दीदी की छिपी चाहतें
सुबह की धूप कमरे में धीरे-धीरे फैल रही थी, और मैं बिस्तर पर लेटा हुआ अलार्म की आवाज़ से जागा। घर में हमेशा की तरह शांति थी, माँ रसोई में चाय बना रही होंगी, और पापा पहले ही ऑफिस के लिए निकल चुके थे। मैं राहुल हूँ, कॉलेज का आखिरी साल चल रहा है, और रोज की तरह आज भी मुझे तैयार होकर निकलना था।
नीचे उतरकर मैंने देखा कि दीदी प्रिया किचन में माँ की मदद कर रही थी। वो मुझसे तीन साल बड़ी है, और घर में सबकी लाड़ली। उसने अपनी नई जॉब शुरू की है, एक छोटी कंपनी में, और शाम को थककर लौटती है। मैंने गुड मॉर्निंग कहा, और वो मुस्कुराकर बोली, "जल्दी नाश्ता कर ले, लेट हो जाएगा।"
हमारा घर छोटा-सा है, दिल्ली की एक कॉलोनी में, जहाँ परिवार की ज़िंदगी साधारण तरीके से चलती है। दीदी और मैं बचपन से साथ खेलते आए हैं, लेकिन अब बड़े होकर बातें कम हो गई हैं। फिर भी, वो हमेशा मेरी चिंता करती है, जैसे कल रात वो मेरे कमरे में आई थी किताबें ठीक करने।
कॉलेज से लौटकर मैं थका हुआ था, शाम के चार बज रहे थे। घर में अकेले दीदी थी, माँ बाजार गई हुई थीं। मैंने बैग फेंका और सोफे पर बैठ गया। दीदी कमरे से निकली, उसके बाल खुले थे, और वो घरेलू कपड़ों में लग रही थी। "क्या हुआ, थक गया?" उसने पूछा, और मेरे पास आकर बैठ गई।
हम बात करने लगे, कॉलेज की छोटी-मोटी बातें, उसकी जॉब के बारे में। दीदी की आँखों में एक अलग सी चमक थी आज, जैसे कुछ कहना चाहती हो लेकिन रुक रही हो। मैंने महसूस किया कि हमारी बातें अब पहले से ज़्यादा गहरी हो रही हैं, बचपन की यादों से शुरू होकर आज की परेशानियों तक।
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रात का खाना हम सबने साथ खाया, पापा ने अपनी ऑफिस की कहानियाँ सुनाईं। दीदी चुपचाप मुस्कुराती रही, लेकिन मुझे लगा वो मुझसे नज़रें मिला रही है। खाने के बाद मैं अपने कमरे में चला गया, किताबें पढ़ने की कोशिश की, लेकिन मन नहीं लगा। दीदी का कमरा बगल में है, और कभी-कभी रात को उसकी आवाज़ें सुनाई देती हैं।
कुछ दिन ऐसे ही बीते, हमारी बातें बढ़ती गईं। एक शाम मैं घर लौटा तो दीदी अकेली थी, और वो रो रही लग रही थी। मैंने पूछा, "क्या हुआ दीदी?" वो बोली, "जॉब में प्रॉब्लम है, बॉस बहुत सख्त है।" मैं उसके पास बैठा, और उसने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया। वो पल इतना करीब का था कि मैं उसके दिल की धड़कन महसूस कर रहा था।
उस रात मैं सो नहीं पाया, दीदी की वो करीबी याद आती रही। अगले दिन सुबह वो सामान्य लग रही थी, लेकिन दोपहर में जब माँ सो रही थीं, दीदी मेरे कमरे में आई। "राहुल, तेरे साथ बात करके अच्छा लगता है," उसने कहा, और मेरी किताबें देखने लगी। हमारी नज़रें मिलीं, और एक अजीब सा सन्नाटा छा गया।
धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि दीदी की मौजूदगी मुझे अलग तरीके से प्रभावित करने लगी है। उसकी मुस्कान, उसकी बातें, सबमें एक गहराई थी। एक शाम हम बालकनी में खड़े थे, सूरज डूब रहा था। दीदी ने कहा, "तू बड़ा हो गया है राहुल, लेकिन अभी भी मेरा छोटा भाई है।" मैंने हँसकर जवाब दिया, लेकिन अंदर से कुछ उथल-पुथल हो रही थी।
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उस रात बारिश हो रही थी, और बिजली चली गई। घर में अँधेरा था, मैं मोमबत्ती जलाकर बैठा था। दीदी आई, उसके हाथ में टॉर्च थी। "डर लग रहा है?" उसने मज़ाक किया, और मेरे बगल में बैठ गई। हम बातें करने लगे, पुरानी यादें, और अचानक उसका हाथ मेरे हाथ पर आ गया। वो स्पर्श इतना गर्म था कि मैं सिहर उठा।
मैंने उसकी आँखों में देखा, और वो भी मुझे देख रही थी। "दीदी, ये क्या हो रहा है?" मैंने धीरे से पूछा। वो चुप रही, लेकिन उसने अपना सिर मेरे सीने पर रख दिया। हम दोनों चुप थे, बस बारिश की आवाज़ थी। धीरे-धीरे मैंने उसके बालों में हाथ फेरा, और वो करीब आ गई।
