बरसात की रात में दीदी के साथ

मैं राहुल हूँ, और उस शाम मैं अपने छोटे से घर की बालकनी में बैठा था। बाहर हल्की-हल्की फुहार पड़ रही थी, जो धीरे-धीरे तेज बारिश में बदलने वाली थी। मैंने अपनी किताब बंद की और चाय का कप उठाया, जो अब ठंडा हो चुका था।

हमारा घर दिल्ली के एक पुराने मोहल्ले में है, जहाँ मैं और मेरी दीदी प्रिया अकेले रहते हैं। माँ-पापा गाँव में हैं, और हम दोनों यहाँ नौकरी करते हैं। मैं 22 साल का हूँ, एक छोटी आईटी कंपनी में काम करता हूँ, और प्रिया 25 की है, वो एक स्कूल में टीचर है।

उस दिन ऑफिस से जल्दी लौट आया था मैं, क्योंकि मौसम खराब होने का अनुमान था। प्रिया अभी घर नहीं आई थी, शायद स्कूल से देर हो गई होगी। मैंने रसोई में जाकर कुछ सैंडविच बनाए और टीवी ऑन कर लिया।

बाहर बारिश की आवाज़ तेज हो गई थी। मैं सोफे पर बैठा न्यूज़ देख रहा था, जब दरवाजे की घंटी बजी। मैंने उठकर दरवाजा खोला, तो प्रिया भीगी हुई खड़ी थी, उसके हाथ में छाता था जो बेकार साबित हो चुका था।

"अरे राहुल, जल्दी से तौलिया दे ना, पूरी भीग गई हूँ," उसने हँसते हुए कहा। मैंने जल्दी से बाथरूम से तौलिया लाकर दिया और वो अंदर आ गई। हमारा घर छोटा है, दो कमरे, एक हॉल और किचन।

प्रिया ने अपना बैग रखा और तौलिया से बाल पोंछने लगी। मैंने चाय बनाने की पेशकश की, लेकिन उसने मना कर दिया। "नहीं, पहले कपड़े बदल लूँ," उसने कहा और अपने कमरे की तरफ चली गई।

मैं वापस सोफे पर बैठ गया। हम दोनों का रिश्ता हमेशा से करीबी रहा है। बचपन से ही प्रिया मेरी देखभाल करती आई है, खासकर जब माँ-पापा काम पर होते थे। अब बड़े हो गए हैं, लेकिन वो आदत नहीं गई।

थोड़ी देर बाद प्रिया बाहर आई, उसने घर का साधारण सूट पहना हुआ था। "क्या बना रहा है आज रात को?" उसने पूछा, रसोई की तरफ जाते हुए। मैंने कहा, "सोचा था दाल-चावल बना लें, या बाहर से ऑर्डर कर लें अगर बारिश रुकी तो।"

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बारिश अब जोरों पर थी, खिड़कियाँ हिल रही थीं। हम दोनों ने मिलकर रसोई में काम शुरू किया। प्रिया सब्जी काट रही थी, और मैं चावल धो रहा था। हमारी बातें चल रही थीं, स्कूल की, ऑफिस की।

"आज क्लास में बच्चों ने इतना शोर मचाया कि सिर दर्द हो गया," प्रिया ने शिकायत की। मैंने हँसकर कहा, "तुम्हें तो आदत होनी चाहिए अब तक।" वो मुस्कुराई और मेरी तरफ देखा।

रात का खाना बनाते-बनाते हमने प्लेट्स सजाईं और हॉल में बैठकर खाया। टीवी पर कोई पुरानी फिल्म चल रही थी, लेकिन हम ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे थे। बारिश की आवाज़ सब कुछ ढक रही थी।

खाना खत्म होने के बाद मैंने बर्तन धोने की पेशकश की, लेकिन प्रिया ने कहा, "नहीं, मैं कर लूँगी। तू आराम कर।" मैं सोफे पर लेट गया, और वो रसोई में व्यस्त हो गई।

