छत की वो रात
सुबह की धूप अभी-अभी कम हुई थी, और मैं रसोई में चाय की केतली चढ़ा रही थी। घर में रोज की तरह शांति छाई हुई थी, सासू मां मंदिर गई हुई थीं और ससुर जी अखबार पढ़ते हुए बालकनी में बैठे थे। मैंने घड़ी की तरफ देखा, शाम के पांच बज रहे थे, और विक्रम का फोन आने वाला था, वो हमेशा ऑफिस से निकलते वक्त कॉल करता था।
मैं रिया हूं, तेईस साल की, दो साल पहले विक्रम से शादी हुई थी। हमारा घर दिल्ली की एक पुरानी कॉलोनी में है, जहां हर शाम छत पर हवा खाने का रिवाज है। विक्रम बड़ा भाई है, और उसका छोटा भाई अर्जुन अभी कॉलेज में पढ़ता है, इंजीनियरिंग का आखिरी साल। वो घर में ही रहता है, कभी-कभी पढ़ाई में मदद मांगता है, लेकिन ज्यादातर अपने कमरे में रहता है।
चाय बनाकर मैंने ट्रे में रखी और ससुर जी को दी। "बहू, आज रात खाने में क्या बनाओगी?" उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा। मैंने कहा, "पापा जी, आलू की सब्जी और रोटी, या कुछ और चाहिए?" वो हंस पड़े, "वही ठीक है, सिंपल रखो।" मैं वापस रसोई में आई, और सोचने लगी कि विक्रम आजकल कितना व्यस्त रहता है, हफ्ते में दो-तीन दिन तो देर रात आता है।
अर्जुन नीचे आया, उसके बाल बिखरे हुए थे, शायद पढ़ाई से उठा था। "भाभी, पानी मिलेगा?" उसने कहा, और मैंने फ्रिज से बोतल निकालकर दी। वो वहीं खड़ा हो गया, चुपचाप पानी पीता रहा। मैंने पूछा, "कॉलेज कैसा चल रहा है? एग्जाम कब हैं?" वो बोला, "अभी दो महीने बाद, लेकिन प्रोजेक्ट बहुत है।" उसकी आवाज में थोड़ी थकान थी, और मैंने देखा कि वो आजकल ज्यादा चुप रहता है।
शाम ढलने लगी, और मैंने सोचा कि छत पर जाकर थोड़ी हवा खाऊं। घर के काम निपटाकर मैं ऊपर चली गई। छत पर पुरानी कुर्सियां पड़ी थीं, और दूर से शहर की लाइट्स दिख रही थीं। मैं वहां बैठी, और मन में विक्रम की याद आई। शादी के बाद सब कुछ अच्छा था, लेकिन उसकी नौकरी की वजह से अकेलापन महसूस होता है।
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तभी अर्जुन ऊपर आया, उसके हाथ में किताब थी। "भाभी, यहां पढ़ाई करूं? नीचे शोर है," उसने कहा। मैंने हां में सिर हिलाया, और वो मेरे पास वाली कुर्सी पर बैठ गया। हम चुपचाप बैठे रहे, हवा चल रही थी, और मैंने महसूस किया कि उसकी नजर कभी-कभी मुझ पर टिक जाती है। लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा, बस आसमान की तरफ देखती रही।
रात के आठ बज गए, विक्रम का फोन आया कि वो लेट होगा। मैंने खाना बनाया, और सबने साथ खाया। अर्जुन ने खाने के दौरान ज्यादा बात नहीं की, लेकिन जब मैं प्लेट उठा रही थी, उसने मदद की। "भाभी, मैं धो दूं?" उसने पूछा। मैंने मना किया, लेकिन वो जिद करने लगा। रसोई में हम दोनों थे, और उसकी मौजूदगी से थोड़ा अजीब लगा, लेकिन मैंने सोचा कि ये तो परिवार है।
रात को सोने से पहले मैं फिर छत पर गई, नींद नहीं आ रही थी। चांदनी रात थी, और हवा ठंडी हो गई थी। मैं वहां टहल रही थी, जब अर्जुन फिर आया। "भाभी, आप यहां? नींद नहीं आ रही?" उसने पूछा। मैंने कहा, "हां, थोड़ा अकेलापन लगता है जब विक्रम लेट आता है।" वो मेरे पास आकर खड़ा हो गया, और बोला, "मैं हूं न, बात कर लीजिए।"
