गांव की वो रात

सुबह की पहली किरणें अभी-अभी गांव की मिट्टी पर पड़ रही थीं। मैं अपने घर के आंगन में खड़ा होकर चाय की चुस्की ले रहा था, हवा में खेतों की महक घुली हुई थी। हमारा गांव छोटा सा था, जहां हर दिन की शुरुआत एक जैसी लगती थी—खेतों में काम, जानवरों को चारा देना और परिवार के साथ बैठकर बातें करना। मैं शहर से कुछ दिनों की छुट्टी लेकर आया था, अपने चाचा-चाची के घर। मेरा नाम राजू है, और मैं यहां अपनी जड़ों से जुड़ने आया था।

चाचा सुबह-सुबह ही खेतों की ओर निकल जाते थे, और चाची सरिता घर के कामों में लग जातीं। वो मेरी सगी चाची थीं, पापा की छोटी बहन, जिन्होंने चाचा से शादी की थी। मैं बचपन से उन्हें जानता था, लेकिन अब बड़ा हो गया था, शहर की जिंदगी ने मुझे बदल दिया था। आज सुबह मैंने देखा कि चाची रसोई में रोटियां सेंक रही थीं, उनके हाथों में आटे की लोई घूम रही थी। मैंने उन्हें आवाज दी, "चाची, चाय बना दूं?" वो मुस्कुराईं और बोलीं, "नहीं राजू, तू बैठ, मैं बना देती हूं।"

दिन भर मैं चाचा के साथ खेतों में रहा। धूप तेज थी, लेकिन काम करने में मजा आ रहा था। शाम को घर लौटे तो चाची ने सबके लिए खाना बनाया था। हम सब साथ बैठकर खाए, बातें कीं। चाचा थकान की वजह से जल्दी सो गए। मैं बाहर बरामदे में बैठा सितारों को देख रहा था। गांव की रातें शांत होती हैं, दूर कहीं कुत्तों की भौंक सुनाई देती है। चाची भी बाहर आईं, अपने काम निपटाकर। वो मेरे पास बैठ गईं और पूछा, "शहर में कैसी चल रही है तेरी जिंदगी, राजू?"

मैंने उन्हें बताया कि शहर की भागदौड़ में सब कुछ तेज है, लेकिन यहां की शांति याद आती है। हम देर तक बातें करते रहे। चाची की आवाज में एक अलग सी मिठास थी, जो बचपन से याद थी। वो बताने लगीं कि गांव में कितनी मुश्किलें हैं, फसल अच्छी नहीं हुई इस बार। उनकी बातों में एक उदासी थी, जो मुझे छू गई। मैंने कहा, "चाची, आप चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा।" वो मुस्कुराईं, लेकिन उनकी आंखों में कुछ था जो मैं समझ नहीं पाया।

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रात गहराने लगी थी। घर में सब सो चुके थे। मैं अपने कमरे में लेटा था, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। बाहर से कोई आवाज आई, शायद चाची की। मैं उठकर बाहर गया तो देखा वो छत पर खड़ी थीं, चांदनी रात में। मैं उनके पास गया और पूछा, "चाची, नींद नहीं आ रही?" वो बोलीं, "हां राजू, कभी-कभी रातें लंबी लगती हैं।" हम छत पर बैठ गए, हवा ठंडी थी। बातों-बातों में मैंने उनकी जिंदगी के बारे में पूछा।

चाची ने बताया कि शादी के बाद से वो यहीं हैं, लेकिन कभी-कभी अकेलापन महसूस होता है। चाचा हमेशा काम में व्यस्त रहते हैं। उनकी बातें सुनकर मुझे दुख हुआ। मैंने उनका हाथ थाम लिया, सिर्फ सांत्वना देने के लिए। वो चौंकी नहीं, बल्कि मेरी ओर देखा। उस पल में कुछ बदला सा लगा। हमारी नजरें मिलीं, और चुप्पी छा गई। मैंने कुछ नहीं कहा, बस उनके करीब बैठा रहा।

धीरे-धीरे बातें फिर शुरू हुईं। चाची ने मेरे बचपन की यादें ताजा कीं, कैसे मैं उनके घर आता था खेलने। मैं हंस पड़ा। लेकिन अब वो यादें अलग लग रही थीं। रात और गहरा गई थी। चाची ने कहा, "राजू, ठंड लग रही है, चल अंदर चलें।" हम नीचे उतरे, लेकिन मेरा मन अजीब सा हो गया था। कमरे में लेटे-लेटे मैं सोच रहा था कि चाची के प्रति मेरी भावनाएं बदल रही हैं।

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अगले दिन सुबह फिर वही रूटीन। लेकिन अब मैं चाची को अलग नजर से देखने लगा था। वो रसोई में काम कर रही थीं, मैंने मदद की पेशकश की। हम साथ में सब्जियां काटने लगे। हमारी उंगलियां छू गईं, और मैं रुक गया। चाची ने नजरें झुका लीं। शाम को जब चाचा बाहर गए, हम घर में अकेले थे। मैंने चाची से कहा, "आप बहुत अच्छी हैं, चाची।" वो बोलीं, "तू भी बड़ा हो गया है, राजू।"