कुछ देर बाद प्रिया आई और मेरे पास बैठ गई। "कितनी तेज बारिश है ना," उसने कहा, खिड़की की तरफ देखते हुए। मैंने हामी भरी। हम दोनों चुपचाप बैठे रहे, बस बारिश की धुन सुनते हुए।

फिर अचानक बिजली चली गई। अंधेरा हो गया पूरे घर में। प्रिया ने कहा, "अरे, अब क्या करें?" मैंने फोन की लाइट जलाई और कैंडल ढूंढी। हमने एक कैंडल जलाई और टेबल पर रख दी।

अब कमरा हल्की रोशनी से भर गया था। प्रिया मेरे करीब बैठी थी, और हम बातें करने लगे। पुरानी यादें, बचपन की शरारतें। "याद है, जब तू छोटा था और मैं तुझे स्कूल छोड़ने जाती थी," उसने कहा।

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मैंने हँसकर जवाब दिया, "हाँ, और तू हमेशा मेरी शिकायत करती थी माँ से।" हम दोनों हँसे। लेकिन उस हँसी में कुछ अलग था, शायद वो अंधेरा और बारिश का असर।

धीरे-धीरे बातें गहरी होने लगीं। प्रिया ने अपनी जिंदगी के बारे में बताया, कैसे वो अकेलापन महसूस करती है कभी-कभी। "तू है ना मेरे साथ, फिर भी कभी मन उदास हो जाता है," उसने कहा।

मैंने उसका हाथ पकड़ा, सांत्वना देने के लिए। "मैं हमेशा हूँ दीदी, तू चिंता मत कर।" वो मेरी तरफ मुड़ी, और उसकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा।

कैंडल की रोशनी में उसका चेहरा और खूबसूरत लग रहा था। हमारी नजरें मिलीं, और एक पल के लिए समय रुक सा गया। प्रिया ने अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा, और हम चुप रहे।

बारिश बाहर और तेज हो गई थी, जैसे हमारी भावनाओं को उकसा रही हो। मैंने महसूस किया कि मेरा दिल तेज धड़क रहा है। प्रिया ने धीरे से कहा, "राहुल, तू मेरा कितना ख्याल रखता है।"

मैं कुछ कह नहीं पाया, बस उसकी तरफ देखता रहा। फिर वो मेरे और करीब आई, और उसने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया। मैंने उसे गले लगा लिया, भाई-बहन के रिश्ते की गर्माहट में।

लेकिन वो गर्माहट कुछ और में बदल रही थी। प्रिया की साँसें मेरे गले पर महसूस हो रही थीं। मैंने अपना हाथ उसकी कमर पर रखा, और वो सिहर उठी।

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"दीदी," मैंने धीरे से कहा, लेकिन वो चुप रही। फिर उसने अपना चेहरा उठाया और मेरी आँखों में देखा। उस पल में सब कुछ बदल गया।

हमारी होंठ मिले, पहले हिचकिचाहट से, फिर पूरी ताकत से। प्रिया के होंठ नरम थे, और मैं खुद को रोक नहीं पाया। हम एक-दूसरे में खो गए।

कैंडल की लौ टिमटिमा रही थी, और बारिश की आवाज़ हमारी साँसों के साथ मिल रही थी। प्रिया ने मेरी शर्ट के बटन खोलने शुरू किए, और मैंने उसके सूट का दुपट्टा हटाया।

हम सोफे से उठे और मेरे कमरे की तरफ चले गए। वहाँ बिस्तर पर हम लेट गए, और मैंने उसे किस करना जारी रखा। उसकी त्वचा गर्म थी, और मैं अपनी उँगलियाँ उसके बालों में फिरा रहा था।

प्रिया ने मेरी पैंट उतारी, और मैंने उसके कपड़े। नंगे होकर हम एक-दूसरे को छू रहे थे, हर स्पर्श में एक नई उत्तेजना। "राहुल, ये गलत है," उसने फुसफुसाया, लेकिन उसके हाथ मुझे रोक नहीं रहे थे।

