कह रही थीं। "हां, लेकिन ये फिल्म ने कुछ अजीब सा फील करा दिया।"

हम बात करने लगे—फिल्म के बारे में, उसमें दिखाए रिश्तों के बारे में। दीदी ने कहा, "जिंदगी में कभी-कभी ऐसे मोमेंट्स आते हैं जब इंसान कंट्रोल खो देता है।" मैंने सहमति में सिर हिलाया। बातों-बातों में हम करीब आ गए। मैंने उसका हाथ पकड़ा, और इस बार वो नहीं हटी। मेरे मन में एक संघर्ष था—ये दीदी है, लेकिन ये फीलिंग्स क्या हैं? वो भी शायद वैसा ही सोच रही थी।

रात गहराती जा रही थी। हम दोनों अपने-अपने कमरों में जाने की बजाय लिविंग रूम में ही बैठे रहे। दीदी ने कहा, "राहुल, तू कभी ऐसी फिल्में देखता है?" मैंने शर्माते हुए हां कहा। वो बोली, "मैं भी कभी-कभी, लेकिन अकेले। आज साथ में देखकर... अच्छा लगा, लेकिन डर भी लग रहा है।" उसकी ये बात ने मुझे और करीब खींचा। मैंने धीरे से उसकी तरफ झुका, और वो नहीं रुकी।

हमारे होंठ मिले—पहली बार, एक हल्का सा चुंबन। मेरे अंदर बिजली सी दौड़ी। दीदी की सांसें तेज थीं, उसने मुझे गले लगा लिया। "राहुल, ये गलत है न?" वो फुसफुसाई। मैंने कहा, "शायद, लेकिन अभी सही लग रहा है।" हम दोनों के बीच की दूरी मिटती गई। मैंने उसके गाल पर हाथ फेरा, उसकी आंखें बंद थीं।

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कमरे की मद्धिम रोशनी में हम एक-दूसरे को छूने लगे। दीदी की साड़ी का पल्लू सरक गया, और मैंने उसके कंधे पर किस किया। वो कांप रही थी, लेकिन उसके हाथ मेरी कमीज उतारने लगे। मेरे मन में भावनाओं का तूफान था—प्यार, डर, उत्तेजना। मैंने उसे उठाकर बेडरूम में ले गया, जहां हम दोनों पूरी तरह खो गए।

बिस्तर पर लेटकर मैंने उसके शरीर को सहलाया। उसकी त्वचा इतनी मुलायम थी, जैसे रेशम। दीदी ने मेरी गर्दन पर किस किया, और मैंने उसके स्तनों को छुआ। वो कराह उठी, "राहुल... धीरे।" मैंने वैसा ही किया—धीरे-धीरे, हर पल को महसूस करते हुए। हमारा पहला अनुभव इतना गहरा था कि शब्दों में बयां नहीं कर सकता।

जैसे-जैसे हम आगे बढ़े, दीदी की आंखों में एक नई चमक थी। मैंने उसके शरीर के हर हिस्से को प्यार किया—उसकी कमर, जांघें, और फिर वो पल जब हम एक हो गए। उसकी सिसकियां कमरे में गूंज रही थीं, और मेरी हर धड़कन उसके नाम थी। ये सिर्फ शारीरिक नहीं था, बल्कि भावनात्मक बंधन था जो हमें जोड़ रहा था।

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पहले सीन के बाद हम थककर लेटे रहे, एक-दूसरे को गले लगाए। लेकिन रात अभी बाकी थी। दीदी ने मुस्कुराकर कहा, "राहुल, एक बार और?" मैंने हां में सिर हिलाया। इस बार हमने अलग तरीके ट्राई किए—वो ऊपर आई, और मैंने उसके बालों में उंगलियां फेरते हुए उसे महसूस किया। हर मूवमेंट में नई सनसनी थी, जैसे हर बार कुछ नया सीख रहे हों।

उसकी सांसें मेरे कान में गर्म हवा की तरह लग रही थीं। मैंने उसके निपल्स को चूमा, और वो जोर से कराही। हमारा पसीना मिल रहा था, शरीर एक लय में हिल रहे थे। दीदी की आंखें बंद थीं, लेकिन उसके होंठ मेरे नाम पुकार रहे थे। ये अनुभव इतना इंटेंस था कि समय का पता ही नहीं चला।

दूसरे राउंड के बाद हम बातें करने लगे—भविष्य के बारे में, इस रिश्ते के बारे में। दीदी ने कहा, "राहुल, ये हमारा सीक्रेट रहेगा। लेकिन मैं खुश हूं।" मैंने उसे चूमा, और हम फिर से शुरू हो गए। इस बार धीमा, ज्यादा इमोशनल—हर टच में प्यार था, हर किस में वादा।

रात के आखिरी घंटों में हम पूरी तरह थक चुके थे। दीदी मेरी छाती पर सिर रखकर लेटी थी, उसकी उंगलियां मेरे बालों में खेल रही थीं। मैंने सोचा, ये रात कभी भूल नहीं पाऊंगा। बाहर सुबह की पहली किरण आने वाली थी, लेकिन हम अभी भी एक-दूसरे में खोए हुए थे।

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दीदी ने धीरे से कहा, "राहुल, मुझे ऐसा लगा जैसे हम हमेशा से ऐसे थे।" मैंने उसे कसकर गले लगाया, और हम फिर से करीब आए। इस बार सिर्फ छूना, महसूस करना—कोई जल्दबाजी नहीं। उसकी त्वचा की खुशबू, उसकी सांसों की गर्मी, सब कुछ परफेक्ट लग रहा था।

हमारे शरीर फिर से एक हुए, लेकिन इस बार ये ज्यादा गहरा था। दीदी की कराहें अब खुशी की थीं, और मैं उसके हर हिस्से को एक्सप्लोर कर रहा था। वो मेरे कानों में फुसफुसाई, "तू मेरा है, राहुल।" मैंने जवाब में उसे और जोर से पकड़ा, और हम चरम पर पहुंचे।

सुबह होने से पहले हम लेटे रहे, बातें करते हुए। दीदी की आंखें थकान से भरी थीं, लेकिन संतुष्टि से चमक रही थीं। मैंने उसके माथे पर किस किया, और हम सो गए—एक-दूसरे की बाहों में।