हम बातें करने लगे, पहले कॉलेज की, फिर घर की। अर्जुन ने बताया कि वो विक्रम जैसा बनना चाहता है, लेकिन कभी-कभी डर लगता है। उसकी आवाज में एक ईमानदारी थी, जो मुझे छू गई। मैंने उसका कंधा थपथपाया, "तुम अच्छा करोगे, चिंता मत करो।" वो मुस्कुराया, और उसकी आंखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा।
उस रात हम देर तक बातें करते रहे। अगले दिन सुबह उठी, तो मन हल्का लग रहा था। विक्रम घर पर था, लेकिन दोपहर में फिर ऑफिस चला गया। शाम को अर्जुन ने कहा, "भाभी, छत पर चलें? थोड़ी देर बैठते हैं।" मैं सहमत हो गई, क्योंकि अब उससे बात करके अच्छा लगता था।
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छत पर हम बैठे, और वो अपनी किताब पढ़ रहा था। मैंने पूछा, "क्या पढ़ रहे हो?" उसने किताब दिखाई, कोई नॉवेल था। हमने उस पर चर्चा की, और हंसने लगे। लेकिन बातों के बीच उसकी नजर मेरे चेहरे पर रुक जाती, और मैं महसूस कर रही थी कि मेरे मन में भी कुछ बदल रहा है। विक्रम की कमी तो थी, लेकिन अर्जुन की मौजूदगी उस कमी को भर रही थी।
एक शाम बारिश हो गई, और हम छत पर भीगते हुए नीचे आए। अर्जुन ने मेरा हाथ पकड़ा था, ताकि मैं फिसल न जाऊं। उस स्पर्श में कुछ था, जो दिल को छू गया। रात को सोते वक्त मैं उस बारे में सोचती रही, क्या ये गलत है? लेकिन वो तो मेरा देवर है, परिवार। फिर भी, मन में एक उथल-पुथल थी।
कुछ दिन ऐसे ही बीते। अर्जुन अब ज्यादा समय मेरे साथ बिताने लगा। एक रात, विक्रम फिर लेट था, और मैं छत पर अकेली थी। अर्जुन आया, और बोला, "भाभी, आप उदास लग रही हैं।" मैंने कहा, "बस, ऐसे ही।" वो मेरे करीब आया, और उसकी आंखों में एक भाव था जो शब्दों से ज्यादा कह रहा था।
मैंने उसकी तरफ देखा, और महसूस किया कि मेरे मन में भी वही भाव है। वो धीरे से बोला, "भाभी, मैं आपको पसंद करता हूं, बहुत।" मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई। मैंने कुछ नहीं कहा, बस चुप रही। लेकिन वो और करीब आया, और उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। उस स्पर्श में गर्माहट थी, जो मुझे रोक नहीं सकी।
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हमारी नजरें मिलीं, और मैंने खुद को रोकने की कोशिश की, लेकिन मन नहीं माना। अर्जुन ने मुझे अपनी बाहों में लिया, और मैंने विरोध नहीं किया। उस रात छत पर, चांद की रोशनी में, हम एक-दूसरे के करीब आए। उसका चुंबन इतना नरम था, जैसे कोई सपना। मेरे मन में विक्रम का ख्याल आया, लेकिन उस पल की तीव्रता ने सब भुला दिया।
उसकी उंगलियां मेरे बालों में फिर रही थीं, और मैंने महसूस किया कि मेरा शरीर उसकी गर्मी से पिघल रहा है। हम धीरे-धीरे कपड़े उतारते गए, हवा ठंडी थी लेकिन हमारी सांसें गर्म। अर्जुन ने मुझे छत की दीवार के सहारे टिकाया, और उसके होंठ मेरे गले पर थे। मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं, और उस पल को जीने लगी।