मैंने कहा, "दीदी, लेकिन ये सही लग रहा है अभी।" हमारा संघर्ष भावनाओं से भरा था, लेकिन इच्छा जीत रही थी। मैंने उसके स्तनों को छुआ, और वो कराह उठी।

धीरे-धीरे मैं नीचे सरका, उसके पेट को चूमा, फिर उसकी जाँघों को। प्रिया की साँसें तेज हो गईं। मैंने अपनी जीभ से उसे छुआ, और वो काँप उठी।

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"ओह राहुल," उसने कहा, अपने हाथ मेरे सिर पर रखते हुए। मैंने जारी रखा, उसकी चूत को चाटते हुए, उसकी नमी को महसूस करते हुए। वो बार-बार सिहर रही थी।

फिर मैं ऊपर आया और अपना लंड उसकी चूत पर रगड़ा। प्रिया ने आँखें बंद कर लीं, और मैं धीरे से अंदर घुसा। वो दर्द से चीखी, लेकिन फिर मुस्कुराई।

हमारी चुदाई शुरू हुई, धीमी और गहरी। हर धक्के में हमारी भावनाएँ उफान पर थीं। प्रिया ने मुझे कसकर पकड़ लिया, उसके नाखून मेरी पीठ में गड़ रहे थे।

बारिश बाहर जारी थी, जैसे हमारी इस रात को आशीर्वाद दे रही हो। मैं तेज हुआ, और प्रिया की कराहें कमरे में गूँज रही थीं। "और जोर से, राहुल," उसने कहा।

हमने पोजीशन बदली, अब वो ऊपर थी। उसने मुझे सवारी की, उसके स्तन उछल रहे थे। मैंने उन्हें पकड़ा और चूसा, जबकि वो नीचे-ऊपर हो रही थी।

हमारा क्लाइमैक्स करीब था। प्रिया की चूत मेरे लंड को कस रही थी, और मैं खुद को रोक नहीं पाया। हम एक साथ झड़ गए, हमारी साँसें मिलकर एक हो गईं।

उसके बाद हम लेटे रहे, एक-दूसरे की बाहों में। प्रिया ने मेरे सीने पर सिर रखा, और मैं उसके बाल सहला रहा था। बारिश अब धीमी हो गई थी, लेकिन हमारी रात अभी खत्म नहीं हुई थी।

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थोड़ी देर बाद प्रिया ने फिर से मुझे किस किया, और हम दोबारा शुरू हो गए। इस बार ज्यादा जुनून से, ज्यादा गहराई से। मैंने उसे दीवार के सहारे खड़ा किया और पीछे से घुसाया।

उसकी कराहें अब और तेज थीं, और मैं उसके कूल्हों को पकड़कर धक्के मार रहा था। "दीदी, तुम कितनी सुंदर हो," मैंने कहा। वो मुड़ी और मुझे देखा, उसकी आँखों में प्यार और इच्छा थी।

हम बिस्तर पर वापस लौटे, और इस बार मैंने उसके पैर फैलाए और गहराई से चोदा। हर मूवमेंट में नई सेंसेशन, नई भावना। प्रिया की उँगलियाँ मेरी पीठ पर निशान छोड़ रही थीं।

रात गहराती गई, और हमारी चुदाई जारी रही। कभी धीमी, कभी तेज। हम एक-दूसरे के शरीर को एक्सप्लोर कर रहे थे, जैसे पहली बार।

सुबह होने से पहले हम थककर सो गए, लेकिन वो रात हमारी जिंदगी बदल चुकी थी। प्रिया की बाहों में लेटे हुए मैं सोच रहा था कि ये सब कैसे हुआ, लेकिन कोई पछतावा नहीं था।

बारिश रुक चुकी थी, लेकिन हमारे बीच का तूफान अभी शांत नहीं हुआ था। प्रिया ने आँखें खोलीं और मुझे देखा, फिर धीरे से किस किया। हम फिर से एक हो गए, सुबह की पहली किरण में।

उसकी चूत अब और गीली थी, और मैंने उसे फिर से भरा। हमारी साँसें मिलीं, शरीर एक हुए। ये पल अनंत लग रहा था।