ठंड की रात में मौसी के साथ
सर्दियों की वो शाम थी जब दिल्ली की हवा में ठंड इतनी तेज हो गई थी कि बाहर निकलना मुश्किल लगता था। मैं राहुल, अपने छोटे से अपार्टमेंट में अकेला बैठा चाय की चुस्की ले रहा था, बाहर की खिड़की से देखते हुए जहां सड़क पर लोग गर्म कपड़ों में लिपटे हुए जल्दी-जल्दी घर की ओर जा रहे थे। दिनभर की नौकरी के बाद ये शाम मेरी दिनचर्या का हिस्सा थी, जहां मैं किताब पढ़ता या टीवी देखता, लेकिन आज कुछ अलग था क्योंकि मौसी आने वाली थीं।
मौसी का नाम रेखा है, मेरी मां की छोटी बहन, जो लखनऊ से दिल्ली आ रही थीं कुछ दिनों के लिए। उनके पति, जो एक बिजनेसमैन हैं, विदेश गए हुए थे, और मौसी को अकेले घर में अच्छा नहीं लगता था। मैं 25 साल का हूं, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, और मौसी 38 की हैं, लेकिन वो हमेशा से मेरी फेवरेट रिश्तेदार रही हैं। बचपन से वो मुझे कहानियां सुनातीं, और अब भी फोन पर बात करके मेरी जिंदगी के बारे में पूछतीं। आज वो ट्रेन से आ रही थीं, और मैं स्टेशन पर उन्हें लेने गया था।
स्टेशन पर पहुंचते ही ठंड ने मुझे कंपकंपा दिया, लेकिन मौसी को देखकर मन खुश हो गया। वो गर्म शॉल में लिपटी हुई थीं, हाथ में छोटा सा बैग लिए, और मुस्कुराते हुए बोलीं, "राहुल बेटा, कितनी ठंड है यहां! लखनऊ से तो ज्यादा ही लग रही है।" हम टैक्सी में बैठे, और रास्ते भर वो घर-परिवार की बातें करती रहीं। मैंने उन्हें बताया कि मां-पापा गांव में हैं, और मैं यहां अकेला मैनेज कर रहा हूं। अपार्टमेंट पहुंचकर मैंने चाय बनाई, और हम सोफे पर बैठकर गप्पें मारने लगे।
रात हो चुकी थी, और ठंड इतनी थी कि हीटर चालू करने के बावजूद कमरे में सिहरन सी महसूस हो रही थी। मौसी ने अपना बैग खोला और कुछ घर से लाई मिठाइयां निकालीं, "ये तेरे लिए, बेटा। तू तो यहां अकेला रहता है, खाने का ध्यान रखता है न?" मैंने हंसकर कहा, "हां मौसी, लेकिन आपकी लाई चीजें हमेशा स्पेशल होती हैं।" हमने डिनर किया, साधारण दाल-चावल, और फिर टीवी पर कोई पुरानी फिल्म देखने लगे। मौसी मेरे बगल में बैठी थीं, और ठंड से बचने के लिए उन्होंने शॉल ओढ़ रखी थी।
फिल्म देखते-देखते मौसी ने पूछा, "राहुल, तेरी कोई गर्लफ्रेंड है? उम्र हो गई है अब।" मैं थोड़ा शरमाया, "नहीं मौसी, काम में इतना बिजी रहता हूं कि वक्त ही नहीं मिलता।" वो हंसीं, "अरे, जिंदगी सिर्फ काम नहीं है। कोई अच्छी लड़की मिले तो बताना मुझे।" उनकी बातों में वो पुरानी वाली केयर थी, जो मुझे हमेशा अच्छी लगती थी। रात गहराती गई, और मैंने उन्हें गेस्ट रूम में सुला दिया, खुद अपने कमरे में चला गया। लेकिन ठंड इतनी थी कि नींद नहीं आ रही थी।
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अगले दिन सुबह उठकर मैंने ब्रेकफास्ट बनाया, पराठे और चाय। मौसी किचन में आईं, बाल खुले हुए, और बोलीं, "वाह राहुल, तू तो अच्छा कुक बन गया है।" हम साथ बैठकर खाए, और दिनभर मैं घर से काम कर रहा था क्योंकि ऑफिस की छुट्टी थी। मौसी घर की सफाई में मदद करने लगीं, और हम बातें करते रहे। शाम को ठंड फिर बढ़ गई, और हमने साथ में चाय पी। मौसी ने कहा, "यहां की ठंड तो हड्डियां जमा देती है। लखनऊ में इतनी नहीं होती।" मैंने हंसकर जवाब दिया, "हां मौसी, लेकिन आप हैं तो अच्छा लग रहा है।"