उसकी हर हरकत में एक कोमलता थी, जैसे वो मुझे संभाल रहा हो। मैंने उसके सीने पर हाथ रखा, और महसूस किया कि उसकी धड़कन मेरी तरह तेज है। हम एक-दूसरे में खो गए, छत पर पड़ी पुरानी चादर पर लेटकर। उसका शरीर मेरे ऊपर था, और मैंने खुद को पूरी तरह सौंप दिया। हर स्पर्श नया था, हर सांस में एक नई भावना।
बारिश की बूंदें फिर गिरने लगीं, लेकिन हम रुके नहीं। अर्जुन की आंखों में प्यार था, और मेरे मन में एक अपराधबोध, लेकिन वो पल इतना मजबूत था कि सब फीका पड़ गया। उसने धीरे से मेरे कान में कहा, "भाभी, मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूंगा।" मैंने उसे चुप करा दिया, और हम फिर से एक हो गए।
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उस रात के बाद, हमारा रिश्ता बदल गया। लेकिन मन में डर था, क्या ये जारी रहेगा? अगली शाम, विक्रम घर पर था, लेकिन अर्जुन की नजरें मुझ पर थीं। रात को जब सब सो गए, मैं छत पर गई, और वो भी आया। हम फिर करीब आए, लेकिन इस बार और गहराई से।
उसकी उंगलियां मेरी पीठ पर नाच रही थीं, और मैंने महसूस किया कि मेरा शरीर उसकी हर चाहत को जवाब दे रहा है। हमने अलग-अलग तरीके आजमाए, कभी खड़े होकर, कभी लेटकर। हर बार नई संवेदना, नई उत्तेजना। अर्जुन ने मेरे स्तनों को चूमा, और मैंने सिसकी ली। वो रुका, और पूछा, "दर्द हो रहा है?" मैंने ना में सिर हिलाया, और उसे और करीब खींच लिया।
हवा में बारिश की महक थी, और हमारी सांसें मिल रही थीं। उसका शरीर मेरे अंदर था, और मैंने खुद को पूरी तरह खो दिया। हर धक्के में एक नई लहर, हर चुंबन में एक नई कहानी। हम चुपचाप थे, लेकिन हमारी आंखें सब कह रही थीं।
कुछ रातें ऐसी ही बीतीं। एक बार, छत पर तेज हवा चल रही थी, और हमने खुद को चादर से ढक लिया। अर्जुन ने मुझे गोद में उठाया, और दीवार के सहारे खड़े होकर हम एक हुए। उसकी ताकत मुझे उत्तेजित कर रही थी, और मैंने उसके कंधे पर दांत गड़ा दिए। दर्द और सुख का मिश्रण इतना गहरा था कि मैं भूल गई कि ये गलत है।
लेकिन मन में संघर्ष था। विक्रम को कुछ शक नहीं था, लेकिन मैं खुद से लड़ रही थी। अर्जुन ने एक रात कहा, "भाभी, ये प्यार है, डरो मत।" मैंने कहा, "लेकिन समाज, परिवार?" वो बोला, "हम छुपा लेंगे।" उस रात हम और भावुक हो गए, उसके स्पर्श में अब प्यार ज्यादा था।
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फिर एक शाम, विक्रम अचानक घर आ गया, और हम छत पर थे। लेकिन वो नीचे रहा, और हम बच गए। उस डर ने हमें और जोश दिया। रात को, जब वो सो गया, हम फिर छत पर मिले। अर्जुन ने मुझे चूमते हुए कहा, "तुम मेरी हो।" मैंने जवाब दिया उसके शरीर से, हमारी हरकतें अब और तेज, और गहरी।
उसकी जीभ मेरे शरीर पर घूम रही थी, और मैंने सुख की चरम सीमा छू ली। हम दोनों एक साथ पहुंचे, और वो पल अनंत लगा। लेकिन फिर भी, मन में एक सवाल था, ये कब तक?
अगली रात, छत पर चांद पूरा था। अर्जुन ने मुझे बाहों में लिया, और हम धीरे-धीरे शुरू हुए। उसकी उंगलियां मेरी जांघों पर, और मैंने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया। हमारा मिलन अब सिर्फ शारीरिक नहीं था, भावनात्मक भी।
वो मेरे अंदर था, और मैंने महसूस किया कि ये प्यार है, चाहे गलत हो। हमारी सांसें मिलीं, और