उस पल में सब कुछ बदल गया। दीदी ने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए, एक नरम चुंबन। मैं स्तब्ध था, लेकिन मैंने भी उसे कसकर पकड़ लिया। हमारा चुंबन गहरा होता गया, जैसे सालों की दबी हुई भावनाएँ बाहर आ रही हों। उसके शरीर की गर्मी मुझे महसूस हो रही थी, और मैंने उसे अपनी गोद में उठा लिया।
हम मेरे कमरे में चले गए, दरवाज़ा बंद किया। दीदी की साँसें तेज़ थीं, और मैंने उसके कपड़े धीरे-धीरे उतारे। उसकी त्वचा इतनी मुलायम थी, जैसे रेशम। मैंने उसके स्तनों को छुआ, और वो सिसकी। "राहुल, धीरे," उसने कहा, लेकिन उसकी आँखों में इच्छा थी।
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मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया, और उसके शरीर को चूमा। उसकी कमर, उसकी जाँघें, सब इतने आकर्षक थे। दीदी ने मेरे कपड़े उतारे, और हम दोनों नग्न थे। मैंने महसूस किया कि उसकी योनि पर छोटी-छोटी झांटें थीं, जो उसे और भी नैचुरल बना रही थीं। मैंने वहाँ छुआ, और वो कराह उठी।
उसकी चूत इतनी नरम और गीली थी, छोटी-छोटी झांटें मेरी उँगलियों से रगड़ रही थीं। मैंने धीरे से अपनी उंगली अंदर डाली, और दीदी ने मेरे कंधे पर नाखून गड़ा दिए। "ओह राहुल," उसने कहा, और मैंने अपना मुँह वहाँ रख दिया। उसकी महक, उसका स्वाद, सब मुझे पागल कर रहा था।
दीदी ने मुझे ऊपर खींचा, और मैंने अपना लिंग उसकी चूत पर रगड़ा। छोटी झांटें मेरे खिलाफ ब्रश हो रही थीं, एक अलग सा सेंसेशन। धीरे से मैं अंदर घुसा, और हम दोनों एक हो गए। उसकी दीवारें मुझे कस रही थीं, और मैं धक्के देने लगा। दीदी की सिसकियाँ कमरे में गूँज रही थीं।
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हमारा मिलन भावनात्मक था, जैसे प्यार और इच्छा का मिश्रण। मैंने उसके कान में कहा, "दीदी, मैं तुम्हें बहुत चाहता हूँ।" वो बोली, "मैं भी राहुल, लेकिन ये गलत है।" फिर भी हम रुके नहीं, हमारी गति बढ़ती गई, और आखिरकार हम दोनों चरम पर पहुँचे।
उसके बाद हम लेटे रहे, एक-दूसरे को गले लगाए। लेकिन अगले दिन एक अजीब सा तनाव था। दीदी ने कहा, "ये सिर्फ एक बार था, हमें रुकना चाहिए।" मैंने सहमति दी, लेकिन अंदर से संघर्ष कर रहा था। फिर भी, शाम को जब घर खाली था, हम फिर करीब आ गए।
इस बार दीदी ने पहल की, मुझे चूमते हुए। हम बाथरूम में चले गए, शावर के नीचे। पानी हम पर गिर रहा था, और मैंने उसकी चूत को फिर छुआ। छोटी झांटें गीली होकर और आकर्षक लग रही थीं। मैंने उसे दीवार से सटाकर प्रवेश किया, तेज़ धक्कों के साथ।
दीदी की कराहें पानी की आवाज़ में घुल गईं, और हमारा क्लाइमेक्स और भी तीव्र था। लेकिन हर बार के बाद एक अपराधबोध आता था। हम बात करते, अपनी भावनाओं पर चर्चा करते, लेकिन आकर्षण कम नहीं होता।
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एक रात हम छत पर गए, तारे देखते हुए। दीदी ने कहा, "राहुल, ये रिश्ता क्या है हमारा?" मैंने जवाब दिया, "प्यार है, लेकिन समाज नहीं मानेगा।" हम फिर एक हुए, खुले आसमान के नीचे। उसकी चूत की छोटी झांटें मेरे हाथों में महसूस हो रही थीं, और मैंने उसे जीभ से सुख दिया।
समय बीतता गया, हमारी मुलाकातें गुप्त रहतीं। हर बार कुछ नया, कभी धीमा और भावुक, कभी तेज़ और जंगली। दीदी की आँखों में अब शांति थी, लेकिन डर भी। मैं जानता था ये लंबा नहीं चलेगा, लेकिन फिलहाल हम साथ थे।
एक शाम दीदी ने मुझे गले लगाया, और हम फिर बिस्तर पर थे। मैंने उसकी चूत पर छोटी झांटों को सहलाया, और वो मुस्कुराई। "तुम्हें ये पसंद है न?" उसने पूछा। मैंने हाँ कहा, और हम फिर एक हो गए, भावनाओं की गहराई में डूबते हुए।