रात को फिर वही रूटीन, लेकिन इस बार मौसी ने कहा कि गेस्ट रूम में ठंड ज्यादा लग रही है। "राहुल, क्या मैं तेरे कमरे में सो जाऊं? वहां हीटर बेहतर काम कर रहा है।" मैंने हामी भरी, "हां मौसी, कोई दिक्कत नहीं। मैं सोफे पर सो जाऊंगा।" लेकिन वो मानी नहीं, "नहीं बेटा, इतनी ठंड में सोफा? हम दोनों ही बेड पर सो जाएंगे, स्पेस तो है।" मैं थोड़ा हिचकिचाया, लेकिन ठंड को देखते हुए मान गया। हम बेड पर लेटे, अलग-अलग कंबल ओढ़कर।
रात के सन्नाटे में मैं जाग रहा था, मौसी की सांसें सुनते हुए। वो करवट बदल रही थीं, शायद ठंड से। अचानक उन्होंने कहा, "राहुल, तुझे नींद आ रही है?" मैंने जवाब दिया, "नहीं मौसी, ठंड बहुत है।" वो थोड़ा करीब सरकीं, "मैं भी कांप रही हूं। जरा पास आ जा, गर्मी मिलेगी।" उनका हाथ मेरे कंधे पर रखा, और मैंने महसूस किया कि उनका स्पर्श कितना नरम था। मन में एक अजीब सी हलचल हुई, लेकिन मैंने खुद को संभाला।
धीरे-धीरे बातें शुरू हुईं। मौसी ने अपनी जिंदगी के बारे में बताया, कैसे उनके पति हमेशा बाहर रहते हैं, और वो अकेली महसूस करती हैं। "राहुल, कभी-कभी लगता है कि जिंदगी में कुछ कमी है।" उनकी आवाज में उदासी थी, और मैंने कहा, "मौसी, आप बहुत स्ट्रॉन्ग हैं। मैं हमेशा आपके लिए हूं।" वो मुस्कुराईं, और उनका हाथ मेरे हाथ पर आ गया। ठंड की रात में वो स्पर्श गर्माहट दे रहा था, लेकिन मेरे मन में कुछ और उथल-पुथल मच रही थी।
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मैंने खुद को रोकने की कोशिश की, लेकिन मौसी की आंखों में वो अकेलापन देखकर दिल पिघल गया। वो और करीब आईं, और बोलीं, "राहुल, तू मेरा कितना ख्याल रखता है।" उनका चेहरा मेरे करीब था, और मैंने महसूस किया कि मेरी सांसें तेज हो रही हैं। अचानक, बिना सोचे, मैंने उनका हाथ चूम लिया। वो चौंकी नहीं, बल्कि आंखें बंद करके रह गईं। मन में संघर्ष था – ये गलत है, लेकिन भावनाएं उफान पर थीं।
रात और गहरा गई, और हमारी बातें गहरी होती गईं। मौसी ने अपनी शादी की बातें बताईं, कैसे वो कभी पूरी तरह खुश नहीं रहीं। मैंने सुना, और धीरे से उनका कंधा सहलाया। उनका शरीर ठंड से कांप रहा था, लेकिन अब गर्मी महसूस हो रही थी। मैंने उन्हें गले लगाया, सिर्फ ठंड से बचाने के लिए, लेकिन वो पल कुछ और बन गया। उनकी सांसें मेरे गले पर लग रही थीं, और मैंने खुद को खोया हुआ पाया।
मौसी ने मेरी आंखों में देखा, और बोलीं, "राहुल, क्या ये गलत है?" मैंने जवाब नहीं दिया, बस उनके होंठों को छुआ। वो पल इतना भावुक था कि आंसू आ गए। हम एक-दूसरे में खो गए, ठंड की रात में गर्माहट तलाशते हुए। उनका शरीर मेरे शरीर से सटा, और मैंने महसूस किया कि कितनी नरमी है उनमें। धीरे-धीरे कपड़े उतरे, और हमारी दुनिया सिर्फ हम दोनों की हो गई।
उस रात ठंड बाहर थी, लेकिन अंदर आग लगी हुई थी। मैंने मौसी के शरीर को सहलाया, हर हिस्से को प्यार से छुआ। वो कराह रही थीं, "राहुल, इतना अच्छा कभी नहीं लगा।" मेरी उंगलियां उनके बालों में, उनकी कमर पर, और फिर नीचे। वो मेरे ऊपर आईं, और हमारा मिलन इतना गहरा था कि समय रुक सा गया। हर स्पर्श में भावनाएं थीं, अकेलेपन का अंत और एक नई शुरुआत।
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सुबह हुई, लेकिन हम नहीं उठे। ठंड अभी भी थी, लेकिन अब हम साथ थे। मौसी ने मेरे सीने पर सिर रखा, और बोलीं, "ये हमारा राज रहेगा, राहुल।" मैंने हामी भरी, और फिर से उन्हें चूमा। दिन गुजरा, लेकिन हर पल में वो करीब आती गईं। शाम को हम फिर बेड पर थे, इस बार बिना हिचक के। मैंने उनके पैरों को सहलाया, उनकी जांघों को चूमा, और वो मेरे नाम पुकारती रहीं।
