गांव की वो रात

सुबह की पहली किरणें अभी-अभी खिड़की से झांक रही थीं, जब मैं बिस्तर से उठा। हमारा छोटा सा गांव, जहां हर दिन एक जैसा लगता था, आज भी वैसा ही था। मैंने बाहर निकलकर देखा, खेतों में हल्की धुंध छाई हुई थी, और दूर से गायों की घंटियों की आवाज आ रही थी।

मैं रवि हूं, उम्र होगी कोई बाइस साल की। शहर में पढ़ाई छोड़कर गांव लौट आया था, पिता जी की तबीयत खराब होने की वजह से। अब यहीं रहता हूं, खेती-बाड़ी में हाथ बंटाता हूं। चाचा जी का घर हमारे घर से सटा हुआ है, और चाची सुनीता हमेशा परिवार की धुरी बनी रहती हैं।

चाची की उम्र होगी कोई चालीस के आसपास, लेकिन वो गांव की औरतों जैसी ही लगती हैं—साड़ी में लिपटी, बालों में चोटी, और चेहरे पर वो सादगी वाली मुस्कान। चाचा जी खेतों में ज्यादा व्यस्त रहते हैं, और मैं अक्सर चाची की मदद करता हूं घर के कामों में। आज भी मैं उनके घर गया, क्योंकि पिता जी ने कहा था कि चाची को कुछ सामान लाने में मदद कर दूं।

चाची रसोई में थीं, आटा गूंथ रही थीं। मैंने दरवाजे पर खड़े होकर कहा, "चाची, पापा ने कहा था कि बाजार से सामान लाना है। मैं चलूं?" उन्होंने मुस्कुराकर देखा और बोलीं, "अरे रवि, आ जा अंदर। पहले चाय पी ले, फिर जाएंगे।" उनकी आवाज में वो अपनापन था, जो हमेशा से था।

हम चाय पीते हुए बातें करने लगे। चाची ने पूछा, "शहर की याद आती है न? वहां की पढ़ाई, दोस्त..." मैंने हंसकर कहा, "हां चाची, लेकिन यहां का सुकून अलग है। आप लोगों के बिना वहां मन नहीं लगता।" बातों-बातों में समय बीत गया, और हम बाजार चले गए। रास्ते में गांव की गलियां, पेड़ों की छांव, सब कुछ इतना शांत लग रहा था।

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बाजार से लौटते वक्त बारिश की बूंदें गिरने लगीं। हम भागते हुए घर पहुंचे, लेकिन दोनों भीग चुके थे। चाची ने हंसते हुए कहा, "देख रवि, अब कपड़े बदलने पड़ेंगे। तू भी अपना ध्यान रख।" मैंने उनके घर में ही इंतजार किया, जबकि वो अंदर जाकर कपड़े बदल रही थीं। बाहर से बारिश की आवाज आ रही थी, और मन में एक अजीब सी शांति थी।

शाम होने को आई, और चाचा जी खेत से लौटे। रात का खाना हम सबने साथ खाया। पिता जी, चाचा जी, चाची और मैं। बातें चल रही थीं खेती की, मौसम की। चाची ने मुझे देखकर कहा, "रवि, आज तूने बहुत मदद की। थैंक्यू बेटा।" उनकी आंखों में वो ममता थी, जो हमेशा से महसूस होती थी।

रात गहराने लगी। मैं अपने कमरे में लेटा था, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। बाहर बारिश अभी भी पड़ रही थी, और हवा ठंडी हो गई थी। अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने उठकर देखा, चाची खड़ी थीं, हाथ में एक कंबल लिए। उन्होंने कहा, "रवि, ठंड लग रही होगी। ये ले, ओढ़ ले।" मैंने कंबल लिया, और वो अंदर आ गईं।

कमरे में हल्का अंधेरा था, सिर्फ लालटेन की रोशनी। चाची ने कहा, "नींद नहीं आ रही क्या? मुझे भी नहीं। चाचा जी सो गए हैं।" हम बात करने लगे, पुरानी यादों की। चाची ने बताया कैसे वो गांव आईं थीं शादी के बाद, कैसे सब कुछ नया लगता था। उनकी आवाज में एक उदासी थी, शायद चाचा जी की व्यस्तता की वजह से।

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बात करते-करते मैंने महसूस किया कि चाची मेरे करीब बैठ गईं थीं। उनकी साड़ी की सिलवटें, बालों की महक, सब कुछ अजीब सा लग रहा था। मैंने खुद को संभाला, लेकिन मन में एक उथल-पुथल शुरू हो गई। चाची ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा, "तू बड़ा हो गया है रवि। अब तुझे अपनी जिंदगी बनानी चाहिए।" उनकी उंगलियां मेरी त्वचा पर थीं, और दिल की धड़कन तेज हो गई।

