होटल की वो रात

सुबह की धूप कमरे में धीरे-धीरे फैल रही थी, और मैं अपनी कॉफी का मग हाथ में थामे बालकनी में खड़ा था। दिल्ली की इस व्यस्त कॉलोनी में हर रोज की तरह गाड़ियों की आवाजें और पड़ोस के बच्चों का शोर सुनाई दे रहा था। मैं अजय, तीस साल का, एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता हूँ, और आज का दिन भी वैसा ही लग रहा था—ऑफिस जाने की तैयारी, कुछ ईमेल चेक करना, और शाम को जिम जाना।

फोन की घंटी बजी तो मैंने देखा कि बुआ का नंबर था। राधा बुआ, मेरे पापा की छोटी बहन, गांव से फोन कर रही थीं। उनकी आवाज हमेशा की तरह शांत और स्नेहपूर्ण थी। "अजय बेटा, मैं दिल्ली आ रही हूँ कुछ दिनों के लिए। डॉक्टर से मिलना है, और थोड़ा घूमना भी। क्या तू मुझे स्टेशन से ले लेगा?" मैंने हामी भरी, क्योंकि बुआ से मिले हुए काफी समय हो गया था।

बुआ करीब पैंतालीस साल की होंगी, लेकिन उनकी जिंदगी ने उन्हें समय से पहले परिपक्व बना दिया था। उनके पति की मौत दस साल पहले एक दुर्घटना में हो गई थी, और तब से वो अकेली ही गांव में रहती थीं। बच्चे नहीं थे, इसलिए परिवार का सारा बोझ उन्होंने खुद संभाला। मैं बचपन से उन्हें बहुत मानता था—वो हमेशा कहानियां सुनातीं, मिठाई बनातीं, और मेरी हर शरारत पर हंसतीं।

अगले दिन मैं स्टेशन पर पहुंचा। ट्रेन थोड़ी लेट थी, लेकिन जैसे ही बुआ उतरीं, मैंने उन्हें दूर से ही पहचान लिया। साड़ी में लिपटी, बालों में हल्की सफेदी, और चेहरे पर वही मुस्कान। "अजय, कितना बड़ा हो गया तू," उन्होंने कहा और मुझे गले लगा लिया। हम टैक्सी में बैठे, और रास्ते में गांव की बातें कीं—फसल कैसी है, पड़ोसी क्या कर रहे हैं।

मैंने सोचा था कि बुआ को अपने फ्लैट में ठहराऊं, लेकिन वो बोलीं, "नहीं बेटा, तू अकेला रहता है, मैं होटल में ठहरूंगी। तेरे काम में दखल नहीं दूंगी।" मैंने मना किया, लेकिन वो नहीं मानीं। आखिरकार, मैंने एक अच्छा होटल बुक कर दिया, शहर के बीचों-बीच, जहां से डॉक्टर का क्लिनिक पास था। शाम को मैं उन्हें होटल छोड़ने गया।

कमरा साफ-सुथरा था, बड़ी खिड़की से शहर का नजारा दिखता था। बुआ ने अपना सामान रखा और चाय ऑर्डर की। हम बैठकर बातें करने लगे। "तेरी नौकरी कैसी चल रही है? शादी कब करेगा?" उन्होंने पूछा। मैंने हंसकर कहा, "अभी तो समय है बुआ, पहले कुछ और कमाना है।" वो मुस्कुराईं, लेकिन उनकी आंखों में एक उदासी थी, शायद अपनी जिंदगी की यादें।

रात हो गई, लेकिन मैं जाने को तैयार नहीं था। बुआ ने कहा, "रह जा आज रात यहां, कल सुबह चला जाना।" मैं सहमत हो गया। हमने डिनर ऑर्डर किया—साधारण दाल-चावल, जैसा घर में बनता है। खाते हुए उन्होंने पुरानी यादें ताजा कीं। "याद है, जब तू छोटा था, मैं तेरे साथ खेलती थी। पापा कितने सख्त थे, लेकिन मैं हमेशा तेरी तरफ होती थी।"

इसे भी पढ़ें: होटल की वो रात

बातों-बातों में समय बीतता गया। बुआ की आवाज में एक गर्माहट थी, जो मुझे बचपन की याद दिलाती थी। मैंने देखा कि वो थोड़ी थकी लग रही थीं, शायद सफर की वजह से। "बुआ, आप आराम करो, मैं सोफे पर सो जाऊंगा," मैंने कहा। लेकिन वो बोलीं, "नहीं, बेड बड़ा है, तू यहां सो जा।"