रात फिर आई, और ठंड ने हमें और करीब ला दिया। इस बार हमने धीरे-धीरे शुरू किया, बातों से, फिर स्पर्श से। मौसी की आंखें चमक रही थीं, और मैंने महसूस किया कि ये सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक था। उनका शरीर मेरे नीचे था, और हम एक लय में थे। हर गति में नई सनसनी, नई भावना। वो मेरे कानों में फुसफुसाईं, "और तेज, राहुल।" और मैंने वैसा ही किया।
कुछ दिनों बाद मौसी को जाना था, लेकिन वो रातें हमेशा याद रहेंगी। ठंड की आखिरी रात हमने फिर वही किया, लेकिन इस बार और गहराई से। मैंने उनके पूरे शरीर को एक्सप्लोर किया, हर हिस्से को प्यार दिया। वो चीखीं नहीं, बस सिसकियां लीं, और हम साथ में चरम पर पहुंचे। सुबह वो उठीं, मुझे चूमा, और बोलीं, "तू मेरी जिंदगी का हिस्सा है अब।"
ट्रेन स्टेशन पर छोड़ते हुए मन भारी था। ठंड अभी भी थी, लेकिन दिल में गर्माहट। मौसी ने कहा, "फिर आऊंगी, राहुल।" मैंने मुस्कुराकर विदा किया, लेकिन जानता था कि ये ठंड की रातें हमें बदल चुकी हैं। घर लौटकर मैं अकेला था, लेकिन यादें साथ थीं।
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कुछ हफ्ते बाद मौसी का फोन आया, "राहुल, ठंड फिर बढ़ रही है लखनऊ में। क्या मैं आ जाऊं?" मैंने हंसकर कहा, "हां मौसी, इंतजार है।" वो आईं, और फिर वही रातें शुरू हुईं। इस बार हम और खुले थे, कोई संकोच नहीं। मैंने उन्हें बाहों में लिया, उनके स्तनों को चूसा, और वो मेरे शरीर पर रेंगती रहीं। हर पल नया था, हर स्पर्श में प्यार।
एक रात हम बाहर बालकनी में खड़े थे, ठंडी हवा में। मौसी ने मुझे गले लगाया, और बोलीं, "राहुल, ये ठंड हमें मिलाती है।" हम अंदर आए, और बेड पर गिरे। मैंने उनकी पीठ सहलाई, उनकी गांड को दबाया, और फिर प्रवेश किया। वो कराह रही थीं, "हां, ऐसे ही।" हमारा मिलन लंबा चला, भावनाओं से भरा।
समय गुजरता गया, लेकिन हमारा रिश्ता गहराता गया। ठंड का मौसम खत्म होने वाला था, लेकिन हमारी आग नहीं। आखिरी रात हमने सब कुछ किया, धीरे से, प्यार से। मौसी मेरे ऊपर थीं, उनकी कमर हिल रही थी, और मैंने उनके चेहरे पर वो संतुष्टि देखी। हम साथ में सोए, एक-दूसरे में लिपटे।
सुबह उठकर मौसी ने पैकिंग की, लेकिन आंखों में नमी थी। मैंने उन्हें गले लगाया, और चूमा। ट्रेन में बैठते हुए वो बोलीं, "जल्दी मिलेंगे, राहुल।" मैं घर लौटा, ठंड अब कम थी, लेकिन दिल में वो रातें हमेशा रहेंगी।
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कुछ महीने बाद गर्मियां आईं, लेकिन मौसी का फोन आया, "राहुल, मुझे तेरी याद आ रही है।" मैंने कहा, "मुझे भी, मौसी।" वो फिर आईं, भले ठंड न हो, लेकिन हमारा प्यार वही था। हम साथ थे, भावनाओं में डूबे।
एक शाम हम पार्क में घूम रहे थे, और घर आकर फिर एक हो गए। मौसी की सांसें तेज थीं, और मैंने उन्हें हर तरह से संतुष्ट किया। वो मेरे नाम लेती रहीं, और हम चरम पर पहुंचे। रात भर हम बातें करते रहे, अपने भविष्य के बारे में।
ये रिश्ता अब हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गया था। ठंड हो या गर्मी, हम एक-दूसरे के लिए थे। मौसी ने कहा, "राहुल, तू मेरी खुशी है।" मैंने उन्हें चूमा, और हम फिर से मिलन में खो गए।