उस रात फिर छत पर मिले। इस बार बातें गहरी हो गईं। चाची ने अपनी जिंदगी की परेशानियां बताईं, कैसे वो कभी खुश नहीं रह पातीं। मैंने उन्हें गले लगा लिया, सांत्वना में। उनका शरीर मेरे करीब था, और मैं महसूस कर रहा था उस गर्माहट को। चाची ने मुझे नहीं रोका। हमारी सांसें तेज हो गईं। मैंने उनके होंठों पर अपना होंठ रख दिया, धीरे से। वो पीछे नहीं हटीं।

उस चुंबन में सब कुछ बदल गया। हम नीचे कमरे में आए। चाची की आंखों में डर और इच्छा दोनों थे। मैंने कहा, "चाची, क्या ये गलत है?" वो बोलीं, "शायद, लेकिन अब रुक नहीं सकती।" मैंने उन्हें बाहों में भर लिया। उनके कपड़े धीरे-धीरे उतारे। उनका शरीर नरम था, गांव की मेहनत से मजबूत। मैंने उनके गले पर चूमा, नीचे उतरते हुए।

चाची ने मेरे कपड़े खींचे, हम बिस्तर पर लेट गए। मेरी उंगलियां उनके शरीर पर घूमीं, हर स्पर्श में एक नई सिहरन। वो कराह उठीं, "राजू..." मैंने उनके स्तनों को चूमा, जीभ से सहलाया। उनका हाथ मेरे शरीर पर था, मुझे उत्तेजित कर रहा था। हम एक हो गए, धीरे-धीरे। वो दर्द और सुख में सिसक रही थीं।

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रात भर हम नहीं रुके। पहले धीमे, फिर तेज। मैंने उन्हें पीठ पर लिटाया, ऊपर से प्रवेश किया। उनकी कमर पकड़कर मैं गहराई तक गया। चाची की सांसें तेज थीं, वो मेरे कंधे पर नाखून गड़ा रही थीं। हम पसीने से तर थे, लेकिन इच्छा कम नहीं हो रही थी। मैंने उन्हें घुटनों पर बिठाया, पीछे से। उनका शरीर मेरे साथ लय में था।

कभी वो ऊपर आईं, मुझे नीचे लिटाकर। उनकी चाल में एक जंगलीपन था, जो मैंने कभी नहीं देखा। मैंने उनके कूल्हों को पकड़ा, ऊपर-नीचे किया। हमारी आंखें मिलीं, उसमें प्यार और वासना दोनों। रात के बीच में हम रुके, बातें कीं। चाची बोलीं, "ये गलत है, लेकिन अच्छा लग रहा है।" मैंने कहा, "मैं तुम्हें खुश रखूंगा।"

फिर शुरू हुए। इस बार मैंने उनके पैर फैलाए, जीभ से उनके गुप्तांग को छुआ। वो तड़प उठीं, "आह राजू..." मैंने जारी रखा, जब तक वो झड़ नहीं गईं। फिर मैं अंदर आया, तेज धक्कों के साथ। हमारा मिलन अब और गहरा था, भावनाओं से भरा।

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सुबह होने को थी, लेकिन हम थके नहीं थे। आखिरी बार हमने बगल में लेटकर किया, धीमे-धीमे। चाची की आंखों में आंसू थे, खुशी के। मैंने उन्हें चूमा, और हम ऐसे ही लेटे रहे।

उस रात के बाद सब बदल गया, लेकिन हम चुप रहे। दिन की रोशनी में हम सामान्य लगते थे, लेकिन रातें अब हमारी थीं। चाची की मुस्कान में एक नई चमक थी।

अगली रात फिर वही। इस बार हमने और प्रयोग किए। मैंने उन्हें दीवार से सटाकर किया, खड़े-खड़े। उनकी टांगें मेरी कमर पर लिपटीं। सुख की लहरें आ रही थीं।

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हम बातें करते, हंसते, फिर एक होते। चाची ने कहा, "तू मुझे जीना सिखा रहा है।" मैंने जवाब दिया, "तुम मेरी हो।"

रातें गुजरती गईं, हर बार नया अनुभव। कभी बाहर बरामदे में, चांदनी में। उनका शरीर मेरे लिए अब परिचित था, लेकिन हर स्पर्श नया लगता।

एक रात बारिश हो रही थी। हम भीगते हुए कमरे में आए। कपड़े उतारे, और बारिश की आवाज में हमारा मिलन हुआ। ठंड में गर्माहट।

चाची की कराहें अब और मुखर थीं। मैंने उनके मुंह पर हाथ रखा, लेकिन वो नहीं रुकीं। हमने पूरी रात नहीं सोया।

सुबह की रोशनी कमरे में आई, हम अभी भी एक-दूसरे में लिपटे थे। चाची ने मेरे सीने पर सिर रखा, और हम चुपचाप लेटे रहे।