रात गहराती गई, और कमरे में हल्की रोशनी थी। मैं बेड के एक तरफ लेटा था, बुआ दूसरी तरफ। नींद नहीं आ रही थी, शायद शहर की आदत की वजह से। बुआ भी करवटें बदल रही थीं। "क्या हुआ बुआ, नींद नहीं आ रही?" मैंने पूछा। उन्होंने叹息ते हुए कहा, "हां बेटा, अकेलेपन की आदत हो गई है, लेकिन कभी-कभी यादें सताती हैं।"

उनकी बात सुनकर मुझे दुख हुआ। मैंने हाथ बढ़ाकर उनका कंधा थपथपाया। "बुआ, आप अकेली नहीं हो। मैं हूं ना।" वो मुड़ीं और मेरी तरफ देखा। उनकी आंखों में कुछ था—शायद कृतज्ञता, शायद कुछ और। हम चुप रहे, लेकिन वो पल लंबा खिंचता गया।

धीरे-धीरे, बातें फिर शुरू हुईं। बुआ ने अपनी जिंदगी के बारे में बताया—कैसे उन्होंने पति की मौत के बाद खुद को संभाला, कैसे परिवार की जिम्मेदारियां निभाईं। "तू जानता है अजय, जीवन में कई चीजें अधूरी रह जाती हैं," उन्होंने कहा। मैंने महसूस किया कि मेरे मन में उनके लिए सम्मान के साथ एक करुणा उभर रही थी।

रात के सन्नाटे में, जब हम पास-पास लेटे थे, मैंने महसूस किया कि बुआ का हाथ मेरे हाथ पर आ गया। वो अनजाने में हुआ, लेकिन न तो उन्होंने हटाया, न मैंने। मेरे मन में अजीब सी हलचल हुई, लेकिन मैंने खुद को रोका। वो मेरी बुआ थीं, परिवार।

इसे भी पढ़ें: गांव की वो रात

सुबह उठकर मैंने चाय बनाई। बुआ अभी सो रही थीं। मैंने उन्हें जगाया नहीं, बस बाहर बालकनी में खड़ा हो गया। दिन की शुरुआत हो रही थी, लेकिन मेरे मन में रात की वो चुप्पी घूम रही थी। शाम को मैं फिर होटल आया, इस बार कुछ फल लेकर।

बुआ डॉक्टर से मिलकर लौटी थीं। "सब ठीक है बेटा, बस रूटीन चेकअप," उन्होंने कहा। हमने साथ में वॉक की, होटल के गार्डन में। बातें करते-करते, मैंने देखा कि बुआ की नजरें कभी-कभी मुझ पर ठहर जाती थीं। शायद वो भी महसूस कर रही थीं वो अनकही निकटता।

रात फिर वही कमरा, वही बेड। इस बार हम ज्यादा खुलकर बातें करने लगे। बुआ ने अपनी जवानी की बातें बताईं—कैसे उन्होंने शादी की, कैसे जीवन बीता। "अब तो सब यादें ही बची हैं," उन्होंने कहा। मैंने कहा, "बुआ, जीवन अभी खत्म नहीं हुआ। आप खुश रह सकती हैं।"

उनकी आंखों में आंसू आ गए। मैंने उन्हें गले लगा लिया, सांत्वना देने के लिए। लेकिन वो पल बदल गया। उनका शरीर मेरे शरीर से सटा, और मैंने महसूस किया एक गर्माहट। मेरे मन में संघर्ष था—ये गलत था, लेकिन भावनाएं उफान पर थीं।

बुआ ने मेरी तरफ देखा, उनकी सांसें तेज थीं। "अजय, क्या ये सही है?" उन्होंने फुसफुसाते हुए पूछा। मैंने कुछ नहीं कहा, बस उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। वो पल जैसे समय को रोक देना चाहता था। हम दोनों जानते थे कि ये रिश्ते की सीमाओं को पार कर रहा था, लेकिन अकेलेपन और इच्छाओं ने हमें बांध लिया।

मैंने धीरे से उनकी साड़ी का पल्लू सरकाया। उनका शरीर नरम और गर्म था, सालों की उदासी को छिपाए हुए। मेरे हाथ उनकी कमर पर फिसले, और उन्होंने मेरी गर्दन पर吻 किया। हर स्पर्श में एक नई भावना थी—दुख, चाहत, और मुक्ति।

इसे भी पढ़ें: गांव की वो रात

हम बेड पर लेट गए, कपड़े धीरे-धीरे उतरते गए। बुआ की आंखें बंद थीं, लेकिन उनके चेहरे पर एक शांति थी। मैंने उनके शरीर को सहलाया, हर हिस्से को महसूस किया। उनकी सांसें मेरे कानों में गूंज रही थीं, और मैंने खुद को उनमें खो दिया। वो पल तीव्र था, भावनाओं से भरा।