मैंने हिम्मत करके कहा, "चाची, आप हमेशा मेरे लिए इतना सोचती हैं। मैं आपके बिना क्या करूंगा?" वो चुप हो गईं, और हमारी नजरें मिलीं। उस पल में कुछ था, जो शब्दों से परे था। चाची की आंखों में एक चमक थी, शायद वही जो मैं महसूस कर रहा था। धीरे से मैंने अपना हाथ उनके हाथ पर रखा।

बारिश की आवाज तेज हो गई थी, जैसे वो हमारी चुप्पी को ढक रही हो। चाची ने कुछ नहीं कहा, बस मेरे करीब आ गईं। मैंने उन्हें अपनी बाहों में लिया, और वो抵抗 नहीं कीं। हमारा स्पर्श इतना नैचुरल लग रहा था, जैसे सालों से इंतजार था। उनकी सांसें मेरे चेहरे पर महसूस हो रही थीं।

मैंने धीरे से उनके होंठों को छुआ। वो कंपकंपा गईं, लेकिन पीछे नहीं हटीं। हमारा चुंबन गहरा होता गया, जैसे सारी भावनाएं उमड़ पड़ीं। चाची ने फुसफुसाकर कहा, "रवि, ये गलत है... लेकिन..." मैंने उन्हें चुप कराया, और हम बिस्तर पर लेट गए। उनकी साड़ी की सिलवटें खुलने लगीं।

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रात की वो ठंडक में हमारी गर्माहट मिल गई। मैंने उनके शरीर को छुआ, हर हिस्से को महसूस किया। चाची की आहें कमरे में गूंज रही थीं, और मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था। हमारा मिलन इतना गहरा था, जैसे आत्माओं का जुड़ाव। हर स्पर्श में एक नई भावना थी, प्यार की, इच्छा की।

समय रुक सा गया था। चाची ने मेरे कान में कहा, "रवि, मुझे ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ।" मैंने उन्हें और करीब खींचा, और हम फिर से एक हो गए। रात भर हम बातें करते, छूते, महसूस करते रहे। बारिश बाहर पड़ती रही, लेकिन अंदर एक तूफान था।

चाची की त्वचा इतनी मुलायम थी, जैसे रेशम। मैंने उनके स्तनों को छुआ, और वो सिहर उठीं। हमारा हर मूवमेंट सेंसरी था—उनकी महक, मेरी सांसें, सब कुछ। कभी धीरे, कभी तेज, हम रात भर एक दूसरे में खोए रहे।

कभी वो ऊपर आ जातीं, कभी मैं। हर बार एक नया अनुभव, जैसे पहली बार। चाची की आंखों में वो संतुष्टि थी, जो शब्दों में नहीं बयां हो सकती। हम थककर लेटे, लेकिन फिर शुरू हो जाते।

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रात गहराती गई, और हमारी भावनाएं और गहरी होती गईं। चाची ने कहा, "रवि, ये रात याद रहेगी।" मैंने उन्हें गले लगाया, और हम फिर से मिलन में डूब गए। बाहर बारिश थम चुकी थी, लेकिन हमारी दुनिया अभी भी घूम रही थी।

सुबह होने से पहले चाची उठीं, अपनी साड़ी ठीक की। उन्होंने मुझे देखा, मुस्कुराईं, और चुपचाप चली गईं। मैं लेटा रहा, उस रात की यादों में।

दिन चढ़ा, लेकिन वो रात का असर अभी भी था। चाची से नजरें मिलीं, और हम दोनों मुस्कुरा दिए। जीवन वैसा ही चलता रहा, लेकिन अब कुछ बदल गया था।

शाम को फिर बारिश आई, और चाची दोबारा आईं। इस बार बिना किसी हिचक के। हम फिर से एक हो गए, रात भर। हर स्पर्श नया था, हर भावना गहरी।

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चाची की उंगलियां मेरे शरीर पर घूमतीं, और मैं उनकी हर इच्छा पूरी करता। हम हंसते, बातें करते, और मिलन करते। रात भर का सफर इतना लंबा लगता, फिर भी छोटा।

कभी वो मेरे ऊपर, कभी मैं। वैरायटी से भरा, इमोशनल। चाची की आहें, मेरी सिसकियां, सब कुछ मिक्स। हम थकते नहीं, बस जारी रखते।

रात के आखिरी पहर में हम लेटे रहे, एक दूसरे को देखते। चाची ने कहा, "रवि, तू मेरी जिंदगी का हिस्सा है।" मैंने उन्हें चूमा, और हम सो गए।

लेकिन नींद ज्यादा नहीं आई। सुबह से पहले फिर जागे, और आखिरी बार मिले। इतना गहरा, इतना भावुक।

चाची चली गईं, और मैं अकेला लेटा रहा। वो रात अब हमारी जिंदगी का राज थी।