उस रात हमने एक-दूसरे को पूरी तरह समर्पित कर दिया। हर गति में नई संवेदना थी—कभी नरम, कभी उग्र। बुआ ने मेरे कान में फुसफुसाया, "अजय, इतने सालों बाद मुझे जीवित महसूस हो रहा है।" मैंने उन्हें कसकर पकड़ा, और हम दोनों एक हो गए।

सुबह की रोशनी में, हम चुपचाप लेटे रहे। कोई शब्द नहीं, बस वो निकटता। बुआ ने मेरी तरफ देखा, उनकी आंखों में अब उदासी नहीं, बल्कि एक नई चमक थी। हम जानते थे कि ये सिर्फ एक रात नहीं थी, बल्कि सालों की भावनाओं का विस्फोट।

अगले दिन बुआ का डॉक्टर का अपॉइंटमेंट था, लेकिन मैंने ऑफिस से छुट्टी ली। हमने साथ में शहर घूमा, लेकिन अब हर नजर में वो राज था। शाम को होटल लौटकर, हम फिर उसी दुनिया में खो गए। इस बार ज्यादा विश्वास के साथ, ज्यादा गहराई से।

बुआ के स्पर्श में अब डर नहीं था, बल्कि एक स्वीकृति। मैंने उनके बालों में उंगलियां फिराईं, उनके कानों में प्यार भरी बातें कहीं। हमारा मिलन अब सिर्फ शारीरिक नहीं था, बल्कि आत्मिक। हर पल में नई खोज थी, नई खुशी।

इसे भी पढ़ें: बारिश की वो रात

रात गहराती गई, और हम थककर सो गए, एक-दूसरे की बाहों में। सुबह बुआ ने कहा, "अजय, ये सब गलत है, लेकिन मैं इसे रोक नहीं पा रही।" मैंने उन्हें चुप कराया, और हम फिर से एक हो गए, इस बार दिन की रोशनी में।

दिन बीतते गए, और बुआ का दिल्ली में रहना लंबा होता गया। हर रात होटल का वो कमरा हमारी दुनिया बन गया। कभी हम बातें करते, कभी चुप रहते, लेकिन वो निकटता हमेशा बनी रही। बुआ की मुस्कान अब ज्यादा जीवंत थी, और मेरे मन में उनके लिए एक नया सम्मान।

एक शाम, बारिश हो रही थी। हम खिड़की के पास खड़े थे, पानी की बूंदें देखते हुए। बुआ ने मेरा हाथ पकड़ा, और हम फिर से उसी जुनून में डूब गए। इस बार बारिश की आवाज के साथ, हमारा मिलन और भी मधुर लगा। उनके शरीर की हर रेखा अब मुझे अपनी लगती थी।

हमने घंटों बिताए, एक-दूसरे को एक्सप्लोर करते हुए। बुआ की सिसकियां, मेरी सांसें, सब मिलकर एक संगीत बना रहे थे। वो पल जैसे अनंत थे, भावनाओं से ओत-प्रोत।

अब बुआ की वापसी का समय आ रहा था, लेकिन हम दोनों जानते थे कि ये रिश्ता अब बदल चुका था। आखिरी रात, हमने सब कुछ भूलकर खुद को समर्पित किया। हर स्पर्श में विदाई की टीस थी, लेकिन साथ ही एक वादा।

सुबह स्टेशन पर, बुआ ने मुझे गले लगाया। "अजय, तूने मुझे फिर से जीना सिखाया," उन्होंने फुसफुसाया। ट्रेन चली गई, लेकिन मेरे मन में वो होटल की रातें हमेशा बसी रहेंगी।

इसे भी पढ़ें: छत की वो रात

दिनचर्या फिर से शुरू हो गई, लेकिन अब सब कुछ अलग लगता था। ऑफिस, घर, सब वैसा ही, लेकिन अंदर एक राज छिपा था। बुआ से फोन पर बात होती, और हम चुपचाप वो यादें साझा करते।

कभी-कभी रातों में मैं अकेला महसूस करता, और उनकी याद आती। वो गर्माहट, वो स्पर्श। लेकिन मैं जानता था कि जीवन आगे बढ़ता है, और वो पल हमेशा मेरे साथ हैं।

एक दिन बुआ फिर आईं, इस बार बिना किसी बहाने के। होटल का वही कमरा, वही जुनून। हम फिर से एक हो गए, इस बार ज्यादा गहराई से, ज्यादा समझ से।

बारिश फिर बरस रही थी, और हम खिड़की के पास लेटे थे। बुआ की उंगलियां मेरे बालों में, मेरे हाथ उनकी कमर पर। हम चुप थे, लेकिन सब कुछ कह रहे थे।